Connect with us

Hi, what are you looking for?

Local News Community

सुख-दुख

अखबार, टीवी के बाद अब बिकाऊ सोशल मीडिया – एक भरोसे का खत्म हो जाना

संजय सिन्हा

संजय सिन्हा-

हुत पुरानी बात नहीं है, सुबह अखबार में छपी हर खबर सच्ची लगती थी। अखबार में छप गया, मतलब ब्रह्मा जी ने लकीर खींच दी। बड़ा, छोटा हर अखबार सच्चा लगता था।

लोग नेताओं पर संदेह करते थे, पत्रकारों पर नहीं। अखबार पर नहीं।

फिर टीवी पर खबरों का ज़माना आया। याद कीजिए दूरदर्शन का वो दौर, जब रात 9 बजे टीवी एंकर जो कह देता था, वो सच का उदाहरण होता था। उन दिनों हम हाथ में नोटबुक लेकर बैठा करते थे कि टीवी पर जो जानकारी आ रही है, उसमें से महत्वपूर्ण जानकारी को अपने पास दर्ज कर लें।

वो सब भरोसे का संसार था।

अखबार, रेडियो, टीवी। पत्रकार कुछ कहते थे तो उसके मायने होते थे।

मैंने तो जनसत्ता अखबार में नौकरी करते हुए देखा है कि लोग संपादक के नाम पत्र में भी अपनी कोई शिकायत लिख देते थे तो उस पर तुरंत कार्रवाई होती थी। धीरे-धीरे सभी संस्था अपनी गरिमा खो रहे हैं।

हम और आप जब भी किसी जानकारी की तलाश करते हैं, तो सबसे पहले गूगल पर जाते हैं। जब हम होटल बुक करते हैं, तो उसकी रेटिंग देखते हैं। जब हम बाहर खाना खाने जाते हैं, तो भी रेटिंग देखकर जाते हैं। और जब हमें किसी चीज़ के बारे में राय बनानी होती है, तो यूट्यूब पर रिव्यू भी देखते हैं।

संजय सिन्हा हमेशा छोटी-बड़ी बातों के लिए सलाह पर निर्भर रहते हैं। लेकिन कल दिल टूट गया। कल मेरे पास एक फोन आया। फोन करने वाले ने कहा, “संजय सिन्हा जी, क्या आप कोई काम करना चाहते हैं?” मैंने पूछा, “किस तरह का काम?” तो उसने कहा, “घर बैठे हजारों रुपए कमाने का काम।”

कैसे?

“हम लोग होटल रिव्यू देने वाली कंपनी हैं। हमारा काम है होटल की रेटिंग देना। आपको बस इतना करना है कि हम जिन होटलों की सूची भेजेंगे, आपको उसमें रेटिंग देनी होगी। हम आपको सब कुछ बताएंगे, और आप उसी हिसाब से लिखेंगे। हर रेटिंग के बदले होटल वाले आपके अकाउंट में दो सौ रुपए जमा कराएंगे।”

“तो क्या सिर्फ तारीफ लिखनी होगी?”

“नहीं। कुछ होटलों की शिकायत भी करनी होगी। वो लिस्ट भी हम देंगे। और अगर आप सहमति पत्र पर हस्ताक्षर कर देते हैं, तो हम आपको ट्रेनिंग देंगे कि रेटिंग कैसे दी जाती है।”

“बिना वहां गए हुए?”

“हां, हां। वो सब हमारी जिम्मेदारी है। आप बस हमारे कहे मुताबिक रेटिंग दीजिए, और पैसे कमाइए।”

मैं हतप्रभ था।

क्या जो तारीफ और शिकायत हम पढ़ते हैं, वो सब फर्जी अनुभव होते हैं?

मैं कुछ कह नहीं पाया। क्या कहता?

सोशल मीडिया पर जो इन्फ्लुएंसर घूम रहे हैं, क्या वो सब?

राजनीतिक चमचे तो सक्रिय हैं ही, अब ये रेटिंग भी?

फेसबुक पहले ब्लू टिक देती थी, आदमी की विश्वसनीयता पर। अब सब बिकाऊ हो गया है।

मतलब सब झूठ ही हो गया है?

मुझे कभी-कभी पिताजी की याद आती है। उनका कहा हुआ आज भी कानों में गूंजता है, “बेटा, पैसे कितने कमाए, इसकी कोई अहमियत नहीं। कैसे कमाए, ये बहुत महत्वपूर्ण है।”

ओह! अखबार छूटा। टीवी छूटा अब सोशल मीडिया भी?

जाएं तो जाएं कहां? बचें तो बचें कैसे?

संजय सिन्हा कल से उदास हैं। किस पर भरोसा करूं? आप ही बताइए।

नोट- हैप्पी 26 जनवरी। बहुत साल पहले आज के दिन ही हमारे देश में लोगतंत्र बहाल हुआ था।

CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
1 Comment

1 Comment

  1. प्रोफेसर शरद कुमार

    January 28, 2025 at 2:54 am

    अखबार टीवी सोशल मीडिया क्रम से देश को मिट्टी में मिला रहे हैं। सच्चाई के रास्ते ही हम आगे बढ़े हैं और आगे बढ़ते रहेंगे। झूठ से हम अपना भला कर सकते हैं पर देश का नहीं। टीवी और अखबार की मुख्य हेडिंग सरकारों को ज्यादातर खुश करने वालीं होती हैं। देश संकट में हैं बढ़ती आय की असमानता देश के लिए चिंता का विषय है। क्राइम कम होने का नाम नहीं ले रही है। हर दिन महिलाओं के प्रति हिंसा औऱ बलात्कार की घटनायें बढती जा रहीं हैं। धर्म की आड़ में हम बहुत कुछ छिपा रहे हैं। समय हैं इनको उजागर करने का। सच लिखकर और सच कहकर देश को 2047 तक विकसित बनाने की योजना पर विचार किया जा सकता है।
    सच्चाई छुप नहीं सकती बनावट के उसूलों से की खुशबु आ नहीं सकती किसी काग़ज़ के फूलों से अब तो इसी गाने पर भरोसा करना हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

भड़ास लीगल टीम : Bhadas Legal Team

भड़ास मेल: [email protected]

Latest 100 भड़ास

विज्ञापन