नाश्ते के बाद एक बाउचर पर दस्तखत करने के बाद मुझे डेढ़ सौ रुपये मिले। उस समय कमरे का किराया पचहत्तर रुपये महीने था मुझे दो महीने का किराया एक साथ मिल गया! यह कविता से मेरी पहली कमाई थी। शिवकुटी लाल जी ने अलग से मेरी तारीफ की और कहा कि छोटी कविताओं की चोट बड़ी है…

बोधिसत्व-
शिवकुटी लाल वर्मा से अश्क जी तक!
मैं चार पाँच मित्रों के साथ लोकभारती गया! वहाँ उसके स्वामी द्वय आदरणीय रमेश ग्रोवर जी और दिनेश ग्रोवर जी मिले। मैंने मित्रों के सामने उनसे पूछा कि मुझे मेरा कविता ग्रंथ प्रकाशित करवाना है। बतायें कब छप जाएगा। रमेश जी ने कहा कि तीन चार साल लगेंगे!
हमें बुरा लगा। बल्कि कहें तो धक्का लगा। अभी हम बीए के पहले साल में थे और हमारा पहले साल का इम्तहान भी नहीं हुआ था! उन मित्रों में रामजी सेठ पिछले साल संसार से विदा हो गए! उन मित्रों में पद्म देव सिंह और जंग बहादुर सिंह यहाँ फेसबुक पर उपस्थिति हैं! पद्मदेव यहाँ पीडी सिंह हैं।
मैंने पचासी से सत्तासी के बीच लिखी सारी कविताएँ सुलेख में उतार कर एक पांडुलिपि बना ली थी और स्वयं को कवि मानने लगा था। सुबह उठ कर अखबार देखता और जहाँ साहित्यिक आयोजन की सूचना होती वहाँ जाता और सुनता। ऐसे ही एक आयोजन में शिवकुटी लाल वर्मा जी मिल गये और मैंने उनको अपना हाथ से बनाया मोटा संग्रह पकड़ा दिया। उन्होंने कुछ कविताएँ पढ़ीं और फिर सबको मंच पर बुलाया जाने लगा तो वे भी मेरे बगल से उठ कर मंच पर चले गये।
उनका शांति के साथ उठना और धीरे-धीरे मंच तक जाना आज भी याद है। जाते-जाते उन्होंने कहा आप रुकियेगा, जाइएगा नहीं। मैं उनके कहे का भाव समझ नहीं पाया लेकिन बैठा अवश्य रहा! वे आगे रुकने के लिए न कहते तो भी मैं बैठा ही रहता।
सुबह के अखबार से इस आयोजन की सूचना मिली थी। मैं ऐसे आयोजनों में कुर्ता पायजामा और ऊपर एक खादी की सदरी पहन कर जाता था। कवियों का सा बानक बना कर। यह आयोजन कुल भास्कर आश्रम डिग्री कॉलेज के सभागार में चल रहा था। कुछ लोगों ने काव्य पाठ किया होगा कि शिवकुटी लाल वर्मा जी ने माइक पर आये और मेरा नाम लेकर मुझे काव्य पाठ के लिए मंच पर बुलाया। माइक पर मुझे मेरा नाम अखिलेश कुमार मिश्र सुन कर बहुत अच्छा लगा। मैं मंच पर गया तो उन्होंने कहा कि मैं अपनी ये तीन कविताएँ सुनाऊँ। मुझे अचरज हुआ और बहुत अच्छा लगा कि उन्होंने मेरे द्वारा दी गई फाइल से तीन चार छोटी कविताओं के शीर्षक के साथ मेरा नाम और बीए पार्ट वन नोट कर लिया था।
मैंने तीन कविताएँ पढ़ीं। वहाँ उपस्थित सबने खूब सराहना की वे छोटी-छोटी तीन कविताएँ थी- सिकंदर, लौट गये पिता, दिल्लगी। मैंने इस तरह पढ़ा जैसे मैं युगों से पढ़ता आ रहा हूँ। मेरी भर्रायी सी आवाज मुझ तक लौट आती थी और मुझे हौसला देती थी कि ठीक पढ़ रहे हो। काव्य पाठ पूरा करके शिवकुटी लाल जी को अंगुली दिखा कर उनका धन्यवाद ज्ञापन किया और मंच से नीचे आकर अपनी जगह बैठ गया। मेरे मन में यह ध्यान भी नहीं आया कि किसी से उनका नाम भी पूछ लेता या यही कह देता कि अध्यक्ष जी का और कुल भास्कर आश्रम के आयोजकों का आभार।
आयोजन पूरा हुआ। अंत में शिवकुटी लाल जी ने अपनी कविताओं का पाठ किया। उनको खूब सराहना मिली। लेकिन मंच से उतर कर वे जल्दी से मेरे पास आए और मुझसे कहा आप जाइएगा नहीं नाश्ता करिए और एक बाउचर पर दस्तखत कर दीजियेगा! उन्होंने जिस तरह कहा मैंने किया। जाड़े के दिन थे। मकर संक्रांति के बाद का कोई दिन था। मेरी काको माघ मेले में कल्प वास के लिए आ गई थी और मुझे हर शाम को उनसे मिलने जाने का मन करता था! बड़े ताऊजी सपरिवार दारागंज में रहते थे। काको का प्रबंध वे और भैया लोग देखते थे!
नाश्ते के बाद एक बाउचर पर दस्तखत करने के बाद मुझे डेढ़ सौ रुपये मिले। शिवकुटी लाल जी ने अलग से मेरी तारीफ की और कहा कि छोटी कविताओं की चोट बड़ी है।
उस समय कमरे का किराया पचहत्तर रुपये महीने था मुझे दो महीने का किराया एक साथ मिल गया! यह कविता से मेरी पहली कमाई थी! अगले दिन के अखबारों में काव्य पाठ करने वालों में मेरा नाम प्राथमिक लोगों में छपा था। सिकंदर कविता की पंक्तियाँ उद्धृत की गई थीं! आगे वह और वहाँ पढ़ी गई अन्य दो कविताएँ मेरे पहले संकलन में प्रकाशित हुईं।
तब की मेरी लेखकीय मनोदशा ऐसी थी कि मैं हर दिन दो तीन कविताएँ लिखता था। जिस दिन कोई कविता नहीं लिख पाता था लगता था कि कुछ खो गया है। अगले दिन पिछली दिन की क्षति पूर्ति में और लिखता।
काव्य पाठ की उस शाम मैं माघ मेले गया। वहाँ काको से मिला। उसे बताया कि मुझे डेढ़ सौ रुपये मिले हैं। उसने बहुत सारा आशीष दिया! अगले दिन साथ में लोकभारती गये मित्रों में से एक ने मुझे अखबार दिखाया और फिर से बैठक जमी। यह बैठक मध्यकालीन इतिहास विभाग और प्राचीन इतिहास विभाग के बीच की खाली जगह पर जहाँ अमलतास या कदम्ब का बड़ा पेड़ था वहाँ घास पर हुई। मित्रों ने मुझसे वे कविताएँ फिर से सुनीं। उसी बैठक में मुझे अनिल सिंह अनिलाभ नाम के कवि मित्र मिले। उन्होंने भी एक कविता सुनाई। जिसकी एक पंक्ति थी- ‘यह स्याही जहाँ गिरे बारूद हो जाये’
यह कविता अनिलाभ भाई अक्सर सुनाते। आगे भी एक दो बार इसे दहाड़ते हुए सुनाया उन्होंने।
गाजीपुर निवासी अनिलाभ भाई भी फेसबुक पर अनिल सिंह पटेल गाजीपुरिया नाम से उपस्थित हैं। मित्रों ने चाय पिलाने को कहा। हम सात आठ लोग हॉलैण्ड हॉल हॉस्टल की दीवार तोड़ कर बनाई चाय की उस दुकान पर गये जहाँ चाय के साथ बंद मक्खन भी मिलता था और जीरे वाला बिस्कुट भी! वह दूकान ओम प्रकाश की थी।मेरे बीस पच्चीस रुपये खर्च हुए लेकिन आनन्द इस बात का अधिक था कि आज अखबार में नाम आया है तो कल लोकभारती वाला किताब भी छापेगा। हुआ भी वही अक्तूबर 1991 में मेरी पहली किताब लोकभारती से ही आई। विमोचन के दिन भी उन मित्रों ने कहा कि गुरु तुम्हारी बात भी सही हुई। क्योंकि मैंने पहली बार लोकभारती में कहा था कि किताब तो यहीं से छपेगी।
मैं रोज लिखता और शहर में हो रहे आयोजन में जाने के लिए नहा धो कर तैयार रहता। अल्लापुर में रहता था तो कभी कृष्णेश्वर डींगर जी के घर तो कभी तिलक राज गोस्वामी जी के घर पहुँच जाता। तिलक राज जी ने कहा कि आपका स्वर बहुत उत्तम नहीं है तो आप गीत नुमा कुछ न लिखिए क्योंकि गलाबाजी आपसे हो नहीं पाएगी! डींगर जी ने मुझे बहुत गंभीरता से नहीं लिया। उन्होंने मुझसे पूछा आप क्यों लिखते हैं? उनका आशय था कि मेरे साहित्य का उद्देश्य क्या है? लेकिन मुझे लगा कि वे जानना चाह रहे हैं कि कविता लिखने से मुझे किसी लाभ की अपेक्षा है? तब तक मैं साहित्य के किसी बड़े उद्देश्य से लेखन किए जाने के महान भाव से परिचित नहीं था। मैंने कहा नाम करना है और पैसे पाने हैं। उनको शायद मेरी बातें अच्छी नहीं लगीं। लेकिन तब तक के मेरे लिखने का उद्देश्य शायद नहीं बल्कि निश्चित रूप से इतना ही था। नाम और पैसा। क्योंकि अभी तक मैं जनवादी नहीं हुआ था न जनवादी शब्द से परिचित था न जनवादी लेखकों और लेखक संघ से!
साहित्य के नाम पर अब तक धूमिल की संसद से सड़क तक और केदार नाथ सिंह की ज़मीन पक रही है के अलावा भवानी प्रसाद मिश्र की किताब नीली रेखा तक कुल तीन चार किताबें ही पढ़ पाया था। और उस पर भी स्थिति ऐसी थी कि जिसको पढ़ता उसके जैसे लिखने लगता। विकल मन को आराम नहीं था। शिवकुटी लाल वर्मा जी का पता भी नहीं ले पाया था। उन दिनों शहर के जिस लेखक के बारे में कुछ ज्ञात हो जाता उसी के घर दौड़ पड़ता। किसी ने कहा बिरहा गायक राम कैलाश से मिलो। आगे शायद मैं यह भी करता।
इसी बीच एक दिन अमृत प्रभात में विख्यात साहित्यकार उपेन्द्र नाथ अश्क जी का एक इंटर व्यू पढ़ा जिसमें उन्होंने कहा था कि वे नये लोगों को निखारने के लिए दिन रात मेहनत करते हैं और प्रतिभाओं को बढ़ावा देना उनको भी नया करता रहता है। यह इंटरव्यू राम बाबू रेणुज ने लिया था। समस्या यह थी की अश्क जी इलाहाबाद में कहाँ रहते हैं उन तक कैसे पहुँच सकता हूँ?
कोई रास्ता न पा कर मैं अमृत प्रभात के दफ्तर चला गया। घुसने पर एनआईपी के मालिकान में किसी एक दो की उजली सी मूर्ति दिखी। इसके पहले मैं बनारस के आज अखबार के दफ्तर कई बार जा चुका था। वहाँ से अवकाश साप्ताहिक और आज के साप्ताहिक पन्नों पर कविता छपवाने के लिए मैं कई बार संपादक शार्दूल विक्रम गुप्त से मिल भी चुका था। उन्होंने मुझे छापा तो नहीं लेकिन पहचानने अवश्य लगे थे। लेकिन उस जान पहचाना से कोई लाभ न हुआ। वहाँ भी कविताएँ प्रकाशित नहीं हो पाई थीं! वह वृतांत आगे कभी!
इलाहाबाद में भी कविता छपने का कोई सही उपाय नहीं बन पा रहा था।
अमृत प्रभात के दफ्तर में मेरी भेंट हिमांशु रंजन जी या उनके भाई साहब से हुई! वहाँ से मुझे अश्क जी का पता मिला। यह अप्रैल की कोई सुलगती हुई शाम थी। मैं बहुत उत्साहित था। मुझे एक दो दिन में एक ऐसा लेखक मिलेगा जो नये लोगों को निखारने में बहुत मेहनत करते हैं। पता रट लिया, पाँच खुसरो बाग। पता तो बहुत छोटा था अश्क जी का वह पूरा इंटरव्यू तक मैं रट गया था। अश्क जी से मिलूँगा तो वे कविताएँ जरूर सुनाऊँगा जिनकी तारीफ शिवकुटी लाल वर्मा जी ने की थी और जिनको पढ़ने पर डेढ़ सौ रुपये मिले थे मुझे।
पता मिलने की अगली सुबह मैं गाँव चला गया। बेचैन इधर उधर गेहूं के खेत और खलिहान और कुछ अन्य आयोजन थे घर गाँव में। मई के दूसरे सप्ताह में इलाहाबाद लौट आया। अश्क जी का पता जेब में लेकर सिविल लाइंस की ओर से बड़े स्टेशन के ओवर ब्रिज से पार करता हुआ खुसरो बाग गया लेकिन सही जगह पहुँचने में देरी हो गई। दिन दुपहरिया मैं कुर्ता पायजामा और खादी की मोटी सदरी पहने अश्क जी को खोजता रहा। झौंस देने वाली तपन और पसीने की परवाह किए बिना मैं लगातार पाँच खुसरो बाग तलाशता रहा लेकिन पहुँचा नहीं! बहुत देर बाद किसी एक रद्दी अखबार वाले ने बताया कि वो अश्क तो बहुत बड़ा पागल है। इंदिरा गाँधी की नै सुनता। ऊ भुट्टो से सीधे बात करता है। ऊ तुमसे क्यों मिलेगा? उससे क्या करोगे मिल कर? मैंने कहाँ भाई पता बता पाओ तो बता दो? उसने खुसरो बाग की दीवार से बाहर जाने को कहा। मेरी गलती यह थी कि मैं अश्क जी का घर खुसरो बाग के आहाते में अमरूदों के बाग के आस पास कहीं खोज रहा था जबकि घर आहाते के बाहर की ओर लूकर गंज लो साइड में था!
साइकिल लेकर तपा हुआ मैं उनके अहाते में घुस गया! मेरी स्थिति किसी नून बेचने वाले ढूसर बनिये की सी हुई पड़ी थी! कंधे पर झोला! झोले में दो सौ कविताओं के दो संग्रह! मुझे नहीं ध्यान कि किससे मैंने कहा मुझे अश्क जी से मिलना है! शायद उमेश जी थे! अश्क जी के बड़े पुत्र!
दोपहर के तीन या साढ़े तीन बजे रहे थे। मैं भुना हुआ था! अश्क जी को लगा मैं ग़ुस्से में लाल हुआ हूँ! उनकी बैठक के कूलर चल रहे थे! उन्होंने हल्का सा दरवाजा खोला कर मुझे देख कर कहा- ‘क्रोध पाप कर मूल’
मैंने कहा क्रोध नहीं घाम से लाल हुआ हूँ!
उन्होंने कहा अंदर आ जाओ!
मैं अश्क जी के सामने था!
महीने भर से इस मुलाकात की प्रतीक्षा थी। उन्होंने कहा बताओ कहाँ से और क्यों आए हो?
मैंने कहा आप नये लोगों को निखारते हैं। मैंने आपका इंटरव्यू पढ़ा था। अमृत प्रभात में! वे जोर से हंसने के लिए मुँह ऊपर उठा लिये। मुँह पान के ओगार से भरा था। मेज के नीचे से बड़ा उगाल दान निकाल कर मुँह खाली किया और देर तक हंसते रहे! मुँह के दोनों किनारों से पान का लाल रंग फैल रहा था। उसे पोछते हुए
पूछा – क्या लिखते हो?
मैंने बहुत दर्प से कहा ‘कविता’
वे मेरा झौंसा झुलसा मुँह देख कर या जिस भाव स्वर में कहा था या जैसा मेरा बानक था उसमें मैं भी कविता लिखता हूँ यह सुन कर वे फिर हंसे! मेरा बाना आज के ग्राम प्रधानों जैसा ही था!
लेकिन मुझे याद है उनके हंसने पर मैं भी हंसा था!
यहाँ उस दिन कुल भास्कर आश्रम वाले आयोजन में पढ़ी गई कविताएँ छाप दे रहा हूँ जिसे शिवकुटी लाल वर्मा जी ने पढ़ने के लिए कहा।इन कविताओं के लिखने तक मैं किसी भी लेखक संगठन का नाम तक नहीं जानता था!
।।दिल्लगी।।
माँ,
अगर बनी रही दिल्ली
तो दिल्लगी नहीं करता मैं
घर एक
दिल्ली में बनाऊँगा
तुम्हें दिल्ली दिखाऊँगा।
।।लौट गए पिता।।
आए थे पिता
कुछ-कुछ उदास
कुछ-कुछ हताश
लौट गए पिता
बिल्कुल उदास
बिल्कुल हताश।
।।सिकन्दर !।।
सिकन्दर!
सैनिक थके हुए हैं
सैनिक अपने परिवार में
पहुँचना चाहते हैं
सैनिक सोना चाहते हैं
अपने घर में
सैनिक अपने बच्चों को
एक बार चूमना चाहते हैं।
सैनिक अपने को
तुमसे और घोड़ों से
अलग साबित करने के लिए
बीड़ी पी रहे हैं।
नोट: चित्र में स्वर्गीय शिवकुटी लाल वर्मा जी (सबसे ऊपर)
पिछला भाग…
इलाहाबाद के किस्से (पार्ट-5) : अक्सर नीलाभ जी की आवाज गूंजती है- कहाँ रहेंगे दस साल बाद कभी सोचा है?


