अमर उजाला कानपुर में कभी विवादों का अंत नहीं होता दिखता। हर शाख पे ….अब देखिए सनसनी खेज खबर के चक्कर में क्या कर डाला। दरअसल प्रधानमंत्री मोदी 30 मई को कानपुर आए थे और जनसभा को संबोधित किया था।
अमर उजाला कानपुर के एक हीरो हीरालाल ने सनसनीखेज खबर के चक्कर में किसी के कान में फूंकने पर एक खबर लिख डाली कि एक हिस्ट्रीशीटर भाजपा नेता संदीप ठाकुर ने प्रधानमंत्री से मुलाकात की। उस भाजपा नेता को हिस्ट्रीशीटर बताते हुए प्रधानमंत्री से मिलने की फोटो भी छापी जो उस भाजपा नेता ने ही अपने फेसबुक पोस्ट पर लगाई थी।
पत्रकारिता का बेसिक नियम होता है कि हम अगर किसी पर कोई आरोप लगा रहे हैं वो भी पार्टी बनकर तो उसका पक्ष जरूर ले लें। लेकिन यहां रिपोर्टर ने किसी तीसरे पक्ष के कहने पर भाजपा नेता संदीप ठाकुर की छीछालेदर कर डाली बिना उसका पक्ष जाने और तो और इतनी संवेदनशील खबर में किसी भाजपा नेता की भी बयान नहीं लिया। वही हुआ जिसका अनुमान था, अगले दिन हंगामा मच गया।
छानबीन शुरू हुई तो पता चला कि भाजपा नेता संदीप ठाकुर की हिस्ट्रीशीट तो शासन के आदेश पर 2019 में ही खत्म की जा चुकी है। अब सवाल है तो फिर उसे 2025 में हिस्ट्रीशीटर कैसे लिख दिया गया जब उसकी हिस्ट्रीशीट 2019 में ही खत्म हो चुकी है?
सीधा मानहानि का मामला बनता है। अब फजीहत होने पर भूल सुधार की जगह अगले दिन फिर खबर छापी गई पुलिस के कंधे पर बंदूक रखकर कि जांच होगी और भाजपा नेता की हिस्ट्रीशीट फिर से खोली जाएगी।
यानी इससे भी तय हो गया कि हिस्ट्रीशीट बंद है तभी तो लिखा कि फिर खोली जाएगी। अगले दिन इस बड़े अखबार के बड़े पत्रकारों ने और गड़बड़ी की। अपनी गलती छिपाने और मामला बैलेंस करने के लिए दो और भाजपा नेताओं अरविंद राज त्रिपाठी एडवोकेट और वीरेंद्र दुबे एडवोकेट को भी हिस्ट्रीशीटर बताकर उनके भी प्रधानमंत्री से मिलने की खबर अगले दिन छाप दी गई। फिर वही गलती कि उनका पक्ष नहीं लिया गया।
वीरेंद्र दुबे सुप्रीम कोर्ट के एडवोकेट हैं। 35, 40 साल पुराने नेता हैं। कई पार्टियों में रहे हैं। भाजपा में भी विधिक और कानून विभाग में पदाधिकारी हैं। फिर हंगामा मचा तो खंडन के लिए अगले दिन उनका पक्ष छाप दिया गया कि हिस्ट्रीशीटर नहीं हैं। अब दोनों नेता मानहानि की फाइल तैयार कर रहे हैं।
सवाल वही कि पत्रकारिता के बेसिक नियम यानी दोनों पक्ष को जाने बिना इतनी संवेदनशील खबर कैसे लिख दी गई, किसी सीनियर ने चेक क्यों नहीं की, बिना किसी का पक्ष लिखे खबर पास कैसे हो गई, क्या प्रधानमंत्री को घेरे में ले रही खबर की जानकारी संपादक को दी गई?
क्या इतनी संवेदनशील खबर सोशल मीडिया से उठाकर बिना किसी का पक्ष जाने छापी जानी चाहिए? जवाब वही कि हर शाख पर….


कानपुर से भड़ास को भेजे गए एक गोपनीय मेल पर आधारित


