
दिनेश पाठक-
अमर उजाला नोएडा दफ्तर में पत्रकारिता में नए-नए प्रवेश करने वाले कुछ युवक-युवतियों से मुलाकात हुई। इन्हें मिलने के बाद मेरा भरोसा एक बार फिर दृढ़ हुआ कि देश का भविष्य उज्ज्वल है।
इन्हें अमर उजाला ने अपने कैम्पस सेलेक्शन प्रॉसेस से भर्ती किया है। यह अच्छा प्रयास है।
जब नई पौध सवाल-जवाब के मोड में आ जाये तो माना जाना चाहिए कि वह समय आने पर सबसे हिसाब माँगने में सक्षम दिखेगी। इन युवाओं का कॉन्सेप्ट एकदम क्लियर है। दिशा तय करके ही आये हैं। अब बस एक महत्वपूर्ण बात इनके करियर को पंख दे देगी, जब ये यूनिट्स में पहुँचें तो कुछ उदारमना सीनियर्स मिल जाएं। जो डपटकर इनकी सवाल पूछने की स्किल खत्म न कर दें। इन्हें लिखने की आजादी मिले। बोलने की आजादी मिले।
मेरे लिए सिर्फ दो छोटे विषय तय थे लेकिन इनकी जिज्ञासा ऐसी कि विषय पर बोल लिया तो ये पत्रकारिता के अन्य पहलुओं को जानने लगे। दो घण्टे का सत्र करीब तीन घण्टे चला। न मेरा मन भरा और न उनका। वह तो भला हो उदय सर का, जो ट्रेनिंग का जायजा लेने आ गए। मौका देखकर मैंने अपनी बात झट से खत्म की और सर को सुनने लगा।
मेरा एक ऑब्जर्वेशन यह रहा कि उदय सर ने पत्रकारिता के नवांकुरों से मेरे बारे में जब बात शुरू की तो वे सब कुछ कह गए, जो मैं करता आ रहा हूँ। जबकि सर से बातें तो यदा-कदा होती है लेकिन मुलाकातें न के बराबर हैं। फिर भी एक अभिभावक की तरह सर की मेरी हर गतिविधि पर नजर है। यह मेरे लिए बहुत शानदार बात है। गर्व करने का कारण भी है। जब तक अभिभावक की नजर आप पर है तब तक आपसे गलती होने की आशंका खुद कम रहती है।

यही वह अकेला कारण है कि मैं कोशिश करता रहता हूँ। प्रयोग करने से भी परहेज़ नहीं करता हूँ। जिससे आपने पत्रकारिता का ककहरा सीखा हो, उसे वर्षों बाद लाइव सुनना मेरे लिए भी प्रेरणादायी रहा।
यह मौका दिया था अमर उजाला के स्थानीय संपादक श्री कुणाल वर्मा ने, जो एक बेहतरीन फ़िल्म निर्देशक की तरह कैमरे के पीछे ही रहे। उनका आभार इसलिए खास तौर से बनता है क्योंकि उन्होंने जहाँ नई पीढ़ी से मिलने का मौका दिया तो उसी हाल में मेरे करियर के शुरुआती दिनों के आदर्श, शिक्षक, सीनियर श्री उदय कुमार सर को भी सुनने का मौका दे दिया। यह आम के आम गुठलियों के दाम जैसा रहा। सर के साथ मैंने लखनऊ हिंदुस्तान में काम किया था।


