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सियासत

अमेरिका हमारी मजबूरी है, लेकिन भारत भी अब पहले वाला नहीं रहा!

नितिन त्रिपाठी-

अमेरिका से व्यापार का सबसे पॉजिटिव पहलू कह लीजिये या सबसे बड़ा इशू कह लीजिये वह यह है कि जो एक बार अमेरिका से व्यवसाय कर लेता है, उसका बिजनेस मॉडल ऐसा हो जाता है कि आसानी से इतना रेवन्यू कहीं और हो पाना असंभव रहता है. तीस ट्रिलियन की इकॉनमी, 35 करोड़ जनसंख्या, प्रति व्यक्ति आमदनी 85,000 डॉलर. खूब बड़ी जनसंख्या है जिसके पास पैसे भी बहुत हैं. इसे भारत के संबंध में ऐसे समझ सकते हैं कि भारत की जीडीपी अब चार ट्रिलियन ही, पर यह सवा अरब जनता में फैली है तो प्रति व्यक्ति बमुश्किल ढाई हज़ार डॉलर आता है. इसमें अधिसंख्य ज़िन्दगी के बेसिक रोटी कपड़ा मकान में खर्च हो जाता है.

दरअसल आम जनता तो आम जनता मीडिया तक सही से रिसर्च कर बिजनेस/ एक्सपोर्टर्स का पक्ष नहीं रख पा रहा है. इन फैक्ट कई जगहों पर हास्यास्पद तर्क देखे – हम सबसे बड़े उपभोक्ता हैं. नहीं – अमेरिका से व्यापार के संदर्भ में हम विक्रेता हैं वह उपभोक्ता. हम उनसे एक रुपये का सामान खरीदते हैं, दो का बेचते हैं. हम उनसे खरीदते भी वही हैं जो हमारी मजबूरी है – तेल (थोड़ा सा), हवाई जहाज (दुनिया में दो कंपनियाँ बनाती हैं, बोइंग और एयर बस). थोड़े से डिफ़ेंस इक्विपमेंट – मुख्यतः तो रूस और फ़्रांस से लेते हैं मजबूरी वाला अमेरिका से लेते हैं. वहीं अमेरिका में हम वह चीजें बेचते हैं जो असल व्यवसाय है – कपड़े, लेदर आइटम, ज्वैलरी, घरेलू प्रयोग का सामान आदि. उनका पाला यहाँ मजबूत है.

अब दूसरी तुलना करते हैं – टीवी पर डिबेट चलती हैं – रसिया में माल बेच लेंगे. भाई साहब दुनिया का सबसे बड़ा स्व निर्भर देश रूस ही है. उसके पास अपनी खेती है, अपना फ्यूल है, सस्ता लेबर है, आपके माल की आवश्यकता उसे नहीं है. इसी लिए आज भी हमारा रूस से जो व्यापार है हम उनको जितना बेचते हैं उससे दस गुना माल ख़रीदते हैं. रूस को हम जितना निर्यात करते हैं उसका कई कई गुना ज़्यादा अमेरिका को करते हैं. उसमें भी रूस को कपड़े, जूते आदि नहीं निर्यात करते यह वह स्वयं बना लेता है. चाइना के बारे में भी आपको पता ही है. हम चाइना से लगभग सौ बिलियन का माल ख़रीदते हैं, और वो हमसे सोलह बिलियन का. उसमें भी ये जो चीजें हैं – घरेलू आइटम, कपड़े, ज्वेलरी, जूते : चाइना उसमें हमारा प्रतिद्वंदी है. वह भी सारी दुनिया को यही बेचता है हमसे कई गुना ज़्यादा. भारत चाइना का व्यापार बढ़े अच्छी बात है, पर इन देशों में अपना माल बेचा जा सकेगा इसकी विशेष संभावना शून्य ही है.

यूरोप का भी यही हाल है. छोटे छोटे देश हैं. हर देश के अपने नखड़े. अकेले अमेरिका से जितना रेवन्यू है उसका आधा भी यूरोप से नहीं होता और उसके लिए उनके हर देश की भाषा, उसका क़ानून समझना होता है.

तो लब्बो लुआब यह है कि निःसंदेह अमेरिकन टैरिफ़ से नुक़सान तगड़ा है व्यवसाय का. यह कल्पना करना कि भारतीय सरकारी अधिकारी यूरोप में जाएँगे डील सेट कर आयेंगे और भारत अकस्मात यूरोप में दस गुना माल खपाने लगेगा केवल टीवी मीडिया ही कर सकता है.

निःसंदेह भारत को अपने हितों के ख़िलाफ़ जाकर न समझौता करना चाहिए न करेगा. लेकिन यह भी तय है समय आने पर समझौता होगा ही, यह वृहद हितों में है. इस समय भारत को आवश्यकता है आर्थिक उन्नति की.

नोट: यह पोस्ट केवल और केवल प्रोडक्ट्स के संदर्भ में लिखी, सर्विसेज और रेमिटेंस के ऐंगल से तो हमारी डिपेंडेंसी बहुत ज़्यादा है यूएसए पर. फ़िलहाल ट्रम्प चिचा का ध्यान वहाँ नहीं गया है.


अंततः भारत पर 50% अमेरिकन टैरिफ की डेट आ ही गई.
अमेरिका में रहने वाले nri समुदाय के दृष्टिकोण से देखेंगे तो उस पर सबसे ज्यादा असर यह पड़ेगा कि उसकी इंडियन ग्रोसरी मुख्यतः चावल, मसाले, दाल आदि महंगे हो जायेंगे.

अमेरिका में टिपिकली इंडियन स्टोर में एक ओर जहाँ भारतीय ब्रांड मिलते हैं तो साथ ही पाकिस्तानी ब्रांड्स भी मिलते ही हैं. बीच के कुछ दसकों में एक बड़ी भारतीय nri कम्युनिटी ने पाकिस्तानी प्रोडक्ट्स जैसे शान मसाले, ज़ेब्रा राइस आदि का बहिष्कार कर रखा था. यद्यपि एक ठीक ठाक नंबर ऐसों का भी था जिन्हें कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता था.

किसी भी भारतीय का अमेरिका में मुख्य फ़ूड होता है चावल. सोना मसूरी सामान्य दिनों में और बासमती स्पेशल डेज़ में. यद्यपि बासमती का थोड़ा प्रचलन अमेरिकन फ़ूड में भी है. उनकी समस्या नहीं उन्हें तो जो सस्ता मिलेगा वह ले लेंगे. समस्या उन 50-60% सेक्युलर खेमे वाले भारतीयों की भी नहीं है वह पहले ही जो सस्ता मिलता है वो लेते आए हैं, एमडीएच मसाले महंगे होंगे तो शान मसाले ले लेंगे.

समस्या है राष्ट्र भक्त वाली nri कम्युनिटी की. अब इसके लिए सीधे सीधे 31% एक्स्ट्रा जेब से देना होगा और वो भारत को नहीं बल्कि अमेरिका को मिलेगा.

वैसे सोशल मीडिया पर ही इस बात के चर्चे हैं कि भारतीय बिजनेसेज प्रोडक्ट को कम टैरिफ़ वाले देशों से होकर घुमायेंगे. पर एग्रीकल्चर प्रोडक्ट्स में ऐसा करना विशेष प्रॉफिटेबल नहीं होता. जैसे कि अफ़्रीका से टैरिफ़ दस प्रतिशत ही है. पर एक भारतीय कंपनी एमडीएच वहाँ फैक्ट्री खोले फिर भारत से मसाले मंगाये फिर वैल्यू ऐड कर पैकेजिंग वहाँ करे – इतना करने से बेटर होगा कि वह इजिप्ट से ही जीरा ख़रीद अपने पैकेट में भर कर भेज देंगे – कोई उँगली भी न उठा पायेगा.

हाँ वो प्रोडक्ट्स जो इंडियन फैक्ट्री में बनते हैं जैसे पतंजलि टूथपेस्ट, डाबर अमला तेल आदि – यद्यपि इनका मार्केट इंडियन सेग्मेंट्स में भी विशेष नहीं है, ऐसे आइटम्स जरूर मिडल ईस्ट से घुमाये जायेंगे.

आने वाले दिन अमेरिका में रहने वाली nri community के लिए काफ़ी चैलेंजिंग होंगे.


नब्बे के दशक में आप सबको पता होगा 1991 में भारत को विदेशी देनदारी चुकता करने के लिए सोना गिरवी रखने की नौबत आ गई थी.

दर असल आप जब विदेश से कुछ भी आयात करते हैं तो आपको आवश्यकता होती है उस करेंसी की जिसे लेकर दूसरा देश आपको सामान दे सके. वह करेंसी तब भी डॉलर थे, अब भी डॉलर ही है मुख्यतः. आधुनिक युग में आप और कुछ आयात करें न करें तेल और गैस आयात करना ही पड़ेगा, नहीं तो देश की गाड़ी रुक जायेगी, चूल्हे बंद हो जायेंगे, रेलगाड़ी नहीं चलेगी, कारख़ाने बंद हो जाएँगे और सड़क पर गाड़ियाँ बंद हो जायेंगी.

अब डॉलर के साथ समस्या यह कि आपको खर्च करना है तो कमाना पड़ेगा. नहीं कमाया तो आपको सोना, बिल्डिंग, देश की संपत्ति, बंदर गाह बेचने पड़ेंगे ताकि डॉलर मिले. यह है ताक़त डॉलर की. अमेरिकन राष्ट्रपति जब टैरिफ़ और अमेरिकन एक्सपोर्ट बंद करने की धमकी देते हैं तो उनके दिमाग़ में ये रहता है कि अगर इनका एक्सपोर्ट बंद हुआ तो डॉलर कमाई बंद. डॉलर कमाई बंद तो विदेशों से सामान (तेल समेत) न ख़रीद पायेंगे. पिछले कुछ वर्षों से भारत में पर्याप्त गेहूँ हो रहा है पर बीच बीच में भारत को गेहूँ तक बाहर से इंपोर्ट करना पड़ता हो – डॉलर देकर.

लेकिन 91 और अब में भारत के पास दो शक्तियाँ आ गई हैं – डॉलर पैदा करने वाली. प्रथम तो है सर्विसेज – सॉफ़्टवेयर सर्विसेज ऑफर कर आज की तारीख में भारत लगभग उतने डॉलर कमा लेता है जितना प्रोडक्ट एक्सपोर्ट कर कमाता है. सर्विसेज पर कोई टैरिफ़ नहीं.

और भारत की इससे भी बड़ी पूंजी है विदेशों में रहने वाले भारतीय. NRI भारतीयों ने 2024 में भारत लगभग 130 बिलियन डॉलर घर भेजे जिसमें सबसे ज्यादा अमेरिका में रह रहे भारतीयों ने भेजा. यह रकम इतनी बड़ी है कि भारत के बिहार जैसे बड़े, सशक्त और खनिज प्रधान प्रदेश के दस करोड़ प्लस लोगों की वार्षिक सकल उत्पादन से ज्यादा है. और यह विशुद्ध मुनाफा है. देश में जो पैदा होता है उसके एवज में आपको बिजली पानी सड़क सुरक्षा सब देना पड़ता है, वहीं NRI जो डॉलर भेज रहे हैं वह है विशुद्ध कैश और वह भी डॉलर में.

पिछले दस वर्षों में NRI का भारत में विश्वास बढ़ा, उन्होंने अपनी जमा पूंजी भारत में निवेश की. 2014 में चाइना भारत से आगे था रेमिटेंस में, पर आज विदेश में रहने वाले भारतीय चीनियों से लगभग तिगुना पैसा घर भेज रहे हैं. वैसे इस कैश काऊ को सबसे पहले अटल जी ने पहचाना फिर मनमोहन सरकार में और वृद्धि हुई और मोदी जी ने तो पंख लगा दिए.

जब तक भारत के पास यह NRI संपदा और सॉफ्टवेयर सर्विसेज से आने वाला रेवन्यू है, भारत सीना तान खड़ा रह सकता है, अंतरराष्ट्रीय व्यापार हेतु भारत का खजाना भरा हुआ है, भरता रहेगा. एक्सपोर्ट का जो टैरिफ़ से नुक़सान होगा, वह इंपैक्ट सर्विसेज, रेमिटेंस, रूस से सस्ता तेल विशेष महसूस न होने देंगे.

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