अनामिका में किसी के भी प्रति कटुता का भाव कभी नहीं पाया

ओम थानवी-

अनामिका को साहित्य अकादेमी मिला। इस घोषणा का व्यापक स्वागत हुआ है। मुझे निजी ख़ुशी भी कम नहीं हुई है। उनकी कविताओं का ही नहीं, गद्य और आलोचना का भी प्रशंसक रहा हूँ। वे भीड़ से सदा अलग रही हैं।

हिंदी में थोड़े लोग हैं जिन्होंने संसार की रचनाएँ पढ़ी हों। अनामिका ख़ूब पढ़ती हैं। उनका हिंदी के साथ अंगरेज़ी पर भी अधिकार है। उन्होंने स्त्री समाज के प्रति पुरुषवादी मानसिकता के विरोध में लिखा है। मगर संयम और वेदना का संतुलन साधते हुए।

मेरी किताब ‘मुअनजोदड़ो’ पढ़कर उन्होंने अपनी पहल से — जैसा कृष्णा सोबती जी ने भी किया — उसकी समीक्षा लिख डाली थी। यों उनसे बहुत संवाद रहा है। नेपाल की एक यात्रा में भी वे साथ थीं। उनकी कविताओं में रोष का स्वर पढ़ते वक़्त कैसे कविता का स्वर बना रहता है, नज़दीक से देखा।

उनके व्यक्तित्व में एक अनूठी आत्मीयता है। उनमें किसी के प्रति कटुता का भाव कभी नहीं पाया। ठिठोली करने वालों के प्रति भी। यह उनकी ख़ूबसूरती है। और ताक़त भी।

बधाई निवेदित करते हुए प्रस्तुत है उनकी एक कविता।

अयाचित

मेरे भंडार में
एक बोरा ‘अगला जनम’
‘पिछला जनम’ सात कार्टन
रख गई थी मेरी माँ।

चूहे बहुत चटोरे थे
घुनों को पता ही नहीं था
कुनबा सीमित रखने का नुस्खा
… सो, सबों ने मिल-बाँटकर
मेरा भविष्य तीन चौथाई
और अतीत आधा
मज़े से हज़म कर लिया।

बाक़ी जो बचा
उसे बीन-फटककर मैंने
सब उधार चुकता किया
हारी-बीमारी निकाली
लेन-देन निबटा दिया।

अब मेरे पास भला क्या है
अगर तुम्हें ऐसा लगता है
कुछ है जो मेरी इन हड्डियों में है अब तक
मसलन कि आग
तो आओ
अपनी लुकाठी सुलगाओ।



भड़ास व्हाट्सअप ग्रुप- BWG-10

भड़ास का ऐसे करें भला- Donate






भड़ास वाट्सएप नंबर- 7678515849

Leave a Reply

Your email address will not be published.

*

code