अविनाश दास की ‘अनारकली’ यशवंत को नहीं आई पसंद, इंटरवल से पहले ही बाहर निकल आए

Yashwant Singh : अनारकली आफ आरा कल देख आया. नोएडा सिटी सेंटर के पास वाले मॉल के सिनेमा हॉल में. इंटरवल से पहले ही फिल्म छोड़कर निकल गया. मेरे साथ एक संपादक मित्र थे. फिल्म बहुत सतही थी. जैसे मीडिया वाले टीआरपी के लिए कुछ भी दिखा देते हैं, पढ़ा देते हैं, वैसे ही सिनेमा वाले बाक्स आफिस के चक्कर में कुछ भी बना देते हैं. याद करिए वो दौर, जब सेमी पोर्न सिनेमा रिक्शे वालों के लिए बना करती थी और वो अच्छी कमाई भी करती थी. इन सिनेमा के बीच बीच में रियल पोर्न क्लिप भी चला दिया जाता था ताकि काम कुंठित दर्शक पूरा पैसा वसूल वाला फील लेकर जाए.

अनारकली आफ आरा में कुछ भी नया नहीं है. एक फूहड़ गाना गाने वाली सिंगर जो ढेर सारे लोगों से रिश्ते बनाती फिरती है, उसका पंगा एक शराबी वीसी से पड़ गया जो उसे सरेआम नंगा कर रहा था. जाहिर है, फूहड़ गायिका उर्फ सेमी रंडी को इसका बुरा लगना था क्योंकि वह यह सब बंद कमरे में करती थी, आज काम कुंठित और प्रभावशाली वीसी ने उसके साथ सरेआम करने की कोशिश की. बस, वह वीसी को सबक सिखाने में लग गई और सिखा भी दिया. कहानी बस इतनी ही है. इंटरवल से पहले फिल्म छोड़ आया इसलिए मुझे बस इतना बताना है कि मैंने ऐसा क्या फील किया जिससे फिल्म छोड़ आया. फिल्म का ज्यादातर हिस्सा फूहड़ गानों, काम कुंठाओं, कामुकता, वासना और जुगुप्साओं से भरा पड़ा है. आपको मिचली भी आ सकती है. फिल्म का पिक्चराइजेशन पूरी तरह से अनुराग कश्यप मार्का बनाने की कोशिश की गई है, लेकिन बन नहीं पाई है.

ऐसे दौर में जब बहुत अलग अलग किस्म के टापिक पर सुंदर फिल्में बन और हिट हो रही हैं, सिर्फ वासना वासना वासना और काम काम काम से बनी फिल्म का औचित्य समझ नहीं आता. अनारकली का दलाल बार बार अनारकली को छेड़ता नोचता परोसता दिखता है लेकिन इससे कोई दिक्कत नहीं अनारकली को. सोचिए, जिसकी मानसिक बुनावट सिर्फ देने लेने भर की हो उसे एक प्रभावशाली से दिक्कत क्या, बस इतने भर से कि यह सरेआम करने की कोशिश की गई. ये ठीक है कि बदन पर आपका हक है और आप तय करेंगी किसे देना लेना है, लेकिन जब आप चहुंओर देती परसोती दिखती हैं तो आपको लेकर कोई खास नजरिया नहीं कायम हो पाता. यौन अराजकता को परोसती यह फिल्म भले ही पुलिस और पावर से टक्कर का नौटंकी करती हो लेकिन इसकी आड़ में असल में केवल वासना और सेक्स परोसा गया है. बेहद घटिया और फूहड़ फिल्म.

इस फिल्म के शुरू होने से पहले पहाड़ पर चढ़ने वाली एक बच्ची की आने वाली फिल्म का प्रोमो दिखाया गया. मैं सोचता रहा कि क्या अविनाश के दिमाग में ऐसे थीम नहीं आते जिसमें जीवन का मकसद और जिजीविषा की कहानी बयां हो जो प्रेरणा देती हो. हमारे हिंदी पट्टी के नए फिल्मकारों के साथ दिक्कत ये है कि वे पहली बार हिट देने के चक्कर में ऐसे विषय उठा लेते हैं जो न सिर्फ फूहड़ और आउटडेटेड होते हैं बल्कि नए जमाने के दर्शकों को पचते भी नहीं. अविनाश की बड़ी सफलता इस बात की है कि उनने बिना खर्च ठीकठाक पीआर किया और ढेरों बढ़िया वाह वाह करती समीक्षाएं फेसबुक से लेकर अखबारों मैग्जीनों में छपवा लीं. वे फिल्में खर्चा निकाल लिया करती हैं, जो मॉल से लेकर सिनेमाघरों में रिलीज हो जाया करती हैं क्योंकि फिल्मों के ढेर सारे राइट मसलन म्यूजिक, टीवी रिलीज, फारेन रिलीज आदि अच्छे खासे पैसों में बिक जाया करते हैं.

हफ्ते भर में रो गा कर काफी लोगों ने फिल्म देखी है (हालांकि हाउसफुल कहीं नहीं रही यह फिल्म और आरा से लेकर भोपाल तक में एक शो में बस बीस लोगों तक के होने की खबर है) और देख रहे हैं. मेरे साथ सिनेमा हाल में कुल साठ लोग तक रहे होंगे. गोल्ड कैटगरी की सीटों पर ही लोग थे और वह भी पूरे नहीं. तब भी कहा जा सकता है कि जिनने इस फिल्म को बनाने में पैसा लगाया उनका पैसा निकल गया होगा. अविनाश को चाहिए कि वह माडर्न थीम सोचें और प्रगतिशील ढंग का सिनेमा बनाएं. मैंने बिना देखे अविनाश को दो बार फोन कर इतनी अच्छी समीक्षाओं और इतने ढेर सारे स्टार के लिए बधाई दी थी, अब उसे वापस लेता हूं. वो कहते हैं न, दूर के ढोल सुहावने होते हैं.

सिर्फ आलोचना के लिए यह आलोचना कतई न समझा जाए, यह जानते हुए भी कि लोगों को आजकल आलोचना का मतलब निंदा ही लगता है. मैं पूरी साफगोई से इसलिए लिख रहा ताकि प्रतिभावान अविनाश आगे कुछ अच्छी फिल्में बना सकें. और हां, यह भी जानता हूं कि ढेर सारे लोगों ने फिल्म देखकर जो वाह वाह लिख मारा है, उन्हें कतई यह मेरी समीक्षा पसंद न आएगी लेकिन उनसे फिर आग्रह करूंगा कि वह तटस्थ ढंग से सोचें और फिल्म के बारे में पुनर्विचार करें. मेरी तरफ से फिल्म को मात्र एक स्टार. मैं कम ही फिल्मों को इंटरवल से पहले छोड़कर निकलता हूं क्योंकि मेरा मानना है टिकट खरीद कर पैसा बेकार कर दिया है तो फिल्म लास्ट तक देख ही ली जाए, लेकिन लस्ट और भौंडेपन से सनी अनारकली आफ आरा को इंटरवल से पहले तक ही उबकाई के मारे छोड़ आया.

जैजै

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से.

उपरोक्त स्टेटस पर आए ढेर सारे कमेंट्स में से कुछ प्रमुख यूं है :

Ravi S Srivastava फेसबुको पर वीरो की बखानता के बाद सोच ही रहा था आप ने बचा लिया साधुवाद

   Yashwant Singh मैंने फिल्म देखी भी देर में ताकि मैं लिखूं तो इससे फिल्म का बिजनेस प्रभावित न हो. आखिर अविनाश अपने साथी हैं, अपने पेशे के रहे हैं और उनकी पहली फिल्म है, बहुत संघर्षों के बाद.

   Ravi S Srivastava बात आप की सही है पर प्रोफेसन मे इमोशनल का छौंका नहीं होना चाहिये

आशीष महर्षि sahi me?

   Yashwant Singh जाइए देख ही आइए. ताकि मेरे कहे के आलोक में आप भी रिव्यू लिख सकें. आप ज्यादा तटस्थ लिखेंगे क्योंकि दोनों पक्ष आपके सामने हैं. हां, देख आना इसलिए जरूरी है ताकि साथी अविनाश की पहली फिल्म होने के नाते एक थोड़ा-सा योगदान अपन लोग की तरफ से करना बनता है.

चैतन्य घनश्याम चन्दन मैंने भी अतिउत्साह में यह फिल्म पैसे खर्च कर देख डाली, लेकिन निराशा ही हाथ लगी। दरअसल जिस फिल्मकार की जैसी मानसिकता होती है, वह वैसी ही चीजें दर्शकों को दिखाना चाहते हैं। इस फिल्मकार का इतिहास भी पलट कर देख लीजिये। कम लिखा, ज्यादा समझिये।

Prakash Govind मैं ये फ़िल्म फ़िल्म देखने को आतुर था,,, क्योंकि बड़े-बड़े दिग्गज बुद्धिजीवियों ने दिल खोलकर सराहा था। लेकिन आपने तो एक झटके में बैंड बजा डाली। मुझे आपकी साफगोई बढ़िया लगी। बिना लाग-लपेट के सटीक समीक्षा की है। अविनाश जी को इसे अवश्य पढ़ना चाहिए ताकि अगली फ़िल्म सार्थक व बेहतर बना सकें।

   Yashwant Singh मजेदार ये है कि वो लोग ज्यादा ही तारीफ लिख रहे जिनने नंगई का जीवन भर विरोध किया. आज के दौर में हर आदमी के हाथ में स्मार्टफोन है और पोर्न क्लिप सबको सहज उपलब्ध है. ऐसे में सिर्फ कामुकता परोसने के लिए फिल्म बनाना और कामुकता वासना सेक्स को जस्टीफाई करने के लिए एक सरोकारी एंगल गढ़ देना पचता नहीं बंधु.

    Prakash Govind मुझे लग रहा है कि अविनाश जी ने बाजार के बोझ तले दबकर ये फ़िल्म रची, इसीलिए कहानी और रचनात्मकता को नजरअंदाज कर दिया।

   Mantu Soni अब बुद्धिजीवी की क्या बुद्धि है जनता जान चुकी है।

Dev Nath इसको कहते हैं बिना किसी लाग लपेट की समीक्षा

सुभाष सिंह सुमन तमाम रिव्यूज पढ़कर सोच रहे थे कि टिकट बुक किया जाए। अब रहने देते हैं।

Nadim S. Akhter भाई Yashwant Singh, अब तक ये फिल्म नहीं देखी है पर अब देखनी पड़ेगी. जैजै

    Yashwant Singh जरूर. मैं तो सरेआम अपील कर चुका हूं रिलीज से पहले ही कि अपने साथी अविनाश की पहली फिल्म को सब लोग देखें और उन्हें सपोर्ट करें. फिल्म सभी को देखना चाहिए क्योंकि पहली फिल्म थोड़ी भी हिट हो गई, पैसा वसूल बन गई तो निर्देशक के लिए आगे का रास्ता खुल जाता है. जरूर देखिए मित्र और लिखिएगा.

    Nadim S. Akhter आप दोनों मेरे मित्र हैं. इसलिए जरूर देखूंगा और ईमानदारी से लिखूंगा. आपका एक अलग दृष्टिकोण मिला. ये भी जरूरी था. आलोचना और समालोचना जरूरी है. कोई चीज परफेक्ट नहीं होती.

Sandip Thakur कमाल कर दिया यशवंतजी…आपने। धाे डाला…पटक पटक कर। आरा आैर अनारकली….एक ताे करेला,दूजे चढ़ा नीम। अनारकली अपने आप में गजब थी आैर अनारकली यदि आरा की हो तो फिर क्या कहने..। मैंने फिल्म देखी नहीं है…लेकिन आपने जैसा लिखा है कि फिल्म में फूहड़ता का नंगा नाच है…उससे मैंने सहमत हाे सकता हूं। क्याेंकि भाेजपुरी संस्कृति जानी ही जाती है नंगई व दबंगई के लिए। फिल्म सेंसर बाेर्ड ने भी ए सर्टिफिकेट दिया है ताे जाहिर है कि फिल्म में वाे सबकुछ हाेगा जाे पैंट में हलचल पैदा कर दे। .

   Yashwant Singh मेरा दावा है कि अगर आप अपने बेटे या बेटी के साथ फिल्म देखेंगे तो आपको शर्म आएगी कि क्यों देखने चला आया. बेटा या बेटी सिर्फ यौन अराजकता की शिक्षा ही पा सकेंगे. इतने घटिया फूहड़ डायलाग और इतने भोंडे गाने कि आप उफ्फ कर लेंगे.

   Sami Ahmad यशवंत जी, मैं सिनेमा के मामले में जीरो हूँ या आम तौर पर इसके बारे में अच्छी राय नहीं। मैंने इस फ़िल्म का बहुत नाम सुनकर एक भाई से पूछा था कि इस फ़िल्म में और बाई जी के नाच में क्या अंतर है? अब लग रहा कि यह तो बाई जी के बीच बाई जी है। फिर आदमी जलेबी बाई को ही क्यों देखे। किसी शादी में चला जाय। नाच और स्टेज पर ही देख ले नाथुनिये पे गोली मारे और फिर चोली के पीछे क्या है। भाई लोग भी कमाल के हैं। सबको एकदम्मे बुड़बक समझते हैं।

Madan Tiwary निष्पक्ष आलोचना है न? व्यवसायिक प्रतिद्वन्दिता तो नहीं? शेयर करना है यह समीक्षा।

   Yashwant Singh अरे पहले आप देख आइए पंडीजी. देखने से ही आप समझ पाएंगे क्या सही समीक्षा है और क्या गलत. बाकी अविनाश और मेरा कहीं कोई होड़ या प्रतिद्वंद्विता नहीं है. न पहले थी. न अब है. हम लोग अच्छे मित्र हैं.

  Madan Tiwary नहीं आपकी बात पर विश्वास है। मित्र तो सब हैं, बुद्धिजीवियों वाली मित्रता भी है, प्रतिद्वन्दिता भी। हाहाहाहाहा

   Yashwant Singh आलोचना लिखना भी एक तरह की ब्रांडिंग ही होती है. इस बहाने फिल्म की चर्चा हुई. सिनेमा में तो वैसे भी निगेटिव पब्लिसिटी ब्रांडिंग कराई जाती है ताकि सिनेमा का नाम लोगों के दिमाग जुबान तक पहुंच जाए. इसलिए यह आरोप लगा सकते हैं Madan पंडी जी कि हम दोनों ने फिक्स करके यह आलोचना लिखी लिखवाई है 😀

   Madan Tiwary आरा की अनारकली यशवन्त की नजर में। वेब मीडिया के तीन मठाधीश हैं। यशवन्त आफ भड़ास, अविनाश आफ मोहल्ला लाईव, संजय तिवारी आफ विस्फोट। तीनों के बीच बुद्धिजीवी वाली मित्रता और प्रतिस्पर्धा भी रही है। यानी दोस्ती भी दुश्मनी भी। हाहाहाहाहा। लेकिन फेसबुकिया मठाधीशों वाला छिछलापन कभी नहीं रहा। खैर तीनों दोस्त है। दो के साथ जाम वाली मित्रता रही। संजय तिवारी बेचारे मजबूर है जाम नहीं छलका सकते। खैर समीक्षा पढ़े जरूर लेकिन फ़िल्म भी देखें। अविनाश के लिए, संघर्षशील एक्टिविस्ट के लिए।

  आशीष सागर Seedha likha

Aryan Kothiyal चलो अब हमारा पैसा तो बचेगा… सही समीक्षा करने के लिए धन्यवाद भईया

Ila Joshi ग़ज़ब समीक्षा उससे भी ग़ज़ब टिप्पणियां, हालांकि मेरी इस समीक्षा से भयंकर असहमतियां हैं लेकिन आपकी वॉल है सो जो चाहे लिखिए।

   Yashwant Singh आप मेरी समीक्षा और ग़ज़ब टिप्पणियों पर एक समीक्षा अपने वॉल पर लिख सकती हैं. बहस तो होनी चाहिए.

Vinay Oswal मैं तो फिल्म ही नही देखता तो टिपण्णी भी नहीं।

Siddharth Kalhans आपको धन्यवाद वरना आजकल में ही 1000-1200 की चपत लगने वाली थी। कई परिजन फिल्म दिखाने का आग्रह कर रहे थे। चेन्नई प्रवास में तो साथी उत्कर्ष सिन्हा आमादा ही हो गए थे फिल्म जाने को। अब इस बचे पैसे का कुछ सदुपयोग कर सकूंगा आपके लखनऊ आगमन पर द्रव्यपान कराने में (आपके साथियों को क्योंकि खबर है कि आपने द्रव्य से बेवफाई कर दी है)

Harsh Kumar एक ऐसी ही बकवास फिल्म पार्च्ड आई थी। जिसकी तथाकथित कम्युनिस्ट टाइप के लोग तारीफ करते नहीं थक रहे थे।

S.p. Singh Satyarthi देखने की चाह जाती रही। यशवंत जी की टिप्पणी अपनी अलग और निर्लिप्त पहचान रखती है। इतनी फूहड़ता है तो बाय बाय…

Singhasan Chauhan मैंने फिल्म देखी नहीं है मगर इसी फूहड़पन की वजह से मुझे खुद याद नहीं कब भोजपुरी फिल्म देखी थी

    Yashwant Singh इसका उल्टा होने की ज्यादा संभावना है. लोग अपना नजरिया कायम करने के लिए फिल्म देखने जाएंगे फिर लिखेंगे कि यशवंत ने सही कहा या दूसरों ने. आप जानते ही होंगे कि निगेटिव पब्लिसिटी और ब्रांडिंग सिनेमा का शगल है ताकि फिल्म जुबान दिमाग में चढ़ जाए. 😀

Deepak Pandey आपकी यह पोस्ट जितने लोग पढ़ेगे उतनी फिल्म को चपत लगेगी।

Vinay Shrikar मैंने भी बिना देखे ही यह मूवी देख ली! थैंक्यू यशवंत।

Tarun Kumar Tarun इस समीक्षा का असर यह हुआ कि मेरे १२० रुपये, तीन घंटे और पचास ग्राम खून बच गये!

डॉ. अजित मैं यही सोच रहा था सर सब वाह वाह कर रहे है क्या फिल्म का कोई कमजोर पक्ष नही है। आपकी दर्शकीय टिप्पणी महत्वपूर्ण है।

Kamal Kumar Singh एक से पहले ही अप्रैल फूल बन गया भैया, हमकों पहिले से ही पता था कि कुंठित खेल होगा।

Ramji Mishra शानदार विश्लेषण

Rajesh Yadav सटीक समीक्षा करना सबके बात नहीं रही इस बिकाऊ मीडिया में। आपने आईना दिखाया है, लेकिन बहुतों को फिर भी धुंधला ही नजर आएगा।

Sheeba Aslam Fehmi Maine Arvind Shesh aur kisi ek aur mitr ki sameeksha padhi, ta’ajub hai ki dono ne hi kuchh aisa nahi likha jisse ye pahlu ujagar hotey. Baharhaal aapke mashvire me dum hai, aainda behtar filmen bhi banaenge Avinash.

Dilnawaz Pasha कई दिन से फिल्म देखने का सोच रहा हूं. मौका मिला तो देख भी लूंगा… बिना देखे क्या कहना!

Sandeep Kumar Yadav मैं आप की बात से सहमत नहीं हूँ। अनारकली लेती देती है या नहीं ये उसकी मर्ज़ी है कोई ज़बरदस्ती तो नहीं है कि BC रसूखदार हैं पैसे फेक रहे हैं तो वो BC के साथ सो जाए, ये उसकी मर्ज़ी है। शरीर उसका है मन उसका है मर्ज़ी उसकी है। आप ने जो ये लिखा है वो अपने दलाल को लेती देती है फिर BC से खुले आम कुछ भी करने में क्या दिक्कत है, मैं ये जानना चाहता हूँ उसके शरीर और उसके मन पर किसका हक़ है, कौन निर्णय कौन करेगा, किसको हक़ दिया गया है…. अगर आप ने फिल्म पूरी नहीं देखी तो कैसे पता की वो अंत में Bc से बदला लेती हैं और सबक सिखाती है ? जिस प्रकार आप ने लिखा है उससे ये पता चलता है कि जो नाचने गाने वाले लोग हैं उनकी अपनी स्वतंत्रता या अपनी नैतिकता कुछ नहीं होती । और जो उसका दलाल है उसने कहाँ कहाँ परोसा है फ़िल्म में अनारकली को ज़रा वो भी बताइये। खैर गीत संगीत में तो आप को फूहड़ता ही नज़र आई बाकी क्या कहें? खैर इसी कहानी में सनी लियोन होती या इमरान हाशमी होते तो शायद ये प्रतिक्रिया न होती आप की? कोई औरत क्या करेगी और किस हद तक करेगी ये BC टाइप्स वाली मानसिकता के लोग तय करते हैं? और सर कृपया अनुराग कश्यप मार्का का अर्थ ज़रा समझाइये?

    Yashwant Singh आपका अपना पक्ष है. स्वागत है. सबके विचार अलग हो सकते हैं. मैने भी लिखा है कि शरीर पर स्त्री का हक होता है, वह तय करती है. मेरा लब्बोलुआब ये है कि सरोकारी कहानी की आड़ में सिर्फ कामुकता, भोंडापन, वासना और नंगई परोसी गई है. जब आप कहते हैं कि पैंसे भी लूंगी, दूंगी भी नहीं तो ये वही नंगई है जिसमें एक पत्रकार कहता है कि रिश्वत भी लूंगा और बदनाम भी करूंगा, एक पुलिस वाला कहता है घूस भी लूंगा और चालान भी करूंगा, एक डाक्टर कहता है फीस भी लूंगा और मरीज को मार भी डालूंगा… क्या संदेश देना चाहते हैं ऐसे सीन / डायलाग से. फिल्म का अंत फिल्म की समीक्षाओं से पता है. अनुराग कश्यप मार्का समझने के लिए गैंग आफ वासेपुर देख लीजिए. दलाल कितने को दिलाता परोसता है यह कुछ दृश्य देखकर अंदाजा लग जाता है जिसमें वह खींच खांचकर हर जगह उसे ले जाता है, थाने से लेकर वीसी तक के घर में. बाकी नजरिया सबका अपना अपना. मैंने अपने जीवन में इतनी भोंडी फिल्म नहीं देखी है, इसलिए कह लिख रहा हूं. सरोकारी कहानी की चाशनी में नंगई परोसने का माडल बहुत पुराना है दोस्त. मुझे स्त्री के संघर्ष से कोई दिक्कत नहीं है. उसके संघर्ष की आड़ में क्या क्या परोसा सुनाया दिखाया गया है, उससे दिक्कत है.

Divakar Singh हम्म सही है सर. हम कल नहीं आ पाए तो एक टिकट का पैसा बर्बाद होने से बच गया. आपने बढ़िया समीक्षा लिखी है.

Sandip Naik कुछ पूर्वाग्रह लग रहे हैं यशवंत। पता नही Avinash ने ये सब पढा या नहीं। खैर, अविनाश खुले दिल दिमाग़ के शख्स हैं और जिंदादिल इंसान हैं। समय आने पर सबको और सबकी जिज्ञासाओं का माकूल जवाब भी देंगे, अभी सुस्ता तो लेने दो एक लंबी पारी खेलने के बाद।

    Yashwant Singh पूर्वाग्रह होता तो फिल्म का रिलीज से पहले ही प्रचार न कर रहा होता भड़ास के जरिेए और रिलीज पर सबको देखने का आह्वान न करता. पूर्वाग्रह अगर इसे कहते हैं कि जैसा आप फील करें, उसे लिख दें तो मान लीजिए पूर्वाग्रही हूं. रही अविनाश की बात तो उन्हें प्रशंसाओं के अंबार के बीच दो चार आलोचनाओं का भी स्वागत करना ही चाहिए मित्र.

Rj Shalini Singh आप जैसे आलोचक जो स्पष्ट एक बार में कह दें कम होते हैं भाई। हम तो ऐसे लोगो को पलकों पर नहीं उनके भीतर छुपा के रखने वाले हैं। ताकि कोई नज़र न लगा पाए।

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Comments on “अविनाश दास की ‘अनारकली’ यशवंत को नहीं आई पसंद, इंटरवल से पहले ही बाहर निकल आए

  • vijay srivastava says:

    आपके फ़ेसबुक वॉल पर संदीप ठाकुर जी ने लिखा है कि भोजपुरी संस्कृति जानी ही जाती है नंगई और दबंगई के लिए. कृपया आप उस पोस्ट को delete कर दें. मुझे इस वाक्य पर ऐतराज है.किसी संस्कृति को नंगा कहना गलत है. मैं उनके पोस्ट कि भर्त्सना करता हूं. बात अविनाश दास जी कि फिल्म की हो रही है. आपने बहुत अच्छी समीक्षा की है. लेकिन इस बात का ख्याल रखा जाए कि किसी के कमेन्ट से किसी समुदाय की भावनाएं आहत न हों. भोजपुरी दुनिया की श्रेष्ठ संस्कृतियों में शुमार है. ये मेहनतकश लोगों की संस्कृति है. मुझे नहीं पता कि संदीप ठाकुर किस संस्कृति से आते हैं. वे जिस भी संस्कृति से आते होंगे उसमें संस्कार मिला होगा, तमीज ज़रूर सिखाई गई होगी. जिसे अब वे भूल गए हैं.

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  • ranjan srivastava says:

    आज ज्ञान मिल गया कि अनारकली अगर अपने मैनेजर की हर बात मानती है, तो उसे सबकी हर बात माननी चाहिए (होगी!). नाचनेवाली की अपनी मर्ज़ी हो भी क्यों? वैसे भी अब इस देश में अपनी मर्ज़ी के मालिक हैं ही कितने. सिर्फ जय जय और हर हर करनेवालों को छोड कर.

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