छह अप्रैल को रिलीज हो रही ‘सूबेदार जोगिंदर सिंह’ एक बहादुर सिपाही की गाथा है

परमवीर चक्र विजेता सूबेदार जोगिंदर सिंह एक सच्‍चे और बहादुर सिपाही की गाथा है, जिन्‍होंने अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहूति दे दी।सूबेदार जोगिंदर सिंह सन 62 की चीन के साथ लड़ाई में अपनी वीरता और शौर्य दुश्‍मनों को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया। उनकी इस बहादुरी का किस्‍सा आज देश के लोगों को प्रेरित करेगी। ऐसा कहना है फिल्‍म सूबेदार जोगिंदर सिंह के निर्देशक सिमरजीत सिंह का। वे कहते हैं कि सूबेदार जोगिंदर सिंह की बायोपिक अब 6 अप्रैल से देशभर के सिनेमाघरों में तीन भाषाओं; हिंदी, तमिल और तेलगु में रिलीज़ होगी।

सिमरजीत सिंह ने कहा कि आज कल युवाओं का रुझान काल्पनिक सिनेमा की तरफ अधिक है। हमारे देश में  चारों तरफ समृद्ध संस्कृति, विरासत, ऐतिहासिक घटनाएं और किस्से हैं। उस नज़रिये से देखें तो हमारे पास दर्शकों को दिखाने और उन्हें देने के लिए बहुत कुछ है। वर्तमान परिदृश्य में व्यावसायिक फिल्में बनाने का चलन है। इसके बीच लीक से हटकर एक फिल्म बनाई गई है – ‘सूबेदार जोगिन्दर सिंह’। यह एक वीर सैनिक की जिंदगी और घटनाओं पर आधारित है, जो अपनी मातृभूमि की सेवा के लिए जुनून और दृढ़ संकल्प से प्रेरित था।

फिल्‍म की कास्टिंग के बारे में उन्‍होंने कहा कि इस फिल्‍म में ‘सूबेदार जोगिन्दर सिंह’ की भूमिका में पंजाब के सुपर स्‍टार गिप्‍पी ग्रेवाल सूबेदार जोगिंदर सिंह की भूमिका में हैं, जिन्‍होंने इस फिल्‍म के लिए काफी मेहनत किया। हमने फिल्‍म को कारगिल और द्रास, राजस्थान एवं असम के कई दुर्गम और कठिन लोकेसंस पर शू‍ट किया है। हमने भारत-चीन की लड़ाई को इस फिल्‍म में 14000 फ़ीट की ऊंचाई पर फिल्‍माया गया है, इस दौरान पहाड़ की दुर्गम चोटियों शूटिंग दौरान पहाड़ पर फिसलने से अभिनेमा गिप्‍पी ग्रेवाल घायल भी हो गये थे।

इसके अलावा भी इस फिल्‍म में उन्‍होंने ज़्यादातर स्टंट्स खुद ही किये। गिप्पी ग्रेवाल, गुग्गु गिल, कुलविंदर बिल्ला, अदिति शर्मा, राजवीर जवंदा, रोशन प्रिंस,करमजीत अनमोल, सरदार सोही, लवलीन कौर सैसन, जॉर्डन संधू मुख्‍य भूमिका में हैं। राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता राशीद रंगरेज़ द्वारा लिखित और सुमीत सिंह द्वारा तैयार की गई फिल्म ‘सूबेदार जोगिंदर सिंह’ का ट्रेलर सागा म्यूज़िक एव म्यूनिसिस इन्फो सोल्युशंस के साथ सैवन कलर्स मोशन पिक्चर्स ने जारी किया है।

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‘पद्मावती’ फिल्म देख आए वरिष्ठ पत्रकार वेद प्रताप वैदिक, पढ़िए वो क्या कह रहे हैं…

फिल्म पद्मावती को लेकर आजकल जैसा बवाल मच रहा है, अफवाहों का बाजार जैसे गर्म हुआ है, वैसा पहले किसी भी फिल्म के बारे में सुनने में नहीं आया। बवाल मचने का कारण भी है। पद्मावती या पद्मिनी सिर्फ राजस्थान ही नहीं, सारे भारत में महान वीरांगना के तौर पर जानी जाती है। मध्ययुग के प्रसिद्ध कवि मलिक मुहम्मद जायसी ने अपनी महान कृति ‘पद्मावत’ में चितौड़ की इस महारानी का ऐसा सुंदर चरित्र-चित्रण किया है कि वे भारतीय नारी का आदर्श बन गई हैं। यदि ऐसी पूजनीय देवी का कोई फिल्म या कविता या कहानी अपमान करे तो उसका विरोध क्यों नहीं होना चाहिए और डटकर होना चाहिए लेकिन यह जरुरी है कि विरोध करने के पहले उस कला-कृति को देखा जाए, पढ़ा जाए, उसका विश्लेषण किया जाए। मुझे पता नहीं कि जो संगठन इस फिल्म का विरोध कर रहे हैं, उनके नेताओं ने यह फिल्म देखी है कि नहीं? मैंने यह सवाल पिछले हफ्ते अपने एक लेख में उठाया था। मुझे राज-परिवारों से संबंधित मेरे कुछ मित्रों ने प्रेरित किया कि मैं खुद भी इस फिल्म को देखूं और अपनी राय दूं।

मैंने यह फिल्म देखी। फिल्म ज्यों ही शुरु हुई, मैं सावधान होकर बैठ गया, क्योंकि यह फिल्म मैं अपने मनोरंजन भर के लिए नहीं देख रहा था। मुझे इसमें यह देखना था कि इसमें कोई संवाद, कोई दृश्य, कोई गाना ऐसा तो नहीं है, जो भारत के इतिहास पर धब्बा लगाता हो, अलाउद्दीन- जैसे दुष्ट शासक को ऊंचा उठाता हो और पद्मावती जैसी विलक्षण महारानी को नीचा दिखाता हो ? मुझे यह भी देखना था कि महाराजा रतनसिंह-जैसे बहादुर लेकिन भोले और उदार व्यक्तित्व का चित्रण इस फिल्म में कैसा हुआ है ? मेरी चिंता यह भी थी कि फिल्म को रसीला बनाने के लिए कहीं इसमें ऐसे दृश्य तो नहीं जोड़ दिए गए हैं, जो भारतीय मर्यादाओं का उल्लंघन करते हों?

मुझे लगता है कि बिना देखे ही इस फिल्म पर जितनी टीका-टिप्पणी हुई है, उसका फायदा फिल्म-निर्माता ने जरुर उठाया होगा। उसने ऐसे संवाद, ऐसे दृश्य और ऐसे संदर्भों को उड़ा दिया होगा, जिन पर कोई एतराज हो सकता था। फिल्म के कथा लेखक, इतिहासकार और निर्माता सर्वज्ञ नहीं होते हैं। वे गलतियां करते हैं और कई बार उनके कारनामे आम दर्शकों को गहरी चोंट भी पहुंचाते हैं। लेकिन इस फिल्म को वे सब फायदे पहले से ही मिल गए, जो सेंसर बोर्ड या जनता के सामने जाने पर मिलते हैं। इस फिल्म को सबसे बड़ा फायदा यह मिला है कि इसका जबर्दस्त प्रचार हो गया है। यदि इसके प्रचार पर करोड़ों रु. भी खर्च किए जाते तो इसका नाम हर जुबान तक पहुंचाना मुश्किल था। इस फिल्म को अब भारत के अहिंदीभाषी प्रांतों में भी जमकर देखा जाएगा और विदेशों में भी इसकी मांग बढ़ जाएगी।

इस फिल्म का सबसे बड़ा खलनायक सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी है। यह जो खिलजी शब्द है, इसका सही पश्तो और फारसी उच्चारण गिलजई है। अफगानिस्तान में एक ‘जहांसोज अलाउद्दीन’ भी हुआ था। याने सारे संसार को भस्मीभूत करने वाला। अलाउद्दीन के इस भस्मासुर रुप को इस फिल्म में नई युद्ध-तकनीक दिखाकर बताया गया है। अलाउद्दीन ने तोप जैसे एक ऐसे यंत्र से चितौड़ के किले पर ऐसा हमला किया कि उसके अग्निबाणों से भारतीय सेना का बचना मुश्किल हो गया। इस फिल्म में अलाउद्दीन एक धूर्त्त, अहंकारी, कपटी, दुश्चरित्र और रक्तपिपासु इंसान की तरह चित्रित है। वह अपने चाचा सम्राट जलालुद्दीन की हत्या करता है, अपनी चचेरी बहन से जबर्दस्ती शादी करता है, वह समलैंगिक है, वह उस राघव चेतन की भी हत्या कर देता है, जो उसे पद्मावती के अलौकिक सौंदर्य की कथा कहकर चित्तौड़ पर हमले के लिए प्रेरित करता है। वह हर कीमत पर पद्मावती को अपनी रानी बनाना चाहता है। अलाउद्दीन ने धोखे से महाराज रतनसिंह को दिल्ली बुलाकर गिरफ्तार कर लिया लेकिन बहादुर पद्मावती कैसे नहले पर दहला लगाती है, खुद दिल्ली जाकर अलाउद्दीन को चकमा देती है, उसे बेवकूफ सिद्ध करती है और रतनसिंह को छुड़ा लाती है। अलाउद्दीन और रतनसिंह की मुठभेड़ों में मजहब कहीं बीच में नहीं आता। वह मामला शुद्ध देशी और विदेशी का दिखाई पड़ता है।

जहां तक पद्मावती का प्रश्न है, श्रीलंका की राजकुमारी और परम सुंदरी युवती को रतनसिंह एक शिकार के दौरान देखते हैं और उसके प्रेम-पाश में बंध जाते हैं। फिल्म के शुरु से अंत तक पद्मावती की वेशभूषा और अलंकरण तो अद्वितीय हैं। वे चित्तौड़ की इस महारानी के सौंदर्य में चार चांद लगा देते हैं। रतनसिंह और पद्मावती के प्रेम-प्रसंग को चोरी-चोरी देखनेवाले गुरु राघव चेतन को देश-निकाला दिया जाता है। पद्मावती उसे सजा-ए-मौत देने की बजाय देश-निकाला सुझाती है। ऐसी उदार पद्मावती का यहां वह दुर्गा रुप भी देखने को मिलता है, जब उसे अलाउद्दीन खिलजी की इच्छा बताई जाती है।

पूरी फिल्म में कहीं भी ऐसी बात नहीं है, जिससे दूर-दूर तक यह अंदेशा हो कि पद्मावती का अलाउद्दीन के प्रति जरा-सा भी आकर्षण रहा हो। बल्कि पद्मावती और रतनसिंह के संवाद सुनकर सीना फूल उठता है कि वाह ! क्या बात है ? एक विदेशी हमलावर से भिड़कर अपनी जान न्यौछावर करनेवाले ये राजपूत भारत की शान हैं। इस फिल्म में पद्मावती अद्वितीय सौंदर्य की प्रतिमूर्ति ही नहीं है, बल्कि साहस और चातुर्य की मिसाल है। वह कैसे अपने 800 सैनिकों को अपनी दासी का रुप देकर दिल्ली ले गई और उसने किस तरकीब से अपने पति को जेल से छुड़ाया, यह दृश्य भी बहुत मार्मिक और प्रभावशाली है। दूसरे युद्ध में वीर रतनसिंह कैसे धोखे से मारे गये, कैसे उन्होंने अलाउद्दीन के छक्के छुड़ाए और कैसे पद्मावती ने हजारों राजपूत महिलाओं के साथ जोहर किया, यह भी बहुत रोमांचक समापन है। जहां तक घूमर नृत्य का सवाल है, उसके बारे में भी तरह-तरह की आपत्तियां की गई थीं। लेकिन वह नृत्य किसी महल का बिल्कुल निजी और अंदरुनी मामला है। वह किसी शहंशाह की खुशामद में नहीं किया गया है। उस नृत्य के समय महाराज रतनसिंह के अलावा कोई भी पुरुष वहां हाजिर नहीं था। वह नृत्य बहुत संयत और मर्यादित है। उसमें कहीं भी उद्दंडता या अश्लीलता का लेश-मात्र भी नहीं है।

यह फिल्म मैंने इसलिए भी देखी कि हमारे एक पत्रकार मित्र की पत्नी ने, जो मेरी पत्नी की सहपाठिनी रही हैं, मुझे मुंबई से एक संदेश भेजा और कहा कि आपको शायद पता नहीं कि मैं प्रतिष्ठित राजपूत परिवार की बेटी हूं और इस फिल्म में मैंने एक छोटा-सा रोल भी किया है। यह फिल्म राजपूतों के गौरव और शौर्य की प्रतीक है। इस फिल्म को बाजार में उतारने के पहले राजपूत संगठनों के नेताओं को भी जरुर दिखाई जानी चाहिए। मुझे समझ में नहीं आता कि हमारे सभी नेता इतने विचित्र और डरपोक क्यों है ? फिल्म को देखे बिना वे ऐसे फतवे जारी क्यों कर रहे हैं ? वे इतने डर गए हैं कि सेंसर बोर्ड को भी परहेज का उपदेश दे रहे हैं। अदालत ने फिल्म पर रोक लगाने से मना कर दिया। उसे भी इस फिल्म को देखना चाहिए था। यदि इसमें कोई गंभीर आपत्तिजनक बात हो तो सेंसर बोर्ड और अदालत दोनों को उचित कार्रवाई क्यों नहीं करनी चाहिए लेकिन अफवाहों के दम पर देश और सरकार चलाना तो लोकतंत्र का मजाक है।

पहले पद्मावती को देखें, फिर बोलें…

फिल्म पद्मावती का प्रदर्शन अब एक दिसंबर से शुरू नहीं होगा, यह अच्छी खबर है। अब फिल्म-निर्माता और फिल्म-विरोधियों को इस फिल्म पर ठंडे दिमाग से सोचने का समय मिल जाएगा। मुझे पूरा विश्वास है कि फिल्म को देखकर उन्हें काफी संतोष होगा। यदि उसमें सुधार के कुछ सुझाव वे देंगे तो फिल्म प्रमाणीकरण पर्षद (सेंसर बोर्ड) उन पर विचार करेगा और वे सुझाव उसे ठीक लगेंगे तो वह फिल्म-निर्माता को वैसे निर्देश देगा, जिसे यदि वह नहीं मानेगा तो फिल्म सार्वजनिक तौर पर दिखाई नहीं जा सकेगी। इसी आशय की बात राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने कही है। यदि सेंसर बोर्ड की सहमति के बावजूद कुछ लोगों को फिल्म आपत्तिजनक लगे तो उन्हें अधिकार है कि वे उसका विरोध करें लेकिन वह विरोध अमर्यादित न हो और हिंसक न हो। वह राजपूत समाज की अप्रतिष्ठा और मजाक का कारण न बने, यह जरुरी है।

मैंने यह फिल्म काफी गौर से देखी है। मुझे इसमें आपत्तिजनक कुछ भी नहीं लगा। हां, एकाध जगह उसे बेहतर बनाने का सुझाव मैंने दिया है। इसमें अलाउद्दीन खिलजी का खलनायकत्व जमकर उभरा है और महाराजा रतनसिंह की सज्जनता और वीरता भी काफी प्रभावशाली ढंग से चित्रित हुई है। और पद्मावती के क्या कहने ? उसे अप्रतिम सौंदर्य की प्रतिमूर्ति तो बनाया ही गया है, साथ-साथ उसके शौर्य और रणनीति-कौशल को इतना तेजस्वी और अनुकरणीय रुप दिया गया है कि देश की प्रत्येक महिला उस पर गर्व कर सकती है।

झूठी अफवाहों के आधार पर जो आरोप लगाए जा रहे हैं, जैसे अलाउद्दीन और पद्मावती के प्रेम-प्रसंग, दोनों का एक-दूसरे के सपनों में आना, घूमर नृत्य की अश्लीलता आदि का लेश-मात्र संकेत भी इस फिल्म में नहीं है। सेंसर बोर्ड और नेताओं को भी घबराने की जरुरत नहीं है। उन्हें बहानेबाजी और चुप्पी का सहारा लेने की बजाय अपनी राय इस फिल्म पर खुलकर दे देनी चाहिए। जब मेरे-जैसा मामूली हैसियत का आदमी इस फिल्म के बारे में खुलकर बोल रहा है तो वे खुद इस फिल्म को देखने का आग्रह क्यों नहीं करते ? मैंने जैसे यह फिल्म देखी, वैसे ही कुछ चुने हुए लोग इस फिल्म को देखें, तो वह न तो किसी कानून का उल्लंघन है और न ही किसी मर्यादा का। इस तरह फिल्म दिखाने और सिनेमा घरों में उसे दिखाने में बहुत फर्क है। यह दिखाना पैसा कमाने के लिए नहीं, सत्य और शुभ की स्थापना के लिए है।

लेखक डॉ. वेदप्रताप वैदिक वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं.

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अमिताभ बच्चन यानि एक भयंकर अवसरवादी आदमी!

Narendra Nath : बहुत रिस्क के साथ पोस्ट कर रहा हूं। जानता हूं इस देश में बहुमत के खिलाफ लिखना-बोलना बहुत जोखिम भरा होता है। फिर भी देश के एक नायक पर तल्ख टिप्ण्णी करने का साहस उठा रहा हूं। उस मुल्क में जहां सितारों को भगवना की तरह पूजा जाता है। और हां, बतौर अभिनेता मैं भी इनका बहुत ही बड़ा प्रशंसक हूं। नाम है अमिताभ बच्चन। अमिताभ बच्चन सुपरस्टॉर हैं। लारजर दैन लाइफ जिया है सिने दुनिया में। रील दुनिया में जो किरदार निभाया वह उन्हें अपने क्षेत्र में महान बनाती है। Continue reading

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फिल्म ‘न्यूटन’ अपने दर्शकों के एक गाल को सहलाते हुए दूसरे पर चांटे जड़ती है!

Nirendra Nagar : अभी ‘न्यूटन’ देखी हॉल में। फ़िल्म में दिखाया गया है कि कैसे प्रशासन, पुलिस और सशस्त्र बलों की मिलीभगत से चुनाव के नाम पर इस देश में कई जगह केवल छलावा होता आया है चाहे वह कश्मीर हो या छत्तीसगढ़। पहलाज़ निहलानी के रहते तो यह मूवी सेन्सर बोर्ड से पास ही नहीं होती। वैसे न्यूटन जो एक ईमानदार युवा सरकारी कर्मचारी है और जो इस बात पर डटा हुआ है कि वह अपने अधिकार वाले बूथ में असली मतदान करवाकर रहेगा, उसकी ज़िद्दी कोशिशों पर जब दर्शक हँसते हैं तो स्पष्ट होता है कि ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा की वाक़ई इस देश में क्या क़ीमत है। एक दर्शक तो वास्तव में बोल भी पड़ा – ‘पागल है क्या!’ ऐसा लगा जैसे उसने न्यूटन और उसके जैसे सभी लोगों को गाली दी हो।

Nitin Thakur : बहुत लोग न्यूटन देख चुके होंगे. मैंने देखने के बावजूद काफी वक्त तक कुछ नहीं लिखा. ऐसी फिल्मों पर लिखने के लिए अच्छा खासा वक्त चाहिए. सबसे बढ़कर वो मानसिक परिस्थिति होनी चाहिए जिसमें आप फिल्म के सभी पहलुओं को सामने रख सकें. यहां वो पहलू भी शामिल हैं जो छिपे रह जाते हैं. फिल्म तो सब एक ही देखते हैं पर किसी से कुछ छूट जाता है तो किसी को कुछ दिख जाता है. रुझान और चीज़ों को ग्रहण करने पर है कि आपने कितना सीखा या देखा.

न्यूटन अपने काम को ईमानदारी से पूरा करने की सनक पर है. वो तंत्र के आपस में उलझते कर्मचारियों की उस “अंडरस्टैंडिंग” पर है जो कानूनी तो नहीं मगर व्यवस्था बनाए रखने के लिए डेवलप हुई और अब स्वीकृत है. फिल्म दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की सीमाएं दिखाने पर है. ये बताती है कि हम अपने सीमित अधिकारों और ताकत के बूते किसी हद तक सही रास्ते चल भी सकते हैं. हां, गांधी दुनिया में स्वीकारे जाने से पहले कभी पागल लगे होंगे.. ऐसा ही आपको फिल्म वाले नूतन कुमार उर्फ न्यूटन के लिए लग सकता है. कुछ साल पहले आई “हैदर” दिखा कुछ रही थी मगर तल के नीचे बयां कुछ और ही करती थी. इसी तरह “न्यूटन” सिनेमाघर के दर्शकों को एक गाल पर सहलाते हुए दूसरे पर चांटे जड़ रही है.

जैसा कि मैंने कहा कि अपना अपना हिसाब है. कोई सहलाने को ज़्यादा महसूस करता है और कोई चोट को. इसे फिल्म का बहुअर्थी होना ही कहेंगे कि किसी दृश्य पर आपकी सीट के एक तरफ बैठा दर्शक हंस सकता है तो ठीक उसी वक्त वही दृश्य दूसरी तरफ बैठे दर्शक को रुला सकता है. मैं हिंदी फिल्मों से निराश होकर सालों पहले विदेशी फिल्में देखने लगा था. कुछ सालों बाद जब मैंने हिंदी फिल्म की गली में झांका तो पाया कि सूरत बदलने लगी है. कुछ लोग जो मोहल्ले का माहौल खराब कर रहे थे वो जा चुके हैं. उन मकानों में नए लोग आ गए हैं जो तुलनात्मक रूप से पुराने वालों से बहुत बेहतर हैं. समाज अब “नो मीन्स नो” पर फिल्म बनाकर आत्ममंथन और पछतावे की भावना के साथ जी रहा है.

खुद न्यूटन सत्तर साल पुरानी व्यवस्था को वैसे ही देख रही है जैसे आप काफी वक्त से एक ही जगह पड़ी ईंट उठाते हैं और उसके नीचे पल रहे कीड़े आपके सामने रेंगते हुए चले आते हैं. अब राजकुमार राव ऑस्कर में जा चुके हैं. कहा जा सकता है कि फिल्म को ऑस्कर के लिए चुनकर गलती नहीं की गई है. भले वो ना भी जीते तो भी बहुत फर्क नहीं पड़ता. हर फिल्म के साथ गुणवत्ता बढ़ ही रही है. आप भी इस क्वालिटी चेक के लिए न्यूटन देखें. ऐसी फिल्मों को पैसा कमाने का मौका मिलना चाहिए. अगर हो सके सिनेमाघर का रुख कीजिएगा. डीवीडी आने पर बच्चों को दिखाने के लिए खरीद लीजीएगा. आज के दौर में न्यूटन कमर्शियल ड्रामा कम एक डोक्यू ड्रामा ज़्यादा है.

वरिष्ठ पत्रकार नीरेंद्र नागर और नितिन ठाकुर की एफबी वॉल से.

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मीडिया केंद्रित फिल्म ‘JD’ में कई पत्रकारों ने किया काम, गिना रहे हैं डायरेक्टर शैलेंद्र पांडेय सबके नाम (देखें वीडियो)

मीडिया पर जोरदार फ़िल्म ‘जेडी’ बनाने वाले शैलेन्द्र पांडेय ने निकाली अपनी भड़ास। उन्होंने टाइम्स ऑफ इंडिया को कठघरे में खड़ा किया। कई असली पत्रकारों ने फिल्म में पत्रकार का किरदार निभाया है। तो, फ़िल्म में किन-किन असली पत्रकारों ने रोल किया, उन सबके नामों का किया खुलासा किया। शैलेंद्र पांडेय से बातचीत की भड़ास के संपादक यशवंत सिंह ने।

शैलेंद्र कानपुर के बगल के जिले उन्नाव के रहने वाले हैं। फिलहाल राजस्थान पत्रिका समूह में नेशनल फोटो एडिटर हैं। उन्हें फोटो जर्नलिज्म के लिए रामनाथ गोयनका एवार्ड भी मिल चुका है। ‘जेडी’ शैलेंद्र की पहली फिल्म है। पूरा बातचीत के जरिए आप ‘जेडी’ फिल्म बनने की प्रक्रिया से लेकर शैलेंद्र पांडेय के जीवन-करियर आदि के बारे में भी जान सकते हैं। देखें वीडियो…

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JD फिल्म का डिजिटल पार्टनर है भड़ास4मीडिया डॉट कॉम (देखें वीडियो)

22 सितंबर 2017 को रिलीज हो रही फिल्म JD का डिजिटल पार्टनर भड़ास4मीडिया डाट काम है. भड़ास के संस्थापक और संपादक यशवंत बता रहे हैं वो तीन वजह जिसके चलते हम सभी को ये फिल्म देखने के लिए थिएटर जाना चाहिए. देखें संबंधित वीडियो…

https://www.youtube.com/watch?v=_izRF4GD-Hc

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प्रधानमत्री नरेंद्र मोदी पर गुजराती में बन रही है फिल्म ‘हू नरेंद्र मोदी बनवा मांगू छू’

बॉलीवुड निर्देशक अनिल अनिल नरयानी का कहना है कि प्रधानमत्री नरेंद्र मोदी पर आधारित उनकी आने वाली गुजराती फिल्म ”हूं नरेन्द्र मोदी बनवा मांग छू” बच्चों के लिये बेहद प्रेरणाश्रोत होगी। अनिल नरयाणी इन दिनों फिल्म ”हू नरेंद्र मोदी बनवा मांगू छू” बना रहे हैं। अनिल नरयानी ने फिल्म की चर्चा करते हुये कहा, “‘हू नरेंद्र मोदी बनवा मांगू छू’ हमारे देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बचपन की कहानी पर आधारित है।

इसकी कहानी मोटिवेशनल है। इस कहानी को खास कर बच्‍चों और युवाओं को ध्‍यान में रखकर हमने तैयार किया है। हम इस फिल्‍म में उनकी कहानी को इस तर‍ह से पेश कर रहे हैं, जिससे फिल्‍म को देखने और समझने वाले दर्शक मोटिवेट हो। और उन्‍हें ये भी समझ में आये कि नरेंद्र मोदी देश की भलाई के लिए क्‍या चाहते हैं, क्‍यों चाहते हैं और कैसे चाहते हैं।

उन्‍होंने कहा कि मुझे लगता है कि आज देश का हर बच्‍चा नरेंद्र मोदी बनना चाहता है। वास्‍तव में जो रियल है, फिल्‍म में हमने वही दिखाने की कोशिश की है। मेरा मानना है कि नरेंद्र मोदी फिल्‍म के नहीं, पूरे देश के हीरो हैं। वे अभी देश के लिए बहुत अच्‍छा कर रहे हैं। क्‍योंकि वे मेरे भी हीरो हैं, इसलिए मुझे लगा कि उनके जीवन के संघर्ष को पर्दे पर लाना चाहिए। इसमें मुझे कोई परेशानी या डर जैसा कुछ नहीं लगा। मैं मानता हूं कि नरेंद्र मोदी जी के व्‍यक्तिव से भारत की नई पीढ़ी को प्रेरणा मिलेगी।

इस फिल्‍म में मुख्‍य रूप से तीन गाने हैं, जो मोटिवेशनल हैं। फिल्‍मकार ने कहा,“ ‘हू नरेंद्र मोदी बनवा मांगू छू’ फिलहाल गुजरात के दर्शकों के लिए बना रहा हूं। इसका किसी राजनीतिक दल से कोई वास्‍ता नहीं है। हम चाहते हैं नरेंद्र मोदी की इंस्‍पायरिंग कहानी देश भर में जाये। पहले तो इसे टारगेट के अनुसार 17 नंवबर को गुजरात में ही रिलीज करने की योजना है। बाद अन्‍य भाषाओं में डब करने की कोशिश होगी।

काव्‍या मूवीज और श्रीअर्थ प्रोडक्‍शन  के बनैर तले बन गुजराती फिल्‍म ‘हू नरेंद्र मोदी बनवा मांगू छू’ बनी है। इस फिल्‍म की शूटिंग मुख्‍य रूप से गुजरात के अहमदाबाद, वडोदरा और सूरत में हुई है, जहां पीएम नरेंद्र मोदी का बचपन बीता। अनिल नारायणी गुजराती भाषा में ही ‘बे यार धक्‍को मार’ बना चुके हैं, जिसे लोगों ने खूब पसंद किया था। इसके अलावा वे 6-7 हिंदी फिल्में भी कर चुके हैं।

फिल्म की ‘हू नरेंद्र मोदी बनवा मांगू छू’ प्रोड्यूसर तान्या शर्मा हैं जबकि को- प्रोड्यूसर राजीव अरोड़ा हैं। फिल्‍म में ओंकार दास, अनेशा सैयद, करण पटेल और हीराल मुख्‍य भूमिका में नजर आयेंगे। फिल्‍म के प्रचारक संजय भूषण पटियाला हैं। फिल्‍म में फरीद दाबरी और दिव्‍या कुमार ने गाने गाये हैं। लिरिक्‍स आर जे रौशन, म्‍यूजिक डायरेक्‍टर आर बी कमाल, एक्‍शन अब्‍बास सईद और डीओपी अद्दी भार्गव का है।

प्रेस रिलीज

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JD Trailer out, Film is going to release on 22nd September

The trailer of the upcoming Bollywood film “JD” #MediaकीBreakingNews produced by Shailendra Pandey Films has been released. Speaking on the occasion Producer & Director Shailendra Pandey said; “”I am very excited for my film JD. I feel honoured to have directed the big Politician Amar Singh  and the Rtd. Justice PD Kode who are in the special appearance in the movie. He said, “JD is an honest attempt of film-making and showing the ground realities of Media. I am sure that the audiences will appreciate this movie.”

JD is the ‘Breaking News’ from inside of the Media. The Media brings news every moment from all over the world, but what happens within the Media is not known to the world. The Journalists who fight for Truth and Values are very helpless in fighting for their own rights. The power of Media is captive in the hand of a few people and they wear different masks. Every powerful Establishment first tries to scare, then allures and finally crushes in a maze of defamatory conspiracies. The one who rises with a steely resolve from this fall becomes JD.

This is the story of Jai Dwivedi alias JD. He had started his journalism from Lucknow but Delhi was in his dreams. His pen had the power to shake the seat of power. Will he confront the powers of Media and Politics, or he will shake hands with them? The star cast of  movie Lalit Bisht, Vedita Pratap Singh, Govind Namdev and Aman Verma extended good wishes and congratulated the team for the successful trailer launch. The film is all set to release worldwide on 22nd Sept 2017. JD is produced by Shailendra Pandey and Anju Pandey and is distributed by Adamant Pictures.

https://youtu.be/_tHEvnB7wNs

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अक्षय कुमार ने गाना गाया और भूमि ने किया डांस, जनता हुई मस्त (देखें वीडियो)

अभिनेता अक्षय कुमार अपनी फिल्म टॉयलेट एक प्रेम कथा का प्रमोशन करने आगरा पहुंचे…. ताजमहल के साए में उन्होंने इस फिल्म का प्रमोशन किया….  अक्षय कुमार के साथ फिल्म की हीरोइन भूमि भी थीं….. ताज महल के पास बने ताज खेमा के इस कार्यक्रम में उन्होंने स्कूली छात्र छात्राओं से मुलाकात की और अक्षय कुमार ने छात्रों को देश का भविष्य बताया…. साथ ही स्वच्छता को लेकर छात्रों को पैगाम दिया….

अक्षय कुमार ने अपनी फिल्म टॉयलेट एक प्रेम कथा का खुद गाना गाया और डांस भी किया…. अभिनेत्री भूमि ने भी अक्षय के साथ गाना गाया… घंटा भर चले इस कार्यक्रम में लोगों ने जमकर लुत्फ़ उठाया… संबंधित वीडियो देखने के लिए नीचे क्लिक करें…

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आज रिलीज ‘राग-देश’ और ‘इंदु सरकार’ क्यों हैं मस्ट वॉच फिल्में, बता रहे हैं यशवंत

Yashwant Singh : ऐसा बहुत कम होता है कि एक ही दिन दो अलग-अलग सच्ची घटनाओं पर आधारित, दो अलग-अलग ऐताहासिक कालखंडों पर केंद्रित फिल्में रिलीज हो जाएं. आज ऐसा हुआ है. ‘राग देश’ और ‘इंदु सरकार’ नामक दो फिल्में आज शुक्रवार के दिन रिलीज हुई हैं. दोनों सच्ची घटनाओं पर आधारित हैं और दोनों ही घटनाएं इतिहास के चर्चित अध्याय हैं.

‘राग देश’ सुभाष चंद्र बोष और उनकी सेना आईएनए के जवानों पर केंद्रित है. मेरे जैसे लोग जो गांधी जी के साथ-साथ भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद और सुभाष चंद्र बोस आदि के प्रति समान श्रद्धा और प्रेम रखते हैं, इस फिल्म को जरूर देखेंगे क्योंकि सुभाष चंद्र बोस और उनकी सेना के बारे में इतिहासकार कई एंगल से देखते लिखते बताते हैं. सुभाष चंद्र बोस की सेना आईएनए के जांबाज जवानों के द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान ट्रायल को फिल्म का मुख्य सब्जेक्ट बनाया गया है. सुभाष चंद्र बोस और उनकी सेना पर पूरी तरह केंद्रित इस नई फिल्म से बहुत उम्मीदें हैं.

फिल्म रागदेश के निर्माता गुरदीप सिंह सप्पल

इस फिल्म की खास बात यह भी है कि इसे अपने बड़े भाई और राज्यसभा टीवी के सीईओ व एडिटर इन चीफ Gurdeep Singh Sappal जी ने प्रोड्यूस किया है. जाने माने फिल्मकार तिग्मांशु धूलिया ने इसे डायरेक्ट किया है. यह फिल्म चुनिंदा फिल्म क्रिटिक्स को दिखाई जा चुकी है और उन सभी ने इसे मस्ट वाच कैटगरी की फिल्म करार दिया है. यानि रिव्यू के लेवल पर फिल्म को ढेर सारे स्टार मिल रहे हैं. फिल्म का ये स्लोगन काफी फेमस हो रहा- ”जो देश से करते हैं प्यार, वो राग-देश से कैसे करें इनकार!” तो बंधु, चलिए चला जाए देखने. अपने सभी मित्रों से अपील है कि वे ‘राग देश’ देखें और इसको लेकर रिव्यू प्रकाशित करें. मैं आज शाम का शो बुक कर चुका हूं.

इंदु सरकार फिल्म पहले ही विवादों के कारण चर्चा में आ चुकी है. इंदिरा गांधी, संजय गांधी और आपातकाल पर केंद्रित इस फिल्म के जरिए हम जैसे आपातकाल के समय या बाद पैदा हुए लोग जान सकेंगे कि उस दौर की क्या भयावहता थी, उस दौर के घटनाक्रम कैसे कैसे घटित हुए. इस फिल्म को मधुर भंडारकर ने बनाया है जो पेज थ्री, फैशन, कारपोरेट जैसी फिल्में बना चुके हैं. इंदु सरकार को को कल देखूंगा. फिर दोनों ही फिल्मों का रिव्यू परसों लिखूंगा, वादा है.

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से.

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Lipstick Under My Burkha : दैहिक मुक्ति को असली मुक्ति मान बैठीं ये संभोगरत स्त्रियां! (दो समीक्षाएं)

Mukesh Kumar : अलंकृता श्रीवास्तव को ढेर सारी बधाईयाँ। शायद एक स्त्री ही किसी स्त्री के अंदर पलने वाली हसरतों और चलने वाली कशमकश को इतनी बारीकी से फिल्मा सकती है। इतनी बेचैनी, इतनी छटपटाहट कि कुछ भी करने को तैयार। हर तरह की चौहददियों को लाँघने के लिए बेक़रार। और मर्द हैं कि हर जगह रास्ते रोकते हुए खड़े हैं। उन्हें मंज़ूर नहीं है कोई औरत उनके नियंत्रण से बाहर निकलकर अपनी इच्छाएं पूरी करे। कहीं वह सेक्स को हथियार बनाता है, कहीं धर्म को तो कहीं उसे छलकर दबाने की कोशिश करता है।

अलग-अलग उम्र की चार महिलाएं-दो हिंदू और दो मुसलमान। सभी निम्न मध्यवर्गीय समाज से। अपने सपनों के लिए लड़तीं और आगे बढ़ने के लिए रास्ते तलाशतीं। सबकी कहानी अलग-अलग हैं मगर मर्म एक ही है। एक ही सूत्र से चारों जुड़ी हुई हैं। मन की परतें खुलती जाती हैं और परदे पर पीड़ा उभरती जाती है। कसी हुई पटकथा एक क्षण को भी तनाव कम नहीं होने देती। सधा हुआ अभिनय और निर्देशन फिल्म को कई मील आगे ले जाकर खड़ा कर देता है।

किसी ने कहा, फिल्म में सेक्स बहुत ज़्यादा है। मुझे लगता है कि फिल्म में आए सेक्स दृश्यों को सही संदर्भों में समझने की ज़रूरत है। उसके अलग-अलग निहितार्थ हैं। कहीं वह मुक्ति की कामना को व्यक्त करता है तो कहीं आज़ादी को कुचलने के लिए। सेक्स यहाँ केवल सेक्स नहीं है, पूरी राजनीति है और दमन का हथियार भी। अगर आपने अभी तक Lipstick Under My Burkha नहीं देखी है तो ज़रूर देखिए।

वरिष्ठ पत्रकार मुकेश कुमार की एफबी वॉल से.

Abhishek Srivastava : टिकट कराते वक्‍त (Lipstick Under My Burkha के लिए) थोड़ा अचरज हुआ क्‍योंकि इतवार को दोपहर के शो में एनसीआर के महंगे सिनेमाहॉल फुल दिखे। तीन बजे के शो में जगह मिली, तो मेरा हॉल भी तकरीबन फुल निकला। आखिर क्‍या सोचकर इस महानगर की मध्‍यवर्गीय जनता यह फिल्‍म देखने के लिए आई थी? दो घंटे के दौरान फिल्‍म के अलावा लोगों की प्रतिक्रियाएं भी मैं देखता-सुनता रहा। अंत में निकलते वक्‍त भी लोगों को आपस में बात करते सुना। इसमें कोई शक़ नहीं कि दर्शकों का मनोरंजन ठीकठाक हुआ था। बस एक समस्‍या दिखी- फिल्‍मकार अलंकृता श्रीवास्‍तव जो दिखाना चाहती रही होंगी, लोगों तक उसका ठीक उलटा संदेश पहुंचा है। अगर मैं ठीक देख पा रहा हूं, तो यह समस्‍या गंभीर है।

दरअसल, सतह पर दो दिक्‍कतें हैं। एक महिला पति से ‘छुपाकर’ नौकरी करती है। दूसरी मां-बाप से ‘छुपाकर’ जींस पहनती है, पार्टी करती है, मोर्चा निकालती है और ‘झूठ’ बोलती है। तीसरी महिला लोगों से ‘छुपाकर’ स्विमिंग सीखने जाती है, ‘अश्‍लील’ किताब पढ़ती है और ‘नकली आइडेंटिटी’ बनाकर फोन पर बात करती है। चौथी महिला के जीवन में ‘झूठ’ की जगह दो पुरुषों के बीच का द्वंद्व है। इसका मोटा-सा संदेश इस देश के मोटी बुद्धि वाले महानगरीय सिने-दर्शक तक यह पहुंचता है कि 55 से लेकर 18 बरस तक की महिलाओं के जीवन में एक ‘छुपा’ हुआ पक्ष होता है। इस तरह पात्रों के निजी नैरेटिव एक सामान्‍य दर्शक के मन में म‍हिलाओं के प्रति हिकारत और संदेह पैदा करते हैं।

दूसरी दिक्‍कत फिल्‍म में संभोगरत/आत्‍मरत महिलाओं के कई स्‍तरों से पैदा होती है। एक पति अपनी पत्‍नी की नौकरी करने की सूचना पाकर आक्रोश में जो संभोग करता है, वह प्रेम में बेचैन दूसरी स्‍त्री के संभोग से या साहित्‍य पढ़कर आत्‍मरति में डूबी तीसरी स्‍त्री से बिलकुल अलहदा बात है। हमारा दर्शक इतना सूक्ष्‍म फ़र्क नहीं करता। वह हर संभोग पर मुंह छुपाकर हंसता है। आत्‍मरति में डूबी वृद्ध स्‍त्री का मज़ाक बनाता है। जब चारों स्त्रियां अपनी-अपनी किस्‍मत साथ लेकर अंतिम दृश्‍य में एक साथ कहानी के अंतिम पन्‍ने पलटती होती हैं, तो दर्शक कहता है- ”आगे क्‍या हुआ पता नहीं चला। लगता है दूसरा पार्ट भी आएगा।” दर्शक को निष्‍कर्ष चाहिए था, जो नहीं मिला। मुक्ति की प्रक्रिया को वह पचा नहीं सका क्‍योंकि यह प्रक्रिया चारों को कहीं ले नहीं गई।

इसकी एक वजह यह लगती है कि फिल्‍म का कथानक चारों स्त्रियों की दैहिक मुक्ति से आगे नहीं बढ़ सका। यह समकालीन स्‍त्री-विमर्श की ऐसी बीमारी है जिसे आप Parched में भी देख सकते थे। मैं पहले भी लिख चुका हूं कि देह, देह तक ही ले जाती है। स्‍त्री-मुक्ति उससे बड़ी चीज़़ है। हमारे यहां का दिमागी पिछड़ापन ऐसा है कि सारे विमर्श को देह तक सीमित कर देता है। अगर आप इस फिल्‍म की स्क्रिप्‍ट के शुरुआती नैरेशन पर ध्‍यान दें तो शायद पकड़ में आवे। मसलन, यह वाक्‍य- ”उसके देह के फैलते बगीचे में उसकी जवानी का कांटा उसी को चुभ रहा था।” यह भाषा स्‍त्री की नहीं है। यह पुरुष की भाषा है। पुरुष की भाषा में रोज़ी को आप कैसे मुक्‍त कर पाएंगे? यह विपर्यय फिल्‍म के अंत तक कायम है।

नतीजा? एक कोठरी में सिमट कर सिगरेट फूंकने और रोज़ी की कहानी के अंतिम पन्‍ने पलटने के अलावा और क्‍या हो सकता था? वैसे, इस देश के औसत विवेक के नाते मुझे गंभीर संदेह है कि अब भी कई दर्शक एक-दूसरे से पूछ रहे होंगे कि इन चारों में रोज़ी कौन थी। कायदे से अगर तुलना करनी हो, तो मैं फिल्‍म में स्विमिंग ट्रेनर बने उस मांसल युवक को हिंदुस्‍तान का असली दर्शक मानूंगा जो अंत तक रोज़ी की कहानी में फंसा रहा और जब रोज़ी सामने आई, तो उसे बदनाम करते हुए पलट कर कह दिया- तुम रोज़ी नहीं हो सकती। रोज़ी का अपना एक सपना बेशक है, लेकिन रोज़ी भी किसी का सपना है। प्रॉब्‍लम यहां है।

मीडिया और फिल्म समीक्षक अभिषेक श्रीवास्तव की एफबी वॉल से.

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नेताजी सुभाष चंद्र बोस की इंडियन नेशनल आर्मी उर्फ आईएनए और इसके जांबाजों पर आधारित है फिल्म ‘रागदेश’

The much awaited Tigmanshu Dhulia film ‘Raagdesh’ is all set to release on July 28th, 2017. Expected to be a crossover film, the film marries the historical authenticity with entertaining cinema, a genre much missed in Bollywood. Set in the backdrop of the famous ‘Red Fort Trials’, the film recreates the era of last days of freedom struggle in India, where the battles were being fought on borders, on streets, in media and curiously enough, in the court room.

The film captures the courtroom drama of the trials conducted by the British government in 1945 against the top brass of the Indian National Army, established by Netaji Subhash Chandra Bose. The trials that were observed with great curiosity by the world forces who had won the World War II, as also by the nation who now witnessed another streak of patriotism which was valiant, violent, vociferous and quite different from non-violence practiced by the Congress.

The trials made India aware of the heroic deeds and struggles of the INA, which was till then suppressed by the British authorities through strong armed press censorship. As the trial progressed, the entire nation was galvanized into the final call for independence, leading to Mumbai Naval Mutiny and crumbling of British Empire. The film poignantly portrays the battle travails, border sacrifices and trial of three heroes of INA who changed the course of freedom struggle.

The film is produced by Rajya Sabha Television, who has joined hands with UFO Moviez as its strategic partner for a pan-India release. The film marks the debut of RSTV, which has started an ambitious programme of bringing the exciting events of contemporary history on to the cinema screens.

“India today is a leading nation of the world. There have been people, events and processes that have led to the success of India. RSTV feels that people must know their history in order to preserve their growth. It is the duty of the state and the governments to promote it. Being a public broadcaster, RSTV felt its duty to take history to the people in an entertaining format. We always felt that history has so many fascinating stories to tell and films have been the most powerful and entertaining medium to tell stories”, said Gurdeep Sappal, CEO and Editor-in-Chief of Rajya Sabha Television.

Commenting on the association director Tigmanshu Dhulia said, “This was a great opportunity to showcase a very important chapter of independence struggle. It’s a film about real life heroes, who fought armed war against the mighty British government. It captures the valour, the camaraderie and the heroic struggles of young men who fought and lost the battle, but won the war of independence for India.  It is a one of the most passionate films I have done because I really feel that the nation and the young generation must know about sacrifices of people achieve India’s independence. It’s a film which will certainly make every Indian proud of their legacy.”

Starring Kunal Kapoor, Amit Sadh and Mohit Marwah in the lead roles, Raag Desh is the story of three leading officers of the INA namely Colonel Prem Sehgal, Colonel Gurbaksh Singh Dhillon, and Major General Shah Nawaz Khan, who were captured and imprisoned in the Lal Quila (Red Fort). British wanted to sentence them and hang them in the Red Fort, precisely where Netaji Subhash Chandra Bose wanted to unfurl the Tricolour flag. A trial that the world watched and the nation prayed, eventually turned up as the last message to the British that they would now have to Quit India. The Tricolour flies on the Red Fort since then!

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राज्यसभा टीवी के सीईओ गुरदीप सिंह सप्पल निर्मित फिल्म ‘रागदेश’ का पोस्टर जारी, रिलीज 28 जुलाई को

राज्यसभा टीवी के सीईओ और एडिटर इन चीफ गुरदीप सिंह सप्पल के नाम एक और उपलब्धि जुड़ गई है. उन्होंने फिल्म निर्माण जैसा बड़ा काम कर दिखाया है. बतौर प्रोड्यूसर सप्पल ने जो फिल्म ‘रागदेश’ बनाई है, उसका निर्देशन जाने माने फिल्मकार तिग्मांशु धूलिया ने किया. फिल्म का पोस्टर जारी कर दिया गया है. फिल्म सिनेमाघरों में 28 जुलाई को पहुंचेगी.

The film is on Lal Quila Trial of officers of INA.

फिल्म के पोस्टर को जीएस सप्पल ने अपने एफबी वॉल पर जारी करते हुए जो लिखा है, वह इस प्रकार है :

Gurdeep Singh Sappal : First look of the poster of our film RaagDesh, releasing all over India in cinema halls near you on July 28, 2017. Presented by: Rajya Sabha Television , Director: Tigmanshu Dhulia , Producer : Gurdeep Sappal, Cinematography: Rishi Punjabi, Featuring: Kunal Kapoor, Amit Sadh, Mohit Marwah, Kenneth Desai, Mridula Murali #raagdeshthefilm

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‘हिंदी मीडियम’ देखते हुए आप पॉपकार्न चबाना तक भूल जाते हैं

Uday Prakash : अभी ‘हिंदी Medium’ देख के लौटा। जो भूमिका पहले प्रतिबद्ध साहित्य निभाता था, वह अब ऐसी फिल्म निभा रही है. बाहुबली जैसी मध्यकालीन चित्रकथा फिल्म देखने की जगह, हिंदी मीडियम जैसी फ़िल्में देखने की आदत डालनी चाहिए। इवान इलिच की मशहूर किताब ‘डिस्कूलिंग सोसायटी’ बार-बार याद आती रही. लेकिन यह फिल्म शिक्षा के धंधे में बदलने के विषय से बाहर भी जाती हुई, बहुत बड़ा और ज़रूरी सन्देश इस तरीके से देती है कि आप पॉपकार्न चबाना तक भूल जाते हैं. पूरा हाल भरा हुआ था और ऑडियंस लगातार फिल्म के साथ बोलता, हँसता, सोचता, तालियां बजाता, भावुक होता देखता जा रहा था। आज का दिन ही नहीं यह पूरा महीना हिंदी मीडियम के नाम. (वह महीना जिसमें बाहुबली और Guardians of Galaxie जैसी ब्लॉक बस्टर फ़िल्में भी शामिल है.  🙂

Yashwant Singh : अपनी पहली ही फिल्म से छिछोरपन और सेक्सी सड़ांध की भयानक बदबू छोड़ने वाले अविनाश दास व उनके कट्टर भक्त टाइप चेलों-गुरुओं को ‘हिंदी मीडियम’ फिल्म जरूर देख लेनी चाहिए… क्या कमाल की फिल्म बनाने लगे हैं लोग.. मेरी तरफ से पांच में पांच स्टार. अमीरी-गरीबी, हिंदी-अंग्रेजी, एलीट-भदेस, अध्यात्म-भौतिकता, सिस्टम-करप्शन, जीवंतता-कृत्रिमता, स्वार्थ-त्याग… जाने कितने फ्रेम समेटे है ये फिल्म… जाने कितनी कहानियां कहती है ये फिल्म. मैं सभी से अनुरोध करता हूं कि सपरिवार यानि बीवी बच्चों समेत ये फिल्म देख आइए. पूरा पैसा वसूल है. बहुत दिनों बाद दिल के करीब कोई फिल्म लगी.

जाने माने साहित्यकार उदय प्रकाश और भड़ास एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से.

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मुसहरों का दुख देखा न गया तो इस लड़की ने कैमरे को बनाया हथियार (देखें डाक्यूमेंट्री)

Abhishek Prakash : नागिन डांस करने वाली लड़की से मिले हैं आप! बोले तो ‘बाबा टाइप लड़की’! ऐसी एक लड़की मिली मुझे। बेपरवाह कान में ईयरफोन लगाए ,मन किया तो जोर-जोर से गाने वाली एक मस्तमौला फ़क़ीरी अंदाज़ वाली लड़की। सच कहूं तो खाप-पंचायत की खोज इन जैसों के भय से ही पूर्व में संस्कृति के ठेकेदारों ने की होगी! पर आप इससे बात करिए।

इसके काम को देखिए तो लगेगा कि बनावट से कोसों दूर बदलाव की कहानी लिखने वाली यह नन्ही ‘pursuit of happiness’ की हीरोइन है। अच्छे खासे घर की खाई पी अघाई इक्कीसवीं सदी की ये पौध केवल हिप-हॉप पर ही विश्वास नहीं करती बल्कि अर्थपूर्ण काम भी करती है।

इस साल की बात है जब यह गांव के एक स्कूल में विवेकानंद जयंती कार्यक्रम में भाग लेने गई तो नेताओं की तरह आगे बैठने की चाहत के विपरीत इसने पीछे जाकर ‘मुसहर’ समुदाय के बीच बैठना पसंद किया। मुसहर यानी वही मूस (चूहा) पकड़ने वाली जाति! फिर क्या था हो गया झोल! उनकी दयनीय स्थिति देख वह परेशान हो उठी और सोचने लगी कि उसे कुछ करना है। और, बिना किसी पूर्वानुभव के उनके जीवन संघर्षो पर आधारित एक डॉक्यूमेंट्री बना डाली।

शिवा त्रिपाठी

कोई ज्ञान नहीं, मोबाईल छोड़ कोई इक्विपमेंट भी नही। लेकिन कुछ करने की और वर्तमान में जीने की इस ज़िद ने और उसके अंदर की मानवता तथा संवेदनशीलता ने उससे ये सब करा डाला! मज़ा तो तब आया जब एडिटिंग के लिए उसने छोटे से कस्बे के एक शादी का वीडियो बनाने वाले लड़के को ढूढ़ निकाला वो भी उसके खेत से! रात भर साथ बैठ कर खुद ही लगी रही और अपने जेब से खर्च भी किया।

सोचता हूं लड़कियों के फ़ोन, जीन्स, पढ़ने-लिखने और अपनी मनमाफ़िक जीवनसाथी चुनने वालों को ये सब देखकर कभी शर्म भी नहीं आती होगी क्या? खैर संकीर्ण और प्रतिक्रियावादी लोगों को छोड़ इस प्रगतिशील, सृजनशील लड़की Shiva Tripathi के इस मेहनत को थोड़ा अपना समय दीजिए। डाक्यूमेंट्री देखने के लिए नीचे दिए लिंक पर क्लिक करें :

https://www.youtube.com/watch?v=qdfOw6GhP0Q

यूपी पुलिस में डीएसपी अभिषेक प्रकाश की एफबी वॉल से.

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अविनाश दास की ‘अनारकली’ यशवंत को नहीं आई पसंद, इंटरवल से पहले ही बाहर निकल आए

Yashwant Singh : अनारकली आफ आरा कल देख आया. नोएडा सिटी सेंटर के पास वाले मॉल के सिनेमा हॉल में. इंटरवल से पहले ही फिल्म छोड़कर निकल गया. मेरे साथ एक संपादक मित्र थे. फिल्म बहुत सतही थी. जैसे मीडिया वाले टीआरपी के लिए कुछ भी दिखा देते हैं, पढ़ा देते हैं, वैसे ही सिनेमा वाले बाक्स आफिस के चक्कर में कुछ भी बना देते हैं. याद करिए वो दौर, जब सेमी पोर्न सिनेमा रिक्शे वालों के लिए बना करती थी और वो अच्छी कमाई भी करती थी. इन सिनेमा के बीच बीच में रियल पोर्न क्लिप भी चला दिया जाता था ताकि काम कुंठित दर्शक पूरा पैसा वसूल वाला फील लेकर जाए.

अनारकली आफ आरा में कुछ भी नया नहीं है. एक फूहड़ गाना गाने वाली सिंगर जो ढेर सारे लोगों से रिश्ते बनाती फिरती है, उसका पंगा एक शराबी वीसी से पड़ गया जो उसे सरेआम नंगा कर रहा था. जाहिर है, फूहड़ गायिका उर्फ सेमी रंडी को इसका बुरा लगना था क्योंकि वह यह सब बंद कमरे में करती थी, आज काम कुंठित और प्रभावशाली वीसी ने उसके साथ सरेआम करने की कोशिश की. बस, वह वीसी को सबक सिखाने में लग गई और सिखा भी दिया. कहानी बस इतनी ही है. इंटरवल से पहले फिल्म छोड़ आया इसलिए मुझे बस इतना बताना है कि मैंने ऐसा क्या फील किया जिससे फिल्म छोड़ आया. फिल्म का ज्यादातर हिस्सा फूहड़ गानों, काम कुंठाओं, कामुकता, वासना और जुगुप्साओं से भरा पड़ा है. आपको मिचली भी आ सकती है. फिल्म का पिक्चराइजेशन पूरी तरह से अनुराग कश्यप मार्का बनाने की कोशिश की गई है, लेकिन बन नहीं पाई है.

ऐसे दौर में जब बहुत अलग अलग किस्म के टापिक पर सुंदर फिल्में बन और हिट हो रही हैं, सिर्फ वासना वासना वासना और काम काम काम से बनी फिल्म का औचित्य समझ नहीं आता. अनारकली का दलाल बार बार अनारकली को छेड़ता नोचता परोसता दिखता है लेकिन इससे कोई दिक्कत नहीं अनारकली को. सोचिए, जिसकी मानसिक बुनावट सिर्फ देने लेने भर की हो उसे एक प्रभावशाली से दिक्कत क्या, बस इतने भर से कि यह सरेआम करने की कोशिश की गई. ये ठीक है कि बदन पर आपका हक है और आप तय करेंगी किसे देना लेना है, लेकिन जब आप चहुंओर देती परसोती दिखती हैं तो आपको लेकर कोई खास नजरिया नहीं कायम हो पाता. यौन अराजकता को परोसती यह फिल्म भले ही पुलिस और पावर से टक्कर का नौटंकी करती हो लेकिन इसकी आड़ में असल में केवल वासना और सेक्स परोसा गया है. बेहद घटिया और फूहड़ फिल्म.

इस फिल्म के शुरू होने से पहले पहाड़ पर चढ़ने वाली एक बच्ची की आने वाली फिल्म का प्रोमो दिखाया गया. मैं सोचता रहा कि क्या अविनाश के दिमाग में ऐसे थीम नहीं आते जिसमें जीवन का मकसद और जिजीविषा की कहानी बयां हो जो प्रेरणा देती हो. हमारे हिंदी पट्टी के नए फिल्मकारों के साथ दिक्कत ये है कि वे पहली बार हिट देने के चक्कर में ऐसे विषय उठा लेते हैं जो न सिर्फ फूहड़ और आउटडेटेड होते हैं बल्कि नए जमाने के दर्शकों को पचते भी नहीं. अविनाश की बड़ी सफलता इस बात की है कि उनने बिना खर्च ठीकठाक पीआर किया और ढेरों बढ़िया वाह वाह करती समीक्षाएं फेसबुक से लेकर अखबारों मैग्जीनों में छपवा लीं. वे फिल्में खर्चा निकाल लिया करती हैं, जो मॉल से लेकर सिनेमाघरों में रिलीज हो जाया करती हैं क्योंकि फिल्मों के ढेर सारे राइट मसलन म्यूजिक, टीवी रिलीज, फारेन रिलीज आदि अच्छे खासे पैसों में बिक जाया करते हैं.

हफ्ते भर में रो गा कर काफी लोगों ने फिल्म देखी है (हालांकि हाउसफुल कहीं नहीं रही यह फिल्म और आरा से लेकर भोपाल तक में एक शो में बस बीस लोगों तक के होने की खबर है) और देख रहे हैं. मेरे साथ सिनेमा हाल में कुल साठ लोग तक रहे होंगे. गोल्ड कैटगरी की सीटों पर ही लोग थे और वह भी पूरे नहीं. तब भी कहा जा सकता है कि जिनने इस फिल्म को बनाने में पैसा लगाया उनका पैसा निकल गया होगा. अविनाश को चाहिए कि वह माडर्न थीम सोचें और प्रगतिशील ढंग का सिनेमा बनाएं. मैंने बिना देखे अविनाश को दो बार फोन कर इतनी अच्छी समीक्षाओं और इतने ढेर सारे स्टार के लिए बधाई दी थी, अब उसे वापस लेता हूं. वो कहते हैं न, दूर के ढोल सुहावने होते हैं.

सिर्फ आलोचना के लिए यह आलोचना कतई न समझा जाए, यह जानते हुए भी कि लोगों को आजकल आलोचना का मतलब निंदा ही लगता है. मैं पूरी साफगोई से इसलिए लिख रहा ताकि प्रतिभावान अविनाश आगे कुछ अच्छी फिल्में बना सकें. और हां, यह भी जानता हूं कि ढेर सारे लोगों ने फिल्म देखकर जो वाह वाह लिख मारा है, उन्हें कतई यह मेरी समीक्षा पसंद न आएगी लेकिन उनसे फिर आग्रह करूंगा कि वह तटस्थ ढंग से सोचें और फिल्म के बारे में पुनर्विचार करें. मेरी तरफ से फिल्म को मात्र एक स्टार. मैं कम ही फिल्मों को इंटरवल से पहले छोड़कर निकलता हूं क्योंकि मेरा मानना है टिकट खरीद कर पैसा बेकार कर दिया है तो फिल्म लास्ट तक देख ही ली जाए, लेकिन लस्ट और भौंडेपन से सनी अनारकली आफ आरा को इंटरवल से पहले तक ही उबकाई के मारे छोड़ आया.

जैजै

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से.

उपरोक्त स्टेटस पर आए ढेर सारे कमेंट्स में से कुछ प्रमुख यूं है :

Ravi S Srivastava फेसबुको पर वीरो की बखानता के बाद सोच ही रहा था आप ने बचा लिया साधुवाद

   Yashwant Singh मैंने फिल्म देखी भी देर में ताकि मैं लिखूं तो इससे फिल्म का बिजनेस प्रभावित न हो. आखिर अविनाश अपने साथी हैं, अपने पेशे के रहे हैं और उनकी पहली फिल्म है, बहुत संघर्षों के बाद.

   Ravi S Srivastava बात आप की सही है पर प्रोफेसन मे इमोशनल का छौंका नहीं होना चाहिये

आशीष महर्षि sahi me?

   Yashwant Singh जाइए देख ही आइए. ताकि मेरे कहे के आलोक में आप भी रिव्यू लिख सकें. आप ज्यादा तटस्थ लिखेंगे क्योंकि दोनों पक्ष आपके सामने हैं. हां, देख आना इसलिए जरूरी है ताकि साथी अविनाश की पहली फिल्म होने के नाते एक थोड़ा-सा योगदान अपन लोग की तरफ से करना बनता है.

चैतन्य घनश्याम चन्दन मैंने भी अतिउत्साह में यह फिल्म पैसे खर्च कर देख डाली, लेकिन निराशा ही हाथ लगी। दरअसल जिस फिल्मकार की जैसी मानसिकता होती है, वह वैसी ही चीजें दर्शकों को दिखाना चाहते हैं। इस फिल्मकार का इतिहास भी पलट कर देख लीजिये। कम लिखा, ज्यादा समझिये।

Prakash Govind मैं ये फ़िल्म फ़िल्म देखने को आतुर था,,, क्योंकि बड़े-बड़े दिग्गज बुद्धिजीवियों ने दिल खोलकर सराहा था। लेकिन आपने तो एक झटके में बैंड बजा डाली। मुझे आपकी साफगोई बढ़िया लगी। बिना लाग-लपेट के सटीक समीक्षा की है। अविनाश जी को इसे अवश्य पढ़ना चाहिए ताकि अगली फ़िल्म सार्थक व बेहतर बना सकें।

   Yashwant Singh मजेदार ये है कि वो लोग ज्यादा ही तारीफ लिख रहे जिनने नंगई का जीवन भर विरोध किया. आज के दौर में हर आदमी के हाथ में स्मार्टफोन है और पोर्न क्लिप सबको सहज उपलब्ध है. ऐसे में सिर्फ कामुकता परोसने के लिए फिल्म बनाना और कामुकता वासना सेक्स को जस्टीफाई करने के लिए एक सरोकारी एंगल गढ़ देना पचता नहीं बंधु.

    Prakash Govind मुझे लग रहा है कि अविनाश जी ने बाजार के बोझ तले दबकर ये फ़िल्म रची, इसीलिए कहानी और रचनात्मकता को नजरअंदाज कर दिया।

   Mantu Soni अब बुद्धिजीवी की क्या बुद्धि है जनता जान चुकी है।

Dev Nath इसको कहते हैं बिना किसी लाग लपेट की समीक्षा

सुभाष सिंह सुमन तमाम रिव्यूज पढ़कर सोच रहे थे कि टिकट बुक किया जाए। अब रहने देते हैं।

Nadim S. Akhter भाई Yashwant Singh, अब तक ये फिल्म नहीं देखी है पर अब देखनी पड़ेगी. जैजै

    Yashwant Singh जरूर. मैं तो सरेआम अपील कर चुका हूं रिलीज से पहले ही कि अपने साथी अविनाश की पहली फिल्म को सब लोग देखें और उन्हें सपोर्ट करें. फिल्म सभी को देखना चाहिए क्योंकि पहली फिल्म थोड़ी भी हिट हो गई, पैसा वसूल बन गई तो निर्देशक के लिए आगे का रास्ता खुल जाता है. जरूर देखिए मित्र और लिखिएगा.

    Nadim S. Akhter आप दोनों मेरे मित्र हैं. इसलिए जरूर देखूंगा और ईमानदारी से लिखूंगा. आपका एक अलग दृष्टिकोण मिला. ये भी जरूरी था. आलोचना और समालोचना जरूरी है. कोई चीज परफेक्ट नहीं होती.

Sandip Thakur कमाल कर दिया यशवंतजी…आपने। धाे डाला…पटक पटक कर। आरा आैर अनारकली….एक ताे करेला,दूजे चढ़ा नीम। अनारकली अपने आप में गजब थी आैर अनारकली यदि आरा की हो तो फिर क्या कहने..। मैंने फिल्म देखी नहीं है…लेकिन आपने जैसा लिखा है कि फिल्म में फूहड़ता का नंगा नाच है…उससे मैंने सहमत हाे सकता हूं। क्याेंकि भाेजपुरी संस्कृति जानी ही जाती है नंगई व दबंगई के लिए। फिल्म सेंसर बाेर्ड ने भी ए सर्टिफिकेट दिया है ताे जाहिर है कि फिल्म में वाे सबकुछ हाेगा जाे पैंट में हलचल पैदा कर दे। .

   Yashwant Singh मेरा दावा है कि अगर आप अपने बेटे या बेटी के साथ फिल्म देखेंगे तो आपको शर्म आएगी कि क्यों देखने चला आया. बेटा या बेटी सिर्फ यौन अराजकता की शिक्षा ही पा सकेंगे. इतने घटिया फूहड़ डायलाग और इतने भोंडे गाने कि आप उफ्फ कर लेंगे.

   Sami Ahmad यशवंत जी, मैं सिनेमा के मामले में जीरो हूँ या आम तौर पर इसके बारे में अच्छी राय नहीं। मैंने इस फ़िल्म का बहुत नाम सुनकर एक भाई से पूछा था कि इस फ़िल्म में और बाई जी के नाच में क्या अंतर है? अब लग रहा कि यह तो बाई जी के बीच बाई जी है। फिर आदमी जलेबी बाई को ही क्यों देखे। किसी शादी में चला जाय। नाच और स्टेज पर ही देख ले नाथुनिये पे गोली मारे और फिर चोली के पीछे क्या है। भाई लोग भी कमाल के हैं। सबको एकदम्मे बुड़बक समझते हैं।

Madan Tiwary निष्पक्ष आलोचना है न? व्यवसायिक प्रतिद्वन्दिता तो नहीं? शेयर करना है यह समीक्षा।

   Yashwant Singh अरे पहले आप देख आइए पंडीजी. देखने से ही आप समझ पाएंगे क्या सही समीक्षा है और क्या गलत. बाकी अविनाश और मेरा कहीं कोई होड़ या प्रतिद्वंद्विता नहीं है. न पहले थी. न अब है. हम लोग अच्छे मित्र हैं.

  Madan Tiwary नहीं आपकी बात पर विश्वास है। मित्र तो सब हैं, बुद्धिजीवियों वाली मित्रता भी है, प्रतिद्वन्दिता भी। हाहाहाहाहा

   Yashwant Singh आलोचना लिखना भी एक तरह की ब्रांडिंग ही होती है. इस बहाने फिल्म की चर्चा हुई. सिनेमा में तो वैसे भी निगेटिव पब्लिसिटी ब्रांडिंग कराई जाती है ताकि सिनेमा का नाम लोगों के दिमाग जुबान तक पहुंच जाए. इसलिए यह आरोप लगा सकते हैं Madan पंडी जी कि हम दोनों ने फिक्स करके यह आलोचना लिखी लिखवाई है 😀

   Madan Tiwary आरा की अनारकली यशवन्त की नजर में। वेब मीडिया के तीन मठाधीश हैं। यशवन्त आफ भड़ास, अविनाश आफ मोहल्ला लाईव, संजय तिवारी आफ विस्फोट। तीनों के बीच बुद्धिजीवी वाली मित्रता और प्रतिस्पर्धा भी रही है। यानी दोस्ती भी दुश्मनी भी। हाहाहाहाहा। लेकिन फेसबुकिया मठाधीशों वाला छिछलापन कभी नहीं रहा। खैर तीनों दोस्त है। दो के साथ जाम वाली मित्रता रही। संजय तिवारी बेचारे मजबूर है जाम नहीं छलका सकते। खैर समीक्षा पढ़े जरूर लेकिन फ़िल्म भी देखें। अविनाश के लिए, संघर्षशील एक्टिविस्ट के लिए।

  आशीष सागर Seedha likha

Aryan Kothiyal चलो अब हमारा पैसा तो बचेगा… सही समीक्षा करने के लिए धन्यवाद भईया

Ila Joshi ग़ज़ब समीक्षा उससे भी ग़ज़ब टिप्पणियां, हालांकि मेरी इस समीक्षा से भयंकर असहमतियां हैं लेकिन आपकी वॉल है सो जो चाहे लिखिए।

   Yashwant Singh आप मेरी समीक्षा और ग़ज़ब टिप्पणियों पर एक समीक्षा अपने वॉल पर लिख सकती हैं. बहस तो होनी चाहिए.

Vinay Oswal मैं तो फिल्म ही नही देखता तो टिपण्णी भी नहीं।

Siddharth Kalhans आपको धन्यवाद वरना आजकल में ही 1000-1200 की चपत लगने वाली थी। कई परिजन फिल्म दिखाने का आग्रह कर रहे थे। चेन्नई प्रवास में तो साथी उत्कर्ष सिन्हा आमादा ही हो गए थे फिल्म जाने को। अब इस बचे पैसे का कुछ सदुपयोग कर सकूंगा आपके लखनऊ आगमन पर द्रव्यपान कराने में (आपके साथियों को क्योंकि खबर है कि आपने द्रव्य से बेवफाई कर दी है)

Harsh Kumar एक ऐसी ही बकवास फिल्म पार्च्ड आई थी। जिसकी तथाकथित कम्युनिस्ट टाइप के लोग तारीफ करते नहीं थक रहे थे।

S.p. Singh Satyarthi देखने की चाह जाती रही। यशवंत जी की टिप्पणी अपनी अलग और निर्लिप्त पहचान रखती है। इतनी फूहड़ता है तो बाय बाय…

Singhasan Chauhan मैंने फिल्म देखी नहीं है मगर इसी फूहड़पन की वजह से मुझे खुद याद नहीं कब भोजपुरी फिल्म देखी थी

    Yashwant Singh इसका उल्टा होने की ज्यादा संभावना है. लोग अपना नजरिया कायम करने के लिए फिल्म देखने जाएंगे फिर लिखेंगे कि यशवंत ने सही कहा या दूसरों ने. आप जानते ही होंगे कि निगेटिव पब्लिसिटी और ब्रांडिंग सिनेमा का शगल है ताकि फिल्म जुबान दिमाग में चढ़ जाए. 😀

Deepak Pandey आपकी यह पोस्ट जितने लोग पढ़ेगे उतनी फिल्म को चपत लगेगी।

Vinay Shrikar मैंने भी बिना देखे ही यह मूवी देख ली! थैंक्यू यशवंत।

Tarun Kumar Tarun इस समीक्षा का असर यह हुआ कि मेरे १२० रुपये, तीन घंटे और पचास ग्राम खून बच गये!

डॉ. अजित मैं यही सोच रहा था सर सब वाह वाह कर रहे है क्या फिल्म का कोई कमजोर पक्ष नही है। आपकी दर्शकीय टिप्पणी महत्वपूर्ण है।

Kamal Kumar Singh एक से पहले ही अप्रैल फूल बन गया भैया, हमकों पहिले से ही पता था कि कुंठित खेल होगा।

Ramji Mishra शानदार विश्लेषण

Rajesh Yadav सटीक समीक्षा करना सबके बात नहीं रही इस बिकाऊ मीडिया में। आपने आईना दिखाया है, लेकिन बहुतों को फिर भी धुंधला ही नजर आएगा।

Sheeba Aslam Fehmi Maine Arvind Shesh aur kisi ek aur mitr ki sameeksha padhi, ta’ajub hai ki dono ne hi kuchh aisa nahi likha jisse ye pahlu ujagar hotey. Baharhaal aapke mashvire me dum hai, aainda behtar filmen bhi banaenge Avinash.

Dilnawaz Pasha कई दिन से फिल्म देखने का सोच रहा हूं. मौका मिला तो देख भी लूंगा… बिना देखे क्या कहना!

Sandeep Kumar Yadav मैं आप की बात से सहमत नहीं हूँ। अनारकली लेती देती है या नहीं ये उसकी मर्ज़ी है कोई ज़बरदस्ती तो नहीं है कि BC रसूखदार हैं पैसे फेक रहे हैं तो वो BC के साथ सो जाए, ये उसकी मर्ज़ी है। शरीर उसका है मन उसका है मर्ज़ी उसकी है। आप ने जो ये लिखा है वो अपने दलाल को लेती देती है फिर BC से खुले आम कुछ भी करने में क्या दिक्कत है, मैं ये जानना चाहता हूँ उसके शरीर और उसके मन पर किसका हक़ है, कौन निर्णय कौन करेगा, किसको हक़ दिया गया है…. अगर आप ने फिल्म पूरी नहीं देखी तो कैसे पता की वो अंत में Bc से बदला लेती हैं और सबक सिखाती है ? जिस प्रकार आप ने लिखा है उससे ये पता चलता है कि जो नाचने गाने वाले लोग हैं उनकी अपनी स्वतंत्रता या अपनी नैतिकता कुछ नहीं होती । और जो उसका दलाल है उसने कहाँ कहाँ परोसा है फ़िल्म में अनारकली को ज़रा वो भी बताइये। खैर गीत संगीत में तो आप को फूहड़ता ही नज़र आई बाकी क्या कहें? खैर इसी कहानी में सनी लियोन होती या इमरान हाशमी होते तो शायद ये प्रतिक्रिया न होती आप की? कोई औरत क्या करेगी और किस हद तक करेगी ये BC टाइप्स वाली मानसिकता के लोग तय करते हैं? और सर कृपया अनुराग कश्यप मार्का का अर्थ ज़रा समझाइये?

    Yashwant Singh आपका अपना पक्ष है. स्वागत है. सबके विचार अलग हो सकते हैं. मैने भी लिखा है कि शरीर पर स्त्री का हक होता है, वह तय करती है. मेरा लब्बोलुआब ये है कि सरोकारी कहानी की आड़ में सिर्फ कामुकता, भोंडापन, वासना और नंगई परोसी गई है. जब आप कहते हैं कि पैंसे भी लूंगी, दूंगी भी नहीं तो ये वही नंगई है जिसमें एक पत्रकार कहता है कि रिश्वत भी लूंगा और बदनाम भी करूंगा, एक पुलिस वाला कहता है घूस भी लूंगा और चालान भी करूंगा, एक डाक्टर कहता है फीस भी लूंगा और मरीज को मार भी डालूंगा… क्या संदेश देना चाहते हैं ऐसे सीन / डायलाग से. फिल्म का अंत फिल्म की समीक्षाओं से पता है. अनुराग कश्यप मार्का समझने के लिए गैंग आफ वासेपुर देख लीजिए. दलाल कितने को दिलाता परोसता है यह कुछ दृश्य देखकर अंदाजा लग जाता है जिसमें वह खींच खांचकर हर जगह उसे ले जाता है, थाने से लेकर वीसी तक के घर में. बाकी नजरिया सबका अपना अपना. मैंने अपने जीवन में इतनी भोंडी फिल्म नहीं देखी है, इसलिए कह लिख रहा हूं. सरोकारी कहानी की चाशनी में नंगई परोसने का माडल बहुत पुराना है दोस्त. मुझे स्त्री के संघर्ष से कोई दिक्कत नहीं है. उसके संघर्ष की आड़ में क्या क्या परोसा सुनाया दिखाया गया है, उससे दिक्कत है.

Divakar Singh हम्म सही है सर. हम कल नहीं आ पाए तो एक टिकट का पैसा बर्बाद होने से बच गया. आपने बढ़िया समीक्षा लिखी है.

Sandip Naik कुछ पूर्वाग्रह लग रहे हैं यशवंत। पता नही Avinash ने ये सब पढा या नहीं। खैर, अविनाश खुले दिल दिमाग़ के शख्स हैं और जिंदादिल इंसान हैं। समय आने पर सबको और सबकी जिज्ञासाओं का माकूल जवाब भी देंगे, अभी सुस्ता तो लेने दो एक लंबी पारी खेलने के बाद।

    Yashwant Singh पूर्वाग्रह होता तो फिल्म का रिलीज से पहले ही प्रचार न कर रहा होता भड़ास के जरिेए और रिलीज पर सबको देखने का आह्वान न करता. पूर्वाग्रह अगर इसे कहते हैं कि जैसा आप फील करें, उसे लिख दें तो मान लीजिए पूर्वाग्रही हूं. रही अविनाश की बात तो उन्हें प्रशंसाओं के अंबार के बीच दो चार आलोचनाओं का भी स्वागत करना ही चाहिए मित्र.

Rj Shalini Singh आप जैसे आलोचक जो स्पष्ट एक बार में कह दें कम होते हैं भाई। हम तो ऐसे लोगो को पलकों पर नहीं उनके भीतर छुपा के रखने वाले हैं। ताकि कोई नज़र न लगा पाए।

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‘अनारकली ऑफ़ आरा’ की फर्स्ट डे कमाई थी दस लाख, इन अखबारों ने छाप दिया दस करोड़ रुपये!

Ashwini Kumar Srivastava : दैनिक भास्कर जैसे हिंदी अख़बार में बड़े पद पर पत्रकार रह चुके अविनाश दास की पहली फिल्म ‘अनारकली ऑफ़ आरा’ बॉक्स ऑफिस पर फ्लॉप है या सुपर हिट, कुछ पता ही नहीं चल पा रहा है… पत्रकार से फ़िल्मकार बने अविनाश की फिल्म के बॉक्स ऑफिस आंकड़े न जाने कौन से सूत्रों से मीडिया को मिल रहे हैं कि दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण, अमर उजाला जैसे अखबारों ने जहाँ उसी दिन रिलीज़ हुई अनुष्का शर्मा की फिल्म ‘फिल्लौरी’ को ‘अनारकली ऑफ़ आरा’ के सामने फिसड्डी बता दिया, वहीँ बॉलीवुड में बॉक्स ऑफिस की विश्वसनीय रपट देने वाली वेबसाइट ‘अनारकली ऑफ़ आरा’ को बॉक्स ऑफिस पर सुपर फ्लॉप और ‘फिल्लौरी’ को औसत करार दे भी चुकी हैं।

दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर,  अमर उजाला में तो बाकायदा बॉक्स ऑफिस आंकड़े देते हुए ख़बरें चलाई गई हैं कि कुल 4 करोड़ में बनी अविनाश की फिल्म के पहले दिन की बॉक्स ऑफिस की कमाई 10 करोड़ है…इसी के साथ आज तक जैसी कुछ और वेबसाइट ने भी 10 करोड़ ही लिखा ….

हालाँकि फिर जब आईएमडीबी और बॉलीवुड हंगामा जैसी वेबसाइट ने फिल्म की पहले दिन की कमाई महज 10 लाख रुपये बताई तो आज तक ने भी इसे बदल कर अब 10 लाख ही कर दिया है… मीडिया में फैली इतनी भारी गफलत के बावजूद फिल्म के निर्माता की तरफ से फिल्म रिलीज़ होने के तीन दिन बाद भी बॉक्स ऑफिस आंकड़े नहीं मुहैया कराए जा रहे हैं जबकि अनारकली ऑफ़ आरा के साथ ही रिलीज हुई फिल्लौरी के बॉक्स ऑफिस आंकड़े बराबर आ रहे हैं…

अगर वाकई अनारकली ऑफ़ आरा ने अपने बजट की दोगुनी कमाई पहले दिन ही कर ली है तो यह बेहद बड़ी कामयाबी ही मानी जायेगी। इससे फिल्म के सुपरहिट होने की पूरी उम्मीद भी लगाई जा सकती है। लेकिन महज 10 लाख रुपये ही इस फिल्म ने पहले दिन कमाए हैं तो अनारकली ऑफ़ आरा को अपनी लागत तो दूर, एक करोड़ रुपया कमा पाना भी मुश्किल ही होगा।

यही नहीं, मीडिया से मिल रही चौतरफा वाहवाही और बॉक्स ऑफिस पर पहले ही दिन 10 करोड़ कमा लेने की मीडिया की प्लांटेड ख़बरों से भी यह फ़िल्म सुपरहिट में नहीं बदल पाएगी। पत्रकार होने के नाते अविनाश दास की फिल्म की कामयाबी की कामना बाकी पत्रकारों की ही तरह मैंने भी की थी लेकिन लगता है कि भास्कर, जागरण और अमर उजाला के पत्रकारों ने पत्रकार धर्म को ताक पर रख कर मित्रता धर्म निभाते हुए अविनाश दास की कामयाबी के लिए फर्जी आंकड़ों से भरी खबर ही प्लांट करा दी।

वरना ऐसा कैसे हो सकता है कि बॉक्स ऑफिस रिपोर्ट जिस फिल्म की पहले दिन की कमाई को महज 10 लाख रुपये और फिल्म को फ्लॉप बताये….वहीँ दूसरी तरफ हिंदी के अख़बार उसी फिल्म को फिल्लौरी की पहले दिन की कमाई 4 करोड़ के मुकाबले अनारकली की कमाई 10 लाख से सीधे 10 करोड़ पहुंचा कर फिल्म को सुपरहिट ही घोषित कर दें। जबकि बॉक्स ऑफिस के वास्तविक आंकड़े मिलने में इतनी बड़ी गलती होने की गुंजाईश न के बराबर ही है।

ऐसे में बेहतर तो यही होगा कि फिल्म के निर्माता खुद ही बॉक्स ऑफिस के आंकड़ें जारी कर दें ताकि हम सभी को पता चल सके कि आखिर मीडिया में यह परस्पर विरोधाभासी ख़बरें चलने और बॉक्स ऑफिस आंकड़ों में इतना भारी अंतर आने की वजह क्या है? आखिर कौन सही जानकारी दे रहा है और कौन गलत?

हालाँकि मीडिया से बाहर बैठे लोगों को शायद यह गलती मामूली लगे लेकिन पत्रकार और बुद्धिजीवी अच्छी तरह से जान-समझ रहे हैं कि पत्रकारों द्वारा मित्रता और शत्रुता निभाने का यही खेल तो मीडिया और पत्रकारों को जनता की नजर में दलाल में बदल चुका है।

लखनऊ के पत्रकार और उद्यमी अश्विनी कुमार श्रीवास्तव की एफबी वॉल से. उपरोक्त स्टेटस पर आए ढेर सारे कमेंट्स में से कुछ प्रमुख यूं हैं :

Satyendra PS ए भाई कहीं मोदिया 10 करोड़ आमदनी के मुताबिक कर वसूलने के लिए कारकुन न भेज दे अविनाश दास और प्रोड्यूसर के घर .

Ashwini Kumar Srivastava पहले अविनाश दास खुद तो कबूल करें कि उनको 10 लाख मिला है या 10 करोड़… उनके शुभचिंतक कह रहे हैं 10 करोड़… बॉक्स ऑफिस रिपोर्ट आ रही है 10 लाख… दिमाग का दही कर दिया है शुभचिंतकों ने…

Satyendra PS सब पार्टी लेने के चक्कर में होंगे. वैसे यह सब टोटका करने से फिल्म हिट नहीं होती। फिल्म में स्टारडम के साथ आक्रामक शुरुआती प्रचार, जिससे लोग पगलाकर एक दो शो देख डालें, वो या माउथ पब्लिसिटी अहम है.

Ashwini Kumar Srivastava पार्टी लेने के चक्कर में पगला कर फर्जी ख़बरें ही प्लांट करने लगे ये पगलेठ… बताइये… ऐसी हरकतों से ही हम सभी पत्रकार और पूरा मीडिया ही बदनाम हो जाता है

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अविनाश दास की ‘अनारकली ऑफ आरा’ : पहले दिन गिनती के दर्शक पहुंचे

ये है भोपाल से पत्रकार अमित पाठे का रिव्यू….

रिलीज़ के पहले दिन स्क्रीन ऑडिटोरियम में दर्शक कोई 15-20 ही थे

Amit Pathe : “ये रंडी की ‘ना’ है भिसी (वीसी) साब.” ये वो महत्वपूर्ण डायलॉग है जिसपे फिल्म अनारकली ऑफ आरा पूरी होती है। ये वो ‘ना’ है जो हमने ‘पिंक’ मूवी में मेट्रो सिटी की वर्किंग गर्ल्स का ‘ना’ देखा था। अस्मिता और इज्जत बचाने के लिए नारी का मर्द को कहा जाने ‘ना’। आरा की अनारकली का ‘ना’ भी वैसा ही है। लेकिन बस वो बिहार के आरा की है, ऑर्केस्ट्रा में नाचती-गाती है।

फिल्म के डायरेक्टर-राइटर अविनाश दास का ये डेब्यू है। लेकिन उन्होंने मंझा हुआ काम किया है। फिल्म कसी हुई है और परत दर परत सलीके से खुलती जाती है। कहीं आपको बोरियत नहीं होती। न आप फिल्म के अंजाम का अंदाज़ा लगा लेते हैं। फिल्म की लोकेशन्स इत्ते रियलिस्टिक हैं कि स्वरा को उन गलियों से भी निकलते दिखाया गया है जहां गंदी नालियां हैं। डायरेक्टर खुद बिहार से हैं तो बिहार को और वहां की बोली, टोन, अंदाज़ को बारीकी से दिखा पाए हैं। रामकुमार सिंह के लिखे गानों के देसज व बिहारी बोल, फिल्म को और ज्यादा बिहारी बनाते हैं। पत्रकारिता से फिल्म लेखन में आकर तेजी से उभरते रामकुमार ने इस फिल्म से एक्टिंग में भी हाथ आजमाया है। उन्होंने ऑनस्क्रीन पत्रकार का छोटा सा रोल निभाया है।

वहीं, स्वरा भास्कर ने ‘डर्टी पिक्चर’ की विद्या बालन सा बोल्ड करैक्टर प्ले किया है। स्वरा ने ‘रांझणा’ में साइड रोल कर अपनी एक्टिंग टैलेंट का देसज पहलू दिखाया था। ‘अनारकली ऑफ आरा’ में उन्होंने अपनी इस तरह के एक्टिंग टैलेंट का एक्सटेंड और अपग्रटेड वर्ज़न दिखाया है। कॉस्ट्यूम और बैकग्राउंड स्कोर फिल्म में बड़ा संतुलित है, कहीं अतिरेक कर अटपटा नहीं लगता। म्यूजिक के साथ भी ठीक ऐसा ही है। लिरिसिस्ट रामकुमार और डायरेक्टर अविनाश खुद भी पत्रकारिता से सिनेमा में आये हैं। इन्होंने इंडस्ट्री से बाहर के और नए होने के बावजूद अपनी मजबूत मजबूत एंट्री मारी है। इस फिल्म को ‘A’ ग्रेड जाने क्यों दिया गया है। जबकि फिल्म में न सेक्स है न मारपीट। बस बोल्ड संवाद है वो बिहार की भाषा-बोली से ही ली गई है। ‘A’ ग्रेड जैसा कुछ नहीं लगा, मैंने अपने से 10 साल छोटी बहन के साथ ये फिल्म देखने गया था।

हालांकि, रिलीज़ के पहले दिन स्क्रीन ऑडिटोरियम में दर्शक कोई 15-20 ही थे। उनमें ज़्यादातर भोजपुरी बैकग्राउंड के ही लग रहे थे। जो फिल्म के टाइटल और प्रोमो से जुड़ाव के कारण पहले दिन ही फिल्म देखने आये होंगे। हालांकि भोपाल में बिहार क्षेत्र के लोग भी कम हैं। और इस तरह की ऑफ बीट और देसी फिल्मों को ओपनिंग रेस्पॉन्स फीका ही मिलता है। जैसे-जैसे दर्शक और क्रिटीक उन्हें सराहते हैं, अच्छे और मीनिंगफुल सिनेमा के चाहने वाले फिल्म देखने जाते है। इस तरफ की अच्छी फिल्म अपने डेब्यू-डायरेक्शन, छोटे बैनर, लो-बजट, लो-प्रमोशन और लो-स्टारडम के बावजूद अच्छा बिज़नेस कर जाती है। उससे कहीं जरूरी… सराही जाती है।

अनारकली, बिहार में डबल मीनिंग भोजपुरी गानों पर होने वाले नचनिया डांस फॉर्मेट के स्टेज शो करती है। उसके इस पेशे, गाने-नाचने और पहनावे को उसके ढीले कैरेक्टर का सबूत माना जाता है। वहां की यूनिवर्सिटी का ठरकी वीसी उनमें सबसे ऊपर है, जो स्टेज पे ही अनारकली से छेड़छाड़ और जबरदस्ती करने लगता है। अस्मिता की पक्की अनारकली वीसी को स्टेज पे ही तमाचा जड़ देती है। ठरकी वीसी अपनी हवस और बेइज्जती का बदला लेने के लिए कई बार उसे घेरता व दबाव बनाता है। लेकिन अनारकली टूटती, झुकती नहीं है। हर बार उसे मजबूती से ‘ना’ कह देती है।

खिसियाये वीसी और पुलिस के तमाम दबावों के बाद भी अनारकली अपनी इज्जत बचाये रहती है और घुटने नहीं टेकती। फिल्म के आखिर में वो वीसी को सरेआम स्टेज पे ही बेनकाब कर अपना बदला लेती है। और स्टेज से उतरकर अनारकली कहती है- “ये रंडी की ‘ना’ है भिसी साब।”

ये हैं वरिष्ठ पत्रकार गुंजन सिन्हा…

आरा में अनारकली को देखने के लिए सिनेमा हाल में बमुश्किल बीस लोग थे…

Gunjan Sinha : सन्दर्भ आरा की अनारकली. देखा मैं किसी विशाल प्राचीन मंदिर में हूँ. उसमे तमाम पुजारी नंगे हैं उनके यौनांग स्थाई रूप से उत्तेजित हैं. ऐसे ढेर सारे गोरे चिट्टे विशालकाय, सर घुटाए पुजारी जहाँ तहाँ बैठे गपिया रहे हैं. किसी को कोई एहसास नही कि वे नंगे हैं. उनमे से एक मुझे बाहर निकलने से रोक रहा है. मैं किसी तरह भाग आता हूँ तो देखता हूँ, मंदिर के बाहर बहती नदी के किनारे सड़क पर एक लड़की हांफती हुई बेतहाशा भागी जा रही है. नंग धड़ंग पुजारियों की भीड़ उसे पकड़ने के लिए दौड़ रही है. मेरी नींद खुल गई. पसीने से तर, और कंठ सूखा हुआ.. घडी में दो बज रहे थे.

आखिर ऐसा दुःस्वप्न मैंने क्यों देखा. माजरा तुरंत समझ में आ गया यह असर था ‘अनारकली ऑफ़ आरा’ का. मैंने कल शाम अविनाश दास की यह कृति देखी थी. मुक्त नही हो सका हूँ और शायद जीवन भर मुक्त नही हो सकूँगा – फिल्म से, अनारकली से, अनगिनत अनाम नर्तकियों के अस्मिता विहीन अस्तित्व के एहसास से, अस्मिता के लिए अनारकली के संघर्ष से, दीमक खाये खम्भों वाले प्राचीन परम्पराओं के मंदिर से, इस मंदिर के तमाम नंगे पुजारियों से, मुझे गिरफ्त में लेने की उनकी साजिशों से, बदहवास भागती लड़कियों के बेचैन कर देने वाले बिम्ब से – मैं मुक्त नहीं हो सका हूँ और जीवन भर मुक्त नही हो सकूँगा.

इस फिल्म के लिए अविनाश दास को और उनकी पूरी टीम को सलाम. फिल्म में सभी कलाकारों ने गजब का अभिनय किया है आखिरी दृष्यों में विद्रोही आक्रोश से भरा स्वरा का नृत्य, उसमे अभिरंजित अनारकली का दर्प अविस्मरणीय है. गीत के बोल और नृत्य-संगीत की गति में अनारकली की विद्रोही अस्मिता, उसकी भावनाओं का विस्फोट पूरी तरह व्यंजित हुआ है. मैं फिल्मों का शौकीन रहा हूँ. सोचता था कि अविनाश दास बक बक ज्यादा करते हैं, पता नहीं कैसी फिल्म बनाई है. लेकिन अब कह सकता हूँ, इतनी अच्छी फ़िल्में मैंने बहुत कम देखी हैं.

अक्सर ऐसा होता है, जिन्हें हम व्यक्तिगत रूप से जानते हैं उनकी क्षमता-प्रतिभा को महत्त्व तब तक नही देते जब तक उसे अमेरिका इंग्लैण्ड से सर्टिफेकट न मिले. मैं मानता हूँ, अविनाश के बारे में मैं ऐसी ही गलत फहमी का शिकार रहा हूँ. ये भी आशंका थी कि आरा में आरा की अनारकली का टिकट शायद पहले दिन ना मिले. लेकिन दुर्भाग्य ! ऐसी जिन्दा फिल्म देखने के लिए सिनेमा हाल में बमुश्किल बीस लोग थे. फिल्म को जितना प्रचार मिलना चाहिए, नही मिला है. हर लिहाज से बेहद मनोरंजक होने के साथ फिल्म में व्यंग्य है, असरदार सन्देश है. एक आग है, लेकिन अभागी जनता को न तो आग की जरुरत है, न सन्देश की. उसे जरूरत है उन नंगे पुजारियों की जिन्हें मैंने अपने दुःस्वप्न में देखा है.

फिल्म निर्देशक अविनाश दास से ‘भड़ास’ की बातचीत पढ़िए…

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‘अनारकली आफ आरा’ का क्लाइमेक्स 28 बार री-राइट किया गया : अविनाश दास

(फिल्म ‘अनारकली आफ आरा’ की हीरोइन स्वरा भास्कर के साथ फिल्म लेखक और निर्देशक अविनाश दास. फाइल फोटो)

‘अनारकली आफ आरा’ देश भर में 24 मार्च को रीलीज़ हो रही है। ‘नील बटे सन्नाटा’ के बाद स्वरा भास्कर की यह महत्वाकांक्षी सोलो फिल्म है। प्रोमोडोम कम्युनिकेशन्स के बैनर तले बनी इस फिल्म में उसने एक सड़कछाप गायिका का किरदार निभाया है। फिल्म का निर्देशन किया है अविनाश दास ने। अनारकली की कहानी भी उन्होंने ही लिखी है। इससे पहले अविनाश दास प्रिंट और टीवी के पत्रकार रहे हैं। उन्होंने आमिर ख़ान की ‘सत्यमेव जयते’ के लिए भी रिपोर्टिंग की है। ‘अनारकली’ में स्वरा भास्कर के अलावा संजय मिश्रा, पंकज त्रिपाठी और इश्तियाक़ ख़ान महत्वपूर्ण भूमिकाओं में हैं। फिल्म का अनोखा संगीत रचा है रोहित शर्मा ने, जिन्होंने ‘शिप आफ थिसियस’ में भी संगीत दिया था।

‘अनारकली आफ आरा’ एक सोशल म्‍यूजिकल ड्रामा है। अनारकली बिहार की राजधानी पटना से चालीस किलोमीटर दूर आरा शहर की एक देसी गायिका है, जो मेलो-ठेलों, शादी-ब्‍याह और स्‍थानीय आयोजनों में गाती है। यह फिल्‍म एक ऐसी घटना से जुड़ी है, जिसके बाद अनारकली का जीवन एक उजाड़, डर और विस्‍थापन के कोलाज में बदल जाता है।

अनारकली के गीत लोगों के मन के दबे हुए तार छेड़ते हैं। उसे सुनने वाले उस पर फिदा हो जाना चाहते हैं और अनारकली अपने प्रति लोगों की दीवानगी को अपनी संगीत यात्रा में भड़काती चलती है। उसके प्रेम का अपना अतीत है और सेक्‍स पर समझदारी के मामले में रूढ़ीवादी भी नहीं है। इतनी खुली शख्‍सीयत के बावजूद उसके पास एक आत्‍मसम्‍मान है, जिसका एहसास वह कई मौकों पर सामने वाले को कराती भी रहती है। वह एक तेवर रखती है, जिसमें जमाने की परवाह नहीं है, लेकिन रिश्‍तों के मामले में संवेदनशील भी है। फिल्‍म में उसके इर्दगिर्द पांच लोग हैं – जो उसके प्रेम के एक ही धागे में बंधे हैं। सब अपनी अपनी तरह से अनारकली को प्रेम करते हैं। लेकिन आखिर में अनारकली को अकेले ही अपने रास्‍ते पर जाना है और वही होता है। पूरी कहानी में कठिन से कठिन मौकों पर उसकी आंखें आंसू नहीं बहाती और बाहर की उदासी को वह अपनी हिम्‍मत से खत्‍म करने की कोशिश करती है। अनारकली एक ऐसा किरदार है, जो हिंदी सिनेमा में अब तक नहीं आया है।

इस फिल्म के निर्देशक और लेखक अविनाश दास की खुद की कहानी भी कम मजेदार नहीं है. अविनाश दास ने प्रभात खबर से पत्रकारीय करियर शुरू किया और दिल्ली पहुंचे जहां एनडीटीवी के हिस्से बने. नौकरियां, पद और ग्लैमर इन्हें बांध नहीं पाया. एनडीटीवी हो या ब्लागिंग हो या अखबार हो या इवेंट, हर कुछ करने के बाद आगे की यात्रा पर कुछ नया खोजने रचने निकल पड़ते अविनाश. उनका ताजा हासिल है यह फिल्म. फिल्म नगरी के साथ साथ संपूर्ण मीडिया इंडस्ट्री भी सांस रोके अविनाश की फिल्म का इंतजार कर रहा है. अविनाश से भड़ास4मीडिया के एडिटर यशवंत ने कुछ चुनिंदा सवाल किए जिनका बेबाकी से जवाब अविनाश ने दिया. नीचे है बातचीत :   

-अगर आप एनडीटीवी में ही नौकरी कर रहे होते तो क्या होते?
–एनडीटीवी में होता तो ख़बर लिखते, बनाते, काटते, छांटते अब तक सड़ चुका होता। फ्रस्टेड हो चुका होता।

-बड़ा संकट ड्रिस्ट्रीब्यूशन का है. कैसे करा पाएंगे फिल्म को पूरे देश में रिलीज?
–पीवीआर जैसी बड़ी कंपनी रीलीज़ हो रही है। वैसे भी यह प्रोड्यूसर का अधिकार क्षेत्र है। मेरा काम फिल्म बनाना था, मैंने बनायी। अब वह प्रोड्यूसर की संपत्ति है। चाहे वह उसे कूड़े में डाले या लोगों को दिखाये – यह वही तय करेगा। मुझे ख़ुशी है कि मेरे प्रोड्यूसर ने हर चीज़ टाइमलाइन के हिसाब से की है।

-फिल्म निर्माण से जुड़ा सबसे मुश्किल क्षण क्या रहा?
–सबसे मुश्किल क्षण रहा फिल्म का क्लाइमेक्स डिसाइड करना और उसे शूट करना। क्लाइमेक्स को 28 बार री-राइट किया। तीन दिन में उसे शूट करना था, लेकिन नहीं हो पाया। संजय मिश्रा का अगले दिन का डेट नहीं था। वे साजिद नाडियाडवाल की फिल्म बाग़ी के लिए देश से बाहर जा रहे थे। तो साजिद से लेकर संजय जी को मनाना और एक दिन आगे तक उन्हें रोकना – वह सब ज़ेहन में आता है तो रूह कांप जाती है। अगर वे चले गये होते तो फिल्म डब्बाबंद हो जाती।

-मुंबई पूरी तरह सेटल हो गए या दिल्ली से अभी नाता है?
–हम तो मुंबई में बस गये हैं, पर परिवार अभी दिल्ली में है। इसलिए दिल्ली तो जाते हैं, लेकिन घर से बाहर नहीं निकल पाते। वैसे मार्च में परिवार भी बोरिया बिस्तर समेत मुंबई आ रहा है।

-आपका चर्चित ब्लाग ‘मोहल्ला’ रहा है. क्या इसे वक्त दे पाते हैं?
–हमने पूरे मन से मोहल्ला लाइव को वक्त दिया। लेकिन वो एक इनडीविजुअल एफर्ट था। उसका आर्थिक व्याकरण दुरुस्त नहीं हो पाया। मेरी उसमें काबिलियत भी नहीं। जब बड़े बड़े संस्थान वेबसाइट-ब्लाग्स लेकर आने लगे – तो मुझे लगा, मेरा जो काम था – वह हो गया। अब आगे का सफ़र करना चाहिए। वैसे अब कुछ इनवेस्टर्स आ रहे हैं मोहल्ला लाइव के लिए। तो जल्दी ही उसे री-स्ट्रक्चर करना पड़ेगा। लेकिन इस बार मेरी जगह उसे कोई और लीड करेगा।

-अपने पत्रकारीय करियर के बारे में बताएं.
–रांची में मेरी पढ़ाई हुई, तो स्कूल के ज़माने से हरिवंश जी को जानता था। पटना से 1996 में प्रभात ख़बर का संस्करण शुरू हुआ, तो उन्होंने मुझे काम करने और सीखने का मौका दिया। फिर महज़ पच्चीस साल की उम्र में उन्होंने मुझे पटना संस्करण का संपादक बना दिया। देवघर संस्करण लांच करने का मौका भी दिया। इस बीच मैं दूसरी जगहों पर भी गया, लेकिन बार-बार प्रभात ख़बर में लौटता रहा। देवघर में संपादक रहते हुए मैंने दिबांग के एक चिट्ठी लिखी थी। तब एनडीटीवी नया नया स्वतंत्र चैनल के रूप में सामने आया था। उन्होंने मुझे देवघर से बुला कर आउटपुट एडिटर बना दिया। फिर तीन साल के बाद दिबांग जब एडिटर नहीं रहे, तो मेरा कांट्रैक्ट रीन्यू नहीं हुआ। फिर मैं दैनिक भास्कर ज्वाइन किया। मुंबई मिरर और मिड डे की तरह एक टेबलाॅयड निकालने की योजना थी। मुझे उसको लीड करने की ज़िम्मेदारी दी गयी। पर साल होते होते एक अप्रिय प्रसंग ने पत्रकारिता से मेरा मोहभंग हो गया। मैंने ठान ली कि अब पत्रकारिता नहीं करूंगा। यह 2009 की बात है। फिर रोज़ी रोटी के लिए छोटे-मोटे काम किये, लेकिन उद्देश्य मीडिया से बाहर अपने पंख उगाने, फैलाने का था। आज मुझे ख़ुशी है कि मैंने जो सोचा – वह मुझसे हो पाया।

अविनाश दास से संपर्क avinashdasfilms@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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