दी वायर और सिद्धार्थ वरदराजन की पत्रकारीय राजनीति पर शक करिए और नज़र रखिए, वजह बता रहे हैं यशवंत सिंह

Yashwant Singh : भाजपा ने सबको सेट कर रखा है। अब कांग्रेस वाले कुछेक पोर्टलों से काम चला रहे हैं तो इतनी बेचैनी क्यों। मुकदमा ठोंक के भाजपा ने रणनीतिक गलती की है। मुद्दे को देशव्यापी और जन-जन तक पहुंचा दिया। एक वेबसाइट को करोङों की ब्रांडिंग दे दी। तहलका वालों ने कांग्रेस परस्ती में बहुत-सी भाजपा विरोधी ‘महान’ पत्रकारिता की। मौका मिलते ही भाजपा शासित गोआ में तरुण तेजपाल ठांस दिए गए। उनके साथ हवालात में क्या क्या हुआ था, उन दिनों गोआ में तैनात रहे बड़े पुलिस अधिकारी ऑफ दी रिकार्ड बता सकते हैं।

तहलका अब लगभग नष्ट हो चुका है। केंद्र में सरकार भी बदल गयी तो सारे बनिया मानसिकता वाले मीडिया मालिक भाजपाई हो गए। ऐसे में मीडिया फील्ड में एक एन्टी बीजेपी मोर्चा, जो कांग्रेस परस्त भी हो, तैयार करना बड़ा मुश्किल टास्क था। पर धीरे धीरे सिद्धार्थ वरदराजन एंड कंपनी के माध्यम से कर दिया गया। एन गुजरात चुनाव के पहले जय शाह की स्टोरी का आना, कपिल सिब्बल का इसको लपक कर प्रेस कांफ्रेंस करना, हड़बड़ाई भाजपा का बैकफुट पर आकर अपने एक केंद्रीय मंत्री के जरिए प्रेस कांफ्रेंस करवा के सफाई दिलवाना, सौ करोड़ का मुकदमा जय शाह द्वारा ठोंका जाना… मैदान में राहुल गांधी का आ जाना और सीधा हमला मोदी पर कर देना… यह सब कुछ बहुत कुछ इशारा करता है।

बड़ा मुश्किल होता है निष्पक्ष पत्रकारिता करना। बहुत आसान होता है पार्टी परस्ती में ब्रांड को ‘हीरो’ बना देना। भड़ास4मीडिया डॉट कॉम चलाते मुझे दस साल हो गए, आज तक मुझे कोई निष्पक्ष फंडर नहीं मिला। जो आए, उनके अपने निहित स्वार्थ थे, सो मना कर दिया। न भाजपाई बना न कांग्रेसी न वामी। एक डेमोक्रेटिक और जनपक्षधर पत्रकार की तरह काम किया। जेल, मुकदमे, हमले सब झेले। पर आर्थिक मोर्चे पर सड़कछाप ही रहे। जैसे एक बड़े नेता का बेटा फटाफट तरक्की कर काफी ‘विकास’ कर जाता है, वैसे ही कई बड़े नामधारी पत्रकारों से सजा एक छोटा-मोटा पोर्टल एक बड़ी पार्टी के संरक्षण में न सिर्फ दौड़ने लगता है बल्कि ‘सही वक्त’ पर ‘सही पत्रकारिता’ कर खून का कर्ज चुका देता है।

इसे मेरी निजी भड़ास कह कर खारिज कर सकते हैं लेकिन मीडिया को दशक भर से बेहद करीब से देखने के बाद मैं सचमुच सन्यासी भाव से भर गया हूं। यानि वैसा ज्ञान प्राप्त कर लिया हूं जिसके बाद शायद कुछ जानना बाकी नही रह जाता। आज के दौर में मीडिया में नायक पैदा नहीं होते, गढ़े जाते हैं। कारपोरेट और पॉलिटिशियन्स ही मीडिया के नायक गढ़ते हैं। दी वायर और सिद्धार्थ वरदराजन की पत्रकारीय राजनीति पर शक करिएगा, नज़र रखिएगा। ये जन सरोकार से नहीं फल फूल रहे, ये बड़े ‘हाथों’ के संरक्षण में आबाद हो रहे।

चार्टर्ड फ्लाइट से वकील कपिल सिब्बल / प्रशांत भूषण और संपादक सिद्धार्थ वरदराजन ये वाला ‘क्रांतिकारी’ मुकदमा लड़ने अहमदाबाद जाएंगे, बाइट देंगे, फोटो खिचाएँगे, केस गुजरात से बाहर दिल्ली में लाने पर जिरह कराएंगे। इस सबके बीच इनकी उनकी ऑनलाइन जनता हुँआ हुँआ करके सोशल मीडिया पर ट्रेंडिंग वाली तगड़ी खेमेबंदी करा देगी। इस दौरान हर दल के आईटी सेल वाले सच को अपनी-अपनी वाली वैचारिक कड़ाही में तल-रंग, दनादन अपलोड ट्रांसफर सेंड शेयर ब्रॉडकास्ट पब्लिश करने-कराने में भिड़े-लड़े रहेंगे, ताकि पब्लिक परसेप्शन उनके हिसाब से बने।

आज के दौर में चीजें बहुत काम्प्लेक्स हैं, मल्टी लेयर लिए हुए हैं। अगर आपको पार्टियों से अघोषित या घोषित रोजगार मिला हुआ है तो आप अपने एजेंडे को अपने तरीके का सच बताकर परोसेंगे, वैसा ही कंटेंट शेयर-पब्लिश करेंगे। जो सच को जान समझ लेता है वो बोलने बकबकाने हुहियाने में थोड़ा संकोची हो जाता है। ऐसे समय जब दी वायर हीरो है, कांग्रेसी आक्रामक हैं, भक्त डिफेंसिव हैं, भाजपाई रणनीतिक चूक कर गए हैं, शेष जनता जात धर्म के नाम पर जल कट मर रही है और इन्हीं आधार पर पोजिशन लिए ‘युद्ध’ मे इस या उस ओर बंटी-डटी है, मुझे फिलहाल समझ नहीं आ रहा कि अपने स्टैंड / अपनी पोजीशन में क्या कहूँ, क्या लिखूं। इस कांव कांव में जाने क्यूं मुझे सब बेगाना-वीराना लग रहा है।

भड़ास4मीडिया डाट काम के फाउंडर और एडिटर यशवंत सिंह की उपरोक्त एफबी पोस्ट पर आए ढेर सारे कमेंट्स में से कुछ प्रमुख इस प्रकार हैं…

Shamshad Elahee Shams ज़बरदस्त. सभी नाप दिऐ आपने..कलम हो तो ऐसी हो.

Pranav Shekher Shahi Hats off… दादा… वाकई जानदार लेखनीः।

अभिषेक मिश्रा बस यही आपको सबसे अलग बनाती हैl

Muzaffar Zia Naqvi भैय्या दिल निकाल कर रख दिया आपने। उम्मीद रखिए दिन बदलेंगे।

Ashok Anurag जय जय जय जय हो सत्य वचन, गर्दा लिखे हैं

Ashok Aggarwal आपने तो बहुत जानदार बात लिख दी है आप कह रहे हैं क्या लिखूं ।

Vijay Srivastava ये विश्लेषण पत्रकारिता की नयी पौध को सलीके से सींच सकता है. मैं इसे अपने वाल पर शेयर कर रहा हूं.

Vijayshankar Chaturvedi मैं निष्पक्ष हूँ। भारतीय वामधारा का समर्थक होने के बावजूद आप जान लीजिए, कार्यकर्ता बनने को पत्रकारिता नहीं समझता। और, संन्यास आप ग़लत लिखते आए हैं। कृपया सुधार लीजिए।

Yashwant Singh प्रभो, तुम ज्ञानी, हम मूरख। जानि रहै ई बात 🙂

Sushil Dubey नहीं बाबा पहली बार लगा की आप थक रहे हो सिस्टम से… वीर तुम बढ़े चलो

Yashwant Singh बाबा, थकना बहुत ही प्यारी सी मानवीय और प्राकृतिक (अ)क्रिया/ अवस्था है। हमका कंपूटर जाने रहौ का? 🙂

Ajai Dubey have u same view about Robert Vadra case.

Yashwant Singh हम सबके घरों में दामाद / बेटे होते हैं जिन्हें बढ़ाने का दायित्व ससुरों / बापों का होता है। ये काम पार्टी वाले बाप / सास भी करती / करते हैं। संपूर्णता में चीजों को देखेंगे तब समझेंगे। किसी उस वाड्रा दामाद या इस शाह बेटा पर अटके रहेंगे तो कांव कांव वाली जमात में ही रह जाएंगे। 🙂

Ajai Dubey sahi baat, agree Yashwant ji.

Badal Kumar Yashwant sir your analysis is best on contemporary media.

Sandeep K. Agrawal Bahut achchhi aur sachchi bat kahi aapne… Nishpakash ko trishanku banakar uski durgat karne ka koi mouka nahi chhoda ja raha hai..

Shorit Saxena आलेख सटीक तो है ही, बहुत कुछ सिखाता है। बड़ी बात आइना दिखाता है कि आदरणीय विनोद दुआ जी की बातोंसे भावुक ना हुआ जाये। यहाँ सब प्री प्लांड ही है। गजब, जय जय।

योगेंद्र शर्मा दर्द छुपा है। इस दर्द में आप अकेले है। आपने पत्रकारिता का मूल धर्म कितना निभाया। वायर कितना दोषी है, हम नहीं जानते लेकिन कुछ सच्चाई इसके माध्य्म से आ तो रही है।

Bhagwan Prasad Ghildiyal यशवंत सिंह सही लिख रहे है। चाटुकार, दलाल, भ्रष्ट रातों रात फर्श से अर्श पर होते हैं और दो ..तीन दशक से यह चलन हर क्षेत्र में बढ़ा है । कर्तव्य, मर्यादा और चरित्र तो केवल कहने, सुनने भर को रह गया है।

Avinash Pandey दी वायर की रिपोर्टिंग ने राजनैतिक भूचाल ला दिया है। सबसे अच्छा यह हुआ कि जय शाह ने 100 करोड़ रुपयों का मानहानि का मुकदमा कर दिया है। यह भारत की जनता के लिए सुखद है। इसके पहले भी एक और राजनैतिक मानहानि का मुकदमा जनता देख रही है। श्री केजरीवाल द्वारा दिल्ली क्रिकेट एशेसियेशन में श्री अरुण जेटली पर भ्रष्टाचार करने सम्बन्धी सार्वजनिक आरोप सोशल मीडिया पर लगाये गये थे।यह मुकदमा बहुत रोचक स्थिति में पहुंच गया है। आजतक श्री केजरीवाल भ्रष्टाचार सम्बन्धी एक भी साक्ष्य अदालत में जमा नहीं कर पायें हैं। श्री केजरीवाल के बडे वकील श्री राम जेठमलानी भी भ्रष्टाचार सिद्ध करने के स्थान पर कुछ और ही बहस कर रहे हैं। इसके पहले भी तहलका के तरुण तेजपाल द्वारा गोवा में किये गये यौन शोषण प्रकरण पर श्री कपिल सिब्बल तरुण की ओर से बयान-बाजी कर चुके हैं। गुजरात चुनाव के पूर्व दी वायर वेव पोर्टल की ओर से शानदार खलबली पैदा की गयी।इसी के साथ वेव पोर्टल के प्रमोटर और उनका भविष्य तय हो जायेगा।

Aflatoon Afloo वायर का पृष्ठपोषक कांग्रेस नही है। कुछ उद्योगपति हैं। स्तरीय पत्रकारिता अनुकरणीय है। सीखने की उम्र सीमा नहीं होती। भड़ास अन्याय के खिलाफ हो, बाकी सुलगाने से क्या होगा!

Harsh Vardhan Tripathi स्तरीय नहीं एजेंडा पत्रकारिता कहिए।

Surendra Grover सरोकारी एजेंडा भी कुछ होता है त्रिपाठी भाई.. यदि कोई मीडिया हाउस सरोकारी पत्रकारिता करता है तो उसे हर उस सक्षम से फंडिंग हो जाती है जो सही तथ्यों को गम्भीरता से लेता है.. विरोधी राजनैतिक दल भी इसमें शामिल होते हैं और अपने अपने हिसाब से उन तथ्यों का इस्तेमाल भी करते हैं..

Aflatoon Afloo रजत शर्मा और हर्षवर्धन में कुछ समान

Harsh Vardhan Tripathi बहुत कुछ समान हो सकता है Aflatoon Afloo । लेकिन, कब तक यह चलाइएगा कि पत्रकार, लेखक होने के लिए तय खाँचे में फ़िट होना जरूरी

Aflatoon Afloo बिना खांचे वाले आप होना चाहते हैं?

Harsh Vardhan Tripathi बिना खाँचे का तो कोई नहीं होता Aflatoon Afloo । लेकिन, मुझे यह लगता है कि हर खाँचे से पत्रकार निकल सकते हैं। वामपन्थी होना पत्रकार, लेखक, सरोकारी होने की असली योग्यता भला कैसे हो सकती है।

Surendra Grover सरोकारी होने पर लोग खुद वामपंथी का तमगा क्यों थमाने लगते हैं.?

Harsh Vardhan Tripathi भाई Surendra Grover जी, वामपन्थियों ने लम्बे समय तक कांग्रेस पोषित व्यवस्था में यह साबित किया कि सिर्फ वामपन्थी ही सरोकारी हो सकता है। यह कितना बड़ा भ्रमजाल है, वामपन्थियों की ताज़ा गति से आसानी से समझा जा सकता है। लेकिन, यही वजह रहती होगी।

Surendra Grover निर्लिप्तता भी बड़ी चीज है, खुद Yashwant Singh गवाह है.. हमारे अज़ीज़ नचिकेता भाई मेरी इस बात पर मुझे दलाल का तमगा थमा बैठे थे और उसके परिणामस्वरूप जो हुआ उससे हमारे अभिन्न रिश्ते ही तोड़ बैठे सम्मानीय.. ब्लॉक किया सो अलग..

Akhilesh Pratap Singh संघी सरोकार वाले भाई साहब पेट्रोल डीजल के दाम बढ़ने पर चेक गणराज्य में भी दाम ज्यादा होने की दलील दे चुके हैं…..इनकी बातों को दिल पर न लें…

Harsh Vardhan Tripathi दिल ठीक रहे, कहाँ की ईंट उठाए घूम रहे हो Akhilesh Pratap Singh भाई

Devpriya Awasthi आप कमोबेश सच लिख रहे हैं. लेकिन फंडिग के फंडे के बारे में आपके नजरिए से सहमत नहीं हूं. द वायर ने कुछ तथ्य ही तो उजागर किए हैं . भक्त बेवकूफी भरी प्रतिक्रिया नहीं करते तो द वायर द्वारा उजागर किए गए तथ्यों पर किसी का ध्यान भी नहीं जाता. और जहां तक फंडिंग का मामला है, उसकी जड़ें कहां कहां तलाशोगे? हरेक फंडिंग में कुछ न कुछ स्वार्थ छिपे ही होंगे. आप तो यह देखो कि शांत तालाब में एक छोटे से पत्थर ने कितनी बड़ी हलचल पैदा कर दी है.

Pankaj Chaturvedi आप सटीक बात कर रहे हैं. इसमें भाजपा के कुछ लोग शामिल हैं जिन्होंने इसे हवा दी, आनंदी बेन गुट

Surendra Grover भाई Yashwant Singh जी, Afloo दुरुस्त ही फरमा रहे हैं.. वैसे निर्लिप्त भाव से की गई पत्रकारिता ही असल होती है.. बाकी तो जो है,, वो है ही बल्कि सिरमौर बने बैठे हैं.. सबकुछ बिकता है.. धंधा जो बन गया..

Sandeep Verma जब आप मान ही रहे है कि भाजपा ने रणनीतिक गलती कर दी है तो बाकी पोस्ट की बाते फालतू हो जाती है . और जो हो रहा है वह सोशल मीडिया का दबाव है . भाजपा अगर गलतियाँ कर रही है तो उसकी वजह वह सोशल मिडिया से प्रभावित हो रही है

Manoj Dublish I don’t think that this issue will conclude any result because fast moving media channels will bring a solution of compromise very soon .

Sandip Naik सब सही पर जिस भड़ास पर किसी का साया पड़ा अपुन पढ़ना ही बंद नहीं करेगा एक एंटी भड़ास खोल देगा। यार भाई जनता से जुड़े हो काहे इन अंबानियों की बाट जोह रहे हो

Dev Nath जबर्दश्त। अनुभव इसे कहते हैं, लेखन इसे कहते हैं, समालोचना इसे कहते है, पत्रकारिता इसे कहते हैं, विश्लेषण इसे कहते हैं।शब्द शब्द जबरदस्त

Sanjay Bengani कोई आपके सम्मान से खिलवाड़ करे लेकिन चूँकि वे पत्रकार है चाहे बीके हुए ही क्यों न हो आपको अदालत जाने का अधिकार नहीं है.

Roy Tapan Bharati यशवंत जी, एक दशक हो गया आप और आप की पत्रकारिरता देखते ,आपकी चिंता जायज है। पर आपका उदासीन हो जाना खलता है। हम जैसे शुभचिंतक अपने बच्चों के बल पर भड़ास को कुछ आर्थिक सहयोग करना चाहें तो कैसे करें?

Kamta Prasad झाल बजाना शुरू कर दीजए, जहाँ से नर्क में आए थे। बदलाव की शुरुआत उसी से और वहीँ से होगी। आपने अपने वैचारिक आग्रहों को छोड़कर मानवतावाद का दामन पकड़ा, कहीं से भी ठीक नहीं था।

Manoj Kumar Mishra अमित शाह के पूरे भारत मे भाजपा के विस्तार के आक्रमक नीति से ऐसे फ़र्ज़ी सर्जी हमले होने ही थे तब जब कि सभी विपक्षियों पार्टियों विशेषकर लेफ्ट और कांग्रेस के अस्तित्व पर ही संकट मंडराने लगे। 2019 आते आते ऐसे ही आरोप और गढ़े जाएंगे ।करोड़ों रुपये की कीमत वाले प्रशांत किशोर के फेल होने के बाद कांग्रेस डोनॉल्ड ट्रम्प की चुनावी रणनीति तैयार करने वाली एजेंसी को करोड़ों डॉलर के अनुबंध के साथ हायर कर रही है । जो उच्च तकनीक से लैस है और जिसके पास हज़ारों आईटी एक्सपर्ट और हैकर्स की सेवा उपलब्ध है जो भारतीय मतदाताओं के गूगल सर्च, ईमेल, सोशल मीडिया और उनके संपर्कों का इतिहास भूगोल खंगाल डालेगी और उनकी रुचियों और उसी के अनुसार वो कांग्रेस की चुनावी रणनीति तय करेगी, राहुल बाबा के भाषणों के जुमले गढ़े जाएंगे ।अगर भारतीयों की प्राइवेसी और देश और देश की साइबर सुरक्षा इतनी गौण है तो कम से कम ये तो विचारणीय है कांग्रेस के पास इतना भारीभरकम फण्ड कहां से आ रहा है ?

Brijesh Singh कांग्रेस के पास व उसके नेताओं के पास अभी भी इतना पैसा है कि वह भाजपा तो क्या भारत की सभी पार्टियों को खरीद सकती हैं । अभी सत्ता ही तो नहीं है उनके पास। अभी तक कमाये धन को व्यवस्थित कर रहे हैं ।

Rehan Ashraf Warsi भाई हम जैसे नादान को लगता है कि अपने जो दुख झेलें हैं वह मीडिया के अंदर के सच , संघर्ष और गंदगी के ख़िलाफ़ मोर्चा खोल कर लिए हैं। वरना आज आप भी मज़े कर रहे होते। हाँ आपकी इज़्ज़त बहुत है मगर ज़्यादातर दिल मे ही करते हैं । बल

Jai Prakash Sharma निष्पक्ष, निडर और सच्चाई की बात करने वाले अधिकतम भाई Lisening ही करते नजर आते हैं, दलाली कहना थोड़ा ज्यादा हो जाता है

Vinay Oswal कुछ ऐसे ही कारणों से मैं भी बहुत मानसिक उलझन में हूँ। आप साझा करके हल्का हो लिए मैं नही हो पा रहा हूँ

Arvind Pathik यशवंत जी एक दशक हो गया आप और आप की पत्रकारिरता देखते… आप के निष्कर्ष उचित हैं… पर आपका उदासीन हो जाना खलता है.

Trivedi Vishal Confuse kyo hain ap? Hey arjun.. shastra uthao aur waar karo.

Kuldeep Singh Gyani अपने-अपने झंडे तले “सबकी” मौज बहार, मारी गई “पत्रकारिता” अब तू अपनी राह सवार… भाई साहब लिखा तो बहुत अच्छा है लेकिन बात बात पर सन्यास लेने की बात उचित नहीं…हम तालाब के किनारे बैठ कर भी क्या कर लेंगे उछलेगा तो कीचड़ ही तो क्यों न तालाब में ही खड़े रहा जाए जहां “मगर” भी हैं और “कमल” भी… हे ज्येष्ठ अडिग रहें और अपने हाथों को निरंतर मजबूत करने के लिए “फौज” तैयार करें…

Nirupma Pandey बात तो सही है अब आम जनता में न्यूज के प्रति उदासीन भाव आ गया है परदे के पीछे का सच आम जनता भी जानने लगी है

Harshit Harsh Shukla जी Yashwant singh भाई, पत्रकारिता के वेतन से घर नहीं चलता तो ईमान कहाँ से चलेगा… शायद यही वजह है की पत्रकार पार्टी के हो लेते हैं..

Manoj Upadhyay भाई साहब.. सच तो यही है कि आप जैसे लोग और आपकी जैसी पत्रकारिता ही सही और सार्वकालिक है. यह भी सच है कि यदि आप की पत्रकारिता और पत्रकार भावना संपन्न है तो आर्थिक मोर्चे पर तो सड़क छाप होना ही है. क्योंकि आपकी पत्रकारिता और आपकी पत्रकार भावना आज के तथाकथित लोकतांत्रिक दौर में पनपने वाले कारपोरेट नेताओं के लिए आप किसी काम के नहीं..

Yogesh Garg भड़ास का पिछले 5 साल से नियमित पाठक हूँ । पिछले कुछ समय से लगता है खबरों की आंच कम हो गई है । निष्पक्ष रहने के चक्कर में सत्ता पक्ष के लोकतंत्र विरोधी कुकर्मो का सख्त विरोध नही कर पा रहे आप । ऐसे बहुत से मुद्दे थे जिन पर लगा था कि भैया यशवंत की कलम चलेगी । पर वो मौन रह गए ।

Harsh Vardhan Tripathi असली बात बस यही है हमको १० साल में एक भी निष्पक्ष फ़ंडर न मिला। बाक़ी सब मिथ्या है।

Aflatoon Afloo और वायर को मिले।

Harsh Vardhan Tripathi भाई Aflatoon Afloo सही बात तो यही है ना कि वायर मोदी/संघ/बीजेपी के ख़िलाफ़ एजेंडे पर लगी वेबसाइट है। ऐसे ही कई होंगी, जो मोदी/संघ/बीजेपी के साथ लगी होंगी। जो जैसा है, उसको वही बताइए। मोदी के निरन्तर ख़िलाफ़ है, तो पत्रकार है। मोदी के साथ मुद्दों पर भी है, तो संघी है, इससे बाहर को आना ही पड़ेगा। और तो पब्लिक है, ये सब जानती है।

Aflatoon Afloo बिल्कुल, पब्लिक सब जानती है

Akhilesh Pratap Singh संघ के साथ पत्रकार नहीं, नारद होते हैं

Satyendra PS बात तो ठीक ही कह रहे हैं।

Vishnu Rajgadia अच्छा विश्लेषण है

Jayram Shukla वाजिब भडास।

सौरभ मिश्रा सूर्यांश कोई बचा क्या ? शायद कोई भी नहीं ! अच्छा समालोचनात्मक विश्लेषण

Garima Singh बेहतरीन ….कमाल ….खरा सच

Arvind Mishra बघेलखण्ड में कहा जाता है फुलई पनही से मारना वही किया है। आपने किसी को नहीं छोड़ा। दौड़ा दौड़ा कर

Sushil Rana सोलह आने सच – आज के दौर में मीडिया में नायक पैदा नहीं होते, गढ़े जाते हैं।

आदित्य वशिष्ठ निजी भड़ास भी भड़ास के माध्यम से निकलने लगे तो भड़ास भी भड़ास न रहेगा भाई

SK Mukherjee आज के दौर में चीजें बहुत काम्प्लेक्स हैं, मल्टी लेयर लिए हुए हैं।

Jitesh Singh मीडिया सच नहीं दिखाता, सच छानना पड़ता है। बड़ा मुश्किल हो गया है मीडिया का सच जानना।

Someshwar Singh Good write-up and very correct-analysis.

Madhav Tripathi आपकी बात तो सही है लेकिन जिसके अमित शाहक़ के लड़के को फ़साने की फालतू कोशिश की गई है कुछ वास्तविक मुद्दा होना चाहिए था।

Sanjay Mertiya मुकदमे की जरुरत नहीं थी, वायर की स्टोरी में दम नहीं था, चौबीस घण्टे भी मुश्किल से चलती।

अतुल कुमार श्रीवास्तव अगर वो मुकदमा न करता तो जांच नहीं होती। और सिर्फ इल्जाम लगते। सच और झूठ सामने तो आये।

Kohinoor Chandravancee Right sir I beleif in your thoughts

Baladutt Dhyani तुम्हारी तो दुकान बंद चल रही है इसीलिए परेशान दिखते हो… दलाली की और कमीशन का काम बंद पड़ा है…

Yashwant Singh आपने सच में मेरे दिल के दर्द को समझ लिया ध्यानी भाई.. इसीलिए आप ध्यानी हैं.. वैसे, अपन की दुकान चली कब थी.. जीने खाने भर की कभी कमी नहीं हुई… कोई काम रुका नहीं.. आदमी को और क्या चाहिए… खैर, पूर्वाग्रह से ग्रस्त लोग ये सब न समझेंगे.. वे तो वही बोलेंगे जो बोलना है… सो, बोलते रहियो 🙂

पंकज कुमार झा सुंदर. शब्दशः सहमत.

Rai Sanjay सहमत हूँ आप से

Vimal Verma बहुत बढ़िया।

राजीव राय बहुत सही

Anurag Dwary Sehmat

A P Bharati Ashant yashwant jindabad ! salam !

Arvind Kumar Singh बिल्कुल ठीक बात है

Aradhya Mishra Behatreen

Ashutosh Dwivedi यही सच है

Arun Srivastava सही कहा।

Lal Singh वीर तुम बढ़े चलो।

Nurul Islam सानदार, जबरजस्त, जिंदाबाद

Shadab Rizvi बात 100 फीसदी सही

संबंधित पोस्ट….

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

‘मॉम’ फिल्म में मर्डर करने के नए तरीके का प्रशिक्षण!

Yashwant Singh :’मॉम’ फिल्म देखते हुए मर्डर करने के नए तरीके के बारे में अपन को जो जबरदस्त ट्रेनिंग मिली है, वह इस प्रकार है- दस किलो सेब खरीदें. इन्हें बीच से काट लें. फिर इनके भीतर से सारे बीज निकाल लें. इन बीजों को बारीक पीस लें. फिर इसे आटा या दलिया या किसी भी खाने के सामान में मिला कर परोस दें. काम तमाम हो जाएगा.

‘मॉम’ फिल्म ने बताया कि सेब के बीज से साइनाइड बनाने की रेसिपी गूगल-याहू पर भरपूर मात्रा में उपलब्ध है. जो भी चाहे, पढ़े, सीखे और मिशन पर लग जाए. आने वाले दिनों में जहर से मरने / मारने वालों संख्या में अचानक वृद्धि दिखने लग जाए तो ‘मॉम’ फिल्म के योगदान को जरूर याद कर लीजिएगा.

भड़ास एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

”आप ठहरे भड़ासी पत्रकार, कोई आम आदमी होता तो फर्जी मुकदमे लादे जाते और जेल काट कर ही बाहर आता”

पिछले दिनों भड़ास के संपादक यशवंत सिंह के साथ यूपी के गाजीपुर जिले की पुलिस ने बेहद शर्मनाक व्यवहार किया. यशवंत अपने मित्र प्रिंस सिंह के साथ रेलवे स्टेशन पान खाने गए और कुछ लोगों की संदिग्ध हरकत को देखकर एसपी को सूचना दी तो एसपी के आदेश पर आए कोतवाल ने यशवंत व उनके मित्र को ही पकड़ कर कोतवाली में डाल दिया. इस पूरे मामले पर यशवंत ने विस्तार से फेसबुक पर लिखकर सबको अवगत कराया. यशवंत की एफबी पोस्ट पर आए सैकड़ों कमेंट्स में से कुछ चुनिंदा इस प्रकार हैं… मूल पोस्ट नीचे कमेंट्स खत्म होने के ठीक बाद है… 

Mamta Kalia इस घटना से पुलिस का जनता के प्रति रवैया पता चलता है। मैंने एक बार अपने घर मे हुई चोरी की रपट लिखवाई थी। पुलिस ने मुझे अलग अलग तारीखों में कोर्ट बुला कर इतना परेशान किया कि मैंने लिख कर दे दिया मुझे कोई शिकायत नहीं। केस बन्द किया जाय।

सोनाली मिश्र हम लोग बाइक चोरी होने की रिपोर्ट लिखवाने पहुंचे तो वो हमें ही यह उपदेश देने लगे, चेन न पहना करें, टॉप्स न पहनें आदि आदि।

Ramji Mishra इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि पुलिस से शिकायत करने से पहले खुद को आदरणीय यशवंत जी की तरह मजबूत बना लेना चाहिए, अन्यथा अंजाम उसके हांथ होगा……

Shyam Singh Rawat अपने साथ भी मुरादाबाद में कुछ ऐसा ही हुआ था 1991 में। एक पुलिस इंस्पेक्टर की सार्वजनिक हित में ऐसी ही क्लास लगाई थी। फर्क इतना कि हम अकेले थे। बड़ी मुश्किल से इंस्पेक्टर साहब की जान छूटी थी।

Braj Bhushan Dubey अजीब दास्तान है। अजीबो गरीब घटना। आमजन के साथ तो ऐसे ही होता है जिसे चाहा उठा लिया और बेइज्जत कर दिया। शहर कोतवाल जो है। जोरदार लेखनी कि पढ़ने वाला एक बार शुरू करें तो अंत करके ही रुकेगा।

Pawan Singh यशवंत गुरू एक किस्सा और मिलता है तुम्हारे किस्से से….पुख्ता तौर पर वर्ष का उल्लेख न कर सकूँगा …वाकया होगा तकरीबन सन् 1988-89 का…दैनिक नवजीवन में मैं स्ट्रिंगर हुआ करता था…एक दिन पता लगा कि प्रसिद्ध कवि व पत्रकार राजेश विद्रोही और उस दौरान नवभारत टाइम्स में कार्यरत धीरेंद्र विद्यार्थी काठमांडू में धर लिए गए हैं …घटना यूँ थी कि नेपाल में कम्युनिस्ट दबदबे वाली सरकार थी..भाई लोगों ने दवा लगाई और काठमांडू के कवि सम्मेलन मंच पर ही कम्युनिस्टों के खिलाफ ही आधा दर्जन कविताओं का फाॅयर झोंक दिया….बवाल मचा…भाई लोग धर लिए गए ….अगले दिन हम लोगों ने नेपालगंज जाकर वहां के नेपाली पत्रकारों को साधा तो अगले दिन शाम ढलने के बाद छूटे….आज राजेश भाई तो दुनियां में नहीं हैं लेकिन उनकी कुछ कविताओं की दो-दो पंक्तियां आज भी याद हैं …..

अखबार नवीस भी अजब आदमी है, खुद खबर है दूसरों की लिखता है..

..आज सारा धनी पड़ोस उस निर्धन के साथ है।
लगता है उसकी बेटी जवान है…

..भूखे को चांद भी रोटी नजर आता है….

Vijay Prakash जय हो सर पूरा झकझोर दिए। आखिर तक हार नहीं माने…

Anurag Singh थाने को भी बाद में पता चला कि हम तो असली थानेदार को ले आये, फिर कोतवाल साहब बोले होंगे हईला….मैनें ये क्या कर दिया

Vinod Bhaskar बोला ये क्या कर बैठे घोटाला हाय ये क्या कर बैठे घोटाला, ये तो है थानेदार का साला.

पत्रकार यदु सुरेश यादव सर जी आप तो ठहरे भड़ासी पत्रकार, कोई आम आदमी होता तो लूट के दो चार केस दर्ज हो जाते और कुछ दिन जेल की रोटी तोड़ने के बाद ही बाहर आता, जय हो भड़ासानंद बाबा

Kuldeep Singh Gyani योगी का बदला कोतवाल से…अभी “अर्ध कुम्भ” लगने में समय है महराज, लेकिन बढ़िया तबियत दुरुस्त किये विभाग की…सारे भक्तजन एक साथ…बोलिये, स्वामी भड़ासानन्द महराज की जै

Azmi Rizvi दादा यही होता है आम आदमी के साथ, कोई आम आदमी होता तो जेल में होता आज, और दस बीस साल लग जाते उसे बेगुनाह साबित होने में। जै हो बाबा की

Rahul Vishwakarma सही सबक सिखाया… लेकिन कोतवाल की तरह आपको भी रायता थोड़ा और फैलाना चाहिए था. जरा जल्दी मान गए…

Surendra Trivedi यार मित्र, वाकई में बड़े ही रोमांटिक हो।

Anil Gupta पैदल चलने वाला हर आदमी सामान्य नही होता … बहुत खूब सर ..

Ravi S Srivastava लगता है जानेमन जेल पढे नही है कोतवाल साहब

Gaurav Joshi ग़ज़ब दादागिरी दिखायी भाई आपने ।

Riyaz Hashmi मेरठ कांड याद दिला दिया भाई। उस कहानी का एक चरित्र सौरभ भी याद आ गया जो अब इस दुनिया में नहीं है। Take Care.

Amod Kumar Singh कभी हमारी कोतवाली पधारिये, तुलसी रजनीगन्धा के साथ कन्नौज का इत्र विदाई में अलग से दिया जायेगा।

Yashwant Singh आंय । धमका रहे हैं भाया या वाकई प्रेम भरा न्योता है?

Amod Kumar Singh पुलिस में आने से पहले पुलिस की इतनी लाठियां खायी हैं, कि किसी सभ्य व्यक्ति को धमकाने या लठियाने की कल्पना ही नहीं की जा सकती।आपका स्वागत है।

Yashwant Singh काश आप जैसे सोच समझ के लोग पुलिस विभाग में ज्यादा होते। थैंक्यू आमोद भाई। न्योता कुबूल। जल्द मुलाकात होगीं।

Journalist Yogesh Bharadwaj यशवंत भाई आप मिलिएगा आमोद जी से अच्छे व्यक्तित्व के धनी है और अच्छी सोच समझ के साथ न्याय प्रिय भी

Mishra Aradhendu आप तो बच गए पर आम जनता का क्या , जिसको ये पुलिस वाले बोलने ही नहीं देते….??

Shivam Bhardwaj ज़बरदस्त… लगा जैसे सब कुछ सजीव देख रहा हूँ 🙂

Ashutosh Dwivedi यशवंत जी क्या छापी जा सकती है ये कथा।

Yashwant Singh बिल्कुल ब्रदर।

Nishant Arya रजनीगंधा से मोह नहींऐ जाएगा। उल्टे कोतवाले से घुस लिए।।। बाह

Ajay Kumar Kosi Bihar बच गए भाई.बिहार रहता तो पोलठी भी खाते.सब पत्रकारी निकाल देता.तब फिर से आपको जाने मन जेल का भाग 2 लिखना पड़ता.

Ghanshyam Dubey तो आगे से समझ लेना — SP और CO समझदार थे! अगर न होते तो कहानी में फिर कई ट्विस्ट होते। पुलिस तो फर्जी मुकदमे कायम करने में माहिर होती है! जवान हो, भड़ासी हो तो कहानियाँ तो होती रहेंगी…

चन्द्रहाश कुमार शर्मा …तो आप भी एक नया अफसाना बना दिये?

Sachin Mishra मनमोहक और काफी रुचिकर कहानी थी गुरु। सच में वो जवानी जवानी नहीं जिसकी कोई कहानी न हो।

Kailash Paswan इसलिए पुलिस को आमलोग उप नाम से पुकारते है

Devendra Verma आपने पुलिस का जो सच सुनाया है, वह बिलकुल सच है ….जैसे मैने पढना शुरू किया वैसे वैसे कहानी का रोमांच बढता गया आनन्द आ गया…..

Md Islam बेचारा कोतवाल गलत नंबर डायल कर गया

Amit Srivastava इस पूरी घटना में मुखपात्र कोतवाल का कही नाम नहीं लिखा अगर उसका नाम भी लिख देते तो मामला समझ ने लोगो को आसानी होती।

Pandit Prakash Narayan Pandey बेशर्मी व बेहयाई की हद्द कर दी उस दारोगा ने… वे सब बहुरूपिया तो होते ही हैं… बहरहाल लताड़ना तो कत्तई नहीं छोड़ना है….
Hemant Jaiman Dabang एक वाक्य में ख़त्म करूँगा—अब आया ऊँट पहाड़ के नीचे… यहां ऊंट कोतवाल (पुलिस) को कहा गया है। और पहाड़ यशवंत सिंह को। राम जी राम

Ashutosh Chaturvedi ऊर्जा का संचार कर दिया सर आपने।

DrMandhata Singh गनीमत है एनकाउंटर नहीं किया। आजकल अपनी प्रगति के लिए अनजान लोगों को बलि का बकरा बनाते हैं पुलिस वाले और बाद में होती है लीपा-पोती। अनुरोध है कि ऐसे खेल न खेलें। हम लोगों के लिए आप बहुमूल्य हैं। यह आपको याद रखना चाहिए। सबक का खेल सावधानी से खेलें।

Sunayan Chaturvedi भड़ासी माहौल के जनक यशवंत सिंह की भड़ासी अदा को प्रणाम।

Purnendu Singh आज तो तुम खुश बहुत होगे ठाकुर कोतवाल सीओ, sp से माफी मंगवा लिए। याद रखना अब तुम्हारे जैसे लोग अनशन की धमकी मत दे कर माफी मंगवा सकते हैं तो यह नेता बलात्कारी और अपराधी हत्यारों को भी छोड़ा लेते हैं फिर दोष मत देना पुलिस को क्यों कोतवाल निकम्मा था जो तुमको ऐसे ही आने दिया… कभी किसी के चक्कर में पड़ोगे तो बताया जाएगा पुलिस क्या होती है…

Yashwant Singh आपकी बात कांट्राडिक्टरी हैं। बेवजह पकड़े जाने पर निर्दोष का प्रतिरोध और रेपिस्ट मर्डरर अपराधी को पुलिस से छुड़वाए जाने की नेता की गुंडई जैसी दो विरोधाभाषी चीजों को एक तराजू में रख कर कैसे तौल सकते हैं। वैसे, धमकाने के लिए धन्यवाद।

Sandeep Chandel भाई साहाब पुलिस कोई मुहनोचवा तो है नहीं कि किसी को उठा ले जाय मामले की सही जाच कर के उठाना चहीये ताकी लोगो का विश्वास बना रहे ये सही है की हम पुलिस की दिल से इज्ज़त करते हैं और करते रहेंगे , लेकीन विश्वास तब डगमगाता हैं जब ग्यात्री प्रजापती जैसे लोगों को पकडने में एक महीने लग जाता है और आम जनता को सरेआम बदनाम किया जाता है, हमे लगता है आप हमारी बातों से सहमत होंगे ,

Syed Shahid Ali पुलिस की कार्यप्रणाली की सच्चाई सहन न कर पाने बाले भाई साहब एक पत्रकार को धमकाने के बजाय जनता में पुलिस की छवि सुधारने पर विचार कीजिए । धन्यवाद

Uvaish Choudhari पुरनेन्दू जी के रिश्तेदार तो नही थे कोतवाल साहिब?

S.K. Misra गलती करने वालों को भी विभाग के यदि लोग ऐसे ही समर्थन देंगे तो उनमें सुधार कैसे होगा, इस पुलिस बाले की कमेंट को देख कर दुःख हो रहा है ।

Manoj Tripathi आप जहाँ काण्ड वहां!!

Ram Murti Rai Jabardast.. Heropanthi

C S Singh Chandu जरा सोचिए भाई साहब अगर आपके जगह कोई आमजनता होती तो अब तो उसका उसके पूरे परिवार के साथ बड़ी ही दर्दनाक कहानी हो जाती और वर्षों पढ़ी जाती… सोचकर ही रुह काँप जा रही है… पता नहीं और क्या क्या बीतती उस आम आदमी के साथ…

Rahul Gupta Badaun भैया जी, यह कोतवाल अब सपने में भी सौ सौ बार सोचेगा, इस भड़ासी बाबा से आइंदा पाला न पड़े। वरना अभी तो बच गया आगे भगवन मालिक होंगे। अब यह जहाँ भी आपको देखेगा खुद चल कर मिलने आएगा।

Ajay Mishra खेत खाए गदहा मारा जाए जुलाहा उत्तर प्रदेश पुलिस की यही दिनचर्या है यह सुधर जाएं तो पूरा प्रदेश सुधर जाए

ChandraShekhar Hada सर, ऐसा लग रहा है जैसे आप रजनीगंधा-तुलसी की विज्ञापन फिल्म कर रहे हैं।

Nirupma Pandey ये आप ही कर सकते थे ।

Maneesh Malik Thanks for police valo ko sabak sekhane k laya Maja aa gya. Jay hind.

Syed Mazhar Husain क्या बात है भाई… ऐसी तैसी हो गयी कप्तान से लेकर कोतवाल तक… एक सेल्फी तो बनती थी कोतवाल के साथ…

Narendra M Chaturvedi जेल तो….जानेमन जेल…नाम से प्रख्यात हुई…और अब कोतवाली….यशवंत भईया वैसे आज आपके मुताबिक जेल दिवस भी है…?

S.K. Misra इस पोस्ट में डीजीपी को टैग करना चाहिये था… उन्हें भी पता चलता उनके रणबांकुरे कैसे जनता की सेवा में तत्पर हैं।

Surya Prakash कुल मिला के रजनीगन्धा तुलसी की व्यवस्था हो गई गुरु …

Rajendra Joshi घटना तो जो भी रही हो कहानी में ऐसे-ऐसे मोड़ आपने डाल दिए कि लगा न जाने अगले मोड़ पर क्या नया होगा।

Sarvesh Singh बेचारे पुलिस वालों ने इस दिन की कल्पना तक ना की होगी।

Anshuman Shukla अब सोचिये, लल्लन टाप कानून व्यवस्था है कि नहीं है उत्तर प्रदेश में।

Ashok Kumar Singh आपका रिश्वत रजनीगन्धा तुलसी ,फिर भी सस्ता ही पड़ा कोतवाल को

Vinay Shrikar बतौर समझौते की शर्त तुलसी और रजनीगंधा के साथ ही संजीवनी सुरा की डिमांड कर देना था।

Rajesh Mishra बहुत गलत किये थे कोतवाल महोदय

A.k. Roy कोतवाल के लिऐ, सेर को सवासेर मिला….

Sant Sameer क्रान्तिवीरों की जै हो।

Shrinarayan Tiwari गजब की कहानी है यशवंत जी

Anuj Sharma गुरु एक नई जानकारी मिल गई। आप ”रजनीगंधा तुलसी” मंत्र से वश में होते हो।

Umesh Srivastava Socialist संत किसी के बस में नहीं होता और सब के बस में होता है

Anuj Sharma गुरु तो क्रांतिवीर हैं।।। पत्रकारों की रीढ़ हैं।।

Anuj Sharma अब भक्त ये मंत्र याद कर लेंगे।।।

Kaushal Sharma उत्तर प्रदेश पुलिस संघटित अपराधियों का सरकारी गिरोह है।

Abhay Prakash Yashwant G Mai to aapko ni janta par itna jarur kahunga ki pulice wale itna sidhe sadhe kab se ho gai

Anand Agnihotri फोन करके कोतवाल साहब का हालचाल तो पूछ लेते। बेचारा बड़ा मायूस बैठा होगा। अब कई दिन कहीं से रंगदारी नहीं मिलेगी उसे।

प्रयाग पाण्डे आपकी जै हो। माना आपकी जगह कोई दूसरा निरपराध इंसान होता ? बना दिया गया होता न अपराधी। खैर…… .

Dinesh Dard यही जुझारूपन तो चाहिए ज़ुल्म के ख़िलाफ़। मगर हर शख़्स में इतनी ताब कहाँ होती है। बहरहाल, ज़िंदाबाद।

Vinod Bhardwaj स्वामी भड़ासानन्द जी महाराज, अब उस इंस्पेक्टर को दिल से धन्यवाद कर दो जिसने अपनी करतूत से ये रोमांचकारी भडासी मसाला लिखने – पढ़ने का मौका दे दिया ।

Madan Tiwary यह हुई मेरे मन मुताबिक़ बात। अब आंदोलन शुरू करो गुरु।

Amar Chaubey ध्यान रखा करिये आप योगी सरकार में है

Madhusudan JI अपने ही घर के दरवाजे पर अपना ही कुत्ता न पहचान पाया और गुर्रा कर अपनी औकात भी जल्दी से पहचान लिया.. बधाई हो.. धूल चटा ही दिया उसे

Manish Jaiswal सर, इन कोतवाल महापुरुष का नाम तो बता दीजिए ताकि हम लोग भी उन्हें दुआ दे सकें…

Fareed Shamsi जलवा है जलवा, मैं तो सोच रहा था, कि अब एक और नई किताब पढ़ने के लिये मिलेगी ‘जानेमन हवालात’

Amit Tiwari आज फिर से अपराध जीत गया। एक तुलसी और रजनीगंधा की रिश्वत से बड़ी गलती को माफ़ कर दिया गया । क्या गारंटी है कि इस रिश्वत से पुलिस यह ग़लती किसी भले आदमी के साथ दोबारा नही करेगी।

Dheeraj Rai Sri Amit ji / Dobara Aysa karen na karen .. Ab Yah Police Parivar ke mukhiya (SP-Gazipur) ka daitva huva. Sri Yashvant Ji ne SP KoAaina dikha Apne Daitva ka Nirvahan kar diya. Ab Ek Journalist Es se jada kuchh nhi De Sakta Police ko. Ins. Ko Nilambit athva Anya koi bhi gambhir karywahi ka Vaydhanik Adhikar to Aaina Dekhte SP ke Pas hay !! Ab SP Avm Sarkar Samjhe.
Dhanyawad Sri Yashvan Ji.

Ashwani Sharma अरे भाई कोई आम आदमी होता तो अब तक जेल में सड़ रहा होता

Dheeraj Rai Haaaaaaaa…. To kisi Patrakar se Pala para tha Police ka. hona hi tha.

Lokesh Raj Singh Aapki patrakarita ka power bhi paan masale tak mein simat aaya jai ho patrakar maharaj. Koi shaq nahi ki angreji daru par imaan bik jata hoga.

Manoj Singh Chauhan आप के साथ कहानी हुई, उस कोतवाल के साथ तो कांड हो गया…

Yatish Pant आम आदमी पर क्या गुजरती होगी क्योंकि ऐसा तो रोज होता है।

Chandra Shekhar Kargeti कोतवाल को माफ़ भी किया तो एक रजनीगन्धा और डबल जीरो में …आपकी जगह कोई दुसरे वाले पत्रकार रहे होते तो ?

Mannu Kumar Mani Yashwant भाई, कोई आम आदमी होता। तो उसकी लग गई होती।

Arvind Saxena आपने तुलसी रजनीगंधा की मांग कर अपराध को बढावा दिया

Care Naman सच में कहानी कहानी हो गई इस नई जवानी

Syed Tariq Hasan पैदल चलने वाला हर व्यक्ति सामान्य नहीं होता ! शानदार।

Devendra Kumar Nauhwar आप असाधारण हैं, आपकी समाज को जरूरत है!

Ankit Kumar Singh यशवंत भैया कोतवाल सच में पैर छूने लगा ??

Vishal Ojha ले रहे मजा मजबूर बन के जानेमन

Ashish Mishra E sare fasad ki jadd mujhe tusli aur rajnigandha lg rha h.

Gopal Ji Rai Janeman 2 likhane SE bach gaye

Sandeep Kher वाह बहुत अच्छा सबक़ दिया आपने सर पर उस ग़रीब आदमी का क्या जो ऐसे ही उठा लिए जाते है जिनका कोई सोर्स नहीं होता है अगर आप भी आम आदमी होते तो शायद अंदर होते हमारी पूलिस संवेदनहीन हो गए है जो सिर्फ़ आदेश बजाना जानती है फिर चाहे निर्दोष इंसान को ही ना उठना पड़े पूलिस को ध्यान देना चाहिए की कोई बेगुनाह आदमी क़ानून के चुंगल में ना आए

Sanjay Kumar Patrakaar पता नहीं भारत में ऐसी घटनाएं रोज कितनी होती होगी. परंतु बहुत सा मामला उजागर ही नहीं होती है . यशवंत जी आपने उजागर कर पुलिस की कार्यशैली को जनता के सामने लाने का प्रयास किया है .

Sunil Kumar Singh जय हो… पर आप जरा अंदाजा लगाए कि यह पुलिस महकमा कैसे पेश आता होगा आमजन से?

Vivek Gupta बहुत खूब भैय्या. लेकीन ये प्रशासन कब सुधरेगा.

Gandhi Mishra ‘Gagan’ काम तो कोतवाल कोई बुरा नहीं किया था भाई क्योंकि आप दोनों मित्र भी तो पहुंचने के बाद उसे जिसकी संदिग्धता की जानकारी आपने कप्तान को दी थी कोतवाल को भी देना था औऱ रजनीगंधा तुलसी पर नहीं बिकना था ।

Dharmendra Pratap Singh बाबा कहीं रहें और बवाल न हो, असंभव… जय हो !

Rinku Singh हर पैदल चलने वाला आम आदमी नहीं होता….

Amit Kumar Bajpai पूरी कहानी का सार……. रजनीगंधा की पुड़िया और पानी की बोतल में संसार बंधा है….. तर्क- वितर्क- कुतर्क धरे रह जाते हैं, गलती करने वाले पछताते हैं और गुरु गजब कर जाते हैं.. Haha

Neeraj Sharma बड़े काण्डी हो यशवंत भाई

Trilochan Prasad हाहा, डार्लिंग जेल वाले को पकड़ लिया

Anil Kumar Singh उसे मालूम नहीं था जिसे बकरा समझ रहा है वह तो शेरों का शेर है।


मूल पोस्ट ये है…

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रेलवे स्टेशन पर पान खाने गए यशवंत पहुंचा दिए गए कोतवाली!

Yashwant Singh : रात मेरे साथ कहानी हो गयी। ग़ाज़ीपुर रेलवे स्टेशन पर पान खाने गया लेकिन पहुंचा दिया गया कोतवाली। हुआ ये कि स्टेशन पर मंदिर के इर्द गिर्द कुछ संदिग्ध / आपराधिक किस्म के लोगों की हरकत दिखी तो एसपी को फोन कर डिटेल दिया। उनने कोतवाल को कहा होगा। थोड़ी ही देर में मय लाव लश्कर आए कोतवाल ने मंदिर के पास वाले संदिग्ध लोगों की तरफ तो देखा नहीं, हम दोनों (मेरे मित्र प्रिंस भाई) को तत्काल ज़रूर संदिग्ध मानकर गाड़ी में जबरन बिठा कोतवाली ले गए। मुझे तो जैसे आनंद आ गया। लाइफ में कुछ रोमांच की वापसी हुई। कोतवाल को बताते रहे कि भाया हम लोगों ने तो संदिग्ध हरकत की सूचना दी और आप मैसेंजर को ही ‘शूट’ कर रहे हो।

कोतवाली में नीम के पेड़ के नीचे चबूतरे पर मेरा आसन लगा और गायन शुरू हो गया- ना सोना साथ जाएगा, ना चांदी जाएगी…। पुलिस वालों ने मेडिकल कराया जिसमें कुछ न निकला। अंततः एक स्थानीय मित्र आए तो उनके फोन से फिर एसपी को फोन कर इस नए डेवलपमेन्ट की जानकारी दी। एसपी भौचक थे सुनकर। उन्होंने फौरन कोतवाल को हड़काया। सीओ को कोतवाली भेजा। आधे घंटे में खुद भी प्रकट हो गए।

तब तक दृश्य बदल चुका था।

शहर कोतवाल सुरेंद्र नाथ पांडेय हम लोगों के चरण छूकर माफी मांग रहा था। उनका अधीनस्थ दरोगा जनार्दन मिश्रा जो बदतमीजी पर आमादा था, कोतवाली लाए जाते वक्त, गायब हो चुका था। हम लोगों ने नीम के पेड़ के नीचे पुलिस जुल्म के खिलाफ ऐतिहासिक अनशन शुरू कर देने की घोषणा की। माफी दर माफी मांगते रुवांसे कोतवाल को हम अनशनकारियों ने आदेश दिया कि फौरन तुलसी रजनीगंधा की व्यवस्था कराओ, तब अनशन खत्म करने पर विचार किया जाएगा। कोतवाल ने अल्फा बीटा गामा चीता कुक्कुर सियार जाने किसको किसको आदेश देकर फौरन से पेशतर उच्च कोटि का पान ताम्बूल लेकर हाजिर होने का हुक्म सुनाया।

सीओ को हम लोग कम भाव दिए क्योंकि निपटना कोतवाल से था।

कप्तान आए तो मेरा पुलिस, जनता, पत्रकरिता और सरोकार पर भाषण शुरू हुआ जो अनवरत आधे घंटे तक चला। मैं रुका तो मेर साथ अनशनकारी मित्र प्रिंस का उग्र भाषण शुरू हुआ। कप्तान सोमेन वर्मा माफी मांगने लगे और कोतवाल को जमकर लताड़ने लगे। अगले घण्टे भर तक सुलहनामे की कोशिश चलती रही। मेरी एक ही शर्त थी कि अगर मेरे दोस्त प्रिंस ने माफ कर दिया तो समझो मैंने भी माफ कर दिया वरना ये कोतवाली का धरना सीएम आवास तक पहुंचेगा। एसपी ने प्रिंस भाई के सामने हाथ जोड़ा और पुलिस विभाग की तरफ से मांफी मांग कर उन्हें गले लगाया। साथ ही साथ वहां हाथ बांधे खड़े कोतवाल की जमकर क्लास लगाई- ‘तुम नहीं सुधर सकते… चीजों को ठीक नहीं कर सकते हो तो कम से कम रायता तो न फैलाया करो…’।

मैंने कहा- ‘इसके पास वसूली उगाही से फुरसत हो तब न सकारात्मक काम करे… ऐसे ही लोग विभाग के लिए धब्बा होते हैं जो राह चलते किसी शख्स से बदतमीजी से बात करते हुए उसे थाने-कोतवाली तक उठा लाते हैं, जैसा आज हुआ’।

कोतवाल बेचारे की तो घिग्घी बंधी थी। एसपी और सीओ माफी पर माफी मांग अनशन से उठने का अनुरोध करते जा रहे थे। हम लोग जेल भेजे जाने की मांग पर यह कहते हुए अड़े थे कि अरेस्टिंग और मेडिकल जैसे शुरुआती दो फेज के कार्यक्रम हो चुके हैं, तीसरे फेज यानि जेल भेजे जाने की तरफ प्रोसीड किया जाए।

इसी बीच बाइक से आए एक पुलिस मैन ने कोतवाल के हाथों में चुपके से कुछ थमाया तो कोतवाल ने हाथ जोड़ते हुए मुझे तुलसी रजनीगंधा का पैकेट दिखाया। मैं मुस्कराया, चॉकलेट को मुंह से कट मारने के बाद सारे दुख भूल जाने वाले विज्ञापन के पात्र की तरह। उधर प्रिंस भाई का भी भाषण पूरा हो चुका था और पूरा पुलिस महकमा सन्नाटे में था। अनुनय विनय की चौतरफा आवाजें तेज हो चुकी थीं। अंततः आईपीएस सोमेन वर्मा के बार बार निजी तौर पर मांफी मांगने और आइंदा से ऐसी गलती न होने की बात कही गयी तो मैंने उनसे बोतल का पानी पहले प्रिंस भाई फिर मुझे पिला कर अनशन खत्म कराने का सुझाव दिया जिसे उन्होंने फौरन लपक लिया।

आंदोलन खत्म करने का एलान करते हुए नीम के पेड़ के चबूतरे से उठ कर मैं सीधे कोतवाल की तरफ मुड़ा और उसके हाथ से तुलसी रजनीगंधा झपटते हुए कहा- ”तुम यहां आंख के सामने से निकल लो गुरु, वर्दी न पहने होते तो दो कंटाप देता, लेकिन ये तुलसी रजनीगंधा मंगा कर तुमने थोड़ा अच्छा काम किया है इसलिए जाओ माफ कर रहा हूं। बस ध्यान रखना आगे से कि पैदल चलने वाला हर व्यक्ति सामान्य ही नहीं होता इसलिए किसी आम आदमी से बदतमीजी करने से पहले सौ बार जरूर सोचना।”

कोतवाल सिर झुकाए रहा।

कप्तान ने हम लोगों का जब्त मोबाइल और लाइसेंसी रिवाल्वर वापस कराया। एक दोस्त रिंकू भाई की कार पर सवार होने से पहले कोतवाली के गेट पर बंदूक लिए खड़े संतरी से जोरदार तरीके से हाथ मिलाते हुए उन्हें इस कोतवाली का सबसे बढ़िया आदमी होने का खिताब दिया और उन्हें ‘जय हिंद’ कह कर सैल्यूट ठोंकते हुए घर वापस लौट आया।

अभी सो कर उठा तो सबसे पहले रात का पूरा वृत्तांत यहां लिखा ताकि भड़ास निकल जाए। आज रोज से ज्यादा एनर्जेटिक फील कर रहा हूं क्योंकि वो मेरा प्रिय गाना है न – ‘वो जवानी जवानी नहीं जिसकी कोई कहानी न हो’। दिक्कत ये है कि मैं पूरी जिंदगी में एक नहीं बल्कि हर रोज एक कहानी चाहता हूं और जिन-जिन दिनों रातों में कोई कहानी हो जाया करती है उन उन दिनों रातों में ज्यादा ऊर्जा से भरा जीवंत महसूस करता हूँ।

कह सकते हैं मेरे साथ हर वक्त कहानी हो जाया करती है, कभी इस बाहरी दुनिया में घटित तो कभी आंतरिक ब्रम्हांड में प्रस्फुटित।

फिर मिलते हैं एक कहानी के बाद।

जै जै

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से. संपर्क : yashwant@bhadas4media.com


उपरोक्त एफबी पोस्ट पर आए सैकड़ों कमेंट्स में से कुछ चुनिंदा पढ़ने के लिए नीचे दिए शीर्षक पर क्लिक करें…

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

बचपन के मित्र बिग्गन महाराज के गुजरने पर यशवंत ने यूं दी श्रद्धांजलि : ‘दोस्त, अगले जनम अमीर घर ही आना!’

Yashwant Singh : गांव आया हुआ हूं. कल शाम होते-होते बिग्गन महाराज के गुजर जाने की खबर आई. जिस मंदिर में पुजारी थे, वहीं उनकी लाश मिली. उनके दो छोटे भाई भागे. मंदिर में अकेले चिरनिद्रा में लेटे बड़े भाई को लाद लाए. तख्त पर लिटाकर चद्दर ओढ़ाने के बाद अगल-बगल अगरबत्ती धूप दशांग जला दिया गया. देर रात तक बिग्गन महाराज के शव के पास मैं भी बैठा रहा. वहां उनके दोनों सगे भाइयों के अलावा तीन-चार गांव वाले ही दिखे.

बिग्गन महाराज गांव के सबसे गरीब ब्राह्मण परिवार के सबसे बड़े बेटे थे. अभाव और अराजकता के दुर्योग से वह भरी जवानी में बाबा बनने को मजबूर हुए. अगल-बगल के गांवों के मंदिरों पर रहने लगे. कुछ बड़े बाबाओं के शिष्य भी बने. बताया गया कि वह कल मरने से पहले एक यजमान के यहां जाकर उन्हें दीक्षा दी. गुरुमुख बनाया. बदले में उन्हें नया स्टील का कमंडल और एक बछिया मिली. जिस दिन उन्हें इतना कुछ मिला, उसी दोपहर उनके पेट में अन्न जल न था. उपर से तगड़ी धूप. बिग्गन महाराज मंदिर लौटे और गिर कर मर गए. शव के साथ बैठे लोग किसिम किसिम की चर्चाएं कर रहे थे. कौन जानता था अपने यजमान को मोक्ष-मुक्ति का मार्ग बता मंदिर लौट रहे गुरु पर इस मायावी संसार को अलविदा कहने के वास्ते मारण मंत्र का जाप शुरू हो चुका था.

बतकही जारी थी. पुरवा हवा की सरसराहट से बिग्गन महाराज के शव पर पड़ा चद्दर सर से पांव तक इस कदर फड़फड़ा रहा था जैसे पंडीजी बस अब कुछ बोलने के लिए उठने ही वाले थे. ताड़ी से तारी साथ बैठे एक सज्जन उदात्त भाव और तेज स्वर से कहने लगे- बिग्गन महराज गांजा के बाद हीरोइन पीने लगे थे. आजकल तो पैसे के लिए गांव आकर अपनी मां से लड़कर सौ पचास ले जाने लगे थे. जितने मुंह उतनी बातें. कईयों ने मौत को अनिवार्य सच बताया. कुछ ने बिग्गन महाराज की कम उमर होने का हवाला दिया. मुझे अजीब इच्छा हुई. तख्त पर लिटाए गए बिग्गन महाराज के चेहरे को देखने की. रात दो बजे के करीब उनके छोटे भाई ने महराज के चेहरे से चद्दर हटाया. लंबी बाबाओं वाली दाढ़ी और सांवला चेहरा. बिलकुल शांत. लग ही नहीं रहा था कि यह मरे आदमी का चेहरा है. जैसे वो सोए हों. ध्यान में हों. चिलम के असर के बाद मौन साध गए हों.

चार भाइयों में सबसे बड़े बिग्गन महाराज के गुजर जाने से उनके परिवार पर कोई असर न पड़ेगा. एक तो उनका खुद का कोई निजी परिवार न था. उनने शादी न की थी. कह सकते हैं शायद हुई ही न हो. इसलिए वे बाल ब्रह्मचारी कहलाए गए. दूसरे उनके जाने से सगे भाइयों को कभी कभार सौ पचास मां से मांग ले जाने के अप्रत्याशित कर्म से मुक्ति मिली.

हां, बुजुर्ग महतारी जरूर देर तक छाती पीट पीट कर रोती रहीं. शायद मां के कलेजे में उस बेटे के खास तड़प होती है जो थोड़ा मजबूर हो, जो थोड़ा शोषित हो, जो थोड़ा अव्यवस्थित हो, जो थोड़ा मिसफिट हो, जो गैर-दुनियादार हो, जो संघर्षरत हो.

शाम के समय मरने की खबर जब घर पहुंची तो नाती-नातिन के साथ बैठी बुजुर्ग महतारी छाती पीट पीट कर रोने लगी. अगल-बगल घरों की महिलाएं एक एक कर पहुंच कर उन्हें पकड़ कर दिलासा देने लगीं- ”होनी को कौन टाल सकता है मइया, चुप रहिए, भगवान को शायद यही मंजूर था.” पड़ाइन मइया कुछ गा-गा कर लगातार रोती बिलखती हिलती फफकती हांफती रहीं. शायद इस तरह बेटे को अंतिम बार पूरे दिल और पूरी शिद्दत से याद किया उनने.

मुझे बिग्गन महाराज के साथ बचपन के दिन याद आए. उनके साथ बगीचों में आम तोड़ना, उनके साथ पूड़ी खाने दूसरे गांवों में जाना, ढेर सारी शरारतों और बदमाशियों में उनको अपने विश्वासपात्र सिपाही की तरह साथ रखना. बिग्गन महाराज लायल थे. निष्ठा उनने कभी न तोड़ी. दोस्ती की तो खूब निभाया. बाबा बने तो उसी दुनिया के आदमी हो गए, बाकी सबसे नाता तोड़ लिया. बस केवल अपनी मां से नाता रखा. देखने या मांगने चले आते थे, आंख चुराए, मुंह नीचे झुकाए.

बिग्गन महाराज जीते जी मरने की कामना करने लगे थे. मौत के दर्शन और लाभ का शायद वह कोई रहस्यमय धार्मिक अध्याय बांच चुके थे. तभी तो वह दुनियादारों की तरह मौत से डरते न थे और मौत से बचने के लिए कोई उपक्रम न करते. जैसे वह मौत को चुनौती देते रहते. खुद को नशे में डुबोने के लिए वह अतिशय गांजा-चिलम पीने लगे.

बताते हैं कि जिस गांव के मंदिर पर वह पुजारी थे, उस गांव के कुछ नशेड़ियों की संगत में सुल्फा-हीरोइन को अपना बैठे. गांजे के असर की हद-अनहद वह जी चुके थे. उन्हें इसके परे, इससे भी दूर, अंतरिक्ष के पार, जाना था. सफेद धुओं के रथ पर सवार होकर जाना था. हीरोईन-सुल्फा ने इसमें उनकी मदद की होगी शायद.

इस नई शुरुआत ने इतना आनंदित किया कि वह इसे अपना गुरु बना बैठे. हीरोइन-सुल्फा की लत के शिकार बिग्गन महाराज को पहले कभी-कभार फिर अक्सर पैसे का अभाव खलने लगा. ऐसे में उन्हें अपनी मां याद आतीं जिनके अलावा किसी पर उनका कोई अधिकार न था. वह अपने घर आ जाते, चुपके से. मां से लड़ते-झगड़ते और आखिर में कुछ पैसे पा जाते. घर वाले थोड़े परेशान रहने लगे. उनके लिए बिग्गन महराज की यह आदत नई और अप्रत्याशित थी. छोटे तीन भाइयों के बच्चे-पत्नी हैं. वे छोटे-मोटे काम धंधा कर जीवन गृहस्थी चलाने में लगे रहते. पैसे का अभाव सबके लिए एक बराबर सा था. ऐसे में मां जाने कहां से सौ-पचास उपजा लेतीं और बिग्गन महाराज को डांटते डपटते, आगे से आइंदा न मांगने की लताड़ लगाते हाथ पर चुपके से धर देतीं.

बिग्गन महाराज की मिट्टी को जब आज सुबह अंतिम यात्रा पर ले जाया गया तो मैं गहरी नींद में था. देर रात तक सोए बिग्गन महाराज संग जगा मैं जीवन मौत के महात्म्य को समझता गुनता रहा. घर आकर बिस्तर पर गिरा तो सुबह दस बजे आंख खुली. तब तक बिग्गन महाराज गांव से कूच कर चुके थे. उनके शरीर को गंगा के हवाले किया जा चुका था. उन्हें साधुओं सरीखा सम्मानित सुसज्जित कर जल समाधि दी गई.

इस देश में अभाव और गरीबी के चलते जाने कितने बिग्गन महाराज भरी जवानी बाबा बनने को मजबूर हो जाते हैं. फिर इस मजबूरी को ओढ़ने के लिए नशे के धुएं में उड़ने लगते हैं. बिग्गन महाराज हमारे गांव के लिए कोई उतने जरूरी शख्स नहीं थे. वैसे भी गांव में गरीब और गरीबी के हमदर्द-दोस्त होते कहां हैं. बिग्गन महाराज किसी से कुछ न बोलते और गांव से परे रहते. बेहद गरीब परिवार के सबसे बड़े बेटे बिग्गन महाराज को पता था कि उनके लिए कोई निजी इच्छा रखना, किसी कामना को पालना नामुमकिन है इसलिए उनने इसे विरुपित करने वाले चोले को ओढ़ लिया. एक आकांक्षाहीन जीवन को साधु के चोले से ही दिखावट कर पाना संभव था.

बिग्गन महाराज का जाना मेरे लिए बचपन के एक निजी दोस्त का असमय काल के गाल में समाना है. उनने जिस राह को चुना और आगे जिस राह पर जाने को इच्छुक थे, बाबागिरी से मृत्यु यात्रा तक, इसका सफर उनने रिकार्ड कम समय में, बेहद सटीक-सधे तरीके से की. शायद देश के करोड़ों युवा बिग्गन महाराजों के लिए इस व्यवस्था ने मोक्ष और मुक्ति के लिए यही आखिरी रास्ता बुन-बचा रखा है जिससे परे जाने-जीने के लिए कोई विकल्प नहीं है.

राम-राम बिग्गन महाराज.

नई दुनिया के लिए शुभकामनाएं. इस लुटेरी-स्वार्थी दुनिया से जल्द निकल लेने पर बधाई.

दोस्त, अगले जनम किसी अमीर घर ही आना!

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से. संपर्क : yashwant@bhadas4media.com


उपरोक्त पोस्ट पर आए कुछ कमेंट्स को पढ़ने के लिए नीचे दिए शीर्षक पर क्लिक करें…

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कुतुब मीनार देख कर लौटे यशवंत ने अपलोड की ये दो मजेदार तस्वीरें!

Yashwant Singh : दिल्ली में रहते नौ-दस साल हो गए लेकिन कुतुब मीनार कभी न देख पाया. एक रोज सुबह के वक्त मय कुनबा वहां के लिए कूच कर गया. कई फोटो वीडियो ले आया जिनमें से दो मजेदार तस्वीरें पब्लिश कर रहा हूं.

पहली पिक में एक बिदेसिन अपनी मूड़ी-गर्दन बिलकुल उपर अइंठे कुतुब मीनार के शीर्ष तक को कैमरे में कैप्चर करने को बेताब है तो दूसरी पिक में एक देसी अंकलजी लुंगी डांस वाले स्टाइल में आए और कैमरे से दे दनादन फायर करने लगे, आंटीजी को अपने पीछे सपोर्टिंग सिपाही के रूप में खड़ाकर.

मुझे कहना पड़ा- ”अरे अंकल, आंटीजी को आगे कर फोटो खींचो, तब तो यादगार पिक बनेगी.”

अंकलजी भावहीन चेहरे के साथ क्षण भर को मुझे घूरे फिर अपनी पत्नी से मुखातिब हो अड़बड़ बड़बड़ टाइप बकने लगे जो मेरे पल्ले बिलकुल न पड़ा. हां, आंटीजी की मुखमुद्रा से जरूर खुशी और मुस्कराहट टपकने लगी थी.

कुतुब मीनार से लौटकर सारे वीडियोज और फोटो को यूट्यूब के सौजन्य से एक साथ जोड़कर एक डाक्यूमेंट्री टाइप तैयार किया. आप भी देखें और घर बैठे कुतुब मीनार परिसर के लाइव दर्शन का सुख पाएं. नीचे क्लिक करें…

https://www.youtube.com/watch?v=dREDn-zicZ8

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से.

इसे भी पढ़ें…

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85 से 95 परसेंट कमीशन पर अब भी बदले जा रहे हैं पुराने नोट!

Yashwant Singh : 2019 के लोकसभा चुनाव में मीडिया पर जितना पैसा बरसने वाला है, उतना कभी न बरसा होगा… कई लाख करोड़ का बजट है भाई…. मोदी सरकार भला कैसे न लौटेगी… और हां, नोट अब भी बदले जा रहे हैं.. 85 परसेंट से लेकर 95 परसेंट के रेट पर… यानि पुराना नोट लाओ और उसका पंद्रह से पांच परसेंट तक नया ले जाओ…. लाखों करोड़ रुपये का गड़बड़झाला है ये नोटबंदी… उपर से कहते हैं कि न खाउंगा न खाने दूंगा…

भइये, जब सारा का सारा अकेले खा गए तो भला दूसरे को कैसे खाने दोगे… और, जो तुम खुद खाए हो उसमें इस तरह से सरकारी, अर्द्ध सरकारी और गैर सरकारी संस्थाओं-एजेंसियों को मिलाए हो कि सब कुछ सरकारी, सहज, स्वाभाविक लग रहा है… किसी की औकात नहीं है जो नोटबंदी के घोटाले को उजागर कर सके जिसमें साहब एंड कंपनी ने कई लाखों करोड़ रुपये बनाए हैं और अब भी बनाए जा रहे हैं…

जी हां, काम चालू आहे… ये मेरा दावा है… ये मेरा खुला आरोप है… एनआरआई कोटे के नाम पर यह सारा धंधा चल रहा है… एनआरआई कोटा क्या है, इससे संबंधित खबर नीचे दे रहा हूं… इस घोटाले-गड़बड़झाले के तह तक जाने के लिए बूता चाहिए जो आज दुर्भाग्य से किसी मीडिया हाउस के बूते नहीं है… इतने भारी पैमाने पर पैसे देकर मीडिया हाउस खरीदे जा रहे हैं कि पूछो मत… जो नहीं बिक रहे, उन्हें लाठी-डंडे से लेकर छापे और जेल की राह की ओर धकेला जा रहा है.

वेब जर्नलिज्म में अभी ये संसाधन नहीं कि बड़े स्तर के खोजी अभियान चला सकें… जो बड़े घराने वेब जर्नलिज्म में आ रहे उनसे खोजी पत्रकारिता की उम्मीद नहीं की जा सकती क्योंकि वे पहले से ही गले तक दलाली और धंधेबाजी से मालामाल हुए पड़े हैं… देखते हैं… कुछ तो करना पड़ेगा.. काम मुश्किल है लेकिन किसी को तो हाथ लगाना पड़ेगा…

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के एफबी वॉल से. उपरोक्त स्टेटस पर आए ढेरों कमेंट्स में से कुछ प्रमुख इस प्रकार हैं…

Shashank Singh नोटों की गिनती RBI में अभी तक चालू है… कितना रुपया आया था, अभी तक बता नहीं रहे हैं. बैंकों ने क्या बिना गिने नोट ले लिये थे? उपर से तुर्रा ये कि बच्चन से लेकर टुच्चन तक सब नोटबन्दी के गुण गा रहे हैं..

Yashwant Singh खेल चल रहा है अभी… नोट बदले जा रहे हैं… जो खुद पचासी परसेंट रख रहे हैं पुराने नोट का, वो लोग कौन हैं… इसकी शिनाख्त बस कर लीजिए… सारा खेल सबको पता चल जाएगा…

Shashank Singh आप की बात ठीक होगी… लोग पकड़े जा रहे हैं, कभी कभी खबर भी छप रही है… NRI लोगों के लिये 30 जून तक का समय दिया था नोट बदलने के लिये।

Yashwant Singh आप एनआरआई की छोड़िए, आप कोई देशी आदमी लाइए पुराने नोटों के साथ, मैं उसे पचासी प्रतिशत कमीशन पर बदलने वाले रैकेट से मिलवा दूंगा..

Vikas Yadav Journalist बीजेपी वाले खाते नहीं, लूटते हैं. डकैत हैं.

Yesh Arya इसी 85℅ के चक्कर मे सबकुछ cumputerised होने के बाबजूद भी RBI अभी तक यह नही बता रहा कि कितने 500 और 1000 के नोट जमा हुये कह रहा है गिने नही गये क्या बिना गिने जमा हो गये, मार्च में वित्त मंत्री 8 दिसंबर 2016 के आंकड़े दे रहे थे। रोज शाम को हर बैंक और करेंसी चेस्टों से RBI को नकदी की सूचना देना अनिवार्य होता है।


ये है एनआरआई कोटे से संबंधित खबर…

एनआरआई कोटे के नाम पर अब भी भारी कमीशन देकर 500-1000 के पुराने नोट बदल रहे….

मुंबई : नोटबंदी के इतने समय बाद भी आप अपने पुराने नोटों को बदल सकते है । बंद हुए 500 और 1000 रुपए के पुराने नोटों को अभी भी नए नोटों से बदला जा रहा है पर इसके लिए आपको बहुत मोटा कमीशन देना होगा। अनिवासी भारतीय (एनआरआई) को 30 जून तक पुराने नोट बदलने की अनुमति सरकार ने दे रखी है। यह एन.आर.आई. मोटा कमीशन लेकर आपके पुराने नोट बदलवाने के धंधे में लगे हुए हैं। इस धंधे से जुड़े एक व्‍यक्ति ने बताया कि इस काम के लिए प्रत्‍येक 100 रुपए पर 91 रुपए का कमीशन लिया जा रहा है। यदि आप एक करोड़ रुपए बदलवाना चाहते हैं तो आपको बदले में केवल 9 लाख रुपए के ही नए नोट मिलेंगे।

इतना मोटा कमीशन लोग क्‍यों दे रहे हैं, इस सवाल पर उस व्‍यक्ति ने बताया कि ये ऐसे लोग हैं जो सरकार को अपने धन का स्रोत नहीं बताना चाहते हैं। जिन लोगों ने अभी तक अपने धन के स्रोत का खुलासा नहीं किया है उन्‍हें डर है कि कहीं भविष्‍य में उनके आय के स्रोत का पता सरकार को न चल जाए, इसलिए वे अपना काला धन मोटा कमीशन देकर बदलवा रहे हैं। आरबीआई के एक वरिष्‍ठ अधिकारी ने इस बात की पुष्टि की है। उन्‍होंने बताया कि इस तरह के नोट बदलने के बारे में उन्‍होंने भी सुना है लेकिन उन्‍होंने कहा कि इस पर रोक लगाने का अधिकार उनके पास नहीं है। अधिकारी ने बताया कि एनआरआई फुलप्रूफ डॉक्‍यूमेंट्स के साथ नोट बदल रहे हैं, ऐसे में उन पर कोई कार्रवाई नहीं हो सकती। 2 जनवरी को आर.बी.आई. ने कहा था कि एनआरआई मुंबई, दिल्‍ली, चेन्‍नई, कोलकता और नागपुर स्थित आरबीआई ऑफि‍स में 30 जून 2017 तक अपने पुराने नोट बदल सकते हैं। एन.आर.आई.के लिए नोट बदलने की सीमा फेमा कानून के मुताबिक प्रति व्‍यक्ति 25,000 रुपए है।

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भड़ास के यशवंत “जनक सम्मान” से 10 जून को लखनऊ में होंगे सम्मानित

लोकमत सम्मान 2017 : विजेताओं पर ज्यूरी बैठक सम्पन्न

लखनऊ। हिंदी दैनिक लोकमत के स्थापना दिवस पर प्रति वर्ष आयोजित होने वाले लोकमत सम्मान हेतु विजेताओं के नामों का चयन कर लिया गया है। रविवार 4 जून को आयोजित ज्यूरी की बैठक में जनरल आरपी साही (ए.वी.एस.एम.), पद्मश्री डॉ॰ मंसूर हसन, पद्मश्री परवीन तलहा, रैमेन मैग्सेसे पुरस्कृत संदीप पांडेय, पूर्व आईएएस एसपी सिंह,  श्री सीवी सिंह और श्री पवन सिंह चौहान ने देश भर से आए हज़ारों नामों में से चयनित हर श्रेणी में 5-5 नामों में से एक-एक नाम का चयन किया।

इन सभी विजेताओं को आगामी 10 जून को लखनऊ में आयोजित हो रहे लोकमत सम्मान समारोह में सम्मानित किया जाएगा। श्रेणी पुरस्कारों के अलावा ज्यूरी पुरस्कारों की घोषणा भी की गयी गयी है जिसमें भड़ास फ़ॉर मीडिया डॉट कॉम के यशवंत सिंह “जनक सम्मान” से, आरटीआई कार्यकर्ता सिद्धार्थ नारायण “शक्ति सम्मान” से और वरिष्ठ अभिनेत्री सुष्मिता मुखर्जी “अभिव्यक्ति सम्मान” से सम्मानित किए जायेंगे।

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सुधीर चौधरियों और रवीश कुमारों की बातों पर भरोसा क्यों न करें, बता रहे हैं यशवंत सिंह

Yashwant Singh : सुधीर चौधरियों और रवीश कुमारों की बातों पर भरोसा मत करिए. ये पेड लोग हैं. ये दोनों अपने-अपने मालिकों के धंधों को बचाने-बढ़ाने के लिए वैचारिक उछल कूद करते हुए आपको बरगलाएंगे, भरमाएंगे, डराएंगे, अपने पक्ष में खड़े होने के लिए उकसाएंगे और इसके लिए देर तक व दूर तक ब्रेन वाश करते चलते जाएंगे…

रवीश कुमार को हर पत्रकार डरपोक दिखने लगा है. उन्हें दिल्ली में डर लगने लगा है. हर किसी का फोन टेप होता दिखने लगा है…लोकतंत्र में सारा सत्यानाश हुआ दिख रहा है…ये दौर भाजपा राज का है सो एनडीटीवी को अंधेरा ही अंधेरा दिख रहा है और रवीश कुमार सुर ताल भिड़ाकर गाने में जुटे हैं- ”अंधेरे में जो बैठे हैं, नजर हम पर भी तुम डालो…. अरे ओ रोशनी वालों…”

कुछ ऐसा ही हाल तब जी ग्रुप का था, जब कांग्रेस राज में उगाही के मामले में सुधीर चौधरी उठाकर जेल भेज दिए गए थे और सुभाष चंद्रा प्राण बचाए भागते फिर रहे थे. तब जी न्यूज को सब कुछ खराब होता हुआ, हर ओर अराजकता की स्थिति, अभिव्यक्ति की आजादी का गला घुटा हुआ, आपातकाल सरीखा माहौल दिख रहा था… तबके जी न्यूज के एंकर सुर ताल भिड़ाकर कुछ वैसा ही गीत गाए बकबकाए जा रहे थे.

दोस्तों, भारत अदभुत देश है. यहां कोई मोदी आए या कोई मनमोहन, जनता को बहुत फरक नहीं पड़ता. भारत वाले बहुत संतोषी और मस्त जीव हैं. जब हम सब अंग्रेज को सौ साल तक झेल गए जो कि बाहरी और विदेशी थे, फिर ये मनमोहन, मोदी तो अपने ही देश के हैं. मनमोहन ने क्या बना-बिगाड़ दिया था और मोदी ने क्या रच-उखाड़ लिया है…तब भी अंबानी बिरला लूट रहे थे, सत्ता के प्रिय बने हुए थे… आज भी अंबानी अडानी बिरला सब लूट रहे हैं, सत्ता के प्रिय बने हुए हैं… तब भी जो ‘अप्रिय’ थे उन्हें ठीक करने के लिए ढेर सारे सरकारी कुकर्म किए जाते थे, आज भी जो ‘अप्रिय’ हैं, उनकी हंटिंग होती रहेगी…

कांग्रेस के जमाने में जो आर्थिक नीति थी, वही भाजपा के जमाने में है बल्कि भाजपा वाले कांग्रेस से कुछ ज्यादा स्पीड से उनकी सारी पालिसिज लागू कर रहे हैं.. जीएसटी से लेकर फारेन इनवेस्टमेंट और प्राइवेटाइजेशन को देख लीजिए… इसलिए उनके नाम पर डराकर इनके पाले में करने का खेल वही नहीं समझेगा जो वाकई दिमाग से पैदल होगा…

धर्म जाति की पालिटिक्स हर वक्त थी. 1857 की क्रांति से लेकर किसान विद्रोहों तक में धर्म जाति के आधार पर गोलबंदियां की गई थीं. आजादी के इतने सालों बाद भी गोलबंदियां इसी आधार पर होती रही हैं. कांग्रेस वाले धर्म-जाति-क्रांति आदि के समस्त पैकेज का इस्तेमाल रणनीतिक तौर पर समय व माहौल देखकर करते रहते हैं, बिलकुल ‘निर्दोष’ अंदाज में.. पर भाजपाई और अन्य पार्टियां वही काम खुलकर ‘भदेस’ तरीके से कर रही हैं..

जनता चेतनासंपन्न होती जाएगी तो उनके सोचने विचारने और वोट देने का पैर्टन बदलता जाएगा. इसमें कोई घबड़ाने वाली बात नहीं है. हम मनुष्य आज जहां तक पहुंचे हैं, वहां तक किसी पैराशूट से हमें नहीं लाया गया है बल्कि हम क्रमिक विकास और इवोल्यूशन की हजारों लाखों करोड़ों साल की यात्रा करके आए हैं… ये यात्रा जारी है और सब कुछ बेहतर होगा, ये उम्मीद करते रहना चाहिए…

जो लोग भाजपा से डराकर हमको आपको कांग्रेस के पक्ष में गोलबंद करना चाहते हैें उनको बताना चाहता हूं कि कांग्रेस ने सबसे ज्यादा कम्युनिस्ट नौजवान अपने राजकाज के दौरान मरवाए हैं. वो चाहे पश्चिम बंगाल में नक्सलबाड़ी आंदोलन को कुचलने का काम रहा हो या पूरे देश में कांग्रेसियों द्वारा चलाए गए नक्सल-कम्युनिस्ट विरोधी अभियान के जरिए बड़े पैमाने पर छात्रों, किसानों-मजदूरों का सफाया करवाना रहा हो.

इसी कांग्रेस ने लाखों सिखों का कत्लेआम पूरे देश में अपने नेताओं के नेतृत्व में कराए. सारे पाप इन कांग्रेसियों ने कराए और सिखाए हैं. इसलिए भाजपा का डर दिखाकर आपको जिनके पक्ष के सपने दिखाए जा रहे हैं, जिनके पक्ष में हमें गोलबंद करने को उत्तेजित-उत्प्रेरित किया जा रहा है, वे ज्यादा बड़े पापी हैं. भाजपा वाले तो बड़े पापियों से थोड़ा बहुत सबक सीखकर आए हैं और इसका समय समय पर नौसिखियों की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं, और इस प्रक्रिया में पकड़े भी जा रहे हैं. कांग्रेस के जमाने में भी सीबीआई का रोजाना गलत व मनमाफिक इस्तेमाल होता था, आज भाजपा के राज में भी हो रहा है. सत्ता में आपने पर सबका चरित्र एक-सा हो जाता है, इसे समझ लीजिए क्योंकि सत्ता खुद में एक संस्था होती है जो सबसे ज्यादा मजबूत और सबसे ज्यादा संगठित होती है. सत्ता में भाजपाई आएं या कांग्रेसी या कम्युनिस्ट या सपाई या बसपाई या कोई और… सबकी कार्यशैली अंतत: सत्ता परस्ती वाली यानि बड़े लोगों के पक्षधर वाली हो जाती है… जनता तो बेचारी जनता ही बनी रहती है, थोड़ी कम, थोड़ी ज्यादा… वो अपने मित्र जेपी त्रिपाठी एक जगह लिखते हैं न- ”बाबू हुए तुम, राजा हुए तुम, आदमी बेचारे के बेचारे हुए हम…”

भाजपा, कांग्रेस, सपा, बसपा आदि इत्यादि ढेरों पार्टियां जो हैं.. .ये सब पावर की लालची हैं, सत्ता की लालची हैं, पैसे की लालची हैं, पूंजीपरस्त हैं, झूठे और मक्कार हैं. जनविरोधी हैं… ब्लैकमनी के केंद्र हैं… हरामीपने और उपद्रव की कुंजी हैं… इनके चक्कर में न फंसिए. इन पार्टियों ने अब अपने अपने टीवी चैनल गढ़ लिए हैं. जो सत्ता मेंं होता है, उसकी तरफ मीडिया परस्ती ज्यादा होती है, उसकी तरफ न्यूज चैनल ज्यादा झुके रहते हैं. जैसे सूरज की तरफ सारे फूल पौधे और वनस्पतियां झुकी होती हैं. रीयल जर्नलिज्म अगर कोई कर रहा है तो वह सोशल मीडिया मे थोडा बहुत हो रहा है, वेबसाइटों और ब्लागों के जरिए थोड़ा बहुत हो रहा है. ये बाजारू मीडिया वाले, ये एनडीटीवी और जी न्यूज वाले तो बस टर्नओवर जोड़ रहे हैं, फायदे देख रहे हैं…

चिदंबरम की गोद में बैठकर जब प्रणय राय टूजी स्कैम के पैसे के ब्लैक से ह्वाइट कर रहे थे तो रवीश कुमार को दिल्ली में घना अंधेरा नहीं दिख रहा था… जब एनडीटीवी और चिदंबरम के स्कैम को उजागर करने वाले ईमानदार आईआरएस अधिकारी एसके श्रीवास्तव को पागलखाने भिजवा गया था तो रवीश कुमार की संवेदना नहीं थरथराई और उनको मनुष्यता व लोकतंत्र के लिए एक भयावह दौर नहीं दिखा. अब जब उनके मालिक की चमड़ी उनके काले कारनामों के चलते उधेड़ी जा रही है तो उन्हें सारी नैतिकता और दुनिया भर के सारे आदर्श याद आने लगे हैं… उनका बस चैनल की स्क्रीन पर फूट फूट कर रोना ही बाकी रह गया है..

अरे भइये रवीश कुमार, तू अपनी सेलरी भर पूरा पैसा वसूल एक्टिंग कर ले रहा है… उसके बाद आराम से रह.. चिल्ल कर… एक्टर वैसे भी दिल पर नहीं लेते… रोल खत्म, पैसा हजम… उसके बाद घर परिवार और मस्ती…इस अदभुत देश को और यहां की फक्कड़ जनता को कुछ नहीं होने जा रहा… बहुत आए गए शक हूण कुषाण मुगल अंग्रेज और ढेरों आक्रांता… देश नहीं मरा न मरेगा… आप कृपा करके एनडीटीवी के शेयरों का भाव डबल दिखाकर बैंक को चूतिया बनाकर कर्ज लेने के फर्जीवाड़े की सच्चाई पर एक प्राइम टाइम डिबेट करिए जिसमें बैंक के प्रतिनिधि समेत सभी पक्षों को लाकर स्टूडियो में बैठाइए बुलाइए और दूध का दूध पानी पानी कर दीजिए… आप जरा एनडीटीवी-चिदंबरम के सौजन्य से पागलखाने भिजवाए गए आईआरएस अधिकारी एसके श्रीवास्तव को भी बुला लीजिएगा पैनल में जो सुना देंगे आपके एनडीटीवी चैनल और इसके मालिक प्रणय राय की चोरी की 100 कहानियां…

रवीश जी, युवाओं को भरमाना छोड़िए… सच्ची पत्रकारिता का नाटक बंद करिए… हां, पेट पालने के लिए आपको सेलरी की जरूरत पड़ती है और प्रणय राय को एक ऐसे एंकर की जरूरत पड़ती है जो उनको डिफेंड कर सके तो आप दोनों की जोड़ी ‘जेनुइन’ है, उसी तरह जैसे सुधीर चौधरी और सुभाष चंद्रा की है. कांग्रेस राज में जिस तरह संघिये सब डराते थे कि जल्द ही भारत में कांग्रेस के सहयोग से मुस्लिम राज आने वाला है, उसी तरह भाजपा के राज में एनडीटीवी वाले डरा रहे हैं कि बस सब कुछ खत्म होने वाला है क्योंकि मोदिया अब सबका गला ही घोंटने वाला है…

अरे यार बस करो… इतना भी हांका चांपा न करो… प्रणय राय की थोड़ी पोल क्या खुल गई, थोड़ी चड्ढी क्या सरका दी गई, आप तो अपने करियर का ‘द बेस्ट’ देने पर उतारू हो गए… पोलैंड से लेकर न्यूयार्क टाइम्स और ट्रंप से लेकर प्रेस कार्प की नैतिकता के पत्र के जरिए प्रणय राय को दूध से नहलाकर पवित्र कहने को मजबूर करने लगे….

हम लोगों को यकीन है कि जितनी चिरकुटई कांग्रेस शासन के राज मेंं हुई, उससे काम ही भाजपा के राज में होगी क्योकि भाजपाइयों को अभी संपूर्ण कांग्रेसी चिरकुटई सीखने में वक्त लगेगा… हां, ये पता है कि दोनों ही पूंजीपतियों को संरक्षण देकर और उनसे आश्वस्ति पाकर राज करते हैं इसलिए इनके शासनकालों में जनता का बहुत भला न होने वाला है.. और, जनता बहुत बुरे में भी या तो मस्त रहती है या फिर मारपीट करती है या फिर सुसाइड कर लेती है. उसे अपने रास्ते पता हैं… उसके लिए नए रास्ते न तो आपके प्राइम टाइम लेक्चर से खुल सकते हैं और न ही मोदी जी के ‘देश बदल रहा है’ के जुमलों से…

रवीश भाई और सुधीर चौधरी जी, लगे रहिए… आप दोनों को देखकर यकीन होने लगा है कि एक कांग्रेस और दूसरा भाजपा का प्रवक्ता कितना दम लगाकर और कितना क्रिएटिव होकर काम कर रहे हैं… बस इतना कहना चाहूंगा कि ये देश इस छोर या उस छोर पर नहीं जीता है और न जीता रहा है… इस देश का अदभुत मिजाज है… वह कोई नृप होए हमें का हानि की तर्ज पर अपने अंदाज में अपनी शैली में जीवित रहा है और जीवित रहेगा.. पहाड़ से लेकर मैदान तक और रेगिस्तान से लेकर समुद्र तटीय इलाकों तक में फैले इस देश में अंधेरा लाने की औकात न किसी मोदी में है और न किसी मनमोहन में हो सकी…

फेसबुक के साथियों से कहना चाहूंगा कि इस छोर या उस छोर की राजनीति-मीडियाबाजी से बचें.. दोनों छोर बुरे हैं… दोनों निहित स्वार्थी और जनविरोधी हैं.. सारा खेल बाजारू है और इसके उपभोक्ता हमकों आपको बनाया जा रहा है, जबरन… आप रिएक्ट न करें.. आप मस्त रहें… जीवन में राजनीति-मीडिया के अलावा ढेर सारा कुछ है लिखने करने पढ़ने देखने को… इस भयानक गर्मी में जाइए घूम आइए पहाड़… चढ़ जाइए हिमालय की उंचाई और अपनी आत्मा तक को पवित्र और मस्त कर आइए… देह के पार देख आइए और रुह संग बतिया आइए… ये रवीश कुमार और सुधीर चौधरी तो लाखों रुपये लेता है, जैसा मालिक कहता है, वैसा स्क्रिप्ट पढ़ता है… एक का मालिक कांग्रेस के गोद में बैठा रहता है, दूसरे का भाजपा की गोद में… इनके चक्कर में अपनी नींद, उर्जा और धैर्य बर्बाद न करिए… जाइए, हिमाचल उत्तराखंड आपको बुला रहा है… किसी जाती हुई सामान्य सी सरकारी बस पर बैठ जाइए और चार पांच सौ रुपये में पहाड़ की बर्फ से ढकी चादर को हिला आइए…

जाइए अपनी जिंदगी जी आइए और भटक मरने से बच जाइए…. ध्यान रखिएगा, सारा प्रपंच यह तंत्र आपको भटकाने और मुर्दा बनाने के लिए रचता है… ताकि आपका खून पीकर वह अपने को अमर रख सके…

वो कहते हैं न कबीर… साधो ये मुर्दों का गांंव… और ये भी कि… भटक मरे न कोई….

तो दोस्तों, मुर्दों से दिल लगाना बंद कर दीजिए और भटक मरने से बचने की तरकीब ढूंढने में लग जाइए… शायद जीवन का मतलब मकसद समझ में आ जाए…

जैजै
यशवंत

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से. संपर्क : yashwant@bhadas4media.com


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भड़ास के यशवंत ने एनडीटीवी छापे पर क्या लिखा, ये पढ़ें

Yashwant Singh : हां ठीक है कि ये लोकतंत्र पर हमला है, अभिव्यक्ति की आजादी पर प्रहार है, मीडिया का गला घोंटने की कोशिश है.. लेकिन पार्टनर ये भी तो बता दीजिए कि जो आरोप लगे हैं आईसीआईसीआई बैंक के 48 करोड़ रुपये के फ्राड करने का, उस पर आपका क्या मत है.

ये भी तो बता दीजिए कि आईआरएस अधिकारी एसके श्रीवास्तव ने चिदंबरम और प्रणय राय द्वारा मिल जुल कर 2जी स्कैम के पैसे के गोलमाल का जो खुलासा किया, उस पर आपका स्टैंड क्या है.

मुझे भी आपसे प्यार था. मैं भी भाजपा विरोधी रहा हूं और हूं. लेकिन आप जो कामरेड होने के नाम पर पैसों का गबन कर रहे हैं, स्कैम में सहयोगी बन रहे हैं, उसका कैसे समर्थन कर सकता हूं.

हां ये सही है कि जी न्यूज वाले चोर हैं, रजत शर्मा भाजपाई है, ऐसे ही अन्य भी जो हैं, वो सब आपके विरोधी हैं, लेकिन आप अपने ब्रांड के नाम पर जो घपले-घोटाले किए हैं और किए जा रहे हैं, उस पर आपको खुल कर सफाई देनी चाहिए, लेकिन आपने ऐसा नहीं किया, क्यों?

चिदंबरम और उनके बेटे के यहां जब इनकम टैक्स का छापा पड़ा था, तभी मुझे पता चल गया कि अब आपकी बारी है. पर आपने तब भी अपना स्टैंड क्लीयर नहीं किया, आपने आईसीआईसीआई बैंक के साथ किए गए फ्राड घोटाले के बारे में अपनी साइट या अपने चैनल पर कुछ नहीं लिखा दिखाया.

दुनिया को पारदर्शिता और लोकतंत्र सिखाने वाले प्रणय राय एंड कंपनी, आप लोग खुद को सरकार विरोधी होने का लाभ भले ले लो, जो कि लेना भी चाहिए, यही राजनीति है, यही तरीका है आजकल का, लेकिन सच यह है कि आपसे हम लोग यानि खासकर भड़ास वाले जमाने से पूछ रहे हैं कि जो काला धन सफेद किया है, तत्कालीन मनमोहन सरकार के मंत्री चिदंबरम के साथ मिलकर, जो आरोप आप पर आईआरएस अधिकरी संजय श्रीवास्तव ने लगाए, जो नोटिस तमाम सरकारी एजेंसीज ने समय समय पर आपको भेजी, उस पर आपकी सफाई क्या है?

एनडीटीवी और प्रणय राय के ऐसे तमाम फ्राड को लेकर आपने अपने यहां कुछ नहीं लिखा और न दिखाया, केवल गोलमोल सफाई देते रहे, जैसे आज दिया है. आपने इन मुद्दों पर अपने चैनल पर प्राइम टाइम डिबेट में न तो निधि राजदान को आगे किया और न रवीश कुमार को. ये लोग दुनिया भर के ढेर सारे मुद्दों पर बहस करते रहे, केवल एनडीटीवी-प्रणय राय के फ्राड को छोड़कर. आपको इन मुद्दों पर भी खुलकर लिखना दिखाना चाहिए था क्योंकि मीडिया तो सबकी और अपनी भी आलोचना करने के लिए जाना माना जाता है. पर आप ऐसा नहीं करेंगे न करने वाले हैं क्योंकि आप एड़ा बनकर पेड़ा खा रहे थे.

आप विचारधारा और पार्टीबाजी के आधार पर खुद को शहीद दिखाकर लाभ लेना चाह रहे थे और ले रहे हैं और लेंगे भी.

पर हम जैसे लोग जो मीडिया को बहुत नजदीक से देख रहे हैं, और जानते हैं कि यहां सिर्फ और सिर्फ लूट और कालाबाजारी है, सरोकार विचार संवेदना जैसी बातें सिर्फ दिखाने कहने वाली चीजें होती हैं, वो ये ठीक से समझते मानते हैं कि आप को ही नहीं, बल्कि इस समय के सारे कथित मुख्य धारा और संपूर्ण कारपोरेट मीडिया के मालिकों को सरेआम सूली पर चढ़ा देना चाहिए. वजह ये कि असल जीवन में आप सब लोग उतने ही बड़े चोट्टे हैं, जितने किसी दूसरे फील्ड के चोट्टे. आप थोड़े कम ज्यादा चोट्टे हो सकते हैं और लेकिन हैं चोट्टे ही.

आपको यह जानना चाहिए कि जिस लोकतंत्र की दुहाई देकर आप बार बार अपना बचाव कर रहे हैं, उसी लोकतंत्र ने जिन्हें चुनकर भेजा है, वो आपसे अपना हिसाब ले रहे हैं, लेकिन उन्हीं चीजों का, जो आपने गलत किया है और उनके हाथों में एक्शन लेने के लिए सौंप दिया है. ये घपले घोटाले आजकल के नहीं, बरसों पुराने है. आपने इन्हें साधने, पटाने की भी कोशिश की लेकिन सफल नहीं हो पाए. आपकी ढेर सारी फाइलें पीएमओ में पड़ी हैं जो आपकी काली कहानी बांय बांय करके बता रही हैं.

जो आपने काला किया है, जो आपने फ्राड किया है, वो आपका ही है. ऐसे लोग भुगतते तो जरूर हैं, कोई देर तो कोई सबेर. कोई इस सरकार के आने पर तो कोई उस सरकार के आने पर. अब तो घपले घोटाले भी पार्टियां के संरक्षण में होता है इसलिए पार्टियां बदलते ही घपले घोटालेबाजों के चेहरे भी बदलने लगते हैं.

मेरी संवेदना आपके साथ है क्योंकि आप फिलहाल पीड़ित हैं और हम लोग पीड़ितों के साथ रहते हैं, भले ही वो चोर हो. लेकिन आप पर अत्याचार के खिलाफ जो मोर्चा निकलेगा, उसमें मैं कतई शरीक नहीं हूंगा. मेरी सदिच्छा आपके साथ कतई नहीं है क्योंकि आपके फ्राड हैं. मीडिया के चोरों को मैं नजदीक से जानता हूं, इसलिए आपके साथ तो कतई नहीं खड़ा रहूंगा.

माफ करिएगा, बड़े लोग, खासकर मीडिया के, अपनी चोरी और फ्राड को बड़े आराम से वैचारिक ताने बाने के जरिए ढंक तोप लेते हैं. मैं ऐसे लोगों को अब कतई सपोर्ट नहीं करता. मुझे न तो आपका साथ चाहिए और न आपके लोगों का. हां, ये भी जानता हूं कि आप आत्ममुग्ध लोग पीड़ित पत्रकारों का न कभी साथ दिए न देंगे. खुद आपके यहां के दर्जनों लोग बिना वजह निकाले गए और प्रताड़ित जीवन जीने को मजबूर किए गए. आप अपनी समृ्द्धि, संबंध और साम्राज्य में मस्त रहे. इसलिए आपको एक्सपोज होते हुए देखकर, आप पर एक्शन होते हुए देखकर, मुझे दिल से आनंद आ रहा है.

ऐसे दौर में जब राजनीति पूरी तरह भ्रष्टतम हो गई है, ऐसे दौर में जब राजनीति सिर्फ अपनी जनता का खून पीने का माध्यम बन गई है, मैं किसी को नहीं कहूंगा कि वह राजनीति या मीडिया जनित उत्तेजना का हिस्सा बने, किसी मोर्चे या मार्च का हिस्सा बने. ये सब आपका टाइम और धन वेस्ट करने का तरीका है.

फिलहाल तो आज का दिन मेरे लिए चीयर्स वाला है… आपके यहां छापा पड़ा, चाहें जिस बहाने से भी, मुझे सुकून पहुंचा है. मुझे खुशी है कि आज आईआरएस अफसर एसके श्रीवास्तव भी खुश होंगे जिन्हें आप लोगों ने पागलखाने भिजवाकर अपने फ्राड चोट्टई को ढंकने की कोशिश की थी.

भड़ास के आठवें स्थापना दिवस पर जब आईआरएस अधिकारी एसके श्रीवास्तव ने एनडीटीवी के प्रणय राय और तत्कालीन वित्त व गृह मंत्री चिदंबरम द्वारा अपने घोटाले चोरकटई को ढंकने के लिए उन्हें जेल भिजवाने की कथा सुनाई तो मेरी ही नहीं, वहां मौजूद सारे लोगों के रोएं खड़े हो गए और एक झुरझुरी तैर गई शरीर में.

ये दौर मान्य संस्थाओं को नष्ट किए जाने का है, तो आपको भी नष्ट होना है क्योंकि आप महा चोरकट लोग हो. हां, सुपर चोरकटों से कुछ कम, कुछ बाएं, कुछ नीचे. तो आप लोग अपनी लड़ाई लड़ें. आपका अंजाम देखना मुझे अच्छा लगेगा.

चीयर्स.
यशवंत

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यशवंत की कुछ एफबी पोस्ट्स : चींटी-केंचुआ युद्ध, दक्षिण का पंथ, मार्क्स का बर्थडे और उदय प्रकाश से पहली मुलाकात

Yashwant Singh : आज मैं और Pratyush Pushkar जी दिल्ली के हौज खास विलेज इलाके में स्थित डिअर पार्क में यूं ही दोपहर के वक्त टहल रहे थे. बाद में एक बेंच पर बैठकर सुस्ताते हुए आपस में प्रकृति अध्यात्म ब्रह्मांड आदि की बातें कर रहे थे. तभी नीचे अपने पैर के पास देखा तो एक बिल में से निकल रहे केंचुए को चींटियों ने दौड़ा दौड़ा कर काटना शुरू किया और केंचुआ दर्द के मारे बिलबिलाता हुआ लगा.

मैंने फौरन मोबाइल कैमरा आन किया और पूरे युद्ध को रिकार्ड करना शुरू किया. क्या ऐसा लगता नहीं कि ये जो नेचर है, प्रकृति है इसने हर तरफ हर वक्त प्रेम के साथ साथ युद्ध भी थोप रखा है, या यूं कहिए प्रेम के साथ-साथ युद्ध को भी सृजित कर रखा है. हर कोई एक दूसरे का शिकार है, भोजन है. डिअर पार्क की झील के बारे में प्रत्यूष पुष्कर बता रहे थे कि जो पंछी मर झील में गिरते हैं उन्हें मछलियां खाती हैं और जब मछलियां मर कर सतह पर आती हैं तो ये पंछी खा जाते हैं. ये अजीब है न दुनिया. जितना समझना शुरू कीजिए, उतना ही अज्ञान बढ़ता जाएगा. इस नेचर के नेचर में क्या डामिनेट करता है, प्रेम या युद्ध? मेरे खयाल से दोनों अलग नहीं है. इनमें अदभुत एकता है. केंचुआ-चींटी युद्ध का वीडियो देखें :

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क्या यशवंत दक्षिणपंथी हो गया है? ये सवाल करते हुए एक मेरे प्यारे मित्र मेरे पास आए. उनने सवाल करने से पहले ही बोल दिया कि पूरा रिकार्ड करूंगा. मैंने कहा- ”मेरे पास और क्या है जनपक्षधर जीवन के सिवा.” उनकी पूरी बातचीत इस इंटरव्यू में देख सकते हैं. देखें वीडियो :

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महात्मा गांधी, भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, मदर टेरेसा, ओशो, मार्क्स, कबीर… ये वो कुछ नाम हैं जिनसे मैं काफी प्रभावित रहा हूं. जिनका मेरे जीवन पर किसी न किसी रूप में गहरा असर रहा है या है. इन्हीं में से एक मार्क्स का आज जन्मदिन है. मार्क्स को पढ़-समझ कर मैंने इलाहाबाद में सिविल सर्विस की तैयारी और घर-परिवार छोड़कर नक्सल आंदोलन का सक्रिय कार्यकर्ता बन गया. मजदूरों, किसानों, छात्रों के बीच काम करते हुए एक दिन अचानक सब कुछ छोड़छाड़ कर लखनऊ भाग गया और थिएटर आदि करते करते पत्रकार बन गया. मार्क्स ने जो जीवन दृष्टि दी, जो बोध पैदा किया, उससे दुनिया समाज मनुष्य को समझने की अदभुत दृष्टि मिली. आज मैं खुद को भले मार्क्सवादी नहीं बल्कि ब्रह्मांडवादी (मानवतावाद से आगे की चीज) मानता होऊं पर जन्मदिन पर मार्क्स को सलाम व नमन करने से खुद को रोक नहीं पा रहा. हालांकि यह जानता हूं कि आजकल विचारधाराएं नहीं बल्कि तकनालजी दुनिया को बदलने का काम कर रही है, फिर भी मार्क्स ने जो हाशिए पर पड़े आदमी की तरफ खड़ा होकर संपूर्ण चिंतन, उपक्रम संचालित करने की जो दृष्टि दी वह अदभुत है.

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You might be surprised to know that a spot on the surface of the Earth is moving at 1675 km/h or 465 meters/second. That’s 1,040 miles/hour. Just think, for every second, you’re moving almost half a kilometer through space, and you don’t even feel it.

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भड़ास4मीडिया इसी 17 मई को 9 साल का हो जाएगा. 17 मई 2008 को यह डोमेन नेम बुक हुआ था. जिस तरह पशु प्राणियों वनस्पतियों मनुष्यों आदि की एक एवरेज उम्र होती है, उसी तरह की उम्र वेबसाइटों-ब्लागों अचेतन चीजों की भी होती है, खासतौर पर उन उपक्रमों का जो वनमैन आर्मी के बतौर संचालित होते हैं, किसी मिशन-जुनून से संचालित किए जाते हैं. भड़ास के इस नौवें जन्मदिन पर कब और कैसा प्रोग्राम किया जाएगा, यह तय तो अभी नहीं किया है लेकिन कार्यक्रम होगा, ये तय है. मीडिया के कुछ उन साथियों को भी सम्मानित करना है जो लीक से हटकर काम कर रहे हैं, जिन्होंने साहस का परिचय देते हुए प्रबंधन को चुनौती दी, कंटेंट के लिए काम किया, सरोकार को जिंदा रखा. आप लोग भी इस काम के लिए उचित नाम सजेस्ट करें, bhadas4media@gmail.com पर मेल करके.

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आजकल उन कुछ लोगों से मिल रहा हूँ जिनसे रूबरू बैठने बतियाने की हसरत ज़माने से थी। जिनको पढ़ पढ़ के बड़ा हुआ, जिनको हीरो की तरह प्रेम किया, उनसे आज दोपहर से मुखातिब होने का मौका मिला है।

इन्हें शानदार कवि कहूं या अदभुत कथाकार-उपन्यासकार या ग़ज़ब इंसान। इन्हें भारत का नाम विदेशों में रोशन करने वाला अंतरराष्ट्रीय साहित्यिक व्यक्तित्व कहूं। वारेन हेस्टिंग्स का सांड़ तब पढ़ा था मैंने जब फुल कामरेड हो गया था। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से ग्रेजुवेशन करने के बाद जब बीएचयू बतौर होलटाइमर कामरेड के रूप में पहुंचा तो Uday Prakash जी की लिखी पहली कहानी पढ़ने के बाद उनकी कई कहानियां-रचनाएं पढ़ गया, फिर खोजता पढ़ता ही गया। ये लिविंग लीजेंड हैं, भारतीय साहित्य जगत के। इनसे मिलवाने के माध्यम बने पत्रकार भाई Satyendra PS जी। चीयर्स 🙂 (photo credit : भाभी कुमकुम सिंह जी)

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आईपीएस सुभाष चंद्र दुबे का गाजीपुर में जो सम्मान समारोह आयोजित किया गया, उसमें सबसे मजेदार पार्ट था ट्वंटी ट्वंटी के अंदाज में फटाफट सवाल जवाब. कई सवालों पर उन्हें नो कमेंट कहना पड़ा. उस आयोजन की पूरी रिपोर्ट कई वेबसाइटों, अखबारों, चैनलों पर आई लेकिन अभी तक भड़ास पर कुछ भी अपलोड नहीं किया गया. जल्द ही पूरी रिपोर्ट भड़ास पर आएगी और यह भी बताया जाएगा कि आखिर भड़ास ने इस आईपीएस को सम्मानित करने का फैसला क्यों किया. फिलहाल यह वीडियो देखें. शायद कुछ जवाब आपको मिल जाए. वीडियो में खास बात यह है कि आईपीएस सुभाष चंद्र दुबे पूरी ईमानदारी से बेलौस सब कुछ बता गए. इस दौरान कुछ यूं लगे जैसे यह शख्स हमारे आपके बीच का ही है. उनकी खासियत भी यही है. वह सबसे पहले आम जन के अधिकारी हैं. इसी कारण उन्हें खुद के लिए उर्जा आम जन के लिए काम करने से मिलती है. आगे और भी वीडियो अपलोड किए जाएंगे. फिलहाल इसे देखें…

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ट्रेवल ब्लॉगर Yashwant Singh Bhandari पर दिल्ली पुलिस के जवानों ने बोला धावा। लाल किले की बाहर से तस्वीर ले रहे थे। एक डॉक्यूमेंट्री के लिए दूर से खड़े होकर लाल किले के आउटर साइड को शूट कर रहे थे। जवानों ने धावा बोलकर न सिर्फ पीटा बल्कि पैसे भी छीन लिए। जब उन्होंने मुझे कॉल किया मदद के लिए तो मैंने 100 नंबर डायल करने की सलाह दी। इस बीच पुलिस वाले भड़क गए और भंडारी की पिटाई करने लगे। किसी तरह वो जान बचाकर भागे। पर्यटन को ऐसे ही बढ़ावा देगी राजनाथ की दिल्ली पुलिस! हम सभी को इस घटना की निंदा करनी चाहिए और दोषी पुलिसवालों को बर्खास्त करने की मांग रखनी चाहिए।

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मोदी जी लग रहा है नाक कटवा देंगे. भक्त बेहद निराश हैं. मोदी जी में अचानक मनमोहन सिंह नजर आने लगे हैं जो न कुछ करता है न बोलता है. इतना कुछ देश विरोधी हो रहा है. कैंची की तरह चलने वाली जुबानें खामोश हैं. पाकिस्तान से लेकर नक्सलवाद तक, कश्मीर से लेकर महंगाई तक, सब कुछ भयंकर उठान पर है. लोग तो कहने लगे हैं कि जब देश चाय वाले के हवाले कर देंगे तो यही सब होगा. कुछ कर डालिए मोदी जी, आपसे भक्तों की पुकार आह्वान सुन सुन कर मेरी भुजाएं फड़कने लगी हैं. अब ऐसे में कैसे चुप रह सकते हैं. जरूर आप कोई नई योजना बना रहे होंगे. न भी बना रहे होंगे तो चैनल वाले अपने तीसरे आंख से योजना की भनक लगा लेंगे और आपके इंप्लीमेंट करने से पहले ही ‘दुश्मनों’ को मारे काटे गिराते जाते हुए दिखा देंगे और भक्त समेत पूरा देश एक बार फिर मोदीजीकीजैजै करने लगेगा… आंय.. मुझे कुछ आवाजें धांय धूंय धड़ाम की सुनाई पड़ने लगी हैं, वाया रजत शर्मा के इंडिया टीवी… कई अन्य चैनलों के एंकर भी तोप और राइफल तानने लगे हैं अपने अपने स्टूडियो में… आप आनंद से सोइए, मीडिया वाले आपका काम कर ही डालेंगे… आइए हम सब बोलें भामाकीजै

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से. संपर्क : yashwant@bhadas4media.com

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बाबा रामदेव द्वारा सेना को घटिया आंवला जूस सप्लाई करने की खबर को न्यूज चैनलों ने दबा दिया

पतंजलि और बाबा रामदेव के अरबों-खरबों के विज्ञापन तले दबे मीडिया हाउसेज ने एक बड़ी खबर को दबा दिया. भारतीय सेना ने बाबा रामदेव द्वारा सप्लाई किए जा रहे आंवला को घटिया पाया है और इसकी बिक्री पर फौरन रोक लगा दी है. यह खबर दो दिन पुरानी है लेकिन इस मुद्दे पर किसी न्यूज चैनल में कोई चीखमचिल्ली नहीं है. सब बड़े आराम से चूं चूं के मुरब्बा की तरह इस बड़ी खबर को पी गए और देश को बांटने वाले विषयों पर हो-हल्ला जारी रखे हुए हैं.

असल में बाबा रामदेव का पतंजलि ग्रुप आंवला जूस भारतीय सेना को सप्लाई करता है. भारतीय सेना कोई भी प्रोडक्ट अपने यहां आने पर उसका अपने लैब में परीक्षण करती है. इस परीक्षण में बाबा रामदेव का आंवला घटिया पाया गया. यानि जो पैरामीटर भारतीय सेना ने बनाए हैं, उस पर यह प्रोडक्ट खरा नहीं उतरा. इसके फौरन बाद सेना ने इस प्रोडेक्ट को न सिर्फ कैंटीन से हटवा दिया बल्कि आगे से ऐसे प्रोडक्ट्स को लाने पर पाबंदी लगा दी है.

ये तो रही मूल खबर. अब यहां से शुरू होती है मीडिया वालों के हरामीपने की खबर. दिन रात न्यूज चैनलों पर बाबा रामदेव और उनके प्रोडेक्टस का हरिकीर्तन चलता रहता है. जाहिर है सबकी जेबें इस विज्ञापन की रकम से भरी जा रही है. अरुण पुरी हो या रजत शर्मा, सुभाष चंद्रा हो या अवीक सरकार, मुकेश अंबानी के न्यूज चैनल हों या विनोद शर्मा का मीडिया हाउस, सब के सब रामदेव के नोटों के तले दबे हैं. सो इन्हें तो इस खबर को दबा ही देना था. लेकिन क्या इस खबर को एनडीटीवी पर भी नहीं दिखाया गया? बताया जा रहा है कि एनडीटीवी भी बाबाजी के रुपयों रुपी आशीर्वाद तले दबा है, सो प्रणय राय ने भी खबर पर आंख मूंद लेने का फरमान अपने यहां जारी कर दिया.

मतलब कि बाबा रामदेव के एक घटिया प्रोडक्ट ने भारतीय मीडिया के घटिया और घृणित चेहरे का भी पर्दाफाश कर दिया. अखबार हों या न्यूज चैनल, जबसे इनका कारपोरेटीकरण हुआ है, तबसे इनने शीर्ष लेवल के घपले घोटाले दिखाने छापने बंद कर दिए हैं क्योंकि इन घोटालों में या तो इनका कोई करीबी शामिल होता है या फिर इनके मीडिया हाउसों का बड़ा विज्ञापनदाता. हुआ यह भी है कि ये मीडिया हाउसेज सत्ता से लंबी चौड़ी डील कर पैसे उगाह लेते हैं और फिर सत्ता के खिलाफ भी खबरें नहीं दिखाते, जैसा कि आजकल मोदी राज में हो रहा है. दिन रात मोदी और योगी कीर्तन चल रहा है. इसके पहले यूपी की अखिलेश सरकार ने अरबों रुपये लुटाकर को मीडिया को मैनेज कर रखा था.

बंगाल की पब्लिक हेल्थ लैब में आंवला जूस के फेल हो जाने के बाद आर्मी कैंटीन द्वारा इसकी बिक्री पर रोक लगा देने की खबर पर किसी न्यूज चैनल में प्राइम टाइम पर डिबेट न होना शर्मनाक है. नैतिकता का दिन-रात पाठ पढ़ाने वाले मीडिया हाउसों के संपादकों और एंकरों को एक दिन के लिए अपने मुंह पर कालिख पोत कर स्क्रीन के सामने बैठना चाहिए ताकि जनता जान सके कि इनने एक बड़ी खबर विज्ञापनदाता के दबाव में न सिर्फ दबा लिया बल्कि राष्ट्रहित और भारतीय सेना से जुड़े इस मसले पर जनहित में खबर न दिखाकर राष्ट्रद्रोह किया है.

पतंजलि के प्रोडक्ट आंवला जूस पर सेना की कैंटीन में बिक्री पर रोक लगाने की खबर को अपने चैनल पर न दिखाए जाने को लेकर न तो अजीत अंजुम ने कोई ट्वीट या एफबी पोस्ट जारी किया होगा और न ही सुधीर चौधरी इस बड़े विषय पर अपने दर्शकों का ज्ञान सोशल मीडिया पर बढ़ाते पाए गए होंगे.

रक्षा मंत्रालय ने आयुर्वेद पतंजलि को कारण बताओ नोटिस जारी कर दिया है. इस मामले में रक्षा मंत्रालय ने बाबा रामदेव की कंपनी से जल्द से जल्द जवाब भी मांगा है. लेकिन हमारे महान एंकर और संपादक लोग सो रहे हैं. हमारे महान मीडिया मालिक इस मामले में सेना और राष्ट्र का हवाला देकर छाती बिलकुल नहीं कूट रहे हैं.

खबरों के मुताबिक पतंजलि के इस आंवाल जूस की जांच कोलकाता की सेंट्रल फूड लैबरेटरी में भी जांच कराई गई और वहां भी इसे खाने के लिए ठीक नहीं पाया गया. इसके बाद ही पतंजलि को आर्मी की सभी कैंटीनों से आंवला जूस वापस लेने का निर्देश दिया गया और पतंजलि ने चुपचाप अपना प्रोडक्ट वापस मंगा भी लिया है.

इस पूरे मामले में वरिष्ठ पत्रकार शीतल पी. सिंह का कहना है- ”देशभक्ति यही है क्या? फौज को नकली आंवला जूस बेचने के अपराधी रामदेव पर किसी भक्त को अब कुछ नहीं कहना है, क्यों? अब कहां गया राष्ट्र और कहां गया सेना का अभिमान? तीन दिन हो गये किसी चैनल पर सांस तक नहीं आई. गूगल करें. दस स्रोत हैं इस खबर के. तीन दिन से प्रिंट मीडिया में ख़बर है. लेकिन चैनल वाले अभी हिंदू मुस्लिम और केजरीवाल में उलझे हैं.”

वरिष्ठ पत्रकार Jaishankar Gupta का साफ कहना है कि सब के सब मीडिया हाउस पतंजलि के विज्ञापनों के बोझ तले दबे हैं. पत्रकार Kumar Narendra Singh कहते हैं- ”यदि आपके पैसा और पॉवर हो, तो आपका हर कुकर्म देशभक्ति है। लेकिन यदि आप गांठ के पूरे नहीं हैं, तो आप देशभक्त नहीं हो सकते।”

भड़ास4मीडिया डॉट कॉम के संस्थापक और संपादक यशवंत सिंह की रिपोर्ट. यशवंत से संपर्क ह्वाट्सअप नंबर 9999330099 के जरिए किया जा सकता है.

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‘मीडिया के सरताज’ लिस्ट में भड़ास वाले यशवंत का भी नाम

फेम इंडिया और एशिया पोस्ट नाम पत्रिकाओं की तरफ से ‘मीडिया के सरताज वर्ष 2017’ के लिए किए गए सर्वे में भड़ास वाले यशवंत का भी नाम आया है. फेम-इंडिया-एशिया पोस्ट सर्वे में न्यू मीडिया कैटगरी में एक प्रमुख सरताज के तौर पर यशवंत सिंह को चिन्हित किया गया.

इस संबंध में फेम इंडिया मैग्जीन की वेबसाइट पर एक खबर का प्रकाशन किया गया है, जो नीचे साभार प्रकाशित किया जा रहा है. फिलहाल इस उपलब्धि के लिए सोशल मीडिया पर यशवंत को लोग बधाई दे रहे हैं.

मीडिया को बेबाकी से आइना दिखाते हैं यशवंत सिंह (फेम इंडिया-एशिया पोस्ट सर्वे 2017-मीडिया के सरताज)

Posted by fameindia On April 20, 2017

हिन्दी भाषी राज्यों में जो भी शख्स मीडिया से जुड़ा हो वह कम से कम भड़ास4मीडिया और उसके कर्ता-धर्ता यशवंत सिंह को जरूर जानता होगा। बेबाक, बेलौस और बेलाग। यशवंत सिंह की ये तीन खूबियां उन्हें औरों से अलग बनाती हैं। उन्हें एक ऐसे निडर पत्रकार के तौर पर जाना जाता है जो किसी युनियन या संगठन के पचड़ों में पड़े बगैर भी देश के हर मीडियाकर्मी के साथ हो रहे अन्याय के खिलाफ खड़ा है।

मूल रूप से गाजीपुर के यशवंत सिंह ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से ग्रैजुएशन करने के बाद बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से पत्रकारिता की पढ़ाई की है। लखनऊ में दैनिक जागरण से पत्रकारिता की शुरुआत की। फिर अमर उजाला से जुड़े। अमर उजाला के लिए बनारस, कानपुर और आगरा में काम किया। इसके बाद दोबारा दैनिक जागरण से जुड़े और मेरठ, कानुपर व दिल्ली में काम किया। जागरण समूह के आई-नेक्स्ट की लॉन्चिंग टीम का भी हिस्सा रहे। उन्होंने देखा कि पत्रकारिता में हर जगह कई बुराइयों ने डेरा जमा लिया है और जिस उद्देशय के लिये पत्रकारिता शुरु की थी वो कहीं है ही नहीं।

जब पत्रकारिता उबाऊ लगने लगी तो कुछ दिन दिल्ली में एक मोबाइल वैल्यू एडेड सर्विस कंपनी में वाइस प्रेसीडेंट (मार्केटिंग एंड कंटेंट) के पद पर काम किया। मन में मैली हो रही पत्रकारिता को आइना दिखाने की इच्छा दबी थी, वह नौकरी भी छोड़ दी और मई 2008 में मीडिया की खबरों का पोर्टल भड़ास4मीडिया.कॉम शुरु किया। यह अपनी तरह का पहला पोर्टल था जो हर आम मीडियाकर्मी की समस्या को तरजीह देता था व उनसे जुड़े मुद्दों को प्रमुखता से उठाता था। जल्दी ही यह काफी लोकप्रिय हो गया।

यशवंत सिंह की पहचान उनके बागी तेवरों की वजह से भी है। इसकी वजह से उन्हें कई बार उन मीडिया संस्थानों का निशाना भी बनना पड़ा जो अपने उद्देश्यों से भटके हुए थे। कई बार उनपर मुकदमे भी हुए और उन्हें जेल तक जाना पड़ा, लेकिन बेहद पॉजिटिव सोच रखने वाले यशवंत सिंह ने इस मौके को भी एक अवसर के तौर पर इस्तेमाल किया और जेल में मौजूद कुव्यवस्थाओं और भ्रष्टाचार को दूर करने के लिये एक किताब -‘जानेमन जेल’ लिख डाली। उनकी यह किताब खूब बिकी और प्रशासन ने कई सुधार भी किये।

यशवंत सिंह ने भारतीय पत्रकारों के बीच अपनी पैठ बना रखी है। पत्रकार भले ही दुनिया के लिए लड़ते हैं, लेकिन पत्रकारों के लिए लड़ने वाला ये अगुवा पत्रकार माने जाते हैं। कई पत्रकार युनियनों और समाजसेवी संगठनों ने इन्हें समय-समय पर सम्मानित भी किया है। इंडियन मीडिया वैल्फेयर एसोसिएशन की ओर से इम्वा अवॉर्ड, ‘इंस्टीट्यूट फॉर रिसर्च एण्ड डाक्यूमेटेशन इन सोशल साइन्सेंस’ (आईआरडीएस) अवॉर्ड आदि प्रमुख हैं।

हर मीडियाकर्मी की भलाई और जीवन के हर क्षेत्र में सुधार की सोच रखने वाले यशवंत सिंह फेम-इंडिया-एशिया पोस्ट सर्वे में न्यु मीडिया के एक प्रमुख सरताज के तौर पर पाये गये हैं।

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आईएएस एनपी सिंह और आईपीएस सुभाष चंद्र दुबे, ये दो अफसर क्यों हैं तारीफ के काबिल, बता रहे यशवंत

Yashwant Singh : इधर बीच 2 अफसरों से मिलना हुआ। एक आईएएस और दूसरे आईपीएस। क्या कमाल के लोग हैं दोनों। इनसे मिल कर ये तो संतोष हुआ कि ईमानदारी और दबंगई की जुगलबन्दी के जो कुछ स्पार्क शेष हैं इस महाभ्रष्ट सिस्टम में, वे ही जनाकांक्षाओं में उम्मीद की लौ जलाए हुए हैं। इन दोनों अफसरों के बारे में थोड़ा-सा बताना चाहूंगा। इनके नाम हैं- आईएएस एनपी सिंह और आईपीएस सुभाष चंद्र दुबे। एक नोएडा के डीएम, दूजे गाजीपुर के पुलिस कप्तान।

NP Singh

SC Dubey

वैसे बता दूं, अफसरों से मिलना मुझे पसंद निजी तौर पर पसंद नहीं, मेरे स्वभाव का हिस्सा नहीं। चाहे दैनिक जागरण में रहा या अमर उजाला में या आई नेक्स्ट में… चाहे सिटी चीफ रहा या संपादक रहा… अफसरों के यहां खुद चल के एक्का दुक्का बार ही गया हूंगा… दिमाग में ज्यादातर अफसरों के रीढ़ विहीन और बेईमान होने की छवि गुंथे होने से शायद उनसे मिलने जुलने से परहेज रखता रहा हूं। पिछले 8 वर्षों में, भड़ास संचालित करने के दौरान, जिन कुछ ईमानदार और कलेजे में दम रखने वाले लोगों के बारे में सुना जाना उनमें से एनपी सिंह और सुभाष चंद्र दुबे भी हैं।

एनपी का पंगा आज़म खान से हुआ था, अखिलेश के सीएम बनने के ठीक बाद। ये अफसर डटा रहा। आज़म खान कोपभवन में जाकर ही अखिलेश को मजबूर कर पाए एनपी को उनके मंत्रालय से हटाने के लिए। लेकिन तब तक अखिलेश इस अफसर की ईमानदारी, लोकप्रियता और साहस के बारे में जान चुके थे। दंगा रोकने के लिए शामली भेजे गए एनपी। अभी डीएम नोएडा हैं, काजल की कोठरी में दामन दागदार होने से बचाए हुए हैं। इन्होंने गरीब बच्चों के लिए दो रोजगार परक तकनीकी स्कूल संचालित करके कमाल का काम किया है। एक चंदौली के नक्सल एरिया में। दूसरा बनारस के अपने पिंडरा इलाके वाले गांव में। इन स्कूलों के संचालन में अपने परिवार की संपत्ति होम की और भला किया उन बच्चों का जिनका समाज में कोई नहीं। दर्जनों इनके ऐसे सामाजिक काम हैं जिनको देख सुन के कहने का मन करता है कि क्या लूटतंत्र में ऐसे भी जन सरोकारी, ईमानदार और सोशल एक्टिविस्ट टाइप अफसर हैं, जो आम जन के प्रति अपनी पक्षधरता का चुपचाप निर्वहन किए जा रहे हैं!

आईपीएस सुभाष चंद्र दुबे की ईमानदारी, जन पक्षधरता और सिस्टम से भिड़ जाने का माद्दा रखने के बारे में ज्यादातर लोगों को समय समय पर मीडिया से पता चलता ही रहता है। यही कारण है कि वो या तो सस्पेंड रखे जाते हैं या फिर प्रतीक्षारत। उन्हें अक्सर चुनाव आयोग याद करता है और चुनावों के दौरान महत्वपूर्ण जिममेदारी देता है। इस दफे गाज़ीपुर भेजे गए। इनने फर्जी वोटिंग के खेल का ऐसा रैकेट पकड़ा कि सात बार चुनाव जीत चुके ओमप्रकाश सिंह इस बार तीसरे पोजीशन पर अटक गए। अपने करियर में हजार से ज्यादा निर्दोषों को जेल जाने से बचाया, निष्पक्ष पुलिसिंग के मिशन को मिशनरी भाव से जीते हुए। सुभाष चंद्र दुबे की हिम्मत और ईमानदारी के दर्जनों वाकये हैं। अदभुत जीवट का पुलिस अफसर है ये। न आका टाइप अफसरों के यहां सिर नवाया न मठाधीश टाइप मंत्रियों को सलाम ठोंका। हल्लाबोल अंदाज़ में, बिना भेदभाव किए, जो गुनाहगार मिला, उसे धर दबोचा। अजगरों को उनके बिलों में घुसकर पकड़ने वाले सुभाष को सत्ता जनित बदमाशी कमीनगी और धूर्तता के जाल में फांसकर साजिशन जो उत्पीडन उपेक्षा मुहैया कराए गए उसे उनने ईश्वर की नेमत / करियर का मेडल मान कर तहेदिल से कुबूला और भरपूर एन्जॉय किया।

भड़ास4मीडिया डॉट कॉम के एडिटर यशवंत के उपरोक्त एफबी स्टेटस पर आए कुछ प्रमुख कमेंट्स इस प्रकार हैं…

Golesh Swami Both are nice officers. Np singh is my good friend and subhash chandra dubey as younger brother. Np ki khasiyat yeh hai ki Lucknow mai DM koi bhee raha, jila NP singh ne hi chalya. Subhash bhai ke baare mai kya kahu heera officers mai se hai. NP aur subhash jaise officer u.p. mai unglio par ginne layak hai. Aise officer ho to u.p. sudhar jaye.

अशोक कुमार शर्मा सही बात की यशवंत आपने! मुझे मालूम है कि आप ताकत से प्रभावित नहीं होते उत्तराखंड के मुख्यमंत्री कार्यालय के ओएसडी के रूप में मैंने दो मामलों में आपसे संपर्क किया. आपने सरकार का पक्ष तो दिया मगर कोई समझौता या मांग नहीं मानी. सूत्र भी नहीं बताया अपना. लालच में आप आये नहीं. मैंने भी अपने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री कार्यालय के कार्यकाल में यही पाया कि इन दोनों अफसरों में अनेक ख़ास बातें है: एनपी साहब ओजस्वी और कड़क अफसर होकर भी आम आदमी के हक़ में सेवाभाव से खड़े रहते हैं. आसान नहीं उनको डिगाना. प्रेस क्लब के एक समारोह में मैंने उनको पहली बार बोलते सूना था. उन्होंने पत्रकारों को भी समझाया कि ईमानदारी और शासन के इकबाल का पुराना दौर वापस लाना है तो खबरों में ‘लिहाज’ ना करें किसी का. सुभाष जी क्रांतिकारी अफसर हैं. सीधे एक्शन लेते हैं. लपझप बिलकुल नहीं करते. उत्तर प्रदेश में इन जैसे अच्छे अफसरों की कमी नहीं है. लेकिन सत्ता को कदर कहाँ है? मैंने सूचना विभाग में ही देखाकभी वहां कमीशन और दलाली तंत्र शैशव और वामाना अवस्था में था. और अब? करप्शन का कारपोरेट..

Vinod Bhardwaj एन पी सिंह के बारे में खबरिया जानकारियां हैं , पर सुभाष चंद्र दुबे को व्यक्तिगत रूप से जानता हूँ । आज के सड़ांध मारते सिस्टम में भी दोनों ने अपनी महक और चमक को बरकरार रखा है । ये दोनों ही एक शानदार नजीर हैं , इनको दिल से सलाम !  … और जिसकी निष्पक्षता और काविलियत को लिखने के लिए यशवंत सिंह जैसे पत्रकार की कलम मचलने लगे , उसे किसी और के सर्टीफिकेट की जरूरत ही नहीं ! यशवंत भाई कभी मौका मिले तो डी जी सुलेखान सिंह से लखनऊ जाकर जरूर मिलना । उनसे मिलकर और उनका अतीत जानकर प्रभावित हुए बिना नहीं रह पाओगे । ये मोस्ट सीनियर आई पी एस भी अब रिटायरमेंट के करीब ही हैं ।

S.p. Singh Satyarthi अगर यशवंत जी किसी का मूल्य लगा रहे हैं तो निश्चित ही वह हीरा होगा।

Care Naman अगर भड़ासी किसी अधिकारी की तारीफ़ कर रहा है तो सच में बंदे में है दम इस बात पर आँख बंद कर के यकीन किया जा सकता हैं

Shambhunath Shukla एनपी सिंह ईमानदार और कर्त्तव्यनिष्ठ अफसर हैं। सुभाषचंद्र दुबे से कभी मिला तो नहीं पर उनके बारे में सुना अवश्य है।

Ramji Mishra हमारे महोली में एक उपजिलाधिकारी के एन उपाध्याय जी आये थे बहुत ईमानदार रहे लेकिन उनसे अतिरिक्त कमाई सपने में भी नहीं की जाती थी नतीजा यह हुआ प्रमोशन में लोहे लगते रहे हक़ मारा जाता रहा। बनारस भेज कर आबकारिविभाग में कर दिए गए लेकिन उपजिलाधिकारी का पद छीन लिया गया। और तो और अब उनकी जगह महोली की कमान उपजिलाधिकारी अतुल को दी गई है जो कई सालों से राज कर रहे हैं। अतुल इससे पहले गोरखपुर में तहसीलदार रहे हैं और वहाँ पर भी लोग दबी जुबान न जाने क्या क्या बातें इनके बारे में कहते थे। अब महोली में तो इनके संरक्षण में ही खुले आम खनन , घूसखोरी और दबंगई फलफूल रही है। यहीं नहीं अगर अतुल को जरा सा गुस्सा आता है तो सामने वाले को मारने और पीटने से भी उन्हें दनिक भी गुरेज नहीं है। फिलहाल जिन दो अधिकारियो के बारे में सर आपने लिखा उनको जय हिंद और आपकी पोस्ट सराहनीय है।

Poonam Scholar ऐसे समाज सुधारकों और अफसरों से अन्य समाजसेवियों और भावी अफसरों को अवश्य ही प्रेरणा लेनी चाहिए। आभार साझा करने के लिए।

Siddhartha Malviya ई सही पकडे हैं… दुबे जी बड़े रॉयल आदमी हैं। अच्छो के अच्छा और बुरो के लिए बहुत बुरा।

Kumar Anup Jha सर मैंने तो अभी इन दोनों सर को नहीं देखा हूँ.. नोएडा में ही रहता हूँ. जब बिहार में था तो वहां शिवदीप लांडे सर को देखा था.. वो मुझे अब तक काफी अच्छे अफसर लगे. हालांकि मैने कुछ अफसर को ही देखा है.

Varun Panwar एनपी सिंह शामली में जिलाधिकारी रहे, बेहतर सामाजिक कार्यकर्ता, कुशल अधिकारी और एक अच्छे दोस्त… वैसे तो उनमें अनेको ऐसी प्रतिभा है जो शब्दों में व्यक्त करेगे तो काफी लंबा चौड़ा लिखना पड़ेगा… शामली में वो लगभग डेढ़ वर्ष रहे.. यहां के लिये उन्होंने बहुत कुछ किया… सुभाष जी मुज़फ्फरनगर में कुछ ही दिनों के लिये एसएसपी बनकर आये थे, दंगो के दौरान, एक बार मुलाकात हुई, अपने कार्य के प्रति सजग थे, जो कि वहाँ के सत्ता धारी नेताओ को रास नहीं आये.. दोनों की जोड़ी बहुत कुछ करने का माद्दा रखती है

Shahnawaz Qadri श्री एन पी सिंह के बारे मे जो आपने लिखा है वह कम है… उत्तर प्रदेश मे इस तरह के अधिकारी देखने को कम ही मिलते हैं..

Chandan Srivastava मान लीजिए मैं दिलीप मंडल हूं। तो मेरा फीड बैक यह है कि आप अव्वल दर्जे के जातिवादी, सवर्णवादी हैं। आपको दो अफसर ईमानदार मिले, एक ब्राह्मण दूसरा ठाकुर।  क्या आप यह कहना चाहते हैं कि पिछड़ों दलितों में कोई ईमानदार अफसर ही नहीं। 🙂

Shyam Singh उप्र. के डाकू छविराम और पातीराम गैंग को ध्वस्त करने वाले तथा दो-दो बार राष्ट्रपति पदक हासिल करने वाले तेज-तर्रार आइपीएस. विक्रम सिंह जी जब नैनीताल के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक थे तब उनसे अक्सर मिलना होता था। बाद में उन्हें कुमाऊं का डीआइजी. भी बनाया गया। मैंने उन्हें कर्तव्यनिष्ठ व ईमानदार पाया। अन्य पुलिस अधिकारियों की तरह उन्होंने किसी नेता को दंडवत् नहीं किया होगा। अध्यात्म में रुचि के कारण वे यहां स्थित अरविन्द आश्रम में जाकर उसके साधना व अन्य दैनिक कार्यक्रमों में हिस्सा लेते थे। उन्होंने मेरे से भी अध्याम विद्या सम्बंधी कुछ पुस्तकें लेकर पढीं। पुलिस में ऐसे अधिकारी मैंने कम ही देखे हैं।

Hero Dubey एनपी सिंह से तो परिचित नहीं हूँ सर! लेकिन सुभाष चंद्र दुबे कन्नौज के एसपी रहे हैं। वह बहुत ही शानदार अफसर हैं। जय हिन्द

Pranay Batheja सर आपको पहली बार देखा ऊपर की चंद लाईने पढा कि जिससे इतना पता चला आप पत्रकार हैं अफसरों से मिलना आपको पसंद नहीं फिर भी आप मिले शायद उनकी ईमानदारी आपको उनके ओर आकर्षित करके ले गई। इनके बारे में आप आगे विस्तार से लिखेंगे। लेकिन कोई पत्रकार के वर्तमान स्थिति को क्यों नहीं लिखता उन्हें क्यों नहीं परिभाषित करता जिसे सरकार, सरकारी तंत्र और जनता के बीच सेतु व लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माना जाता है। जो पत्रकारिता हमारे वीर क्रांतिकारी करते थे और जो पत्रकारिता वर्तमान में हो रही है इसकी वास्तविकता क्या है?

A.k. Roy वैसे मुझे भी अफसरों से मिलना अच्छा नहीं लगता मैं राजनीति एवं पत्रकारिता में रहते हुए कम से कम इन लोगों से मिलना चाहता हूं अब आपने बताया है तो कभी किसी एक कार्य हेतु मिलना हुआ अभी इनके बारे में कोई अपनी राय दी जा सकती है अगर इमानदार है तो इन्हें उसकी सजा भी आज के भ्रष्ट सिस्टम से मिलेगी चाहे वह सरकार किसी भी पार्टी की है..

Singhasan Chauhan सलाम है ऐसे ऑफिसर्स को , ऐसे ही एक IPS श्री प्रभाकर चौधरी आये थे हमारे बलिया में | काम करने का तरीका वाकई काबिले तारीफ , कच्ची दारू, सड़कों पर अतिक्रमण, थाने में दलाली वगैरह सब बंद करवा दिए थे मगर भ्रष्ट नेताओ ने 2 महीने में ही उनका ट्रांसफर करा दिया …..इमानदारी अभी भी जिन्दा है .

Ramhet Sharma आपने जो लिखा है, उससे उनका का मऩोबल बढता है.. अच्छे अधिकारियों के अच्छे कार्य की सराहना की जानी चाहिए…

Ashwani Tripathi एनपी सिंह जी, शामली के डीएम रहे। बेहद गजब की नेतृत्व क्षमता है उनमे। एक अफसर और नेता दोनों की कुशल प्ररिभाओं का समावेश है, उनके अंदर। जब तक शामली में रहे, सभी नेताओं के घरों में बने चौपाल खाली रहे। वहां तो यह कहा जाने लगा था कि इस जिले में एक ही नेता है वो है एन पी सिंह। एन पी सिंह के दरवाजे हर समय जनता के लिए खुले रहते थे। पत्रकारों के लिए भी एन पी सिंह से अच्छा कोई अफसर नहीं हो सकता। पत्रकारों के मान सम्मान को हमेशा उन्होंने बढ़ाया। रास्ते में भी कोई पत्रकार मिलता तो गाड़ी रोक कर पत्रकारों से हाल लेते। भाषण देने की उनकी क्षमता तो गजब है।

Ghanshyam Dubey N. P से सिर्फ पाला ही नहीं पड़ा , निजी तौर पर उन्हें जानता हूँ । वह एक रीढ़ की हड्डी रखने वाले कर्मठ अफसर हैं। सुभाष से कभी मिला नहीं हूँ , स्टेट लॉ एंड आर्डर देखने वाले कुछ कनिष्ठ पर काम मे तेज पत्रकारों से उनके बारे मे सुना है । सबने उनके काम – स्वभाव की तारीफ ही की है।


भड़ासानंद कहिन…

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अविनाश दास की ‘अनारकली’ यशवंत को नहीं आई पसंद, इंटरवल से पहले ही बाहर निकल आए

Yashwant Singh : अनारकली आफ आरा कल देख आया. नोएडा सिटी सेंटर के पास वाले मॉल के सिनेमा हॉल में. इंटरवल से पहले ही फिल्म छोड़कर निकल गया. मेरे साथ एक संपादक मित्र थे. फिल्म बहुत सतही थी. जैसे मीडिया वाले टीआरपी के लिए कुछ भी दिखा देते हैं, पढ़ा देते हैं, वैसे ही सिनेमा वाले बाक्स आफिस के चक्कर में कुछ भी बना देते हैं. याद करिए वो दौर, जब सेमी पोर्न सिनेमा रिक्शे वालों के लिए बना करती थी और वो अच्छी कमाई भी करती थी. इन सिनेमा के बीच बीच में रियल पोर्न क्लिप भी चला दिया जाता था ताकि काम कुंठित दर्शक पूरा पैसा वसूल वाला फील लेकर जाए.

अनारकली आफ आरा में कुछ भी नया नहीं है. एक फूहड़ गाना गाने वाली सिंगर जो ढेर सारे लोगों से रिश्ते बनाती फिरती है, उसका पंगा एक शराबी वीसी से पड़ गया जो उसे सरेआम नंगा कर रहा था. जाहिर है, फूहड़ गायिका उर्फ सेमी रंडी को इसका बुरा लगना था क्योंकि वह यह सब बंद कमरे में करती थी, आज काम कुंठित और प्रभावशाली वीसी ने उसके साथ सरेआम करने की कोशिश की. बस, वह वीसी को सबक सिखाने में लग गई और सिखा भी दिया. कहानी बस इतनी ही है. इंटरवल से पहले फिल्म छोड़ आया इसलिए मुझे बस इतना बताना है कि मैंने ऐसा क्या फील किया जिससे फिल्म छोड़ आया. फिल्म का ज्यादातर हिस्सा फूहड़ गानों, काम कुंठाओं, कामुकता, वासना और जुगुप्साओं से भरा पड़ा है. आपको मिचली भी आ सकती है. फिल्म का पिक्चराइजेशन पूरी तरह से अनुराग कश्यप मार्का बनाने की कोशिश की गई है, लेकिन बन नहीं पाई है.

ऐसे दौर में जब बहुत अलग अलग किस्म के टापिक पर सुंदर फिल्में बन और हिट हो रही हैं, सिर्फ वासना वासना वासना और काम काम काम से बनी फिल्म का औचित्य समझ नहीं आता. अनारकली का दलाल बार बार अनारकली को छेड़ता नोचता परोसता दिखता है लेकिन इससे कोई दिक्कत नहीं अनारकली को. सोचिए, जिसकी मानसिक बुनावट सिर्फ देने लेने भर की हो उसे एक प्रभावशाली से दिक्कत क्या, बस इतने भर से कि यह सरेआम करने की कोशिश की गई. ये ठीक है कि बदन पर आपका हक है और आप तय करेंगी किसे देना लेना है, लेकिन जब आप चहुंओर देती परसोती दिखती हैं तो आपको लेकर कोई खास नजरिया नहीं कायम हो पाता. यौन अराजकता को परोसती यह फिल्म भले ही पुलिस और पावर से टक्कर का नौटंकी करती हो लेकिन इसकी आड़ में असल में केवल वासना और सेक्स परोसा गया है. बेहद घटिया और फूहड़ फिल्म.

इस फिल्म के शुरू होने से पहले पहाड़ पर चढ़ने वाली एक बच्ची की आने वाली फिल्म का प्रोमो दिखाया गया. मैं सोचता रहा कि क्या अविनाश के दिमाग में ऐसे थीम नहीं आते जिसमें जीवन का मकसद और जिजीविषा की कहानी बयां हो जो प्रेरणा देती हो. हमारे हिंदी पट्टी के नए फिल्मकारों के साथ दिक्कत ये है कि वे पहली बार हिट देने के चक्कर में ऐसे विषय उठा लेते हैं जो न सिर्फ फूहड़ और आउटडेटेड होते हैं बल्कि नए जमाने के दर्शकों को पचते भी नहीं. अविनाश की बड़ी सफलता इस बात की है कि उनने बिना खर्च ठीकठाक पीआर किया और ढेरों बढ़िया वाह वाह करती समीक्षाएं फेसबुक से लेकर अखबारों मैग्जीनों में छपवा लीं. वे फिल्में खर्चा निकाल लिया करती हैं, जो मॉल से लेकर सिनेमाघरों में रिलीज हो जाया करती हैं क्योंकि फिल्मों के ढेर सारे राइट मसलन म्यूजिक, टीवी रिलीज, फारेन रिलीज आदि अच्छे खासे पैसों में बिक जाया करते हैं.

हफ्ते भर में रो गा कर काफी लोगों ने फिल्म देखी है (हालांकि हाउसफुल कहीं नहीं रही यह फिल्म और आरा से लेकर भोपाल तक में एक शो में बस बीस लोगों तक के होने की खबर है) और देख रहे हैं. मेरे साथ सिनेमा हाल में कुल साठ लोग तक रहे होंगे. गोल्ड कैटगरी की सीटों पर ही लोग थे और वह भी पूरे नहीं. तब भी कहा जा सकता है कि जिनने इस फिल्म को बनाने में पैसा लगाया उनका पैसा निकल गया होगा. अविनाश को चाहिए कि वह माडर्न थीम सोचें और प्रगतिशील ढंग का सिनेमा बनाएं. मैंने बिना देखे अविनाश को दो बार फोन कर इतनी अच्छी समीक्षाओं और इतने ढेर सारे स्टार के लिए बधाई दी थी, अब उसे वापस लेता हूं. वो कहते हैं न, दूर के ढोल सुहावने होते हैं.

सिर्फ आलोचना के लिए यह आलोचना कतई न समझा जाए, यह जानते हुए भी कि लोगों को आजकल आलोचना का मतलब निंदा ही लगता है. मैं पूरी साफगोई से इसलिए लिख रहा ताकि प्रतिभावान अविनाश आगे कुछ अच्छी फिल्में बना सकें. और हां, यह भी जानता हूं कि ढेर सारे लोगों ने फिल्म देखकर जो वाह वाह लिख मारा है, उन्हें कतई यह मेरी समीक्षा पसंद न आएगी लेकिन उनसे फिर आग्रह करूंगा कि वह तटस्थ ढंग से सोचें और फिल्म के बारे में पुनर्विचार करें. मेरी तरफ से फिल्म को मात्र एक स्टार. मैं कम ही फिल्मों को इंटरवल से पहले छोड़कर निकलता हूं क्योंकि मेरा मानना है टिकट खरीद कर पैसा बेकार कर दिया है तो फिल्म लास्ट तक देख ही ली जाए, लेकिन लस्ट और भौंडेपन से सनी अनारकली आफ आरा को इंटरवल से पहले तक ही उबकाई के मारे छोड़ आया.

जैजै

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से.

उपरोक्त स्टेटस पर आए ढेर सारे कमेंट्स में से कुछ प्रमुख यूं है :

Ravi S Srivastava फेसबुको पर वीरो की बखानता के बाद सोच ही रहा था आप ने बचा लिया साधुवाद

   Yashwant Singh मैंने फिल्म देखी भी देर में ताकि मैं लिखूं तो इससे फिल्म का बिजनेस प्रभावित न हो. आखिर अविनाश अपने साथी हैं, अपने पेशे के रहे हैं और उनकी पहली फिल्म है, बहुत संघर्षों के बाद.

   Ravi S Srivastava बात आप की सही है पर प्रोफेसन मे इमोशनल का छौंका नहीं होना चाहिये

आशीष महर्षि sahi me?

   Yashwant Singh जाइए देख ही आइए. ताकि मेरे कहे के आलोक में आप भी रिव्यू लिख सकें. आप ज्यादा तटस्थ लिखेंगे क्योंकि दोनों पक्ष आपके सामने हैं. हां, देख आना इसलिए जरूरी है ताकि साथी अविनाश की पहली फिल्म होने के नाते एक थोड़ा-सा योगदान अपन लोग की तरफ से करना बनता है.

चैतन्य घनश्याम चन्दन मैंने भी अतिउत्साह में यह फिल्म पैसे खर्च कर देख डाली, लेकिन निराशा ही हाथ लगी। दरअसल जिस फिल्मकार की जैसी मानसिकता होती है, वह वैसी ही चीजें दर्शकों को दिखाना चाहते हैं। इस फिल्मकार का इतिहास भी पलट कर देख लीजिये। कम लिखा, ज्यादा समझिये।

Prakash Govind मैं ये फ़िल्म फ़िल्म देखने को आतुर था,,, क्योंकि बड़े-बड़े दिग्गज बुद्धिजीवियों ने दिल खोलकर सराहा था। लेकिन आपने तो एक झटके में बैंड बजा डाली। मुझे आपकी साफगोई बढ़िया लगी। बिना लाग-लपेट के सटीक समीक्षा की है। अविनाश जी को इसे अवश्य पढ़ना चाहिए ताकि अगली फ़िल्म सार्थक व बेहतर बना सकें।

   Yashwant Singh मजेदार ये है कि वो लोग ज्यादा ही तारीफ लिख रहे जिनने नंगई का जीवन भर विरोध किया. आज के दौर में हर आदमी के हाथ में स्मार्टफोन है और पोर्न क्लिप सबको सहज उपलब्ध है. ऐसे में सिर्फ कामुकता परोसने के लिए फिल्म बनाना और कामुकता वासना सेक्स को जस्टीफाई करने के लिए एक सरोकारी एंगल गढ़ देना पचता नहीं बंधु.

    Prakash Govind मुझे लग रहा है कि अविनाश जी ने बाजार के बोझ तले दबकर ये फ़िल्म रची, इसीलिए कहानी और रचनात्मकता को नजरअंदाज कर दिया।

   Mantu Soni अब बुद्धिजीवी की क्या बुद्धि है जनता जान चुकी है।

Dev Nath इसको कहते हैं बिना किसी लाग लपेट की समीक्षा

सुभाष सिंह सुमन तमाम रिव्यूज पढ़कर सोच रहे थे कि टिकट बुक किया जाए। अब रहने देते हैं।

Nadim S. Akhter भाई Yashwant Singh, अब तक ये फिल्म नहीं देखी है पर अब देखनी पड़ेगी. जैजै

    Yashwant Singh जरूर. मैं तो सरेआम अपील कर चुका हूं रिलीज से पहले ही कि अपने साथी अविनाश की पहली फिल्म को सब लोग देखें और उन्हें सपोर्ट करें. फिल्म सभी को देखना चाहिए क्योंकि पहली फिल्म थोड़ी भी हिट हो गई, पैसा वसूल बन गई तो निर्देशक के लिए आगे का रास्ता खुल जाता है. जरूर देखिए मित्र और लिखिएगा.

    Nadim S. Akhter आप दोनों मेरे मित्र हैं. इसलिए जरूर देखूंगा और ईमानदारी से लिखूंगा. आपका एक अलग दृष्टिकोण मिला. ये भी जरूरी था. आलोचना और समालोचना जरूरी है. कोई चीज परफेक्ट नहीं होती.

Sandip Thakur कमाल कर दिया यशवंतजी…आपने। धाे डाला…पटक पटक कर। आरा आैर अनारकली….एक ताे करेला,दूजे चढ़ा नीम। अनारकली अपने आप में गजब थी आैर अनारकली यदि आरा की हो तो फिर क्या कहने..। मैंने फिल्म देखी नहीं है…लेकिन आपने जैसा लिखा है कि फिल्म में फूहड़ता का नंगा नाच है…उससे मैंने सहमत हाे सकता हूं। क्याेंकि भाेजपुरी संस्कृति जानी ही जाती है नंगई व दबंगई के लिए। फिल्म सेंसर बाेर्ड ने भी ए सर्टिफिकेट दिया है ताे जाहिर है कि फिल्म में वाे सबकुछ हाेगा जाे पैंट में हलचल पैदा कर दे। .

   Yashwant Singh मेरा दावा है कि अगर आप अपने बेटे या बेटी के साथ फिल्म देखेंगे तो आपको शर्म आएगी कि क्यों देखने चला आया. बेटा या बेटी सिर्फ यौन अराजकता की शिक्षा ही पा सकेंगे. इतने घटिया फूहड़ डायलाग और इतने भोंडे गाने कि आप उफ्फ कर लेंगे.

   Sami Ahmad यशवंत जी, मैं सिनेमा के मामले में जीरो हूँ या आम तौर पर इसके बारे में अच्छी राय नहीं। मैंने इस फ़िल्म का बहुत नाम सुनकर एक भाई से पूछा था कि इस फ़िल्म में और बाई जी के नाच में क्या अंतर है? अब लग रहा कि यह तो बाई जी के बीच बाई जी है। फिर आदमी जलेबी बाई को ही क्यों देखे। किसी शादी में चला जाय। नाच और स्टेज पर ही देख ले नाथुनिये पे गोली मारे और फिर चोली के पीछे क्या है। भाई लोग भी कमाल के हैं। सबको एकदम्मे बुड़बक समझते हैं।

Madan Tiwary निष्पक्ष आलोचना है न? व्यवसायिक प्रतिद्वन्दिता तो नहीं? शेयर करना है यह समीक्षा।

   Yashwant Singh अरे पहले आप देख आइए पंडीजी. देखने से ही आप समझ पाएंगे क्या सही समीक्षा है और क्या गलत. बाकी अविनाश और मेरा कहीं कोई होड़ या प्रतिद्वंद्विता नहीं है. न पहले थी. न अब है. हम लोग अच्छे मित्र हैं.

  Madan Tiwary नहीं आपकी बात पर विश्वास है। मित्र तो सब हैं, बुद्धिजीवियों वाली मित्रता भी है, प्रतिद्वन्दिता भी। हाहाहाहाहा

   Yashwant Singh आलोचना लिखना भी एक तरह की ब्रांडिंग ही होती है. इस बहाने फिल्म की चर्चा हुई. सिनेमा में तो वैसे भी निगेटिव पब्लिसिटी ब्रांडिंग कराई जाती है ताकि सिनेमा का नाम लोगों के दिमाग जुबान तक पहुंच जाए. इसलिए यह आरोप लगा सकते हैं Madan पंडी जी कि हम दोनों ने फिक्स करके यह आलोचना लिखी लिखवाई है 😀

   Madan Tiwary आरा की अनारकली यशवन्त की नजर में। वेब मीडिया के तीन मठाधीश हैं। यशवन्त आफ भड़ास, अविनाश आफ मोहल्ला लाईव, संजय तिवारी आफ विस्फोट। तीनों के बीच बुद्धिजीवी वाली मित्रता और प्रतिस्पर्धा भी रही है। यानी दोस्ती भी दुश्मनी भी। हाहाहाहाहा। लेकिन फेसबुकिया मठाधीशों वाला छिछलापन कभी नहीं रहा। खैर तीनों दोस्त है। दो के साथ जाम वाली मित्रता रही। संजय तिवारी बेचारे मजबूर है जाम नहीं छलका सकते। खैर समीक्षा पढ़े जरूर लेकिन फ़िल्म भी देखें। अविनाश के लिए, संघर्षशील एक्टिविस्ट के लिए।

  आशीष सागर Seedha likha

Aryan Kothiyal चलो अब हमारा पैसा तो बचेगा… सही समीक्षा करने के लिए धन्यवाद भईया

Ila Joshi ग़ज़ब समीक्षा उससे भी ग़ज़ब टिप्पणियां, हालांकि मेरी इस समीक्षा से भयंकर असहमतियां हैं लेकिन आपकी वॉल है सो जो चाहे लिखिए।

   Yashwant Singh आप मेरी समीक्षा और ग़ज़ब टिप्पणियों पर एक समीक्षा अपने वॉल पर लिख सकती हैं. बहस तो होनी चाहिए.

Vinay Oswal मैं तो फिल्म ही नही देखता तो टिपण्णी भी नहीं।

Siddharth Kalhans आपको धन्यवाद वरना आजकल में ही 1000-1200 की चपत लगने वाली थी। कई परिजन फिल्म दिखाने का आग्रह कर रहे थे। चेन्नई प्रवास में तो साथी उत्कर्ष सिन्हा आमादा ही हो गए थे फिल्म जाने को। अब इस बचे पैसे का कुछ सदुपयोग कर सकूंगा आपके लखनऊ आगमन पर द्रव्यपान कराने में (आपके साथियों को क्योंकि खबर है कि आपने द्रव्य से बेवफाई कर दी है)

Harsh Kumar एक ऐसी ही बकवास फिल्म पार्च्ड आई थी। जिसकी तथाकथित कम्युनिस्ट टाइप के लोग तारीफ करते नहीं थक रहे थे।

S.p. Singh Satyarthi देखने की चाह जाती रही। यशवंत जी की टिप्पणी अपनी अलग और निर्लिप्त पहचान रखती है। इतनी फूहड़ता है तो बाय बाय…

Singhasan Chauhan मैंने फिल्म देखी नहीं है मगर इसी फूहड़पन की वजह से मुझे खुद याद नहीं कब भोजपुरी फिल्म देखी थी

    Yashwant Singh इसका उल्टा होने की ज्यादा संभावना है. लोग अपना नजरिया कायम करने के लिए फिल्म देखने जाएंगे फिर लिखेंगे कि यशवंत ने सही कहा या दूसरों ने. आप जानते ही होंगे कि निगेटिव पब्लिसिटी और ब्रांडिंग सिनेमा का शगल है ताकि फिल्म जुबान दिमाग में चढ़ जाए. 😀

Deepak Pandey आपकी यह पोस्ट जितने लोग पढ़ेगे उतनी फिल्म को चपत लगेगी।

Vinay Shrikar मैंने भी बिना देखे ही यह मूवी देख ली! थैंक्यू यशवंत।

Tarun Kumar Tarun इस समीक्षा का असर यह हुआ कि मेरे १२० रुपये, तीन घंटे और पचास ग्राम खून बच गये!

डॉ. अजित मैं यही सोच रहा था सर सब वाह वाह कर रहे है क्या फिल्म का कोई कमजोर पक्ष नही है। आपकी दर्शकीय टिप्पणी महत्वपूर्ण है।

Kamal Kumar Singh एक से पहले ही अप्रैल फूल बन गया भैया, हमकों पहिले से ही पता था कि कुंठित खेल होगा।

Ramji Mishra शानदार विश्लेषण

Rajesh Yadav सटीक समीक्षा करना सबके बात नहीं रही इस बिकाऊ मीडिया में। आपने आईना दिखाया है, लेकिन बहुतों को फिर भी धुंधला ही नजर आएगा।

Sheeba Aslam Fehmi Maine Arvind Shesh aur kisi ek aur mitr ki sameeksha padhi, ta’ajub hai ki dono ne hi kuchh aisa nahi likha jisse ye pahlu ujagar hotey. Baharhaal aapke mashvire me dum hai, aainda behtar filmen bhi banaenge Avinash.

Dilnawaz Pasha कई दिन से फिल्म देखने का सोच रहा हूं. मौका मिला तो देख भी लूंगा… बिना देखे क्या कहना!

Sandeep Kumar Yadav मैं आप की बात से सहमत नहीं हूँ। अनारकली लेती देती है या नहीं ये उसकी मर्ज़ी है कोई ज़बरदस्ती तो नहीं है कि BC रसूखदार हैं पैसे फेक रहे हैं तो वो BC के साथ सो जाए, ये उसकी मर्ज़ी है। शरीर उसका है मन उसका है मर्ज़ी उसकी है। आप ने जो ये लिखा है वो अपने दलाल को लेती देती है फिर BC से खुले आम कुछ भी करने में क्या दिक्कत है, मैं ये जानना चाहता हूँ उसके शरीर और उसके मन पर किसका हक़ है, कौन निर्णय कौन करेगा, किसको हक़ दिया गया है…. अगर आप ने फिल्म पूरी नहीं देखी तो कैसे पता की वो अंत में Bc से बदला लेती हैं और सबक सिखाती है ? जिस प्रकार आप ने लिखा है उससे ये पता चलता है कि जो नाचने गाने वाले लोग हैं उनकी अपनी स्वतंत्रता या अपनी नैतिकता कुछ नहीं होती । और जो उसका दलाल है उसने कहाँ कहाँ परोसा है फ़िल्म में अनारकली को ज़रा वो भी बताइये। खैर गीत संगीत में तो आप को फूहड़ता ही नज़र आई बाकी क्या कहें? खैर इसी कहानी में सनी लियोन होती या इमरान हाशमी होते तो शायद ये प्रतिक्रिया न होती आप की? कोई औरत क्या करेगी और किस हद तक करेगी ये BC टाइप्स वाली मानसिकता के लोग तय करते हैं? और सर कृपया अनुराग कश्यप मार्का का अर्थ ज़रा समझाइये?

    Yashwant Singh आपका अपना पक्ष है. स्वागत है. सबके विचार अलग हो सकते हैं. मैने भी लिखा है कि शरीर पर स्त्री का हक होता है, वह तय करती है. मेरा लब्बोलुआब ये है कि सरोकारी कहानी की आड़ में सिर्फ कामुकता, भोंडापन, वासना और नंगई परोसी गई है. जब आप कहते हैं कि पैंसे भी लूंगी, दूंगी भी नहीं तो ये वही नंगई है जिसमें एक पत्रकार कहता है कि रिश्वत भी लूंगा और बदनाम भी करूंगा, एक पुलिस वाला कहता है घूस भी लूंगा और चालान भी करूंगा, एक डाक्टर कहता है फीस भी लूंगा और मरीज को मार भी डालूंगा… क्या संदेश देना चाहते हैं ऐसे सीन / डायलाग से. फिल्म का अंत फिल्म की समीक्षाओं से पता है. अनुराग कश्यप मार्का समझने के लिए गैंग आफ वासेपुर देख लीजिए. दलाल कितने को दिलाता परोसता है यह कुछ दृश्य देखकर अंदाजा लग जाता है जिसमें वह खींच खांचकर हर जगह उसे ले जाता है, थाने से लेकर वीसी तक के घर में. बाकी नजरिया सबका अपना अपना. मैंने अपने जीवन में इतनी भोंडी फिल्म नहीं देखी है, इसलिए कह लिख रहा हूं. सरोकारी कहानी की चाशनी में नंगई परोसने का माडल बहुत पुराना है दोस्त. मुझे स्त्री के संघर्ष से कोई दिक्कत नहीं है. उसके संघर्ष की आड़ में क्या क्या परोसा सुनाया दिखाया गया है, उससे दिक्कत है.

Divakar Singh हम्म सही है सर. हम कल नहीं आ पाए तो एक टिकट का पैसा बर्बाद होने से बच गया. आपने बढ़िया समीक्षा लिखी है.

Sandip Naik कुछ पूर्वाग्रह लग रहे हैं यशवंत। पता नही Avinash ने ये सब पढा या नहीं। खैर, अविनाश खुले दिल दिमाग़ के शख्स हैं और जिंदादिल इंसान हैं। समय आने पर सबको और सबकी जिज्ञासाओं का माकूल जवाब भी देंगे, अभी सुस्ता तो लेने दो एक लंबी पारी खेलने के बाद।

    Yashwant Singh पूर्वाग्रह होता तो फिल्म का रिलीज से पहले ही प्रचार न कर रहा होता भड़ास के जरिेए और रिलीज पर सबको देखने का आह्वान न करता. पूर्वाग्रह अगर इसे कहते हैं कि जैसा आप फील करें, उसे लिख दें तो मान लीजिए पूर्वाग्रही हूं. रही अविनाश की बात तो उन्हें प्रशंसाओं के अंबार के बीच दो चार आलोचनाओं का भी स्वागत करना ही चाहिए मित्र.

Rj Shalini Singh आप जैसे आलोचक जो स्पष्ट एक बार में कह दें कम होते हैं भाई। हम तो ऐसे लोगो को पलकों पर नहीं उनके भीतर छुपा के रखने वाले हैं। ताकि कोई नज़र न लगा पाए।

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योगी आदित्यनाथ के सीएम बनने से होने वाले एक बड़े फायदे के बारे में बता रहे यशवंत

Yashwant Singh : योगी आदित्यनाथ के सीएम बन जाने से एक बड़ा फायदा ये है कि यूपी के सीएम को अब अपने परिवार के लोगों के लिए सांसदी, मंत्रालय, ठेका, उगाही आदि के लिए प्रयास नहीं करना होगा. मुलायम और अखिलेश के सीएम वाले कार्यकाल में इनके कुनबे के जितने लोग सांसद विधायक बने, जितने लोग मंत्री बने, जितने लोग ठेका पट्टी से जमकर लूटे, जितने लोग ट्रांसफर पोस्टिंग से ठूंस कर कमाए यानि इन लोगों ने अपने कार्यकाल में अपने और अपने कुनबे के जरिए जितना माल दूहा, इकट्ठा किया-कराया है, अगर वो सब जब्त कर मेरे पूर्वी उत्तर प्रदेश इलाके के हर घर के प्रत्येक सदस्य के बीच वितरित कर दिया जाए तो हर एक को कम से कम एक-एक लाख रुपया मिल जाएगा…

(….मुलायम सिंह जी जाने क्या मोदी के कान में फूंक चुके हैं, शपथ ग्रहण के दिन और आज अपर्णा प्रतीक खुद अपने पैरों से चलकर योगी जी से मिल आए हैं… ऐसे में धन की जब्ती तो छोड़िए, इस कुनबे के काम और आय की जांच भी होगी या नहीं, कुछ कहा नहीं जा सकता…)

योगी संन्यासी हैं और दीक्षा लेने के बाद से अपने परिवार से दूर हैं. इसलिए वो पूरी तरह प्रदेश के विकास के लिए काम करने में मन लगाएंगे, ये उम्मीद करता हूं. पिछले दस वर्षों में जिस कदर अंध लूट, तुष्टीकरण, उगाही, जंगलराज का दौर चला, उससे निजात पाने में वक्त तो लगता है… बूचड़खाने हों, लेकिन लाइसेंसी हों… सड़क पर नौजवान चलें लेकिन लड़कियों की तरफ निगाह न करें… ये दो अच्छे काम कर रहे हैं योगी जी.. साइड इफेक्ट हर काम के होते हैं.. जो अफसर इंप्लीमेंटेशन में गड़बड़ करें उन्हें भी दौड़ा कर दंड दो लेकिन सैद्धांतिक रूप से दोनों फैसले ठीक हैं… मेरी सबसे ज्यादा उत्सुकता किसानों की कर्ज माफी वाले वादे की है. अगर योगी जी ये वाला काम भी कर दें तो उत्तर प्रदेश के किसानों के मुर्झाए चेहरों पर लाली लौट आएगी… जैजै

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से.

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एयर इंडिया वाले लतखोर होते ही हैं!

Yashwant Singh : उपराष्ट्रपति के साथ वेनेजुएला जा रहा था तो एक मेरे पत्रकार मित्र एआई वन के मेल फीमेल एयरहोस्टेस की विनम्रता देख दंग थे. कहते थे यशवंत जी पहली बार इन्हें इतना विनम्र देखा हूं. जरूर इन्हें प्रायश्चित पोस्टिंग मिली है ये. वे कहते रहे कि ये ऐसे बात-बिहैव करते हैं जैसे ये खुदा हों. पत्रकार मित्र आने-जाने के दौरान एयर होस्टेस और एयर इंडिया स्टाफ की विनम्रता देख-देख आंखे फाड़ रहे थे.

तब मुझे लगा कि ये सरकारी जहाज कंपनी के लोग यात्रियों को रुला के रखते हैं. ऐसी हालत में जूता मारना तो ठीक लगता है भाया. 😀

वैसे भी, टिकट बिजनेस क्लास का है और बैठाते इकानामी क्लास में हो तो जूता मार काम तो है ही. ये अलग बात है जूता वही मार पाया जो प्रभावशाली है वरना कोई यात्री मारता तो न सिर्फ एअर इंडिया वालों से हिक भर लात खाया होता बल्कि सूजे मुंह के साथ जेल में होता. एयर इंडिया वाले अगर एक लाख बार बदतमीजी करें तो कम से कम एक बार तो जूता मारना बनता है भाऊ :) नो हाय हाय.. बी प्रैक्टिकल…

वैसे जूता मारने का यह काम कोई कामरेड किया होता तो बाकी कामरेड कहते कि जनता कितना बर्दाश्त करेगी, इन्हीं हालात में नक्सलवादी पैदा होता है… शिवसेना वाले ने जूता मार काम कर दिया तो गलत कैसे… जहां पानी रुक जाए, सड़ जाए, गंधला हो जाए… वहां कोई पत्थर मार दे ताकि यथास्थितिवाद खत्म हो, प्रवाह के नए रास्ते खुलें… माफ कीजिएगा… मैं भाजपाई बिलकुल नहीं हूं लेकिन चीजों को एक चश्मे से देखने की जगह मौलिक तरीके से देखने की कोशिश कर रहा हूं ताकि मूल समस्या, मूल बात सामने आ सके, न कि कौवा कान ले गया के आधार पर कौवे के पीछे पड़ जाएं, बगैर अपना कान देखे….

(अपने राइट विंग के फक्कड़ मित्र Kamal Kumar Singh की इस बारे में एफबी पोस्ट देखा तो वहीं कमेंट किया, उसी को यहां अलग से पोस्ट कर रहा हूं)

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से. संपर्क : yashwant@bhadas4media.com

Chandan Srivastava : किसी की गुंडागर्दी के बारे में सुनकर गुस्सा आना स्वाभाविक है। लेकिन एक सांसद द्वारा एयर इंडिया के किसी कर्मचारी की चप्पल या सेंडिल से पिटाई की खबर पर मुझे गुस्सा आ नहीं रहा। अगर मैं कहूं कि यह कुछ और नहीं शेर को सवा शेर मिलने जैसी बात है और एयर इंडिया वाले कई बार यह या इससे थोड़ा कम तो डिजर्व करते ही हैं। (मतलब 25 नहीं चार-पांच चप्पल) तो अतिश्योक्ति या असहिष्णुता नहीं होगा।

तीन साल पहले एक दोस्त अमौसी एयरपोर्ट से अपने शहर जा रही थी। एक एयर इंडिया के कर्मचारी से चेक-इन के दौरान कुछ कहा-सुनी हुई। कर्मचारी ने उसके साथ अभद्रता की। हमने अमौसी एयरपोर्ट में ही बने एयर इंडिया के ऑफिस में जाकर घटना की लिखित शिकायत की। तीन साल बीत गए, अब तक उस शिकायत पर कोई कार्यवाही नहीं हुई सिवाय कुछ दिनों बाद शिकायत प्राप्त होने का एक लेटर मिलने के। अब तो शिकायत की कॉपी पता नहीं मेरे पास भी सुरक्षित है भी कि नहीं। लेकिन इस बार एयर इंडिया वालों ने किसी ऐसे शख्स को उंगली कर दी जो उनसे भी बड़ा बद्तमीज था। That’s it. मामला बस इतना ही है।

लखनऊ के पत्रकार और वकील चंदन श्रीवास्तव की एफबी वॉल से.

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रोमियो स्क्वाड वाले इशू पर अतिरेक में आकर न लिखें, यह भी सर्जिकल स्ट्राइक, नोटबंदी टाइप मुद्दा है : यशवंत सिंह

Yashwant Singh : रोमियो स्क्वाड वाले इशू पर अतिरेक में आकर मत लिखिए. यह भी सर्जिकल स्ट्राइक, नोटबंदी टाइप का ही मुद्दा है. जमीन पर लोग इसे बहुत जरूरी बता रहे हैं. कई लोगों की बात सुन कर और कई लोगों से बात करने के बाद लिख रहा हूं. आप आजादी, स्वतंत्रता, प्रेम आदि का राग अलापते रहिए लेकिन जमीन पर लोग शोहदों के आतंक से त्रस्त थे. मैं भी आप की ही तरह सोच रहा था कि रोमियो स्क्वाड के जरिए यूपी पुलिस बच्चों को परेशान कर रही है.

पर लोग कह रहे हैं कि परेशान वे बच्चे हो रहे हैं जो सुबह शाम लड़कियों के कालेज स्कूल और उनके निकलने के रास्ते पर तैनात रहते थे और पीछा किया करते थे. रही बात पार्कों बागों आदि में बैठने वाले जोड़ों की तो किसी भी अभियान में दस पंद्रह परसेंट जेनुइन लोग तो चपेट में आते ही हैं.. वो कहते हैं न गेहूं के साथ घुन का पिस जाना. सो, हे साथियों दोस्तों, अब थोड़ा प्रैक्टिकल होकर जमीनी हालात को समझ बूझ के लिखा करिए. सिर्फ घर से आफिस और आफिस से घर, इस दरम्यान पूरे वक्त फेसबुक पर वैचारिक लेखन से रियल्टी / अंडर करंट को नहीं पकड़ पाएंगे.

ठीक यही मामला बूचड़खाने का भी है. शहरी / रियाइशी इलाके में बहते खून, भयंकर बदबू से त्रस्त लोगों को लग रहा है कि बहुत सही हो रहा है… ध्यान रखिए, मुसलमान कतई भाजपा के वोट बैंक नहीं हैं. सपा राज में मुसलमान पूरी तरह सत्ता संरक्षण में पल बढ़ रहे थे और ढेर सारे वैध अवैध काम कर रहे थे, जिसमें छेड़खानी से लेकर अवैध बूचड़खाना संचालन तक है. अब इन पर गाज गिर रही तो हिंदू खुश हैं.

मुझे मुस्लिम हिंदू की भाषा में इसलिए बात करनी पड़ रही है क्योंकि ग्राउंड लेवल का सच यह हो चुका है और इसे सच बनाने में बड़ा रोल सपा बसपा कांग्रेस जैसी पार्टियों का है. मेरा बस इतना कहना है कि योगी के आने के बाद तुरंत हाय हाय करने की जगह तीन महीने तक का वेट करिए… देखिए, भांपिए.. घूमिए, फीडबैक लीजिए… फिर लिखिए… वरना एक बार फिर झटका खाएंगे… जितना बिना वजह भाजपा और योगी का विरोध करेंगे, उतना ही आप उन्हें मजबूत करेंगे…

जैजै

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से.

उपरोक्त स्टेटस पर आए कुछ प्रमुख कमेंट्स इस प्रकार हैं….

Kumar Rahman यशवंत जी, बरेली में शोहदों के डर से एक बच्ची के माता-पिता ने गांव छो़ड़ दिया है… इसकी वजह से उस नवीं कक्षा का छात्रा की पढ़ाई भी छूट गई है…. शाम छह बजे LIVE TODAY न्यूज चैनल पर बरेली से यह रिपोर्ट देखी जा सकती है…

Shivmangal Singh भाई साहब यूपी में ये समस्या कैंसर की तरह है हज़ारों बच्चियां स्कूल छोड़ रहीं हैं up में ऐसा लगने लगा था की बेटी का बाप होना अपराध है मुजफ्फरनगर के दंगों के पीछे छेड़खानी ही थी वहां लफंगों में दहशत होना जरुरी है

Deepak Thakur सटीक विश्लेषण। कुछ यही हालत पटना जैसे शहरों का भी है। पढने वाली बेटियों को काफी परेशानी हो रही है।

Kamta Prasad लगता है मैं भी कायदे से सोचने लगा हूँ तभी आपकी बातें पल्ले पड़ने लगी हैं, कल की भड़ास की रिपोर्ट भी ठीक ही थी कि कानून का दुरुपयोग भी होता है।

Vivek Singh बिलकुल सही बात। इलाहाबाद याद ही होगा किस तरह शाम को महिला छात्रावास के बाहर लल्ला चुंगी पर भीड़ लगती थी। वहां जो होता था वो यही सब था।

Anil Maheshwari Efforts to contain eve teasing (sexual harassment) are being viewed with suspicion but it intriguing that Anti Romeo Squad in UP is “moral policing” & Pink Squad in Kerala is progressive. She squads are also in Hyderabad for the same job. When Rajnath Singh, as UP Minister for Education tried to check copying in examination by making copying cognizable offence, the left/liberal forces in Delhi too opposed the move of Raj Nath Singh saying that a girl of 14 years, caught copying will also be put behind the bars. The result was under the pressure of the party leaders, having entrenched interest in copying and making copying as a source of livelihood compelled the Kalyan Singh government to withdraw the order. The result is before us. No value of UP degrees and certificates in the Job market.

Singhasan Chauhan बिलकुल सही और इसमें सज्जन लोगों को तो कोई परेशानी ही नहीं है परेशानी तो उनके लिए है जो आवारागर्दी करते हैं और रह चलती लड़कियों, औरतों के ऊपर फब्तियां कसते हैं इनका इलाज तो होना ही चाहिए| मैं किसी परती विशेष का समर्थक नहीं हूँ मगर सही काम की हमेशा तारीफ होनी चाहिए चाहे वो किसी भी परती या धर्म से हो.

Ravindra Singh Basera Dev पिछले साल दिसंबर में दिल्ली से देहरादून जा रहा था। रास्ते में बस की खिड़की से बाहर झांक रहा था तो क्या देखता हूं कि मेरठ के किसी स्कूल की छुट्टी हो रही थी। लड़कियों का स्कूल था, कतार बना कर लड़कियां घर को लौट रहीं थी। कुछ लड़कों को सड़क किनारे लड़कियों की कतार में से किसी को खोजते देखा, सोचा कि शायद किसी खास लड़की का इंतजार हो, और मैं अपने लड़कपन के दिन याद करते हुए मन ही मन मुस्कुरा दिया। लेकिन बस के जरा आगे बढने पर दृश्य बड़ा विचलित करने वाला था, लड़के बाइक लेकर एक्सेलेटर दबा, बार बार लडकियों की कतार के चक्कर काट रहे थे, लडकियों की कतार के ठीक बगल में, बीच-बीच में किनारे खड़े दोस्तों का झुंड बनाकर लड़के, छेड़ाखानी करते, हाथ खींचते और लड़कियों को झुंड में घेरने की कोशिश करते दिख रहे थे। चूंकि यह छुट्टी का समय था तो बस के थोड़ा और आगे बढने पर देखा कि, और भी कई स्कूलों की छुट्टी उसी समय हो रही थी। और मेरे आश्चर्य का ठिकाना नहीं था यह देख कर कि सभी जगह वही पहले स्कूल के जैसे हालात थे। यह सब शहर के बीचों बीच चल रहा था, लोग आ जा रहे थे, सब सामान्य कामकाज की भांति चल रहा था। और लड़कों के गिरोह किसी संगठित गैंग की तरह जहां तहां लड़कियों से यूँ ही पेश आते दिखे। इसे पश्चिमी उप्र के शहरों और कस्बों की Teen Age संस्कृति के रूप में आप समझ सकते हैं। लेकिन आज जब योगी सरकार के Anti Romeo Squad के गठन का समाचार सुना तो एक-बारगी लगा कि बड़ा प्रतिगामी कदम है, प्यार पे पहरा बिठाने का Frustrated बजरंगी Lumpens का संघी Vigilante Justice वाला Agenda जैसी कि छवि, लिबरल- लेफ्टिस्ट मीडिया वाले इस कदम की आम जनता विशेषकर मध्यम वर्ग के युवाओं के मन में बना रहे हैं। मुझे फिर अचानक, मेरठ शहर का वह स्कूल से लौटती लड़कियों से Road Romeos के दुर्व्यवहार का दृश्य याद आ गया और मुझे Anti Romeo Squad का मतलब समझ में आ गया, और यह भी कि क्यों इस कदम को इतनी तत्परता से योगी सरकार ने उठाया है।

Suresh Gandhi बिलकुल सही कहा आपने विरोध सिर्फ सपाई व काग्रेसी बलात्कारी कर रहे है सच तो यह है इनके खिलाफ ही रपट दर्ज करनी चाहिए क्योंकि वोट खातिर बलात्कारियों चोर उचक्को भ्रष्टाचारियों चापलूसो व डकैतों को सपोर्ट करना इनका सगल बन गया है

Ravi Prakash Singh यशवंत जी किसी गर्ल होस्टल के बहार जब लडकिया सब्जी फल खरीदती है तो उस फल की साइज सोहदे(रोमियो) पूछते है कल से नजर नहीं आये ।

Nitin Thakur किसी को मैंने जवाब दिया था.. उसका अंश है- मैं आपसे ये कहूंगा कि मैं नहीं जानता कि आप योगी से कितने परिचित हैं और कितने नहीं। कम से कम मैं उनसे और उनके विचार से ठीक ठीक परिचित हूं। कोई भी सरकार नहीं चाहेगी कि उसे शासन में कॉलेज की लड़कियों के साथ शोहदे बद्तमीज़ी करें। शोहदे किसी के सगे नहीं होते और कोई उन्हें नहीं पालता। ये हिंदू और मुसलमान दोनों होते हैं और जाति भी हर तरह की होती है। शासन के पास पहले से पुलिस है। पुलिस ने पहले से ही महिलाओं के लिए हेल्पलाइन नंबर दिए हैं। मेरे अपने शहर में लड़कियों के कॉलेज के बाहर बसपा और सपा दोनों सरकारों के दौरान मैंने पुलिस जीप को खड़े पाया है। दूसरे कॉलेजों के आसपास भी हमेशा इस तरह के अभियान चलते ही रहे हैं। ये अलग से जो एंटी रोमियो वाला ड्रामा है वो किस एक समुदाय विशेष के खिलाफ चलाया जा रहा है वो मैं तो जानता ही हूं और जिन्होंने योगी को सुना है उन्हें भी मालूम ही है। ये स्क्वैड दरअसल लव जिहादी खोज रही है। चूंकि चुनावी प्रचार में ये बात ज़ोर से कहकर वोट आए तो योगी ने कही भी जिसकी मैं तारीफ करता हूं… लेकिन अब यही बात शासन में बैठकर योगी बोल नहीं पाएंगे। वैसे भी घर बैठकर आपने कैसे तय कर लिया कि ये स्क्वैड अपराधी को ही धरेगा? इसमें वही पुलिसवाले काम करेंगे जो आम तौर पर किसी को भी उठाकर टॉर्चर करने के लिए बदनाम हैं। अब क्योंकि ये स्क्वैड अधेड़ उम्र के लोगों और लड़कियों के परिवार को ठीक लग रहा है तो वो असल बात मिस कर रहे हैं पर जो लोग योगी एंड टीम की बातें लगातार सुनते और समझते आ रहे हैं वो जानते हैं कि महिला सुरक्षा के नाम पर दरअसल क्या रोकने की कोशिश हो रही है? और रोकने की क्या.. वो खतरा तो खुद हिंदूवादियों ने चिल्ला-चिल्लाकर खड़ा किया और अब उस आभासी खतरे के खिलाफ एक स्क्वैड भी खड़ा किया है। तालियां बजाइए कि घर में तालिबान हुआ है। जो काम बजरंग दल और शिवसेना के ज़िम्मे था वो अब यूपी पुलिस से कराइए। छेड़छाड़ या किसी और तरह के अपराध की रोकथाम से भला किसको इनकार होगा मगर उसके नाम पर शुरू हुई मोरल पुलिसिंग को आप एक हद के आगे बढ़ने से रोक नहीं सकेंगें। जिस दिन वो आपके घर पहुंचेगी तो आप वैसे ही पोस्ट लिखेंगे जैसे नोटबंदी में घाटा होने पर सरकार के खिलाफ लिखने लगे थे। तब तक आप सरकार के साथ हैं क्योंकि आप नोटबंदी से पहले बहुत मसलों पर भी थे और अब ज़रा सा उबरते ही फिर किसी भी तरह से कदमताल करने लगे हैं। शुभकामनाएं।

Arun Yadav तब राष्ट्रवाद की डोर पकड़कर द गाल फ्रांस का राष्ट्रपति बना था। छात्र, मजदूर और लेखकों का आंदोलन उफान पर था तथा प्रसिद्ध दार्शनिक ज्यॉ-पाल सार्त्र ने इनका नेतृत्व संभाला। द गाल को सलाह दी गई कि सार्त्र को गिरफ्तार किया जाए। समझदार राष्ट्रपति द गाल ने कहा कि सार्त्र की गिरफ्तारी पूरे फ्रांस की गिरफ्तारी होगी, ऐसा नहीं होगा। सत्ता द्वारा साहित्य को दिया गया यह बहुत बड़ा सम्मान था। राष्ट्रवाद की डोर पकड़कर सत्ता पर काबिज होनेवाले सत्तासीनों को द गाल से सबक लेना चाहिए और देश में दाभोलकर, पनसारे और कलबुर्गी की हत्याएँ बंद होनी चाहिए।

Bijendra K Singh दूध का जला छाछ को भी फूंक कर पीता है… लेकिन यशवंत जी ने जमीन की बात की है… सच्चाई भी है… ईव टीसिंग भी सच्चाई है… लव जिहाद भी… BBC की तो पूरी डॉक्युमेंट्री है… जै जै, अब सिटियाबाज लौंडो की खैर नहीं है, वाकई लोग योगी के इस कदम को उपयोगी बताते हुए सराह रहे हैं।

Shrikant Asthana आपसे सहमत हूं। मुद्दे से भी बहुत असहमत नहीं हूं कि शोहदे-लफंगे समस्या हैं पर सारे लड़के-लड़कियां तो लफंगे नहीं हैं! जिस तरह से इस मसले का इम्प्लीमेंटेशन हो रहा है वह बहुत खतरनाक है। भाई-बहन भी एक साथ निकलते हुए डर रहे हों तो उस स्थिति को सहज या अच्छा तो कतई नहीं माना जा सकता।

Arvind Kumar ये वो लडके है जिनके लिए मुलायम सिंह यादव जी ने कहा था कि लडके हैं गलती हो जाती है

Nagendra Singh हर बात का विरोध ठीक नही सही को सही और गलत को गलत कहने दम होनाचाहिए।

Shanu Shrivastava आप हमेशा बेबाक और सच ही क्यों लिखते हैं सर। सैलूट। वैसे लिखते रहिये। कुछ लोग ही तो हैं जो आज भी भीड़ का हिस्सा नही बने।

Shambhunath Nath सोलह आना ग्राउंड रिपोर्ट।

पंकज कुमार झा सुंदर … अब तक का सबसे बेसी समझदार पोस्ट.

Nakul Chaturvedi ये हुई न बात..

Anshuman Shukl एक दम सही लिखे हो। हद दर्जे की बदतमीजी हो रही थी और किसी का डर भी नहीं था। अब डर तो होगा।

अवधेश पाण्डेय 🙂 Sir… aapke charan kahan hain….

Shivmangal Singh साहब बच्चियों के उत्पीड़न की पराकाष्ठा हो गयी थी

Michal Chandan बेहतरीन आंकलन है आपका।

Arun Khare सौ टका सही

Purushottam Asnora सोलह आने सच.

Ranjeet Chaudhary Sahi tarkaaa

Vibhuti Narain Chaturvedi सत्य वचन । # Yashwant Singh

Sneha Mishra true sir

Abhay Ashish Jain Aap ki baat mai dum hai

Awadhesh K. Yadav सही पकड़े है।

Prakash Singh Yahi sach hai …

Harsh Kumar आप तो ऐसे ना थे?

Taukir Alam Sahi bat

Vishal Ojha ये सही ठोके आप

Raghab Jha बिल्कुल सही।

Mayank Pandey Pahlee bar samajhdaari ki baat… Jai jai

प्रयाग पाण्डे सौ आना सच।

Ashok Aggarwal दमदार

Anupam Srivastava first time your bhadas on right dirction

Amit Singh सत्य वचन।

Kamlesh Kumar O Positive ज बात खरी खरी जानेमन कहीन

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राजदीप सरदेसाई को अपमानित कर मुकेश अंबानी ने पूरे चौथे खंभे की औकात बता दी (देखें वीडियो)

Yashwant Singh : देश के सबसे धनी आदमी मुकेश अंबानी का देश के सबसे वरिष्ठ पत्रकारों में से एक राजदीप सरदेसाई ने इंटरव्यू किया. राजदीप बातचीत की शुरुआत मुकेश को देश के सबसे प्रभावशाली / ताकतवर शख्स के रूप में बताते हुए करते हैं और इस पर प्रतिक्रिया मांगते हैं तो इसका जवाब मुकेश अंबानी बहुत घटिया और अहंकारी तरीके से देता है. मुकेश अंबानी का जवाब और उसका अहंकार देख सुन कर एक समझदार आदमी सिर्फ स्तब्ध ही हो सकता है.

इन बनियों की नजर में पत्रकार और मीडिया की औकात कुछ नहीं होती है, क्योंकि ये पूंजी के बल पर मीडिया मालिकों को ही खरीद लेते हैं या फिर पूरे मीडिया हाउस का अधिग्रहण कर लेते हैं. ऐसे में जाहिर है ये किसी की परवाह क्यों करें, खासकर पत्रकार की. लेकिन ये इतने भद्दे, घृणित, जाहिल, असंस्कारी और उद्दंड हो सकते हैं, इसका अंदाजा कतई नहीं था. इस वीडियो में इंटरव्यू का वो वाला हिस्सा भी है जिसमें राजदीप सरदेसाई को मुकेश अंबानी नीचा दिखाने के लिए ‘मैं आपको सीरियसली नहीं लेता हूं’ टाइप की बात कहता है. वीडियो के शुरू और लास्ट में मेरा थोड़ा-सा भाषण है, क्योंकि वीडियो देखकर मन में भड़ास इकट्ठी हो गई तो सोचा एक नया वीडियो बनाकर इसे निकाल ही दूं.

ध्यान रखें, जो जब बुरा करे, उसे खूब गरियाइए, दौड़ा दौड़ा कर गरियाइए, लेकिन इस वीडियो में तो सिर्फ और सिर्फ मुकेश अंबानी की नीचता व अहंकार दिख रहा है. हां, राजदीप जरूर अपनी शालीनता और पेशे की गरिमा बनाए रखते हैं और बिलकुल रिएक्ट नहीं करते हैं. सच में राजदीप सरदेसाई को सैल्यूट करने का मन करता है. मुकेश अंबानी ने अपनी नीचता इस इंटरव्यू के जरिए दिखा दी है.

वीडियो देखने के लिए लिंक नीचे क्लिक करें :

https://www.youtube.com/watch?v=FArsyPA4fHs

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के उपरोक्त एफबी स्टेटस पर आए कुछ प्रमुख कमेंट्स इस प्रकार हैं…

उरूज बानो Is vedio me volume bahut kam h sir..dono ki batcheet samjh nhi aa rahi

Dushayant Shaarma यशवन्त जी, जो जिस लायक होगा उसी हिसाब से डील होगी. सीधी सी बात है मुकेश अंबानी खरीददार है और राजदीप बिकायु है, अब आप इन दोनों से और क्या उम्मीद कर सकते हैं. इस लिए आप जैसे हैं वैसे ही मस्त रहिये

Yashwant Singh मुकेश अंबानी ने तो मोदी जी को भी खरीद लिया है, जियो का विज्ञापन करते हैं, मतलब मोदी जी भी बिकाऊ हैं?

Yashwant Singh आपको पता होना चाहिए कि आईबीएन7 और सीएनएन आईबीएन जब बिक गया था तो राजदीप वगैरह ही थे जो अंबानी के दबाव को खारिज करके खबरें दिखाते थे जिसके कारण उन्हें चैनल से निकाल दिया गया. किसी को यूं ही बिकाऊ नहीं कहना चाहिए वरना भक्तों दासों की कैटगरी में आएंगे. अंबानी देश के बड़े उद्योगपति हैं, उन्हें देश के एक बड़े पत्रकार का सम्मान करना चाहिए था, भारतीय संस्कार यह सिखाता है. वैसे भी जो पेड़ जितना फलदार होता है, उतना झुकता भी है.

Dushayant Shaarma थोड़ा असहमत हूँ भाई, सिर्फ मोदी का विरोध करने से कोई न्यूट्रल पत्रकार कैसे हो सकता है. पत्रकार वो है जो अच्छी बातों की तारीफ करे और गलत बात का विरोध करे. लेकिन राजदीप उन पत्रकारों की श्रेणी में है जो सिर्फ मोदी विरोध को असली पत्रकारिता समझते हैं. माफ़ कीजियेगा मैं आपसे इस मामले में असहमत हूँ

Manmohan Bhalla जब चैनल न्यूज़ की जगह व्यूज़ दिखाने लगें तो वास्तविकता की सार्थकता लुप्त होने लगती है ।।।।।  लेकिन दुर्भाग्य से यही सब आज की पत्रकारिता का स्वरूप बन चुका है

सुबोध खंडेलवाल पूरे इंटरव्यू में मुझे कही भी मुकेश अंबानी अहंकारी नजर नहीं आए उलटा राजदीप अति उत्साही दिखते रहे। यदि कोई किसी पत्रकार को सीरियसली नहीं लेता तो इसमें मीडिया के अपमान की बात कहाँ से आ गई? आपने एक सवाल किया सामने वाले ने इसका जवाब दिया। अब उसका जवाब कैसा हो क्या ये भी सवाल पूछने वाला तय करेगा यशवंत भाई? और वैसे भी राजदीप का सिर्फ ब्रांड बड़ा है उनका वैचारिक स्तर देखना हो तो राज ठाकरे के इंटरव्यू देख लीजिए। दो साल पहले पूछे गए सवाल दो साल बाद दोहरा रहे थे। दोनों इंटरव्यू में राज ठाकरे गरियाते रहे और राजदीप मिमियाते रहे

Yashwant Singh हम मीडिया के आदमी हैं और मुकेश अंबानी जैसा अगर हमारे किसी साथी का अपमान करेगा तो उसकी ऐसी की तैसी.

सुबोध खंडेलवाल गुरु महाराज आप जिस पत्रकार के अपमान की बात कर रहे हो पहले उससे तो पूछ लो उसे अपमान लगा या सम्मान लगा? और अपमान लगा तो खुद अपनी बौद्धिकता से उस पूंजीपति को वही जवाब क्यों नहीं दिया ?

Yashwant Singh सुबोध खंडेलवाल ha ha ha, बात तो सही कही आपने

अविनाश विद्रोही यशवंत भाई एक बात बताओ अम्बानी क्यों न बतमीजी करे देश का सबसे शक्तिशाली यानी प्रधान मंत्री तक उस से पूछ कर फैंसला लेता है लगभग 18 चैनल के करीब उसके अपने है और बाकियों पर उसके विज्ञापन ,किस की इतनी ओकात है आज के समय में जो मुकेश अंबानी के खिलाफ एक भी खबर चलाए या उसके विरुद्ध आवाज़ बुलंद करे ,अहंकार आना स्वाभविक है ।

Prafulla Nayak इसके लिए ऑफर किसका था।
अम्बानी का या पत्रकार का।
इस पर ही पूरा किस्सा निर्भर है
कि इंटरव्यू देने अम्बानी गये थे या इसके लिए पत्रकार साहब कई महीनों से प्रयासरत थे।
वैसे यह भी याद होगा पीएम् मोदी की पहली यूएस यात्रा के दौरान इनके क्या सवाल थे और जनता का क्या मूड था।
वो वीडियो भी यू ट्यूब पर है।

Yashwant Singh हम मीडिया के आदमी हैं और मुकेश अंबानी जैसा अगर हमारे किसी साथी का अपमान करेगा तो उसकी ऐसी की तैसी.

Prafulla Nayak पर जवाब अधूरा है बॉस

Yashwant Singh स्टैंड लेना सीखिए. वीडियो देखिए. मुकेश अंबानी की हरकत निंदनीय है. बाकी अपने घर का झगड़ा हम लोग लड़ते सुलझाते रहेंगे. अंबानी की साकानाकामाका.

Prafulla Nayak गये यह थे
या या यह इन्हें बुलाया गया था?
स्टैंड अपनी जगह है।
साइड में।

Yashwant Singh गांड़ मराने गए थे. बस. अगर वीडियो देख के समझ नहीं आ रहा कि एक पत्रकार इंटरव्यू ले रहा तो आपसे बतियाना बेकार. बाई द वे, आप पत्रकार हो या नहीं? अगर नहीं हो तो आपको नहीं समझ आएगा.

Prafulla Nayak कौन गया था
अपनी लाल कराने बॉस।
नाराज़ मत होइए।

Yashwant Singh अप्रासंगिक सवाल. पत्रकार एसाइनमेंट पर ही जाता है. आपको अगर बेसिक समझ नहीं है तो क्या बात की जाए.

Prafulla Nayak साहब, हम अनपढ़
आप ज्ञानी
लेकिन बेसिक आप बता नहीं रहे हैं।
One वे।
यातायात।

Ankit Mathur भाई साहब नब्बे प्रतिशत मीडिया हाउस के मालिकाना हक प्राप्त करने के पष्चात अगर एक अदना से पत्रकार को दिये गये साक्षातकार में अहंकार झलका देता है अम्बानी तो क्या गलत करता है! आखिर मालिक है!

Suneet Upadhyay फेसबुक पर अम्बानी की ऐसी तैसी लिखने वालों को भी कौन सीरियस लेता है 🙂

Pawan Kumar Upreti इसमें अंबानी की क्या गलती है यशवंत भाई, जनता के बीच में चौड़ा होकर घूमने वाले पत्रकार नेताओं के तलवे चाटते फिरेंगे, दलाली करेंगे, सिर्फ अपना हित सोचेंगे, चाहे पत्रकारिता में बाकी मर रहे हों, ऐसे में वे अपने संपादक और मालिकानों की गालियां सुनने को अभिशप्त रहेंगे, जैसा लगभग सभी मीडिया संस्थानों में हो रहा है।

Yashwant Singh हम मीडिया के आदमी हैं और मुकेश अंबानी जैसा अगर हमारे किसी साथी का अपमान करेगा तो उसकी ऐसी की तैसी.

Awadhesh Mishra में आपकी बात से बिलकुल भी सहमत नहीं हूँ यशवंत भाई .. ये आपके बिचार हो सकते है .

सुबोध खंडेलवाल यशवंत भाई ये वो ही राजदीप है जिन्होंने यूपीए सरकार के समय आईबीएन चैनल में कैश फॉर वोट का स्टिंग आपरेशन करके ऐनवक्त पर स्टोरी ड्रॉप कर दी थी। क्यों की थी ये आप भी जानते हो, समझते हो। फिर भी याद दिलाता हूँ यूपीए सरकार ने लेफ्ट की समर्थन वापसी के बाद कुछ भाजपा सांसदों को पैसा देकर सदन से गैर हाजिर रहने का सौदा किया था। भाजपा सांसदों ने इस पूरी पेशकश और सौदेबाजी का स्टिंग ऑपरेशन राजदीप और आशुतोष से करवाया था। ये तय हुआ था कि सदन की कार्रवाई शुरु होने के पहले आईबीएन इसका प्रसारण करेगा लेकिन राजदीप की निष्ठा मीडिया के सिद्धांतों और लोकतंत्र के प्रति नहीं नोट की थैलियों की तरफ झुक गई। चैनल ने स्टिंग दिखाया ही नहीं। फिर सरकार को बेनकाब करने के लिए भाजपा सांसदों ने सदन में उनको दी गई नोटों की गड्डियां लहराई थी। इसके बाद भी आप चाहे तो राजदीप का प्रशंसा गान जारी रख सकते है। मुझे आपसे और आपको मुझसे असहमत होने का पूरा अधिकार है।

Yashwant Singh हम मीडिया के आदमी हैं और मुकेश अंबानी जैसा अगर हमारे किसी साथी का अपमान करेगा तो उसकी ऐसी की तैसी.

सुबोध खंडेलवाल Haahaahaa यदि मैं आपको कह दू कि मैं आपको सीरियसली नहीं लेता तो क्या इसका मतलब ये है कि मैंने आपका अपमान कर दिया ? मतलब ये जरूरी है कि हर आदमी राजदीप को सीरियसली ले ? या ये जरूरी है कि अंबानी उन्हें सीरियसली ले ? आपके लिए महत्वपूर्ण क्या है ? ये कि मुकेश अंबानी उन्हें सीरियसली ले या ये कि वो ईमानदारी से पत्रकारिता करे। राजदीप ने इंटरव्यू की शुरुआत ही तलवे चाटने से की । ये क्यों कहा कि मेरे साथ देश के सबसे पावरफुल व्यक्ति है ? ये कहकर राजदीप ने खुद को छोटा और मुकेश अंबानी को बड़ा दिखाने का अति उत्साह दिखाया । यदि राजदीप में सेन्स ऑफ़ ह्यूमर और प्रेजेंस ऑफ़ माइंड होता तो वो अंबानी को करारा जवाब दे सकते थे पर वो तो अंबानी के पास बैठकर गदगद हो रहे थे।ऐसा लग रहा था जैसे कोई बड़ी उपलब्धि हासिल कर ली है।

Mahesh Gupta यशवंत जी इसमें किसी की जाति से क्या लेना देना है जो आप जाति पर गालि दे रहे है

Yashwant Singh बनिया जाति को नहीं बल्कि बनियाटिक प्रवृत्ति यानि बनियावाद को गरियाया जा रहा है.

Mahesh Gupta आपने साफ शब्दों मे बनिया जाति का उल्लेख कर उनको बेइज्जत करने का घृणित कार्य किया है

सुबोध खंडेलवाल यशवंत भाई अपनी सृजनात्मकता से व्यापार करने और दूसरों को रोजगार देने वाला हर इंसान बनिया है। चाहे वो रिलायंस वाला मुकेश अंबानी हो या भड़ास वाले यशवंत भाई।

Aanand Singh अम्बानी ने कहा कि वह नहीं मानते कि वह सबसे ताक़तवर हैं। तो इसमें क्या अहंकार है?

Yashwant Singh लगता है कोई आप दूसरा वीडियो देख आए. वह अगर यही कह रहा है तो फिर तो ये पूरी पोस्ट ही बेकार है. धन्य हैं.

Aanand Singh मैंने कहा सुनाई या तो ठीक से नहीं दे रहा है यशवंत जी।

Aanand Singh या तो साफ़ सुनाई नहीं दे रहा! आप मूल बातचीत की यथावत लिंक दीजिए न!

Yashwant Singh उस बातचीत में भी इतना ही है. बाकी तो दूसरे सवालों का सामान्य जवाब है. ताकतवर वाले सवाल के जवाब में अंबानी कह रहा कि मैं तुम्हें सीरियसली नहीं लेता.

Aanand Singh मैंने दोबारा सुना । वह पहले प्रश्न का यह उत्तर देते हैं कि मैं नहीं मानता । और मैं आपको सीरियसली लेता नहीं। इसका अभी फ़िलहाल आशय इतना ही है कि जो बात आप कह रहे हैं उसे नहीं मानता । आपके इस प्रश्न को मैं गंभीर प्रश्न नहीं मान रहा। मेरी धन्यता…

Yogesh Garg पूँजी को सलाम कर रहे है राजदीप फिर कैसा अपमान?

पूजन प्रियदर्शी सीरियसली नहीं लेते तो इंटरव्यू भी नहीं देते।

सुबोध खंडेलवाल गुरु महाराज यशवंत जी आप जिस पत्रकार के अपमान की बात कर रहे हो पहले उससे तो पूछ लो अंबानी की बात उसे अपमानजनक लगी या सम्मानजनक ? और यदि अपमानजनक लगी तो तो खुद अपनी बौद्धिकता और प्रखरता से उस पूंजीपति को वही जवाब क्यों नहीं दिया ? वैसे राजदीप की बॉडी लैंग्वेज तो ऐसी लग रही थी मानो अंबानी के पास बैठकर उन्होंने बड़ी उपलब्धि हासिल कर ली है

Sunil Bajpai ::पत्रकार ::
हम तो भइया सब करते हैं।
पत्रकार कहलाते।
बिना सुरा के हम ना रहते
कच्ची भी पा जाते
हम तो भइया सब करते हैं।
पत्रकार कहलाते -१

ऐसा कोई भ्रष्ट नहीं है।
जो ना मुझको पास बुलाये।
कुत्तों सा दुत्कारे मुझको
लेकिन बोतल रोज दिलाये।।
कसम ईश की खाकर कहते
तलवे चाटे जाते।
हम तो भइया सब करते हैं।
पत्रकार कहलाते -२

पहले तो हालत खराब थी।
और ना थी पहचान
जबसे पत्रकार कहलाया
आलीशान मकान
इसी लिए तो हम भी जमकर
भ्रष्टों की महिमा गाते।
हम तो भइया सब करते हैं।
पत्रकार कहलाते -३

ऐसा कोई लाभ नही है
जो है नही उठाया
तलवे चाट चाट कर उनके
लाखों माल कमाया।।
बिना सुन्दरी के सच मानों
हम भी ना सो पाते।।
हम तो भइया सब करते हैं।
पत्रकार कहलाते- ४

अगर आप से लाभ मिले तो
जो चाहो कर देंगे।
रातों को रंगीन करो तो
मां – बहने भी देंगे – 5

इसीलिए तो सब कुछ पाकर
उढ़े गगन में जाते।
हम तो भइया सब करते हैं।
पत्रकार कहलाते -७

सुनील बाजपेयी

Thakur Sujan Singh Sikarwar Yashwant Singh bhai rajdeep ka itna paksh lena aap per sak ho raha h…. Rajdeep koi dudh ka dhula nhi h

Surendra Mahto Kushwaha Rajdeep jaise ke kiye shalinta waise hi hai jaise pakistaniyo ke hamdardi….kahe ka shalinta jo khaate india ka hai aur din bhar secular ke aad me india ko aur hindu ko girane ka ek v mouka nhi vhhodate hai…god job Ambani

Maninder Singh Sumit awasthi amish devgan sudhir chowdhry rohit sardana deepak chourasiya mukesh ambani ke puppet hai

Kamal Kumar Singh इसको तो मै भी सीरियसली नहीं लेता,मै कौन सा आमिर या घमण्डु हु।  😀

Yashwant Singh सुधीर चौधरी को सीरियसली लेने वाले राजदीप को क्यों लेंगे? हालांकि मेरा कहना है कि पत्रकारिता को बेहद उदात्तता से देखना चाहिए. कोई भाजपाई विचार का है, कोई कांग्रेसी, तो कोई वामी तो कोई आपिया तो कोई व्यापारी विचार का है तो कोई दलाल टाइप है. राजनीति में जो जो लक्षण दिखते मिलते हैं वो सब मीडिया में भी है, इसलिए किसी एक को पूरा खारिज या पूरा स्वीकार करने की प्रवृत्ति से बचना चाहिए. सबकी अच्छाइयों बुराइयों का तार्किक विश्लेषण करना चाहिए और जिसका जो अच्छा हो उसकी तारीफ, जो बुरा हो उसकी आलोचना की जानी चाहिए.

Kamal Kumar Singh हा हा हा। क्या हुआ सुधीर आपके जमात का नहीं ? वो पत्रकार नहीं ? 😀

Yashwant Singh यही तो कह रहा हूं कि सुधीर के साथ भी अगर मुकेश अंबानी ने ऐसी हरकत की होती तो भी मैं मुकेश अंबानी को गरियाता. बात स्टैंड लेने की है. लेकिन आप बता रहे हैं कि मैं भी राजदीप को सीरियसली नहीं लेता. यह दिखाता है कि आपकी भक्त टाइप सोच में अंबानी ने जो हरकत की वो कुछ नहीं, हां आपके जो पूर्वाग्रह हैं राजदीप के प्रति वो यथावत कायम है, अभिव्यक्त हो रहा है.

Kamal Kumar Singh आप चाहे कितना नाराज हो ले, सच तो ये है स्युडो लोगो का चेहरा बेनकाब होने के बाद कोइ भी उन्हें सीरियसली नहीं लेता। मैं भी नहीं। मै कौनसा अम्बानी का पोंछ हु भैया? :D…हाँ , सिरियस मैं सुधीर को भी नहीं लेता। रोहित सरदाना को जरूर लेता हूँ।

Mahesh Singh यशवंत जी मेरे हिसाब से अम्बानी ने कोई गलती नहीं की और कही से वे अशालीन नहीं दिखे बल्कि मुझे सरदेसाई जी या तो जरुरत से ज्यादा चापलूसी या महिनी करते नजर आये जो एक धूर्त आदमी करता है

Dhyanendra Tripathi यशवंत भाई, आप नि:संदेह एक प्रखर मीडिया विश्लेषक और उसकी निगहबानी करने वाले स्वयंसेवक भी है, पर पूरी विनम्रता के साथ कहना चाहता हूं कि मुकेश जी इस साक्षात्कार में कहीं से अहंकारी नज़र नहीं आ रहे. हॉं .. राजदीप जी के सवाल पर उनका ये कहना कि वो उन्हे सीरियसली नहीं लेते का निहितार्थ और भावार्थ शायद उनकी निर्दोषिता को इंगित करता है. वो राजदीप जी से ये कहना चाहते हैं कि वो सबसे ताकतवर शख्सीयत नहीं हैं. यह कहने में उनका लहजा जो भी रहा हो उससे आप कुछ भी निष्कर्ष निकाल सकते हैं पर इसमें अहंकार वाली बात कतई तौर पर नहीं है. मुकेश जी शायद बातचीत में इतने धूर्त और अभिजात नहीं बन पाये हैं कि उनके जवाब बड़े रेटोरिक हों. हॉं जो देश का सबसे धनवान व्यक्ति है, उसमें कुछ खास और अलग तो होगा ही और वो सामने भी आयेगा. आप एक बार उनसे मिल लीजिये, दावा है कि आप का नजरिया बदल जायेगा.. गरियाने के त्वरित नतीजे पर हर बार पहुंचना न्यायसंगत नहीं भाई..

Mahesh Singh यसवंत जी यदि सरदेसाई जी आपको कहे की you are the father of journalism तो आप क्या उत्तर देगे

Yashwant Singh तो मैं कहूंगा ये आपका अनुचित विश्लेषण है, लेकिन इतनी ज्यादा महानता बख्शने के लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद 😀

Mahesh Singh निःसंदेह

Nakul Chaturvedi राजदीप में न जाने कौन सी बात ख़ास लगती है आपको.. राजदीप के इंटरव्यू की शुरुआत ही ओछी थी… बाकी का फिर क्या हाल होगा.. इतना समझदारों को समझ आता है..

Yashwant Singh ये इंटरव्यू का तरीका होता है नकुल जी. पता नहीं आप पत्रकार हैं या नहीं. इंटरव्यू का एक तरीका यह होता है कि हलके फुलके सवाल से शुरू करें और गंभीर सवाल की तरफ जाएं. शुरुआत हलके फुलके से इसलिए की जाती है ताकि माहौल टेंस न रहे, इंटरव्यू देने वाला सहज फील करे. बाकी राजदीप का जितना विरोध मैंने किया है, वो आपने न तो पढ़ा होगा न सुना होगा, इसलिए कोई सफाई नहीं दूंगा. सोच तब गड़बड़ होती है जब हम अपने पूर्वाग्रह के चश्मे से लगातार चीजों को देखते रहते हैं. अगर अंबानी ने ये हरकत सुधीर चौधरी के साथ की होती तो भी मैं इसी तरह से अंबानी को गरियाता क्योंकि मसला मीडिया जैसे चौथे खंभे के प्रतीक किसी वरिष्ठ पत्रकार को पूरी तरह नान सीरियस बताकर पूरे पेशे की गरिमा को खारिज करने का है.

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यशवंत का विकास, ब्रह्मांड और अध्यात्म चिंतन

Yashwant Singh : ब्रह्मांड में ढेर सारी दुनियाएं पृथ्वी से बहुत बहुत बहुत पहले से है.. हम अभी एक तरह से नए हैं.. हम अभी इतने नए हैं कि हमने उड़ना सीखा है.. स्पीड तक नहीं पकड़ पाए हैं.. किसी दूसरे तारे पर पहुंचने में हमें बहुत वक्त लगेगा.. पर दूसरी दुनियाएं जो हमसे बहुत पहले से है, वहां संभव है ऐसे अति आधुनिक लोग हों कि अब वे टेक्नालजी व बाडी को एकाकार कर पूरे ब्रह्मांड में भ्रमण कर रहे हों, कास्मिक ट्रैवल पर हों…उनके लिए हमारे रेडियो संदेश इतने पिछड़े हों कि वे उसे इगनोर कर दें या पढ़ कर जवाब दें तो उस जवाब को समझने में हमें सैकड़ों साल लग जाएं….

जरूरी नहीं कि जीवन वहीं हो जहां कार्बन हो… कार्बन विहीन लेकिन सिलिकान बहुल दुनियाओं में भी जीवन है और वहां के जीवन फार्मेट, पैरामीटर, शक्ल-सूरत अलग है… दूसरी दुनियाओं को समझने के लिए जिंदा होने की अपनी परिभाषा को फिर से परिभाषित करने की जरूरत है. बेहद ठंढे और बेहद गर्म दुनियाओं में जीवन है… जीवन बहुत मुश्किल से मुश्किल स्थितियों में बहुत कम एनर्जी से भी कायम रह पाने में संभव है… सरवाइवल के लिए इंटेलीजेंस का होना जरूरी नहीं है… सरवाइवल बेहद मुश्किल हालात में बहुत कम एनर्जी से भी संभव है… जीवन पनपने के जो मूलभूत आधार धरती के लिए अनिवार्य हों वही अन्य दुनियाओं के लिए होना जरूरी नहीं…

धरती पर जो कुछ भी है वह दूसरी दुनियाओं से आया हुआ है.. हम मनुष्य खुद भी यहां धरती के नहीं हैं… हमारा सब कुछ स्टार डस्ट से बना है… यहां लोहा से लेकर कार्बन तक दूसरी दुनियाओं के उठापटक विस्फोट संकुचन के जरिए गिरता उड़ता गलता सुलगता फटता हुआ आया है… ऐसा संभव है कि ब्रह्मांड कि किसी दूसरी उन्नत दुनिया में कोई सुपर इंटेलीजेंट सुपर डेवलप सभ्यता हो जिसके सामने हम बच्चे ही नहीं बल्कि बिलकुल नए हैं.. वे हम पर नजर रखे हुए हों… ऐसा संभव है कि पूरे ब्रह्मांड के संचालन में कुछ बेहद समझदार और बेहद प्राचीनतम जीवन – सभ्यता का हाथ हो, जिन्हें हर तारे के बुझने, जन्मने, फटने, हर ग्रह और उपग्रह पर जीवन के पैदा होने व नष्ट होने का सही सही हिसाब पता हो… और इस कारण वे अपने को अपनी बेहतरीन तकनीक के जरिए, कास्मिक ट्रैवल के माध्यम से एक तारे से दूसरे तारे या एक ग्रह से दूसरे ग्रह या एक दुनिया से दूसरी दुनिया या एक गैलेक्सी से दूसरी गैलेक्सी या एक प्लानेट से दूसरे प्लानेट में शिफ्ट कर लेने में सक्षम हों…

जीवन की जो परिभाषा हमने गढ़ रखी है, वह काफी संकुचित और स्थानीय है. अदृश्य में भी जीवन संभव है, स्थिर में भी जीवन संभव है.. हमने इंटेलीजेंट एलियन्स को लेकर अपने मन-मुताबिक धारणाएं, तस्वीरें, कहानियां पाल रखी हैं.. वो दूसरी दुनियाओं में वहां के माहौल के हिसाब से बिलकुल अलग तरीके के जीवित हो सकते हैं जिन्हें संभव है हम जिंदा ना मानें…

डिस्कवरी साइंस चैनल पर यूनीवर्स को लेकर कई तरह के प्रोग्राम आते रहते हैं जिससे मिले ज्ञान के कुछ अंश की कड़ियों को अक्रमबद्ध रूप से जोड़ने-तोड़ने-मरोड़ने की कोशिश 🙂 .. और इसी प्रक्रिया में उपजी ये चार लाइनें…

हर रोज खुद को तुम को सब को बड़े आश्चर्य से निहारता हूं
हर रोज ज़िंदगी होने, न होने के बीच के थोड़े मायने पाता हूं
हर रोज अपने अंदर-बाहर के दुनियादारी से दूर हुआ जाता हूं
हर रोज कुछ नया कुछ चमत्कार सा हो पड़ने का भ्रम पाता हूं

जैजै

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उपरोक्त तस्वीर को फेसबुक पर ”आजकल मेरी हालत ऐसी है” शीर्षक से डाला तो तरह तरह के कमेंट्स की बाढ़ आ गई. कमेंट व लाइक के लिए शुक्रिया. हंसने, मजाक मानने और मुझको मजाक समझने के लिए भी शुक्रिया. असल में यह तस्वीर देखकर मेरे दिमाग में जो बात तत्काल आई उसे आपके सामने रखना चाहता हूं.. जो इस प्रकार है….

हरे-भरे खेत-खलिहान, बाग-बगीचे, नदी-तालाब, फूल-पौधे, तारे-आसमान सब छोड़कर जब हम कहीं दूर चल पड़े तो कंकड़-पत्थर, धुआं-प्रदूषण, शोर-अशांति, भागमभाग-भीड़, एक खास किस्म के जानवरों यानि आदमियों की रेलमपेल के बीच फंस गए और उसमें जिंदा बचे रहने के लिए जो संघर्ष शुरू हुआ, उसका कोई अंत नहीं… हर दिन कुछ नष्ट होते जाने, कमजोर होते जाने, हारते जाने का भाव मन में बढ़ता गया…

हम मनुष्यों ने खूब विकास किया है, खूब तरक्की की है वाले डायलाग के उलट इस दुनिया का सबसे ज्यादा नुकसान हम मनुष्यों ने किया है.. और ऐसी स्थिति बना दी है कि सिर्फ हम मनुष्य ही नहीं, हर गैर-मनुष्य भी खुद के सरवाइवल को लेकर असुरक्षित, संघर्षरत, बीमार महसूस करने लगा है…

मैं चेतन हूं, गाड पार्टिकल हूं, आपमें हूं, आपसे इतर जो जिंदा हैं उनमें भी हूं. उनमें भी हूं जो जड़ है और स्थिर है.. सब मिलजुल कर मैं हूं, और यह मैं कोई एक नहीं पूरा ब्रह्रांड है, जिसके अनंत छोटे छोटे मैं यहां वहां जहां तहां बिखरा हुआ है… इसलिए मैं इस स्कूटर में भी हूं, बकरी में भी हूं, मिट्टी में भी हूं, पत्ती में भी हूं, आपमें भी हूं, खुद में भी हूं…
हम फंसे हुए लोग अक्सर महसूस नहीं कर पाते कि हम फंसे हुए हैं क्योंकि कई बार फंसना इतना स्थायी और जन्मना होता है कि हम फंसने को ही सहज-स्वाभाविक मान लेते हैं…
चलिए, मेरे हाल पर हंसिए… पर जरा गौर से देखिए,, कहीं ऐसा तो नहीं कि जो हाल मेरा है, वही हाल तेरा है… 🙂

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पेड़ पत्ती फूल आसमान धूप हवा
तेरी कारीगरी पर फ़िदा हूं दोस्त
इनसे अलग भला मेरा वजूद कहाँ

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की कुछ पुरानी एफबी पोस्ट्स का संकलन. संपर्क : yashwant@bhadas4media.com

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एक औघड़ की आह से तबाह होना ही था अखिलेश राज को!

यूपी में रक्तहीन क्रांति पर भड़ास एडिटर यशवंत की त्वरित प्रतिक्रिया- ‘मीडियाकर्मियों का अंतहीन उत्पीड़न करने वाले अखिलेश राज का खात्मा स्वागत योग्य’

Yashwant Singh : यूपी में हुए बदलाव का स्वागत कीजिए. सपा और बसपा नामक दो लुटेरे गिरोहों से त्रस्त जनता ने तीसरे पर दाव लगाया है. यूपी में न आम आदमी पार्टी है और न कम्युनिस्ट हैं. सपा और बसपा ने बारी बारी शासन किया, लगातार. इनके शासन में एक बात कामन रही. जमकर लूट, जमकर झूठ, जमकर जंगलराज और जमकर मुस्लिम तुष्टीकरण. इससे नाराज जनता ने तीसरी और एकमात्र बची पार्टी बीजेपी को जमकर वोट दिया ताकि सपा-बसपा को सबक सिखाया जा सके.

प्रचंड बहुमत से यूपी में सत्ता पाने वाली भाजपा ने अगर अगले दो साल में शासन करने का ढर्रा नहीं बदला, सपा-बसपा वाली लूट मार शैली से इतर एक नया सकारात्मक कल्चर नहीं डेवलप किया तो 2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी यूपी में थउंस जाएगी यानि ढेर हो जाएगी. मैंने निजी तौर पर अखिलेश यादव और उनकी समाजवादी पार्टी को हराने के लिए अपील किया था क्योंकि इन महोदय के राज में एक पत्रकार जिंदा जला दिया गया, पत्रकार ने मरने से पहले जलाने वाले मंत्री का नाम भी लिया लेकिन उस मंत्री को सत्ता से बेदखल नहीं किया गया. आपको यह भी याद होगा कि अखिलेश यादव ने यूपी में सरकार बनाते हुए मुझे कुछ भ्रष्ट पतित संपादकों और मीडिया हाउसों के इशारे पर उठवा कर अवैध तरीके से 68 दिनों तक जेल में बंद करवाया था.

मेरे बाद भड़ास के तत्कालीन संपादक अनिल सिंह को भी जेल में डलवाया गया. बाद में आफिस और घरों पर छापे डलवाए गए. खैर, हम लोग तो जेल से जश्न मनाते हुए निकले और ‘जानेमन जेल’ नामक किताब लिख डाला. पर फकीर का श्राप आह तो पड़ता ही है. एक औघड़ की आह से तबाह होना ही था अखिलेश राज को! मैंने सपा को वोट न देकर किसी को भी वोट देने की अपील की थी. ढेर सारे लखनवी चारण पत्रकारों और ढेर सारे मीडिया हाउसों के ‘अखिलेश जिंदाबाद’ वाली पेड न्यूज पत्रकारिता के बावजूद अखिलेश यादव को जनता ने दक्खिन लगा दिया.

बीजेपी वाले जश्न बिलकुल मनाएं, लेकिन ध्यान रखें कि जनता ने बहुत बड़ी जिम्मेदारी दे दी है. अब शासन का नया ढर्रा विकसित करना होगा और जंगलराज-लूटराज से यूपी को मुक्ति दिलानी होगी. हम सबकी नजर यूपी की नई भाजपा सरकार पर रहेगी. फिलहाल मोदी और शाह की करिश्माई जोड़ी को बधाई… ये लोग सच में इस लोकतंत्र में वोटों की राजनीति-गणित के शहंशाह साबित हो रहे हैं. जैजै

भड़ास एडिटर यशवंत की एफबी वॉल से. उपरोक्ट स्टेटस पर आए कमेंट्स पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें : YASHWANT FB POST

ये है वो खबर जिसे भड़ास की तरफ से यूपी चुनाव से ठीक पहले एक अपील के रूप में जारी किया गया था…

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यशवंत का भड़ासी चिंतन- पार्ट एक और दो : मनुष्यता से इस्तीफा देने का वक्त आ गया है…

Yashwant Singh : भड़ासी चिंतन पार्ट वन… उम्र और अनुभव के इस नाजुक व कमसिन पड़ाव पर पहुंच कर, फेसबुक को साक्षी मानते हुए, आप सभी के कपार पर अपना हाथ रखकर कसम खाते हुए… होश में रहकर पूरे जोश के साथ ऐलान करना चाहूंगा कि…..

…मनुष्य से बड़ा कमीना, धूर्त, चालबाज, मक्कार, विध्वंसक, स्वार्थी और पाखंडी दूसरी कोई मुंह-हाथ-पैर-पेट वाली प्रजाति नहीं….

…इसलिए मैं खुद को मनुष्य की जगह जानवर, चिड़िया, पंछी, कीड़ा, मकोड़ा आदि प्रजाति में से किसी एक में शामिल करने पर विचार कर रहा हूं…

…तदनुसार अपना धर्म ‘मनुष्यता’ को त्यागकर ‘जानवता’ या ‘चिड़ियाता’ या ‘किड़किड़ाता’ या ‘चहचहाता’ या ‘रेकियाता’ या ‘रेंगियाता’ में से कोई एक अपनाने पर विचार कर रहा हूं….

…और, आप लोगों से अपील करूंगा कि दुनिया के विध्वंस, मनुष्यों के शोषण, जानवरों के खात्मे, जंगल के विनाश, हाथियों के वन विहीन वास, शेरों के जंगल विहीन जीवन, मुर्गों-बकरों के लिए लगातार व सामूहिक उत्सवी कत्लेआम, पर्यावरण के जीवन विरोधी होने के लिए जिम्मेदार मनुष्यों की प्रजाति से इस्तीफा देकर खुद को कोई जानवर या पंछी या चिड़िया या पौधा मान लें, और उसी प्रजाति के हिसाब से जीवन गुजारें….

…मनुष्य के चक्कर और चंगुल में किसी भी रूप (वैचारिक, मानसिक, शारीरिक, सांस्कृतिक) में फंसेंगे तो समझिए कि आपके जीवन का अपव्यय तय है….

…मनुष्य व मनुष्यता के चंगुल में फंसने वाले लोग सदा हींग खाई मुर्गी की तरह बेहद कनफ्यूज भाव से यत्र-तत्र डोलते बकते जीते रहते हैं… और उन्हें खुद समझ नहीं आता कि वे जी डोल बक क्यों रहे हैं…

…मनुष्यों का बनाया वैचारिक जाल जंजाल इतना तगड़ा है कि इससे शायद ही कोई मनुष्य निकल कर मनुष्य व मनुष्यता के निहित स्वार्थी चिंतन से परे उठकर ब्रह्मांड के बुनियादी भावना का एहसास कर पाता है…. क्योंकि मनुष्य ने मनुष्यों के लिए ऐसी व्यवस्था कर रखी है कि दो तिहाई से ज्यादा तो पापी पेट के ऐंठन से उबर नहीं पाते, इसी से उर्जा पाते और इसी में होम हो जाते हैं.. बाकी बचे लोग मनुष्य को न्याय दिलाने और बचाने के चक्कर में बाकी गैर-मनुष्यों का नाश कर जाते हैं.. बाकी बचे लोग मनुष्य को जानवर मानकर उनका भरपूर शोषण व सत्यानाश करते हैं… बाकी बचे लोग मनुष्य मनुष्य कहकर अपनी दुकान चलाते हैं और इस दुकान से होने वाली यश अर्थ पद नुमा लाभ से अपना जीवन सफलता पूर्वक संचालित करते रहते हैं…

…कुछ एक बकचोद, फकीर, नागा, पियक्कड़, गपोड़ी, ऐबी, बनुच्चर, पागल, आलसी, एकांतवासी, असामाजिक, अमानवीय टाइप लोग जीवन के असली दर्शन को बूझ भी जाते हैं तो वे किसी को बता नहीं पाते, या बताना ही नहीं चाहते क्योंकि उनके लिए कोई उनके जैसा श्रोता दर्शक पाठक ही नहीं मिल पाता…. या फिर संभवतः ये भी कि जो चरम सच को, असली मर्म को बूझ जाता है वो खुद में मगन रहता है, उसे किसी और को बताने समझाने का काम उचित नहीं लगता क्योंकि मनुष्य तो निहित स्वार्थी मनुष्यता में पागल है और बेचारे ढेर सारे गैर-मनुष्य तो इन्हीं हरामी मनुष्यों के मारे-सताए हैं…. या फिर ये भी कि जो मनुष्यों के दल दलदल से इस्तीफा देकर जीवन ब्रह्मांड का सच बूझ पाया हो तो फिर वह भला निहित स्वार्थी मनुष्य को क्यों बताए, समझाए.. क्योंकि चालाक व धूर्त मनुष्य को बताने का मतलब है वह मनुष्य आपकी भी फोटो लगाकर मंदिर बनाकर पूजा शुरू कर देगा और इस तरह ढेर सारे मनुष्यों को फांसने बांधने लूटने का एक और उपक्रम शुरू कर देगा…

और ये भी कि जीवन ब्रह्मांड का सच बूझ लेने वाला प्राणी आखिरी सच को किसी गैर-मनुष्य को अच्छे से कनवे कर पाएगा, बिना शब्द के ही, क्योंकि जहां सहजता और उदात्तता है, वहां सब कुछ संप्रेषणीय है.. पर मनुष्य के यहां कहां है सहजता.. वह सहजता भी मनुष्यता के इर्दगिर्द है जो बाकियों के लिए गैर-मनुष्यों के लिए, प्रकृति के लिए असहजता और असंवेदनशीलता का कारण बनता है…

जय हो…

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भड़ासी चिंतन पार्ट दो…

अपने गांव में खेत, हरियाली, धूप, नदी, शांति, अलसाए पशु-पक्षियों की मुदित चपलता, प्राकृतिक कलरवी संगीत के बीच रहते हुए हर वक्त महसूस करता हूं कि ज़िंदगी से मुझे कोई शिकायत नहीं. मैं भाग्यशाली और धनी हूं जो इन अदभुत क्षणों- अकथनीय सुखों का उपभोग कर रहा हूं. प्रकृति मुझे सचमुच अपनी खूबसूरत प्रेमिका सी लगती है जिसे महसूस करते हुए ज्यादा उदात्त और शांत हो जाता हूं… गाने लगता हूं- तुम मिले, दिल खिले, और जीने को क्या चाहिए…

मुझे लगता है कि समाज, सिस्टम, ढेर सारे चिरकुट किस्म के कथित बड़े लोगों, चालाक शासकों, चतुर चारण विद्वानों, मूर्ख चिंतकों, अज्ञानी अध्येताओं आदि इत्यादि ने मिलजुल कर हर किसी के जीवन में इतना शोर, कलह, तनाव, उत्तेजना पैदा कर दिया है कि मनुष्य नार्मल रह ही नहीं सकता. वह प्रकृति को महसूस करने लायक रह ही नहीं जाता क्योंकि वह अप्राकृतिक हो चुका होता है. वह दुखी हो चुका होता है. वह अंतहीन संघर्षों में फंस चुका होता है.

प्रकृति के संगीत को महसूस करने के लिए और इस पर खिलखिलाने के लिए अब जरूरी हो गया है कि खुद को हर लेवल पर सिर के बल खड़ा कर दें… मैं आपको समझा नहीं सकता कि मैं क्या क्या महसूस कर रहा हूं इन दिनों… और कितना अच्छा अच्छा महसूस कर रहा हूं इन दिनों… थोड़ा दुखी हो रहा हूं कि फिर शहर लौटने का वक्त आ गया है… 

भड़ास के एडिटर यशवंत के एफबी वॉल से. संपर्क : yashwant@bhadas4media.com

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सेलरी और बकाया न मिलने पर मीडिया हाउस की पोल खोलते हुए बनाया वीडियो (देखें)

Yashwant Singh : ये मुझे ठीक तरीका लग रहा है. जो संस्थान आपकी सेलरी और बकाया मारे हो, उस संस्थान के गेट पर जाकर अगल बगल घूमते हुए और उसकी पोल खोलते हुए वीडियो बना लीजिए. उसके बाद भड़ास को भेज दीजिए. भड़ास तो बैठा ही है ऐसी खबरों और वीडियोज को जगह देने के लिए. तो आइए, इस क्रम की शुरुआत करने वाले वीडियो को देखते हैं.

इस वीडियो में नेशनल दुनिया नामक अखबार का जिक्र है और इसके मालिक शैलेंद्र भदौरिया का भी उल्लेख है. भदौरिया ने अखबार तो कई जगह से खोले और बंद किए, कुछ जगहों पर अभी चला भी रहा है लेकिन सेलरी देने के नाम पर इसकी नानी मरती है. परेशान हाल मीडियाकर्मी ने जो वीडियो बनाकर अपनी भड़ास निकाली है, उसे देखने के लिए नीचे क्लिक करें :

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से.

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किसी को वोट दे लेना, पर सपा को नहीं… वजह बता रहे भड़ास एडिटर यशवंत

Yashwant Singh : हे मीडिया के साथियों, यूपी चुनाव में सपा को जरूर हराना. वोट चाहे बसपा को देना या भाजपा को या रालोद को या किसी को न देना, लेकिन सपा को कतई मत देना. वजह? सिर्फ पत्रकार जगेंद्र हत्याकांड. अखिलेश यादव के मुख्यमंत्रित्व काल में उनके मंत्री राममूर्ति वर्मा के कहने पर कोतवाल और सिपाहियों ने पत्रकार जगेंद्र को शाहजहांपुर में जिंदा जला दिया था. जगेंद्र ने मजिस्ट्रेट के सामने अपने बयान में मंत्री राममूर्ति वर्मा का नाम लिया था. जगेंद्र ने राममूर्ति के खिलाफ कई खबरें लिखी थीं. मंत्री राममूर्ति तरह तरह से जगेंद्र को धमकाता रहता था. जगेंद्र लिख चुके थे कि मंत्री राममूर्ति उसे मार डालना चाहता है क्योंकि वह उसकी पोल खोलता रहता है.

जिसकी आशंका थी, वही हुआ. मंत्री राममूर्ति के इशारे पर सारा पुलिस प्रशासन जगेंद्र को मारने के लिए जुट गया. बाकायदा घर में घुसकर पत्रकार जगेंद्र पर पेट्रोल डालकर जलाया गया. लखनऊ में भर्ती जगेंद्र ने आईपीएस अमिताभ ठाकुर से लेकर जांच मजिस्ट्रेट तक को हत्यारों के नाम बताए लेकिन अखिलेश यादव ने आजतक हत्यारे मंत्री राममूर्ति वर्मा को बर्खास्त नहीं किया. अखिलेश यादव के युवा होने, इनके स्मार्टफोन देने के वादे, इनके विकास के प्रलाप पर मत जाना. यह अपने खानदान का सबसे काइयां नेता है. परम भ्रष्ट गायत्री प्रजापति से लेकर हत्यारे राममूर्ति वर्मा को पालने वाला यह युवा नेता अगर इस बार खुद के बल पर जीत गया तो समझो इसके राज में वो-वो नंगा नाच होगा जिसकी कल्पना नहीं कर सकते.

लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत जनता द्वारा बेलगाम नेताओं को शाक थिरेपी दिया जाना है. इन्हें पांच साल के लिए सत्ता से बाहर करो ताकि ये आत्मचिंतन और मनन करें. अखिलेश यादव ने पांच साल राज कर लिया. इन्हें पांच साल का ब्रेक दिया जाना चाहिए ताकि थोड़ी ज्यादा समझदारी हासिल कर सकें. अभी जो इन्होंने अपने खानदान से फिक्स मैच खेला है, उससे लॉ एंड आर्डर समेत तमाम सवाल परिदृश्य से बाहर हो गए और अखिलेश की छवि एक नए बहादुर युवा नेता की बना दी गई जो माफियाओं और भ्रष्टाचारियों के खिलाफ है. लेकिन सच्चाई बिलकुल इसके उलट है. यह सारा कुछ मीडिया, मुलायम और अखिलेश द्वारा फिक्स था. अब तो आपको यकीन आ गया होगा जब मुलायम ने साफ साफ कह दिया कि वे अखिलेश और राहुल के लिए प्रचार करेंगे, शिवपाल नई पार्टी नहीं बनाएंगे, वे कभी किसी पर कोई गुस्सा न थे. सपा में आज भी हत्यारे, भ्रष्टाचारी और माफिया नेता-मंत्री अपने पूरे दमखम के साथ मौजूद हैं और साइकिल चिन्ह पर ही चुनाव लड़ रहे हैं. 

तो, हे यूपी के मतदाताओं, खासकर मीडिया के साथियों, मुझ भड़ासी की दिली अपील पर कान धरो, अपने वोट को किसी को भी दे डालो, बस सपा को मत देना. साथ ही सपा को वोट न देने के लिए आप लोग अपने दोस्तों, मित्रों और परिजनों को कनवींस करें. सिर्फ जगेंद्र हत्याकांड की कहानी बताओ. एक पत्रकार को घर में घुसकर जला मारने वाला मंत्री अगर अखिलेश यादव द्वारा बर्खास्त नहीं किया जा सकता तो सोचिए इनके राज में हमारा आपका और आम लोगों का क्या हाल होगा.

बाकी, दिल्ली और लखनऊ के कई बड़े दलाल पत्रकारों के लिखने बोलने पर मत जाना. ये लोग लगातार सपा और अखिलेश का चरण चुंबन करते हुए इनके पक्ष में गायन करते हुए मिल जाएंगे. ये लोग अपने-अपने चैनलों और अखबारों में अखिलेश यादव की छवि बनाते, इन्हें जीतता हुआ दिखाते मिल जाएंगे. इन पर ध्यान मत देना. इन लोगों ने बीते पांच साल में अखिलेश के रहमोकरम से अरबों रुपये कमा चुके हैं और इन्हें नमक का कर्ज तो अदा करना ही है.

99 प्रतिशत मुख्यधारा के मीडिया घराने, जिसमें अखबार और चैनल दोनों शामिल हैं, यूपी की सत्ताधारी पार्टी के रहमोकरम के तले दबे हैं. ये लोग इतना ब्लैक पैसा और नगद विज्ञापन पा चुके हैं कि इन्हें अखिलेश यादव को जीतता हुआ दिखाना मजबूरी है. ये लोग सोची समझी साजिश के तहत सपा के मुकाबले बसपा और भाजपा को कमजोर-कमतर दिखा रहे हैं. मीडिया वालों के पेड न्यूज और पेड सर्वे पर यकीन न करना. अपना दिल दिमाग लगाना. सपा को जरूर हराना. 

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से. उपरोक्त पोस्ट पर आए कमेंट्स पढ़ने के लिए इस पर क्लिक करें : Yash on FB

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दृष्टांत मैग्जीन के जलसे में लखनऊ पहुंचे यशवंत सेहत बनाने में जुटे (देखें वीडियो)

लखनऊ से प्रकाशित होने वाली खोजी पत्रिका ‘दृष्टांत’ के 15 बरस पूरे होने के जलसे में अनूप गुप्ता भाई ने मुझे लखनऊ बुलाकर होटल कंफर्ट इन के जिस 101 नंबर के कमरे में ठहराया, उसके ठीक बगल में जिम था. जीवन में कभी जिम नहीं गया. ज्यादा या कम कभी जरूरत महसूस हुई तो घर बाहर पार्क दुआर खेत में ही कहीं बंदर की तरह कूदफांद भाग कर, रामदेव स्टाइल में फूं फां कर एक्सरसाइज कर लिया. जेल प्रवास के दौरान कई किस्म के एक्सरसाइज एक बंदी योग गुरु ने सिखाए थे, जिसे बाहर के जीवन में अक्सर आजमा लिया करता हूं. इस तरह जिम जाने की नौबत नहीं आई.

लेकिन लखनऊ में होटल के जिस कमरे में रुकवाया गया, उसके ठीक बगल में जिम, और वह भी बिलकुल खाली देखकर मन तो मचलता है जी. एक दो दिन जिम को बाहर से घूरा, थोड़ा अंदर जाकर छुआ देखा. लेकिन तीसरे दिन तो फोन कर रिसेप्शन से किसी इंस्ट्रक्टर को जिम में भेजने के लिए स्ट्रेट फारवर्ड आदेश ही कर दिया. वहां कोई इंस्ट्रक्टर तो होता नहीं सो एक इलेक्ट्रिशिनय पिलास पेंच आदि लेकर हाथ जोड़े आ गया.

मुझे लगा या तो इसका दिमाग गड़बड़ है या मेरा, जिसके पेंच कसते हुए ठीक करने के वास्ते यह उपकरण लिए घूमता हुआ आया है. बेचारा बोला- ”साब जिम में क्यों बुलवाया मुझे”. मैंने कहा ये जो सारी मशीने हैं, इन्हें चला चला के और इन पर कैसे क्या क्या किया जाता है, कर कर के दिखाओ.

वह बेचारा कहां खुद जिम करता है लेकिन उसने आदेश पालन के वास्ते ट्राई मारा. थोड़ा मुझ देहाती का कामन सेंस भी काम आया. हम दोनों गरीब भाइयों ने मिल जुल कर सारी मशीनों को ठोंक पीट हिला डुला कर चला डाला. जब सब कुछ समझ आ गया तो बिजली वाले पिलास पेचकस धारी भइया को प्रणाम सलाम नमस्ते कर जाने को कह दिया और खुद बारी बारी से सभी मशीनों को आजमाने में जुट गया.

तभी आइडिया की बत्ती दिमाग में धड़की कि गुरु काहे नहीं खुद का एक वीडियो बनवा लिया जाए इसी जिम में, एक्सरसाइज करते हुए, ताकि सदा के लिए कहने दिखाने को ये रहे कि अपन भी हाई फाई वाई टाइप आदमी हैं जो जिम आदि करते कराते रहते हैं. वैसे मेरी एक गंदी आदत ये भी है कि जो भी कोई नया काम करूंगा, भले ही एकाध दिन के लिए, उसे डफली बजाकर गाउंगा जरूर और उसे थ्यूराइज करके उसे ऐसा पेश करूंगा जैसे कि अगर किसी ने ऐसा नहीं किया तो उसे न जाने कौन सा नुकसान हो जाएगा. इसे कहते हैं ‘सेल्फ मार्केटिंग’. हिंदी में मैं इसे ‘अप्प दीपो भव:’ कहता हूं 🙂

खैर, आइडिया को अंजाम पर पहुंचाने के लिए अपने साथ होटल के कमरे में रुके गाजीपुर वाले पत्रकार व समाजसेवी मित्र सुजीत सिंह उर्फ प्रिंस को बुलाया. उनने कैमरा थामा और मैंने जिम की मशीनें. बस तैयार हो गया ये वीडियो… देखिए और ऐसे ही आप भी मस्त रहिए, जीवन को जैसा महसूस करेंगे, जीवन वैसा ही है… उस गाने की तरह… पानी से पानी तेरा रंग कैसा… जिसमें मिला दे लगे उस जैसा…  वीडियो देखने के लिए नीचे क्लिक करें…

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भड़ास संपादक यशवंत के बड़े पिता जी श्रीकृष्ण सिंह का निधन

भड़ास4मीडिया के संपादक यशवंत सिंह के बड़े पिताजी श्रीकृष्ण सिंह का कल उनके जिले गाजीपुर स्थित पैतृक गांव में देहांत हो गया. उनकी उम्र 85 साल से ज्यादा थी. उन्हें कोई रोग / शोक नहीं था. उनका निधन हार्ट अटैक के कारण हुआ. वे अपने पीछे चार बेटे, बहुओं और नाती-पोतों का भरा-पूरा परिवार छोड़ गए हैं. यशवंत कई रोज से अपने गांव में ही थे. सो, उन्होंने बड़े पिता जी के निधन के बाद उनके अंतिम संस्कार में शिरकत किया. यशवंत ने फेसबुक पर अपने बड़े पिताजी को लेकर एक संस्मरणात्मक राइटअप लिखा है, जिसे नीचे दिया जा रहा है….

Yashwant Singh : बड़े पिता जी यानि श्रीकृष्ण सिंह की उम्र 85 साल से ज्यादा थी. वे खानदान में सबसे अलग थे. बेहद डेमोक्रेटिक. सबके प्रति साफ्ट रहे. कभी कड़क स्वभाव में उन्हें देखा नहीं. बच्चा हो या बुजुर्ग, हर कोई उनसे हर तरह की बात कर लेता और वह सबकी मजे में सुनते.

गांव में कोई उनका विरोधी नहीं था और वे खुद किसी के विरोधी नहीं बने. बेहद पाजिटिव व्यक्तित्व. किसी से कोई आकांक्षा नहीं रखे कभी, अपने बेटों से भी नहीं. जो कुछ कर दे तो ठीक, न करे तो ठीक. उनकी अपनी दुनिया थी. वे बाकी परिजनों / सवर्णों की तरह फ्यूडल कतई नहीं थे.

लंबी उम्र हो जाने के कारण सेहत को लेकर सतर्क रहा करते. अपना काम काज खुद करते और टहलने में कोताही न बरतते. उनके जीते जी उनसे उमर में छोटे कई सारे लोग गुजर गए. वे तब यही कह करते- अरे वह तो मुझसे छोटे थे, बड़ी जल्दी चले गए.

चार रोज पहले वह बुढ़ापे के हालात का वर्णन अनायास करने लगे. वह बताने लगे- ”चाहे जो कहो, बुढ़ापे में तकलीफ तो है. खड़े होने पर तकलीफ, बैठो तो तकलीफ. न उठो बैठो तो तकलीफ.” वे आगे हंसते हुए बोले- ”ऐसी तकलीफों के कारण ही लोग मर जाना ज्यादा पसंद करते हैं.”

यह बात उनने मुस्कराते हुए कही और मैं बिना गहराई में गए उनका साथ देते हुए हंस-मुस्करा पड़ा. मुझे लगा वो ये बात बस बतियाने के लिए कुछ कहने सुनने हेतु कह बता रहे हैं. मैंने इसका कोई दूसरा या सांकेतिक मतलब नहीं निकाला. पर मैं गलत था. वह शायद अपने तन के जर्जर होते जाने को लेकर यह बात ज्यादा संवेदनशील मन:स्थिति में कह रहे थे. यानि वे मौत के लिए तैयार थे, शायद मौत को आमंत्रित कर रहे थे.

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बड़े पिताजी से हम लोग कुछ भी कह / मांग लेते थे. वे जानते हैं कि मैं कभी-कभार सुर्ती यानि तंबाकू खा लेता हूं. इसलिए वह मुझे देखते तो सुर्ती में चूना मिलाकर हथेली में रगड़ने लगते. चार रोज पहले वह सुर्ती बना रहे थे, तभी उनके पीछे एक बिल्ली ने म्याऊं कहा. मैंने कैमरा आन कर बिल्ली पर फोकस किया और बिल्ली-सी आवाज निकालने की कोशिश करने लगा.

बिल्ली जाल में फंसने लगी. उसे मेरी बिल्ली-सी आवाज परिचित सी जान पड़ने लगी. उसने दोनों कान खड़े कर लिए और आंख फाड़कर देखना शुरू किया. बिल्ली बड़े पिताजी के पीछे थी. बड़े पिता जी समझ ही नहीं पाये कि आखिर मैं कर क्या रहा हूं, क्यों बिल्ली की आवाज निकाल रहा हूं. उन्हें धीरे से बताया कि पीछे बिल्ली है, उसको रिकार्ड कर रहा हूं.

मैंने कैमरे के पीछे मुंह छिपा रखा था और बिल्ली अपनी आवाज की नकल करने वाले की शकल देखना चाह रही थी, आवाज का केंद्र तलाश रही थी. वह चौकन्नी होकर हौले से करीब आई. इसी दरम्यान बड़े पिताजी ने तंबाकू रगड़ कर मेरी हथेली पर रख दिया.

यह अंतिम वीडियो है जिसमें बड़े पिताजी दिख रहे हैं, शुरुआत में सशरीर, बाद में उठकर आते हुए और मुझे तंबाकू देते हुए. मैं लीन था बिल्ली से संवाद करने की कोशिश में.

संबंधित वीडियो का लिंक ये है : https://www.youtube.com/watch?v=53nqm9hgNL8

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बड़े पिता जी का दो बार पहले भी हार्ट अटैक हो चुका था. तीसरी बार यह अटैक जानलेवा साबित हुआ. उनकी मृत्यु के बाद गांव-घर के लोगों ने कहना शुरू कर दिया कि यह अच्छी मौत है, बिना किसी से कुछ सेवा टहल कराए, चलते-फिरते चले गए. थोड़ी ही देर में देखा कि बैंड बाजा मंगा लिया गया. लोहार भाई बांस छील काट कर अंतिम यात्रा के लिए तैयारी करने लगे. गांव के कई बड़े बुजुर्ग उनके इर्दगिर्द खड़े हो गए. हंसी मजाक का दौर चलने लगा.

लोहार ने हंसते हुए कहा कि दो चार इकट्ठे बना दे रहा हूं, कई लोग लाइन में लगे दिख रहे हैं, ये कई बुजुर्ग बस आजकल-आजकल हुए पड़े हैं, जाने कब टपक जाएं. लोहार का इशारा लाठी टेककर खड़े एक बुजुर्ग ठाकुर साहब की तरफ था, जो खुद हंसोड़ शख्स हैं. लोग उनकी तरफ देख ठठा कर हंसने लगे तो उनने जवाब में नहले पर दहला मारा, अभी तो गुरु कइयों को श्मशान पहुंचाउंगा, उसके बाद सोचूंगा.

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बड़े पिता जी की शव यात्रा गाजे बाजे के साथ शुरू हुई और नजदीकी गंगा घाट पर जाकर खत्म हुई. उनके शव को गंगा में विसर्जित किया गया. ऐसी मान्यता है कि किसी संत ने कई गांवों के लोगों को शवों को गंगा में विसर्जित करने को कहा था, तबसे यह परंपरा चली आ रही है. मुझे यह इसलिए ठीक लगता है क्योंकि नेचर का फूड चेन मेनटेन रहता है. हम मछली खाते हैं और जल के जीवों को खाने के लिए हम खुद को पेश कर देते हैं. बड़े पिता जी शाकाहारी थे और दूध उनका सर्वप्रिय सदाबहार आहार थे. वे किसिम किसिम के शाकाहारी खाने के शौकीन थे.

बड़े पिताजी के चले जाने के बाद पूरा गांव उनकी किस्मत की सराहना करने में जुटा रहा, मौत हो तो ऐसी, पूरा जीवन जिया और खटिया पर लेटकर भोगने की जगह हंसते खेलते टहलते चले गए. मैंने महसूस किया कि गांव के लोग शहरियों से ज्यादा प्रैक्टिकल होते हैं, जीवन-मृत्यु को लेकर. वह जीवन को जीवंतता से जीने की समझ तो रखते ही हैं और मौत को एक अनिवार्य साथी मानकर उसके प्रति वेलकम भाव भी रखते हैं. गांववालों के रुख / भाव को देखकर मुझे अच्छा लगा. मैंने गहरे उतरकर काफी कुछ महसूस किया.

मेरा कर्मकांड में भरोसा नहीं है इसलिए शव विसर्जन के बाद अपनी पुरानी दिनचर्या में लौट आया. गांव और परिवार के लोग तेरह दिन तक मृत्यु संस्कार में लीन रहेंगे, सुबह नहाने से लेकर सिर के बाल उतरवाने और तेरहवें दिन बड़े पैमाने पर सामूहिक भोज करने कराने में लगे रहेंगे. मेरे खयाल से ये सब पैसे की बर्बादी है. लेकिन गांव वाले शायद इन्हीं कर्मकांडों के जरिए खुद की सामूहिकता को जी पाते हैं और दुखों सुखों को एक दूसरे से शेयर कर पाते हैं, जो कि अच्छा ही है.

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कल पूरा दिन जीवन-मौत, शव, शोक, बैंड-बाजा, अंतिम संस्कार, गंगा विसर्जन आदि से भरा रहा. आज देर सुबह सोकर उठा तो पूरा गांव और खेत-खलिहान कोहरे से ढंके मिले, चंद कदम आगे तक का राह नहीं सूझ रहा. इस रहस्यमय मौसम के संदेश को समझने के वास्ते पूरा एक चक्कर लगाया, गांव के बगीचों और खेतों का, मेड़ दर मेड़ और पेड़ दर पेड़. मुझे हर जगह बिझी मिली ओस की बूंदों में बड़े पिताजी दिखाई दे रहे थे, चमकते-खिलखिलाते.

दरअसल जीवन में दुख, ग़म, खुशी, उत्सव, जीवन, मौत… ऐसा कुछ अलग-थलग, मोनोलिथिक-सा नहीं होता… एक प्रक्रिया है जो संचालित होती रहती है और हम सब अपने-अपने मन मिजाज ज्ञान संस्कार चेतना समझदारी सोच के हिसाब से इसे कनसीव कर अलग अलग नाम दे दिया करते हैं..

नहा खा कर दोपहर बाद जब मैं शहर यानि जिला मुख्यालय के फोर जी वाले इलाके में आया तो मोबाइल का नेट आन किया. देखा सिंगिंग से संबंधित एक मोबाइल एप्प के बारे में एक संदेश ह्वाट्सएप में आया हुआ है. इसे डाउनलोड किया, इंस्टाल किया, और आजमाने में जुट गया, आप भी रिजल्ट देखें और कुछ क्षण गुनगुनाएं.. : https://www.youtube.com/watch?v=Tgf_9fIK5nk

ग़मगीन होना श्रद्धांजलि देना नहीं होता, गुनगुनाना असल में सच्ची श्रद्धांजलि होती है, जिसमें हम जीवन के उदात्ततम स्वरूप के लिए प्रकृति के प्रति हृदय से आभार व्यक्त करने हेतु थोड़ा म्यूजिकल हो जाते हैं… लव यू आल.

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह से संपर्क yashwant@bhadas4media.com के जरिए किया जा सकता है.

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…तो अब गिरने के बाद दारु छोड़ देंगे भड़ास वाले यशवंत!

पत्रकारिता की दुनिया में भड़ास4मीडिया के जरिये भूचाल ला देने वाले देश के चर्चित पत्रकार यशवंत सिंह बीती रात्रि बाथरूम में गिरकर घायल हो गए! ईश्वर की कृपा यह रही कि उन्हें ज्यादा गंभीर चोट नहीं आयी लेकिन इस घटना से पत्रकारिता की दुनिया में नई क्रान्ति आने की संभावनाएं जग गयी है। मैं दरअसल ऐसा इसलिए लिख रहा हूँ कि इस घटना से यशवंत सिंह से दारु पीने की बुरी लत छूट सकती है। यदि ऐसा होता है तो यशवंत सिंह की सबसे बड़ी बुराई दूर हो जाएगी और वह पहले से ज्यादा अपनी कलम को धार दे सकेंगे!

इसमें कोई शक नहीं कि कलमकारों की आवाज़ को बुलंद करने वाले यशवंत सिंह ने पत्रकारिता में पत्रकारों की आवाज़ को बुलंद कर इतिहास रचने का काम किया है। शायद ही देश का ऐसा कोई पत्रकार होगा जो यशवंत सिंह की कलम और जज्बे का दीवाना न हो। बाथरूम में गिरकर यशवंत सिंह घायल ही हैं और उनकी भौंह के उपर काफी चोट हैं लेकिन ख़ुशी की बात यह है कि खुद यशवंत सिंह अब अपनी दारूबाजी की लत से छुटकारा चाहते हैं! जैसे ही उन्होंने फेसबुक पर अपने घायल होने और दारु छोड़ने की पोस्ट डाली, सोशल मीडिया पर उन्हें कमेंट में सलाह देने का दौर शुरू हो गया। मैं खुद भी चाहता हूँ कि वो दारु छोड़ दें क्योंकि दारूबाजी उनका वो समय खराब कर देती है जिसमें वो पत्रकारों / आमजन के मुद्दों को और धार दे सकते हैं।

उम्मीद करता हूँ, यशवंत भाई जल्द ही स्वस्थ हो जायेंगे और दारूबाजी से भी मुंह मोड़ लेंगे। साथ ही आशा यह भी करता हूँ कि उनके स्वस्थ होते ही देश के बड़े मीडिया घरानों के बड़े खुलासे भी होंगे क्योंकि अब भड़ास4मीडिया पर दारुबाज यशवंत सिंह नहीं बल्कि अपने भोले-भाले पत्रकार यशवंत सिंह होंगे।

यशवंत भाई के जल्द स्वस्थ होने और दारु छोड़ देने की उम्मीद के साथ…

जियाउर्रहमान
संपादक
www.vyavasthadarpan.in
abharatrahman@gmail.com
Mob : 8923220818, 9454391714

मूल खबर :

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दुर्घटना में भड़ास संपादक यशवंत बुरी तरह घायल

(आपरेशन थिएटर से बाहर लाए जाते यशवंत)

नई दिल्ली : भड़ास4मीडिया डाट काम के संस्थापक और संपादक यशवंत सिंह बीती रात बुरी तरह जख्मी हो गए. उनके माथे में गहरी चोटें आई हैं. वे बाथरूम में गिर पड़े थे जिसके कारण नल की टोंटी उनके माथे में घुस गई. उन्हें दर्जनों टांके लगे हैं. चोट की स्थिति देखकर डाक्टर्स ने किसी प्लास्टिक सर्जन डाक्टर से आपरेशन कराने की सलाह दी. इसे ध्यान में रखते हुए प्लास्टिक सर्जरी के विशेषज्ञ डाक्टर से संपर्क साधा गया.

विशेषज्ञ डाक्टर ने अपनी पूरी टीम के साथ करीब घंटे भर तक चले आपरेशन में दर्जनों टांके लगाए. यशवंत को करीब 9 दिन तक बेड रेस्ट की सलाह दी गई है. इस हादसे के बारे में यशवंत ने खुद फेसबुक पर जो पोस्ट किया है, वह इस प्रकार है-

Yashwant Singh : मेरा दुश्मन मैं खुद। रात ‘ज्यादा’ हो गयी थी। गिर पड़ा बाथरूम में। दोनों आईब्रो के उपर गहरे जख्म आए हैं। नॉर्मल टांका लगने की स्थिति नहीं थी। प्लास्टिक सर्जन ने ऑपरेशन थिएटर में लगभग घण्टे भर सिलाई की। अब दारू छोड़ ही देता हूं।

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मोदी तो बेचारे ऐसे फंसे कि पलटी भी नहीं मार सकते… जनता जमकर गरिया रही है गुरु… (देखें वीडियो)

Yashwant Singh : केजरीवाल का आड इवन और मोदी का करेंसी रद्द फैसला इतिहास याद करेगा. दोनों में बड़े लोगों / बड़े चोरों को कोई नुकसान नहीं था. दोनों में आम जन को मुश्किलों का सामना करना पड़ा… केजरीवाल ने तो समय रहते जनता को मूड समझ लिया और आड इवन को रद्दी की टोकरी में डाल दिया.. लेकिन मोदी तो बेचारे ऐसे फंसे कि अब पलटी भी नहीं मार सकते…. जनता जमकर गरिया रही है गुरु… जरा फेसबुक ट्वीटर छोड़ो और बैंकों की तरफ निकलो… उनसे पूछो जिनके घरों में बेटियों की शादियां हैं अगले कुछ दिनों में… उनसे पूछो जो मजदूरी करते थे दुकानों, मकानों, कांस्ट्रक्शन कंपनियों में.. सब ठप पड़ा है… भूखों मरने की नौबत आने वाली है..

मोदिया तो गया विदेश रे…

पांच सौ और हजार की करेंसी बंद होने से बैंकों के बाहर अराजकता का आलम है. ये वीडियो आज सुबह दिल्ली के एक बैंक के आगे का है. जनता का रेला धन बदलवाने के लिए तत्पर है और बैंक के दरवाजे बंद हैं. पूरा देश सब कुछ छोड़कर सिर्फ नोट बचाने बदलने की चिंता में डूबा है. विदेशों में, प्रापर्टी में और सोने में काला धन रखने वाले असली लुटेरे मौज में हैं, उन पर कोई असर नहीं. मोदी राज में देश क्या खूब तरक्की कर रहा है 🙂

देखें वीडियो : https://youtu.be/jtQYT8xc-dY

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से.

पूरे मामले को ठीक से समझने के लिए इन्हें भी पढ़ना जरूरी है…

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करेंसी यूं रद्द करने से देश कैसे आर्थिक मंदी की चपेट में आ सकता है, समझा रहे हैं भड़ास एडिटर यशवंत सिंह

Yashwant Singh : एक बड़ी आर्थिक मंदी की चपेट में देश आ सकता है. नोट करेंसी रद्द / बंद करने का एक साइडइफेक्ट यह भी आशंकित है. क्या आप बताएंगे या मैं समझाऊं? ध्यान रखिए, मेरी आशंका अंध मोदी विरोध टाइप कतई नहीं है. विशुद्ध आर्थिक कारणों पर आधारित है. नोट बदलने, करेंसी रद्द करने से आर्थिक मंदी की चपेट में देश क्यों आ सकता है, इसके बारे में बताने से पहले कहना चाहूंगा कि आपको दिल दिमाग खोलकर पढ़ना समझना पड़ेगा. थोड़ी देर के लिए मोदी विरोध या समर्थन किनारे कर दीजिए. 

यूपी में चुनाव करीब है और नेताओं ने पांच साल में जो सैकड़ों करोड़ कैश इकट्ठा किया है ऐन केन प्रकारेण, वह रद्दी हो गया. ये वो पैसा था जिसे जनता तक जाना था, वोट खरीदने के लिए, एक एक वोटर को पांच पांच सौ या हजार हजार रुपये. वोटरों तक गया यह पैसा मार्केट में लगता, खरीद फरोख्त होती, राशन से लेकर फूड प्रोडेक्ट और दवा आदि जो भी इससे हासिल होता या इकट्ठा किए मूल धन में मिलाकर जो भी टीवी फ्रिज मोबाइल खरीदा जाता, वह नहीं होगा. इससे प्रोडक्शन बढ़ता, सामान बिकता तो नया सामान बाजार में भेजने के लिए प्रोडक्शन का काम होता जिससे इंप्लायमेंट मिलता और औद्योगिक ग्रोथ होती. इस हजारों करोड़ के नोट के रद्दी हो जाने से ये पैसा अब आम जन के हाथ नहीं पहुंच पाएगा. प्लीज, वोट खरीदना गलत है या सही, इस नैतिकता को अभी किनारे कर दीजिए और सिर्फ आर्थिक हिसाब से सोचिए. 

नेताओं का यह पैसा बैनर पोस्टर लाउडस्पीकर कार आदि का प्रोडक्शन करने वालों के पास जाना था. नेताओं का यह पैसा मीडिया वालों कर्मियों के पास भी जाना था, नैतिक अनैतिक रूप में. 

यानि यह पैसा मार्केट में घूमता, देश के मिडिल क्लास, लोअर मिडिल क्लास और बेहद गरीब लोगों तक जाता. औद्योगिक उत्पादन करने वालों से लेकर छोटे कारोबारियों तक जाता. अब यह पैसा कहीं नहीं जाएगा. मार्केट की मोबिलिटी बाधित होगी. खरीदारी कम होगी. लेन देन कम होगा. खपत न होने से प्रोडक्शन कम होगा. प्रोडक्शन कम होगा तो औद्योगिक इकाइयां छंटनी करेगी. छंटनी करेगी तो बेरोजगारी बढ़ेगी. 

यही काला धन जो रियल इस्टेट वालों के पास था, डाक्टरों के पास था वह नए मकान भवन बनाने में लगता. मजदूर काम करते. वे पैसे को बाजार में ले जाकर खरीद करते. सीमेंट, ईंट, सरिया, बालू के कारोबारियों के पास पैसा जाता. यह सब धंधा मंदा हो जाएगा. इनके यहां काम करने वाले छंटनी के शिकार होंगे. डाक्टर उस काले धन से अस्पताल बनवाते, नर्सिंग होम बनाते, ढेर सारे नर्सिंग स्टाफ भर्ती होते, हेल्थ इंस्ट्रुमेंट खरीदे जाते. अब यह सब न होगा क्योंकि वह पैसा रद्दी हो गया. 

नेता, रियल इस्टेट वाले और डाक्टरों का उदाहरण केवल समझाने के लिए दिया है. इन्हीं काले धनों से स्कूल कालेज विश्वविद्यालय खोले जाते हैं. इन्हीं काले धनों से नए प्रोजेक्ट्स में निवेश किए जाते हैं. अब ये सब ठप हो जाएगा. ढेर सारे जो नए काम होने थे. रुक जाएगा क्योंकि जो जो काला धन रखा था, वह रद्दी हो गया. मार्केट में लंबे समय तक खरीदारी न होगी. निजी स्तर के नए प्रोजक्टस न शुरू होंगे. बिक्री कम हो जाएगी. 

समझदार के लिए इशारा काफी है. 

अंबानी जो सबसे बड़े आदमी हैं भारत के, इसलिए नहीं कि उनके पास खूब सारा कैश है. बल्कि उनके पास तो कैश जो होगा सब एकाउंटेड होगा. उनका धन एसेट में है, शेयर में है, प्रोडेक्ट में है, सर्विस में है. वह तो जनता से मुनाफा खींचते रहेंगे. उनका जो काला धन होगा वह स्विटरलैंड से लेकर दुनिया के ढेर सारे ब्लैक मनी फ्रेंडली देशों में होगा. उस पर कोई असर न पड़ेगा. पड़ेगा हमारे आप जैसे छोटे बड़े जिलों के रहने वाले आम लोगों को जिनको इस पैसे से रोजगारा पाना था, या प्रोडक्ट खरीदना था, या घूमना था. सब कुछ ठप हो जाएगा धीरे धीरे. नई मुद्रा के आने और उसे आम जन तक पहुंचने में जो लंबा वक्त लगेगा, उस दौरान आए बाजार के ठहराव से पूरी अर्थव्यवस्था मंदी की चपेट में आ सकती है. 

मंदी का एक नियम है कि जब यह आती है तो जल्दी जाती नहीं, अपना चक्र पूरा करने के बाद ही टलती है. 

ईश्वर करें ऐसा न हो. मेरा कहा झूठ निकले. 

हां, लेकिन जो असली काले धन वाले हैं, जिनका जमीन, सोना और विदेशों में काला धन गड़ा है, उन्हें कोई फरक नहीं पड़ने वाला. क्योंकि वह धन न तो भारत के मार्केट में, भारत की इकोनामी में चलायमान था और न चलायमान होना था. वह अर्थव्यस्था से बाहर का धन था, जिसे सरकार ले आती तो भारतीय अर्थव्यवस्था में अतिरिक्त मोबिलिटी आती. उसके उलट जो भारत की इकानामी में इस्तेमाल होने के लिए रखा काला धन, वह रद्दी हो गया जिससे बाजार का रुख मंदी की ओर जा सकता है. 

अगर नोट करेंसी बदलने रद्द करने से अर्थव्यस्था दुरुस्त हो जाया करती तो वह पहले ही हो जाती क्योंकि भारत में पहले भी नोट करेंसी बदले रद्द किए गए हैं. 

यह केवल एक सस्ती लोकप्रियता का तरीका है. नया धन नया नोट नया करेंसी जो आएगा, वह आम जन तक न पहुंचेगा. वह सरकार, अफसर, कर्मचारी, कारोबारी आदि के एक दस परसेंट वाले छोटे समूह के बीच लंबे समय तक दौड़ेगा. बहुत देर बाद वह नीचे आम जन, सबसे गरीब आदमी के पास पहुंचेगा. तब तक लोग सौ रुपये के नोट से लेकर एक रुपये के सिक्के तक में किसी तरह जीवन यापन करेंगे और बाजार को मोदी सरकार के भरोसे छोड़कर घर बैठे रहेंगे. देखिएगा, जनता से बहिष्कृति बाजार (भले ही मजबूरी अभाव में बहिष्कार को मजबूर किया गया हो) कितने दिन हंसी खुशी नार्मल रह सकता है. टें बोलना ही पड़ेग. 

ईश्वर करें ऐसा न हो. मेरा कहा झूठ निकले. 

मेरा लिखा इसके पहले वाला पार्ट भी पढ़िए ताकि पिक्चर क्लीयर रहे :

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के उपरोक्त फेसबुक पोस्ट पर आए कुछ प्रमुख कमेंट्स इस प्रकार हैं…

Ashwini Kumar Srivastava बेहतरीन और सरल भाषा में किया गया विश्लेषण

Manudev Bhardwaj नायाब आकलन

Dinesh Choudhary गज़ब!!

Sunil Kumar बाज़ार की हालात अभी से ही खराब होने लगी हैं

Robin Singh यही तो देखना है.. फैसला तो अच्छा है.. मैं समर्थन में भी हूँ पर क्रियान्वन कितने अच्छे से होता है आपूर्ति कितने अच्छे से होती है और साइड इफेक्ट्स जैसे रिसेसन जो पैदा होगा व्यापर में उससे निपटने की कितनी तयारी है अब यही देखना है.. अगर इसमें सफल रहते हैं तो सरकार को 100 में से 200 मार्क्स.. कोई गधा ही कैश का बिस्तर बना के सोता रहा होगा.. बेवकूफाना फैसला राजस्व की छति .. आम आदमी के लिए मुसीबत अलग.. जिनके घर शादी है उनको रोने आंसू नहीं आ रहा..

Vivek Dutt Mathuria सरकार कहती है कि हमने चूहे पकडने के लिये चूहेदानियां रखी हैं। एकाध चूहेदानी की हमने भी जांच की। उसमे घुसने के छेद से बडा छेद पीछे से निकलने के लिये है। चूहा इधर फंसता है और उधर से निकल जाता है। पिंजडे बनाने वाले और चूहे पकडने वाले चूहों से मिले हैं। वे इधर हमें पिंजडा दिखाते हैं और चूहे को छेद दिखा देते हैं। हमारे माथे पर सिर्फ चूहेदानी का खर्च चढ रहा है। -हरिशंकर परसाई
डॉ. अजित तार्किक विश्लेषण आपसे असहमति की कोई वजह ही नही बचती।

Kamal Kumar Singh बेहतरीन।

पवन उपाध्याय राजस्व सचिव ने दी जानकारी… बिना हिसाब का पैसा जमा करने पर टैक्स के साथ देनी होगी 200% की पैनाल्टी। बैंको द्वारा ढाई लाख से ऊपर जमा की गई रकम की जानकारी सरकार को देनी होगी। ढाई लाख से ज्यादा जमा पर सरकार की नज़र (अगर पैसा कानूनन वैद्य है तो आपको कोई दिक्कत नहीं होगी)।

Sumit Vaish सब कुछ एक साथ नहीं सुधारा जा सकता। आपने जो शंका व्यक्त की है नए नोटों के आम आदमी तक न पहुँच पाने की और 100, 50 के नोट पर काम चलाते रहने की केवल उसी पॉइंट में दम है। जो अगर झूठ साबित हुआ तो अच्छा होगा। बाकी जो स्कूल, कॉलेज, यूनिवर्सटी नेता जी लोग खोल रहे हैं उनकी उत्तमता तो जग जाहिर है।

Vinay Pandey उम्दा सर

Manmohan Sharma Your assessment is correct but blind supporters of modi are delibraterly misleading people.

Shivam Srivastava चुनाव बहुत से लोगों को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में रोज़गार देता है और काला धन का प्रयोग इसमें होता है । लेकिन यह धन आया कहा से ? निश्चित रूप से गरीबों का ही पैसा है । जनता का पैसा है । एनआरएचएम के पैसे का बन्दर बाँट हो गया , इलाज़ के अभाव में अनेकों लोग मर गए । मनरेगा का पैसा है , मिड डे मील का पैसा है , खनन का पैसा है । 05 साल में कुछ दिन चांदनी होती है फ़िर अँधेरी रात । इस अँधेरे को हटाने के लिए सरकार द्वारा उठाया गया कदम सराहनीय है । आतंकवाद , नक्सलवाद, अपहरण , रंगदारी आदि में कमी संभावित है ।

Yashwant Singh सराहनीय तब होता जब यह विदेशों में बसे कालेधन से होता. देश के काला धन को अचानक खत्म कर देना देश के बाजार को बर्बाद करेगा और देश का बाजार देश की इकानामी को बर्बाद करेगा और देश की इकानामी मंदी के कारण सब कुछ को नष्ट करेगा.

Shivam Srivastava कुछ दिनों तक के लिए कह सकते है कि बाज़ार में मंदी रहेगी । लेकिन तकनीकी तौर पर ऐसा नहीं है । महीने दो महीने में स्थिति सामान्य हो जायेगी । सामानांतर अर्थव्यवस्था किसी भी देश के लिए अच्छी नही होती है । करपावंचन पर कुछ दिनों के लिए विराम लगेगा । देश में विकास की उम्मीद की जा सकती है ।

Arun Srivastava भाजपा नेता प्रवचन दे रहे थे कि इससे कश्मीर में पत्थरबाजी की घटनाएं रुकेंगी। लोग पत्थर फेंकने वालों को नकली नोट देते थे।

Yashwant L Choudhary सर ये पूरा पोस्ट ही कटाक्ष है | इसमें आपने राजनेताओं और डाक्टारो, इसकी और उसकी खूब धोयी है | इसका कंटेंट देखने में कुछ है और पढने के बाद विचार करने पर कुछ और है | ये आज तक का सर्वकालीन भयानकम पोस्ट है | इसको में सेव कर लेता हु

Ghanshyam Dubey मोदी जी अर्थ और राजनीति दोनो के महान खिलाड़ी हैं । अब तो PM भी हैं । उन तक , उनके खेल को 2014 मे कांग्रेस नहीं समझ पाई और सिमट कर 44 तक आ गयी , तो देश का गरीब – आम जन क्या समझेगा । गरीब आदमी की सारी तकनीक मामूली जीवन को गुजारने मे बिता देता है , उसके लिए यह सब अचरज जैसा, दुःस्वप्न जैसा है । …

Manish Kumar भाई बहुत ही साफ़ सुथरी भाषा और बड़ी ही समझदारी भरा ये पोस्ट लेकिन बहुत देर जो चुकी है जिसको फायदा पहुंचना था पहुँच गया। गरीब को मुसीबत दे गया।

Rajnish Tara Musibat gareeb ko nahi jamakhoro ko de gaya

Manish Kumar हाहाहा रजनीश तारा बहुत से धंधेबाजों को कमाने का मौका दे गए। किसी का एक रुपया नहीं रुकने वाला सब बदल जायेगा। सिर्फ मुसीबत उस गरीब की होती है जो पैसों के आभाव में शिक्षा नहीं पा पाया और अब मजदूरी करके महनत करके अपने बच्चों का लालन पालन कर रहा है। रजनीश तारा अमीर से भी पूँछों और गरीबों से भी। नोट बदलने में ना यशवंत भाई को परेशानी है ना मुझे और ना शायद आपको। परेशानी जिसे है वो आपके आस पास वाले ही हैं।

Anita Gautam आपकी बात सही है पर यह संवैधानिक तरीका नहीं है।

Raghvendra Singh Government has indirectly bailed out the PSU banks with black money as their NPA have risen to double digit. PSU banks needed capital infusion of about 110 b$ otherwise technically they are bankrupt.

DrRakesh Pathak तार्किक आकलन बधाई

Acharya Chandrashekhar Shaastri चुनाव में जनता को पहुंचाने के नाम पर कुछ दलाल नेता से रूपये ऐंठ लेते हैं कि वोट खरीदने हैं। लेकिन उस रकम का 10 प्रतिशत भी ऍम वोटर के पास नहीं जाता। हैं दारु का चक्कर वे लगातार चलाते हैं और मतदाता को पूरा उलझाते भी हैं

Rajnish Tara Yashwant bhaiya pahli baat to ye ki kala dhan rakhna hi gunah hai… barso tak kala dhan daba kar use election me gareebo ko baat kar unke vote kharidna bhi gunah hai… unke kharide hue votes ke adhar par ek giri hui aur ghatia sarkar banana bhi gunah hai….is faisle se mujhe to koi dar nahi… gine chune 5 ya 10 note mere paas honge jo main exchange kar lunga lekin jinke bed ke neeche chatte biche hai 500 aur 1000 ke wo chinta karenge…. ya to tax do ya is sardi me unhe jala ke haath seko….haa 2 4 din ki dikkat to hogi par faisla durgaami hai…. baaki adani ambani to door ki baat hai kisi chote mote builder pe bhi chapa maro to 5 7 crore to mil hi jate hai adani ambani pe to kuch jyada hi joga…. bhai mujhe aaj mera 500 ka note na toot pane ki takleef to jarur hui but mai modi ko salute karta hu

Raghavendra Narayan 2008 की आर्थिक मंदी से भारत को यही बचाया था सिर्फ बैंकिंग आधारित अर्थव्यस्था खतरनाक होती।

Sharad Mishra भाई शाब आप तो नोबल prize के उपयुक्त economic analyst है जो ये बताने का असफल प्रायश कर रहे हैं की काले धन की समानांतर अर्थव्यवस्था क्यूँ ज़रूरी हैं ।। वाह वाह । समश्या ये है की जिन्हें इस तरह की अर्थव्यवस्था मे अपने हित देखने की आदत हो जाती है वो ऐसे ही कुतरक देके लोगों को बरगनाले का प्रायश करते रहते है और किसी भी चीज़ का आर्थिक आकलन अवैध धंधों से कमाए धन के आधार पर तो क़तई नहीं किया जाता। ऐसी काले धन आधारित अर्थव्यवस्था से जितनी जल्दी आज़ादी मिलें उतना अच्छा हैं उससे वस्तुओं के मूल्य भी वास्तविक रहते हैं और ग़ुब्बारे तो फ़ुटना ही हैं और अत्यधिक बाज़ारीकरण पर भी संयम मेन रहेगा इसमें बराई क्या है महाशय।

Rajnish Tara Mujhe umeed hai ki iske baad bahut sa kala dhan sirf isliye bahar niklega ki kahi raddi naa ho jaye aur usse fayda hi hoga …. black ko white karne ke liye sarkari khajane me mota tax bhi jayega aur wohi paisa market me circulate bhi hoga…fir kaha bachi mahangai…. ya to jalao ya fir badlao

Mitra Ranjan और चूँकि आपको भी मालूम है कि ईश्वर कहीं नहीं है…इसलिए आपका कहा तो सच और सिर्फ सच ही निकलेगा

शांति भूषण कुमार यार कभी तुम क्रोनी कैपिटल पर मोदी को गरियाते थे और केजरीवाल की तारीफ करते थे…..यशवन्त सिंह जरा बताना तो कि वैचारिक रूप से दोगला किसे कहते हैं?

Bhagwat Shukla Bhai ji apke hisab se black money ko samanantr rup se flow hone dena chahia…. modi ne jo kia wo nhi hona chahia……waaah salute apko

Ripudaman Kaushik आदरणीय यशवंत जी, एक नज़र इधर भी, जितना मेरी समझ में आया उतना लिखा है 170000000000000 के करेंसी नोट इस समय भारत में व्यवहार में हैं जो की नकली हैं और पाकिस्तान या अन्य देश विरोधी माफियाओं द्वारा मार्किट में झोंक दिया गए हैं, जो लोग इस बात को ले कर प्रश्न उठा रहे हैं की, धन बेशक काला हो लेकिन वह भारत की अर्थव्यवस्था का अभिन्न अंग है, और प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से मार्किट को रोटेट करता है, इस तरह से करेंसी नोट को बंद कर देना बचकाना कदम है जो की भारत को भयंकर आर्थिक मंदी की तरफ धकेल देगा…..उफ़्फ़  … सोशल नेटवर्क्स पर इस अकथित virtual मंदी को प्रोडक्शन, इंप्लायमेंट, औद्योगिक ग्रोथ, औद्योगिक उत्पादन, छोटे कारोबारी, मार्केट की मोबिलिटी, बेरोजगारी बढ़ेगी, औद्योगिक इकाइयां में छंटनी, नए प्रोजेक्ट्स में निवेश बंद, बाजार के ठहराव… आदि-आदि अनेकानेक कारण दे कर समझाया जा रहा है.. लेकिन ये कोई विचार नहीं कर रहा की 170000000000000  ये केवल एक अनुमान मात्र है, इस आधार पर की हाल के कुछ वर्षों में ज़ब्त की गयी नक़ली मुद्रा में हर 10 लाख़ नोट में 250 जाली होते हैं, और जो करेंसी चुनाव जैसे ख़ास मौके के लिए टनों की मात्रा में गोदामों में रखी है वह इस अनुमान से भी कई गुना हो सकती है,  अब प्रश्न ये है की 17 लाख करोड़ रूपये की मुद्रा बाज़ार से बाहर कैसे निकलेगी या निष्क्रिय कैसे होगी। १. कल रात से जब से प्रधानमंत्री ने घोषणा की है, तब से कोई भी आदमी 500 का एक नोट लेने को तैयार नहीं है, अधिक मात्रा तो भूल ही जाओ, मतलब एक भी नया जाली नोट, अब अगले 50 दिनों में चलन में नहीं आने वाला। २. यदि आप के पास है, और आप बैंक चले जाते हैं, तो कैशियर जब्त कर लेगा (हालांकि इस बारे में मुझे कोई सुचना नहीं है की भुगतान होगा या नहीं). ३. अब जिसे पता है की उसके पास जाली नोट का स्टॉक हैं और bulk stock है, मात्र उसका पैसा ही मिट्टी होगा।  ४. जाली नोट की सबसे अधिक चोट बांग्लादेश और नेपाल में बैठे सटोरियों पर पड़ेगी, जो चुनाव जैसे ख़ास मौकों पर या ड्रग्स के लेनदेन में 300-400 की face value पर 1000 का नोट सीमापार के गोदाम से भारत भिजवाते थे.  दरअसल सरकार का मुख्य निशाना असली करेंसी वाला काला-धन नहीं है, बल्कि ये जाली करेंसी वाला नकली धन है. —– इसे दूसरे नज़रिये से देखते हैं की अगले 50 दिन में यदि 17 लाख करोड़ रूपये की कोढ़ रूपी जाली मुद्रा का बाज़ार से जाना, और लगभग 90% काला धन जो की घरों, तिज़ोरियों में कब से बंद था उसका एकदम से बाज़ार में किसी भी माध्यम से परावर्तित हो कर व्यवहार में आना. ये एक बहुत बड़ी घटना है.  17 लाख करोड़ + अचल मुद्रा (काला धन) का आगमन = भारत की अर्थव्यवस्था में इतनी ही value की अपरोक्ष इन्वेस्टमेंट का होना है नैतिक या अनैतिक रूप में. अब मेरे जैसे छोटे लोगों की भी सुन लो : हमारे यहाँ धन को लक्ष्मी रूप में पूजा जाता है, तो असली वाला नोट हिन्दुस्थान में कोई जलाएगा तो कतई नहीं, येन-केन प्रकारेण अगले 50 दिनों में बाहर आएगा ही और बदल दिया जाएगा।

Arif Beg Aarifi 17 lakh karod ki total currency purey india me hai.jisme se 14 lakh karod k 500 wa1000 k note hai………aap k dwara diya gaya aankda durust nahi hai,aap total mudra ko fake mudra samjh baithe hai

राज किशोर उपाध्याय मोदी काले धन को दूर रखने के लिए वाक़ई संकल्पशील हैं तो पार्टी के धन/खर्च का ब्योरा आरटीआइ के तहत देश को देने के मामले में उन्हें स्वेच्छा से आगे नहीं आना चाहिए था?

Sanjay Kumar Singh In economy depression is caused due to lack of demand or excessive supply but this decision ofgovernment will make morecirculation of money in economy. Then how we can say that in future economy of India will suffer depression.

Anurag Khandelwal  अगर नोट करेंसी बदलने रद्द करने से अर्थव्यस्था दुरुस्त हो जाया करती तो वह पहले ही हो जाती क्योंकि भारत में पहले भी नोट करेंसी बदले रद्द किए गए हैं. केवल आप के लिए जनाब. १) पहले जब मुद्रा को बदला गया तब सरकार के पास मुद्रा के विनिमय पर नजर रखने के साधन नही थे….. २) डिजिटल विनिमय नहीं होता था….. ३) प्लास्टिक करेंसी नही थी….. ४) मोबाइल पे वॉलेट नहीं थे….. ५) नगद क्रय विक्रय पर निश्चित सीमा तय नही थी….और शायद आपको ऐसा लगता है की यह सारे बड़े प्रोजेक्ट, कॉलेज, चुनाव, अस्पताल आदि केवल और केवल काले धन से ही संभव है और इसीलिए सरकार को इस समानांतर अर्थव्यवस्था बरक़रार रखना चाहिये….हद्द है भाई…. कसम से बाबू आप जैसे लोग स्वर्ग में भी मीन मेख निकाल सकते हो….. गुड ब्रो….कीप इट अप…. साहब जी, ये जो इतनी सारी छोटी मछलियां गिना रहे हो ना आप ये सब मिलकर कई बड़ी बड़ी मछलीयों के आकार से भी ज्यादा बड़ी हो जाएगी….. रही बात मंदी की तो आपके हिसाब से काला धन ही यदि अर्थव्यवस्था को ऑपरेट करता है तो स्वागत है ऐसी मंदी का जिसमे न्यूनतम काले धन के लिए भी कोई स्थान नहीं हो…. रही बात विदेश में जमा काले धन की तो भविष्य के गर्भ में क्या है यह कोई नहीं बता सकता….सरकार की अपनी अंतर्राष्ट्रीय व्यापार संधियाँ है….बैंकिंग कानून है हर देश के….और सभी को साध कर चलना पड़ता है…..सरकार की प्रतिबद्धता में कोई कमी नहीं है इस विषय पर…. हाँ यह सही बात है की गोल्ड और रियल एस्टेट के अब तक के काले धन पर कोई फर्क नहीं गिरेगा किन्तु इस क़ानूनी करेंसी निरस्ती के बाद कहीं भी काले धन का निवेश मुश्किल होगा और बड़े transaction सरकार की निगरानी में आ जायेंगे…. आप बिल्लोरी कांच लेकर नकारात्मकता खोजना छोडिये भाई सा….थोड़े भोत दुःख आये भी तो मिलजुल कर बाँट लेंगे…. देश को बढ़ाना जो है…..

Roy Tapan Bharati आपके विश्लेषण और तर्क से.सहमत हूं।

Geeta Yadvendu कुछ भी हो मोदी भक्त तो मोदी आरती ही गाएँगे

Prashant Tulsani लेखक लेख लिखते समय , काफी कंफ्यूज जान पड़ते है ,  एक तरफ वो चुनावों में प्रयोग होने वाले काले धन की बात करते हैं , तो दूसरी ओर उसी काले धन को बाजार की मंदी से जोड़ कर देखते है , आशय स्पष्ट नहीं होता , क्या वो मान कर बैठे है के अब भारत में जो है सिर्फ वेसा ही चलेगा ? या वो चाहते है कि थोड़ा मंद ही सही किन्तु बाजार को सफ़ेद धन पर चलना चाहिए? हर छोटा व्यापारी ( मेरा परिवार भी ) इस बात को जनता है की अगले ५० दिन कुछ मुश्किल में गुज़र होने वाले है , और उसके बाद बाजार धीमे ही उठेगा , लेकिन ये भी जानते है कि ऐसा होने से मकान से लेकर भवन निर्माण तक जो प्रीमियम राशि काले धन के रूप में देनी पड़ती थी उस पर लगाम कस सकेगी,  दूसरे चरण में भी लेखक काले धन को ही विकास कार्यों से जोड़ते हुए नज़र आते हैं ,  साथ ही लेख के आरम्भ में लिखते है की “आपको दिल दिमाग खोलकर पढ़ना समझना पड़ेगा. थोड़ी देर के लिए मोदी विरोध या समर्थन किनारे कर दीजिए”  और अंत आते आते स्वयं ही लिखते है “यह केवल एक सस्ती लोकप्रियता का तरीका है.”  और फिर अंत में अपने लेख को काल्पनिक सिद्ध कर लिखते है “ईश्वर करें ऐसा न हो. मेरा कहा झूठ निकले” कुल मिलकर इस लेख को देखे तो , तथ्यों, आकँडो , एवं तर्क से दूर एक काल्पनिक लेख ,

Deepak Shweta Singh Kya praksh dala hai Bhaiya…. Ekdam sysska led bulb type

Sudhir Pradhan कुछ तार्किक विश्लेषण

Mayank Pandey अभी तक काली अर्थव्यवस्था में ही तो जीते आये हैं। अब नये वाले को भी देख लिया जाय।

Adv Shivani Kulshrestha bilkul sahmat hu sir…apne sahi likha hai ekdam…ye apne dil se likha hai. koi banwatipan nahi hai..fact or akarne agar sahi hote to deah itna gaddhe me na jata…

Rishi Munjal Vo noor ban ke jamaane mein fail jaayega – Tum aaftaab mein keedey talaash karte rehna ..

Prakash Govind यशवंत भाई बहुत जबर्दस्त और सटीक लिखा है …. पठनीय पोस्ट

Himanshu Priyadarshi Yashwant Singh bhai munhe bahut shiddat se mahsoos hota hai ki aapko abhi economy padhne ke bahut zarroorat hao

Prakash Govind तो आप ही पढ़ा दीजिये न. वैसे आप पहले ही पढ़ा चुके हैं —

Shubh Narayan Pathak सरलीकृत विश्लेषण!

Abhishek Singh Rajput भड़ास मीडिया पर लिखते-लिखते लगता है पुरे भसिया गये हैं…,खुद तो अपनी जवानी में कुछ नही कर पाये, एक बूढ़ा आदमी कुछ अच्छा कर रहा है, उसको तो करने दो भईया… काहे दर्द उखड़ रहा है इतना?

Sudesh Tamrakar वाह रे अर्थशास्त्री! अर्थशास्त्र के ज्ञाता धन्य है आपका ज्ञान! जो कालाबाजारियों और भ्रष्ट नेताओं के द्वारा कमाये गए धन से भारत की आर्थिक स्थिति को मजबूत बनाने का ख्वाब देखते और दिखाते हो आप वाकई धन्य हैं । आपको वो करोड़ों जाली नोट भी नहीं दिखते जो भारत की अर्थव्यवस्था को खोखला कर रहे थे आतंकवादियों के हांथों की बंदूकें अलगाववादियों के हांथो की मशाल बन रहे थे जो बच्चों के स्कूलों में आग लगा रहे थे। बात करते हैं कि थोड़ी देर को मोदी विरोध या समर्थन किनारे रख दीजिए। ठीक है आप देशहित की बात तो करिये । बात करते हैं ….। मोदी का ये कदम उनके खुद के लिए सरकार के लिए एक आत्मघाती कदम है लेकिन भ्रस्टाचारियों और कालाबाजारियों के लिए फांसी का फंदा। माना कि अभी भी बहुत से बच जाएंगे जिसके लिए एक और सर्जिकल स्ट्राइक करनी होगी वह है चुन चुन के रेड्स देखते जाइये अभी 2 साल से ज्यादा बाकी है। सलाह देने के लिए मोदी जी ने मोबाइल एप का तोहफा जो दिया है । सो उस पर आप भी सलाह दे सकते हैं । वैसे भी पप्पू तो खुद ही समझदार है आपकी बात मीडिया तक पहुंचा ही देगा।

Gaurav Bisht aap jis money ki baat kr re h wo black money h …beshak wo rotate hota pr ..un logo ki akal thikane ni lgti jo frod krte h …gandhi ji ne kha h …paap mitao… ab se 2 baar pkka sochenge ese log

Rajesh Gupta क्या स्तर है इन बुद्धिजीवियों का कहते तो हैं हम पूंजीपति के लूट के विरोधमें हैं लेकिन असली बात ये लोग विदेशी देशद्रोही के भाड़े के टट्टू हैं

Mohan Chopra कमजोर सोच वालों के लिए जोरदार लेख।

Nand Kishor Jha यसवंत जी, आप के बात में दम है। लेकिन अर्थव्यवस्था में भी स्वच्छता भी जरुरी है।काले धन की सामानांतर व्यवस्था देश के पालिसी इम्प्लीमेंटेशन में बाधक है। अभी यदि सरकार को इससे कुछ लाख करोड़ रुपये मिलते हैं तो जनकल्याण पर ही खर्च होगा। यदि सरकार सख्त रहे तो भ्रस्टाचार पर भी कंट्रोल होगा। नकली नोट पर भी काबू होगा, जिससे आतंकवादी गतिविविधियों पर भी लगाम लग सकता है।

Vishwakarma Harimohan मानता हूँ कि इस बदलाव से अर्थव्यवस्था फिलहाल स्लो होगी और ये बात मोदी से लेकर जेटली और विपक्ष सभी कह रहे हैं। लेकिन आपके सवालों के जवाब आपके सवालों में ही हैं। अंबानी टाइप लोग कितना भी पैसा विदेश में रखे हों लेकिन जब देश की इकॉनमी ठप्प होगी तो न तो उनके पास रिलायंस बीमे की किश्तें पहुंचेगी न टीवी बिकेंगे और न मकान। कहने का आशय कुछ समय के लिए मार्केट या टर्न ओवर उनका भी थमेगा, तब। आप भी जानते हैं कि अम्बानी हो चाहे कोई और सब कर्जे के संजाल में हैं किसी पर देशी कर्ज है किसी पर विदेशी जब कर्ज है तो ब्याज भी जाएगा। अब ब्याज जाएगा और आवक न होगी क्योंकि मार्केट में टर्नओवर घूमने में समय लगना है तो संतुलन बिगडना है। कोई भी उद्योग तभी फलता है जब टर्न ओवर चालू हो। अब दिवाला निकला कि नही। माल्या या सुब्रतो राय को शौक नहीं था दिवालिया होने का किन्तु गलत नीतियों के कारण आवक को लुटाते रहे और लागत लगती रही सो अपनी जान बचाने दिवालिया हुए। इसलिए हे भडासानंद महाराज खुद को संभालिए।

Balwant Singh आपका कहा झूठ ही होगा श्री मान

Umrendra Singh Pahli baar asahmat hu aapke visleshan se

श्री विदेह इन्फ्लेशन के बारे में भी कुछ सुना है यशवंत जी….और इस पर मोदी के फैसले का क्या असर होगा यह भी बताईये

Nidhi Panday 100 % correct..i like ur articke nd view iagre with this..

Navin Kr Roy यह एक व्यंग्यात्मक लेख है जो साफ़-साफ़ झलक रहा है।पर यदि इसे लेखक का विश्लेषण भी मान लिया जाए तो यह कहने में कोई हिचक नही है कि,इनका विश्लेषण अधूरा है।काले धन के नष्ट होने से भी अर्थव्यवस्था को फायदा हो सकता है।मैं बहुत विस्तार में नही जाऊँगा।पर कम से कम हजारों करोड़ नकली नोट जो भारतीय बाजारों में फैलकर दीमक की तरह हमारी अर्थव्यवस्था को चाट रहे थे,उस पर तो रोक लगी।क्या यह कम है ? और सम्पूर्ण रूप से शायद ना हो पर, निश्चित रूप से सरकार के इस निर्णय से छुपे काले धन पर चोट पहुंचेगी।

पंडित राकेश कुमार त्रिपाठी कुल मिला कर मूलभूत आवश्यकता रोटी कपडा और मकान पर फोकस रहेगा और किसान की उन्नति का मार्ग प्रशस्त होने की सम्भावना बढ़ती है …. अतिरिक्त और गलत मार्ग का धन विलासिता को बढ़ावा देता है । आतंक की रीढ़ तोड़ने से कुछ समय देश में शांति की संभावनाएं भी प्रवल होती है

Shahnawaz Qadri आप की बात को नकारा नहीं जा सकता

Drashish Tiwari भाई साहब बड़ा बेहूदा कुतर्क दिया है आपने।आपका कुतर्क कुछ ऐसा है जैसे बीमारी ठीक करने को इंजेक्शन लगाना जरुरी तो है।पर डर इस बात का है की कही इंजेक्शन से स्किन में छेद न हो जाये।या सुई अंदर टूट न जाये इसलिए इंजेक्शन न लगाया जाये। Nonsense post

Rajesh Kumar Singh थेथरलॅाजी…

Irfan Khan देश का आर्थिक शोधन समय समय पर ज़रूरी है। कड़वी दवाई का साइड इफ़ेक्ट तो होता ही है।

Pankaj Chaturvedi अब देखिये जनधन खातों का खेल, सुदूर गांव में खातों में दो लाख के आस पास जमा होगा फिर निकाला जायेगा, कई करोड खाते हें गणित लगा लें . ढाई लाख से ज्यादा कि राशि पर पूछताछ होगी सो उससे कम जमा होगा , दिक्कत हमारे नजरिये का हे, विजय बहुगुणा जब इधर होते हें तो राहत के अरबो रुपये का घोटाला करने वाला खलनायक और इधर आ गए तो देव-तुल्य. , जिस काँग्रे पर आरोप हे काले धन का उसके दर्जनों बड़े नेते इस तरफ आ गए यानि सफ़ेद वाले हो गए, शूट द मेसेंजर वाली थ्योरी हे, काले धन के मूल पर नहीं सोचना शाखाओं पर पानी छिडकना, जमीं जायदाद के सर्किल रेट घटा दें , रियल एस्टेट बाज़ार जमीं पर होगा और काला धन असल में सड़कों पर कूड़े में मिलेगा

Sunita Soni Use less thought… You don’t understand economics

Abdul Samid this step of modi ji is very good bt I think it is not for black money holders bcz they may have money in formats other than cash

Alamgir Khan Perfect analysis

Preeti Dubey आज़ यकीन हुआ तर्क सुतर्क और कुतर्क…..काले धन की इतनी उपयोगिता?//वाह साहेब धन्य आपकी सोच धन्य आपकी लेखनी। लिखना अच्छी बात है।लेकिन जो हम बोल रहे है वो केवल भिन्न विचार के कारण बोल रहे है या ये भी ध्यान रख रहे है के इसका सामान्यजन की मानसिकता पे क्या असर पड़ेगा?आप चोरी को बढ़ावा दे रहे है। गज़ब है ।

Satbeer Singh main to sochta tha ki Kejriwal hi akela tha but i m wrong

Sarwjeet Singh काश आप जेसी बुद्धि और सोच वालों के लिए भी एक सर्जिकल स्ट्राइक होता

Rajendra K. Gautam इस फैसले से साफ हो गया है कि अपनी नाकामी को ढँकने और जनता का ध्यान भटकाने के लिये किया गया है। विदेश से काला धन ला नहीं पाये और देश में काला धन खोजने की मुहिम छेड़ कर यह संकेत दिये हैं कि देश की जनता टेक्स चोर है। जनता अपना टेक्स भी दे रही है और परेशानी भी उठा रही है। उसको न तो सुरक्षा मिल रही है और न ही टेक्स से राहत। इससे सिर्फ और सिर्फ जनता ही कष्ट भोगेगी। मजे मरेंगे सिर्फ और सिर्फ टेक्स चोर।

Vivek Dutt Mathuria अब जन धन योजना खाते करेंगे जुगाड का काम….

Madhukar Singh पैसे की तरलता (liquidity) केवल काला धन बर्बाद होने से ही नहीं प्रभावित हो रही है बल्कि आम लोगों की शुद्ध कमाई को नोट बदलने के नाम पर बैंकों में अनिश्चित समय तक रखने से भी प्रभावित होगी। इस तरह नगद आरक्षण अनुपात (cash reserve ratio – CRR) अघोषित रूप से बढ़ गया। अर्थशास्त्र का सारा व्यवहारिक सिद्धांत दरकिनार हो चुका है। ऐसे दौर में मांग कम पूर्ति ज्यादा होने के बावजूद सोने चांदी और अन्य चीजों के दामों में बेतहाशा वृद्धि भी संशय का विषय बन गई है। ऐसे ढेरों अनुत्तरित पहेलियां इस बर्बर पूंजीवादी और बाजारवादी समय की पहचान हैं। अन्य विषयों पर ध्यान आकर्षण कराना खतरनाक है इसलिए मेरी तरफ से इतना ही।

Arvind Gupta मोदी जपान उड गये देशवासी को busy कर के मोदी मोदी नमो नमो नमो

Manju Kumari Badlab prakriti ka niyam hai ye hamlog jante hai,Baba Bhimrab ambedker ka bhi to kahna tha ki agar samajh aur duniya ko bhrast mukta rakhna ho to Har Das saal me note ko basal do,to ye subha kam modijee ne hi kar dala
Ratnesh Gupta Jaisi jiski soch. Ek baat aur isko yadi positive le to logo ki niyat me bhi to badlav ayega aur employee bhi salary ko hi apni dharohar samjhenge  Jo hai thode samay ki pareshani but jindgi bhar ki aasani

Arvind Pathik Beshaq mandi aayegi par mahgayi ghategi to kray shakti bhi badhegi.

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