प्रवर्तन निदेशालय के मनी लॉन्ड्रिंग मामले में कलकत्ता के नगर सत्र न्यायालय ने ओम प्रकाश श्रीवास्तव और अनिल वैलापरम्पिल अब्राहम की जमानत याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए अहम आदेश पारित किया है। अदालत ने अनिल अब्राहम की जमानत याचिका खारिज कर दी है, जबकि ओपी श्रीवास्तव की जमानत याचिका पर अगली सुनवाई 3 जनवरी 2026 को तय की गई है।
एमएल केस संख्या 11 वर्ष 2025 में यह आदेश 22 दिसंबर 2025 को पारित किया गया। अदालत के समक्ष दोनों आरोपियों को ज्यूरिस कोर्ट से ऑडियो वीडियो माध्यम के जरिए पेश किया गया। सुनवाई के दौरान प्रवर्तन निदेशालय की ओर से विशेष लोक अभियोजक उपस्थित रहे, जबकि दोनों आरोपियों की ओर से उनके अधिवक्ताओं ने पक्ष रखा।
अदालत ने ओम प्रकाश श्रीवास्तव के मामले में यह दर्ज किया कि उनकी ओर से प्रवर्तन निदेशालय द्वारा दाखिल आपत्तियों के जवाब के लिए समय की मांग की गई है। न्याय के हित में अदालत ने यह प्रार्थना स्वीकार करते हुए ओपी श्रीवास्तव को 3 जनवरी 2026 तक न्यायिक हिरासत में भेजने का आदेश दिया और उसी दिन उनकी पेशी, जवाब दाखिल करने और जमानत याचिका पर आदेश के लिए तारीख तय कर दी।
अनिल वैलापरम्पिल अब्राहम की जमानत याचिका पर अदालत ने विस्तार से विचार किया। बचाव पक्ष ने दलील दी कि अनिल अब्राहम 11 जुलाई 2025 से हिरासत में हैं, वह सहारा समूह के केवल मध्य स्तर के वेतनभोगी कर्मचारी रहे हैं, किसी भी मूल एफआईआर में आरोपी नहीं हैं, उनके खिलाफ लगाए गए आरोप झूठे और निराधार हैं तथा उनके कब्जे से कोई आपत्तिजनक दस्तावेज या सामग्री बरामद नहीं हुई है। यह भी कहा गया कि जांच पूरी हो चुकी है और सह-आरोपी को पहले ही जमानत मिल चुकी है, इसलिए समानता के आधार पर उन्हें भी राहत दी जानी चाहिए।
इसके जवाब में प्रवर्तन निदेशालय ने जमानत याचिका का कड़ा विरोध किया। ईडी ने अदालत को बताया कि अनिल अब्राहम सहारा समूह में कार्यकारी निदेशक के पद पर थे और संपत्तियों की बिक्री तथा उससे प्राप्त धनराशि के प्रबंधन के लिए गठित संकट प्रबंधन दल के अहम सदस्य थे। ईडी के अनुसार, उन्होंने अपराध की आय से बनी संपत्तियों की बिक्री में सक्रिय भूमिका निभाई, नकद लेनदेन की जानकारी होने के बावजूद उसे छिपाने और हेरफेर में मदद की और सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के बावजूद बिक्री से प्राप्त धनराशि को सहारा-सेबी खाते में जमा नहीं कराया गया।
अदालत ने अपने आदेश में कहा कि धन शोधन निवारण अधिनियम के तहत जमानत के लिए कड़े वैधानिक मानक निर्धारित हैं और मनी लॉन्ड्रिंग एक गंभीर, सुनियोजित आर्थिक अपराध है, जो देश की वित्तीय व्यवस्था और संप्रभुता के लिए खतरा है। रिकॉर्ड पर उपलब्ध सामग्री के आधार पर अदालत ने प्रथम दृष्टया माना कि अनिल अब्राहम की भूमिका सक्रिय और महत्वपूर्ण रही है और उन्हें सह-आरोपी के समान स्थिति में नहीं माना जा सकता।
अदालत ने यह भी कहा कि यदि अनिल अब्राहम को जमानत पर रिहा किया गया तो गवाहों को प्रभावित करने और सबूतों से छेड़छाड़ की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। इन तथ्यों और परिस्थितियों को देखते हुए अदालत ने अनिल वैलापरम्पिल अब्राहम की जमानत याचिका खारिज कर दी और उन्हें भी 3 जनवरी 2026 तक न्यायिक हिरासत में रखने का आदेश दिया।
कोर्ट ने आदेश की प्रति जांच अधिकारी और प्रेसिडेंसी करेक्शनल होम के अधीक्षक को सूचना और अनुपालन के लिए भेजने के निर्देश भी दिए हैं। अब इस मामले में अगला महत्वपूर्ण मोड़ 3 जनवरी 2026 को आएगा, जब ओपी श्रीवास्तव की जमानत याचिका पर अदालत अपना फैसला सुनाएगी।


