एंटी-मदर कविता

मदर्स-डे पर माँ के बारे में बहुत कुछ लिखा गया… माँ बहुत महान होती है, माँ की पूजा करनी चाहिए, माँ जैसी कोई नहीं आदि आदि… लेकिन आज की मॉडर्न माँ के बारे में क्या कहेंगे? सभी अख़बारों ने परंपरागत रूप में “अच्छी माँ” के बारे में ही छापा- कविता, कहानी, लेख सब में… लेकिन सतना से प्रकाशित अख़बार “मध्यप्रदेश जनसंदेश” के रविवारीय परिशिष्ट “शब्दरंग” में इसका उल्टा देखने को मिला. मदर्स-डे पर प्रकशित रवि प्रकाश मौर्य की ये कविता इन दिनों काफी चर्चित हो रही है.

मॉडर्न मां

-रवि प्रकाश मौर्य-

कलयुग के समय में
सतयुगी बच्चों की उम्मीद बेमानी है
कलयुग है तो
मांएं एवं बच्चे भी कलयुगी होंगे
इसी कलयुगी समय में
डिब्बाबंद दूध पीकर बड़े हुए बच्चे ने
एक दिन मां से पूछ लिया
मैं क्यों निभाऊं बेटे का फर्ज
मुझ पर तो नहीं दूध का कर्ज
तुमने मुझे पैदा किया…
अपने सुख की खातिर
तुमने मेरा गू-मूत भी नहीं किया
पहना दी नैपी, और
छोड़ दिया क्रेच में…
अपने काम पर जाने के लिए
मुझे कभी लाड़ किया, न दुलार
खिलौनों से खेल बड़ा हुआ मैं
उंगली पकड़ न चलना सिखाया तुमने
वाकर से चलना मैंने सीखा
कभी बांहों का झूला नहीं झुलाया तुमने
पालने में झूल मैं सोया
थोड़ा बड़ा हुआ तो
डाल दिया बोर्डिंग में
मैंने कभी जाना ही नहीं
कि क्या होती है ‘मां’
मैं कैसे मानूं तुम्हें अपनी मां
आखिर क्या किया तुमने मेरी खातिर
तुम्हारे अंतरंग क्षणों का प्रतिफल हूं मैं
तुमने मुझे पैदा किया अपने लिए
क्योंकि नहीं होता यदि मैं
तुम कहलाती बांझ, और
उपेक्षित होती समाज में
….
सदियों बाद किए गए
इन कलयुगी सवालों का
कोई जवाब नहीं था मां के पास
वह खामोश थी
रिश्तों के नए समीकरण से।

भड़ास की खबरें व्हाट्सअप पर पाएं, क्लिक करेंBhadasi Whatsapp Group

भड़ास के माध्यम से अपने मीडिया ब्रांड को प्रमोट करने के लिए संपर्क करें- Whatsapp 7678515849



Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *