अशोक कुमार पांडेय-
मेरे चैनल पर एक मित्र से बातचीत रिकार्ड हो रही थी, एक मित्र बोल गए- कोई मर्द नहीं बचा है, मैंने रोका कहा भाई साहब यह वाली भाषा नहीं चल पाएगी। उन्होंने समझा और फिर दूसरा वाक्य बोला।
एक प्रोग्राम के दौरान दो दलों के समर्थन पर टिकी भाजपा सरकार के लिए बैसाखी शब्द का इस्तेमाल हो गया, Sujata ने टोका, अपाहिजों का अपमान क्यों? बैसाखी उनकी मज़बूरी होती है। आगे किसी को दुहराने नहीं दिया।
गालियाँ मेरी भाषा का हिस्सा कभी नहीं रहीं। नजदीकी दोस्त बताएंगे कि नशे में भी उन्हें गालियाँ देने से रोका है। लेखक हूँ, भाषा मेरी चेरी नहीं आराध्य सी है।
कुणाल के समर्थन के बावजूद मैंने लिखा था गालियाँ न होतीं तो बेहतर होता। वरुण ग्रोवर इसीलिए प्रिय हैं। निजी मुलाक़ात में रसरंजन के दौरान भी उन्हें सभ्य पाया। नीरज घायवान की फिल्में कभी नहीं छोड़ता, जाति जैसे सवाल पर उनकी संवेदना अद्भुत है। किसानों से लेकर हर सवाल पर जनता के साथ खड़े होकर बोलने वाले सुशांत भी ट्रॉल्स को गालियाँ नहीं देते। राहुल गांधी जितना हमला किस पर हुआ होगा, लेकिन एक अभद्र शब्द नहीं। इसीलिए ये लोग मुझे प्रिय हैं।
आप मेरे भाषा के संस्कार को ‘ब्राह्मणवादी’ कहना चाहें शौक़ से कहें।मैं गालियों को फिल्मों और सोशल मीडिया का हिस्सा बनते नहीं देख सकता। ट्विटर, इंस्टा वगैरह पर जाने क्या-क्या सुना है लेकिन पलट कर गाली देना उचित नहीं लगा और न ही उसे तमगा बनाकर सहानुभूति बटोरना। अवॉइड किया या फिर ब्लॉक कर दिया। इंस्टा तो टीम को सौंप दिया इसलिए अक्सर खुद देखता भी नहीं। तीखा बोलना आता है, बदतमीजी भी, लेकिन गालियाँ नहीं। गंद से गंद साफ नहीं होती।
पिछले दस सालों में सबको ट्रॉल में बदल देना भाजपा की सबसे बड़ी सफलता है।
फुले ने अपने जीवन में भी ब्राह्मणवादियों का कोप झेला, मुकाबला किया और अब उन पर बनी फिल्म को रोकना भी उनकी ही साजिश है। उस खबर के आने के बाद से ही लगातार लिखा है, चैनल पर बोला है, लेकिन अनुराग की भाषा का समर्थन नहीं कर सकता। निजी दुश्मनी नहीं है कोई, सिर्फ़ एक डायलाग अपनी एक फिल्म में उपयोग करने पर क्रेडिट दी थी उन्होंने और यह उदारता कभी नहीं भूलूँगा। बात सिद्धांत की है।
गांधी ने लाठियों के बदले अहिंसा सिखाई है, गालियों के बदले गाली नहीं। देर से समझा हूँ लेकिन अब प्रैक्टिस करने की कोशिश करता हूँ।
तीस साल का सार्वजनिक जीवन है लगभग, अगर उसमें किए/कहे से कुछ सिद्ध नहीं हुआ तो खुद को सर्टिफिकेट देने से कुछ नहीं होगा। अगर आपको सिर्फ़ ‘ब्राह्मण’ लगता हूँ तो बंधु-बांधवियों से सादर आग्रह है कि मुझसे दूरी बना लें। जिन लोगों ने पोस्ट लिखकर बाक़ायदा इशारे किए हैं उन्हें सलाह निर्भीक बनें, नाम लें। मेरे पास ऐसा कोई प्राधिकार कभी नहीं रहा कि किसी का कुछ बिगाड़ सकूँ। बना सकूँगा तो आपके ऐसे लिखे के बावजूद कोशिश करूंगा। आप आराम से अपनी प्रगतिशील दुनिया चुन लें और उसमें से मुझे बहिष्कृत कर दें। मैं दुख व्यक्त नहीं करूंगा और न ही कोई शत्रुता पालूँगा। बस इतना ही।


