
मृत्युंजय कुमार-
आप देख रहे हैं- ‘द वायर’ और कांग्रेस नेता जयराम रमेश के पैखाने से लाइव हैं क्रांतिकारी पत्रकार आरफा खानम शेरवानी। क्रांतिकारी पत्रकार देश को दिखा रही हैं कि तपस्वी नेता का पैखाना कैसा होता है। और कांग्रेस के तपस्वी कमोड पर बैठकर कैसे सात्विक तरीके से मल विसर्जन करते हैं।
निडरता और बेकाबी इतनी कि मुंह पर रुमाल रखे बिना ही पी-टू-सी दे रही हैं। संभवतः जयराम रमेश सात्विक मल निकालते हैं, जिसमें कोई दुर्गंध नहीं होता। शायद उससे क्रांति की भीनी खुखबू भी आती हो। बाकी इसका डीटेल तो खुद आरफा जी ही दे सकती हैं।
वैसे इस तरह की रिपोर्टिंग देखना या शेयर करना मुझे पसंद नहीं। लेकिन यही मैडम कल-परसों राहुल गांधी के सुर-में-सुर मिलाते हुए लोकप्रिय टीवी एंकर रुबिका लियाकत को ‘चमची’ कह रही थी। वैसे ध्यान रखिए कि आरफा खानम चमची बिल्कुल भी नहीं हैं। क्योंकि जहां तक मुझे पता है कोई भी भला या बुरा आदमी/औरत शौचालय में चम्मच लेकर तो नहीं जाता। भले ही वह शौचालय किसी जयराम तपस्वी का हो या फिर उसमें सत्व हंगा जाता हो।
यह वीडियो खासतौर से पत्रकारिता के छात्रों के लिए उपयोगी हो सकता है। जब हम माखनलाल और फिर IIMC में पत्रकारिता पढ़ा करते थे, मास्टरों और सीनियर्स ने हमारे सामने इन्हीं पैखाने वाले पत्रकारों का हौवा खड़ा किया था। मीडिया एजुकेशन का इकोसिस्टम भी कुछ ऐसा ही रहा है। जिसमें प्रायः ‘एडवर्सिरी जर्नलिज्म’ को ग्लोरिफाई किया जाता है।
यहां मार्क्सवादी फलसफे की तर्ज पर आपको पत्रकारिता के लिए एक दुश्मन खोजना होता है और फिर उसे जी भर कर गालियां देनी होती है। और इस तरह क्रांतिकारी पत्रकारिता का समां बंधता जाता है। यहां राजनैतिक और आर्थिक लाभ-हानि की दृष्टि से दोस्त-दुश्मन बदलते भी रहते हैं।
हालांकि हचकिन्स कमिशन से लेकर मैकब्राइड रिपोर्ट, भारत के दूसरे प्रेस कमिशन और प्रेस काउंसिल की गाइडलाइंस तक में इस तरह की पत्रकारिता को विकासशील देशों के लिए विनाशकारी बताया गया है।
किसी भी प्रमुख पश्चिमी या भारतीय संचारशास्त्री ने इसे विकासशील देशों के लिए उचित नहीं बताया है। लेकिन निजी फायदे और चंदे के लिए यूट्यूबर पत्रकारों और उनके मित्र मीडिया एजुकेटर्स ने ‘एडवर्सिरी जर्नलिज्म’ का शिगूफा छेड़ा रखा है। इस रास्ते पर चलने की कोशिश में हर साल साल पत्रकारिता के सैकड़ों अच्छे छात्र बेरोजगारी या चंदाखोरी की ओर निकल अपना करियर बर्बाद कर लेते हैं।
जहां तक एक्सपर्ट और रिसर्च की बात है, विकासशील देशों के लिए डेवलमेंट जर्नलिज्म या पार्टिसिपेंट मीडिया थ्योरी को विकल्प बताया गया है। लेकिन अगर भारत में आप ऐसा करें तो किसी शौचालय में खड़े होकर आपको ‘गोदी मीडिया’ या ‘चमचा/चमची’ कह दिया जाएगा।
पत्रकारिता छात्र ध्यान रखें कि ‘एडवर्सिरी जर्नलिज्म’ का ये रास्ता आपके करियर और पत्रकारिता के साथ-साथ देश के भविष्य को भी गर्त में ले जा रहा होता है। हां अगर किसी को चंदा मांगकर खाने की लत लगी हो तो उसके लिए यह एक विकल्प हो सकता है। बिना नहाए, गंदे कुर्ते और बिखरे बालों में घटिया किस्म का वीडियो-विश्लेषण करना शुरु करिए और ‘जनवादी’ पत्रकारिता के नाम पर 100-200 का चंदा वसूलिए।
लेकिन जो छात्र पत्रकारिता में अपना करियर बनाना चाहते हैं। रेगुलर नौकरी, ठीक-ठाक इनकम चाहते हैं और देश-समाज को अपना योगदान देना चाहते हैं। वे मुख्यधार की सूचनात्मक पत्रकारिता या फिर डेवलमेंट जर्नलिज्म की ओर देखें। नेताओं के शौचालय में घुसकर रिपोर्टिंग करने वाली आरफा को भले दुर्गंध न आए। लेकिन इस तरह की पत्रकारिता का दुर्गंध बहुत दूर तक फैलता है।
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