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सुख-दुख

अंतिम पार्ट : मुन्ना भाई कुछ दिन ग़ाज़ियाबाद रहने पर गाँव रामनगर आने की जिद करते, यहाँ महीने भर रहकर पुनः ग़ाज़ियाबाद जाने की जिद करते!

धीरे-धीरे वह पैरों पर चलने में असमर्थ और कमजोर होते गए और बिस्तर पर ही पड़े रहते, उन्हें उठाकर नित्यकर्म कराया जाता और खाना खिलाया जाता!

बद्री प्रसाद सिंह-

अरुण कुमार सिंह दोहरी हड्डी के स्वस्थ व्यक्ति और दमदार आवाज़ के स्वामी थे। बढ़ती उम्र के साथ उनका वजन भी बढ़ने लगा और धीरे-धीरे उन्हें डायबिटीज़ और रक्तचाप की बीमारी ने घेर लिया लेकिन खानपान में परहेज न कर पाने के कारण शरीर में व्याधियाँ बढ़ने लगी परिणामस्वरूप कमजोर होते गए।

२ वर्ष पूर्व गांव में एक शाम मुझे व जगदीश भाई को बुला कर मुन्ना भाई ने विभिन्न सब्ज़ियों को छोटे टुकड़ों में काट कर मिक्सी से रस निकाल कर पीने की सलाह देते हुए कहा कि इनका रस पीने से शरीर का वजन नहीं बढ़ता। मैंने कहा कि यह हमें क्यों बता रहे हैं, जगदीश भाई का वजन औसत से कम है (Underweight) और मेरा वजन सामान्य है, आपको इसकी जानकारी है तो आप इसका सेवन क्यों नहीं करते? (उस समय उनका वजन १२५ किलो था।)

वह हँसने लगे और कहा कि वह अब इसका सेवन करेंगे, लेकिन वह दिन कभी नहीं आया।

पिछली सर्दी से वह बीमार रहने लगे थे। एक बार वह मैक्स हॉस्पिटल दिल्ली में हृदय संबंधी बीमारी के इलाज के लिये भर्ती हुए थे, तबीयत में सुधार होने पर रात में ही डिस्चार्ज के लिए जिद करने लगे। उनका छोटा बेटा सोनू व मेरा छोटा बेटा आशीष रात १० बजे तक अस्पताल में उनकी देखभाल कर अपना फोन नंबर ड्यूटी डॉक्टर को देकर वापस लौटे। आशीष मेरी बेटी के घर तथा सोनू अपने मित्र के घर चला गया। रात १ बजे अस्पताल से आशीष के पास फोन आया कि आपका मरीज़ अभी घर जाने की जिद कर रहा है व शोर मचाकर डाक्टर नर्स व अन्य मरीज़ों को परेशान कर रहा है।

आशीष के वहाँ पहुँचने पर मुन्ना भाई ने ग़ाज़ियाबाद अपने घर ले चलने को कहा आशीष ने पहले तो समझाया, ज़िद करने पर डांट कर चुप करा कर सुबह डिस्चार्ज कराने को कह कर सुलाया। सुबह सोनू भी आ गया, दोनों उन्हें अस्पताल से घर ले आए।

मुन्ना भाई १५ माह से लगातार बीमार चल रहे थे। कुछ दिन ग़ाज़ियाबाद रहने पर गाँव रामनगर आने की जिद करते, यहाँ महीने भर रहकर पुनः ग़ाज़ियाबाद जाने की जिद करते। बच्चे बार-बार गाँव से ग़ाज़ियाबाद और वहाँ से वापस गांव लाने में परेशान हो जाते थे। दोनों जगह तबीयत अधिक खराब होने पर अस्पताल में भर्ती कराये जाते, सुधार होते ही अस्पताल से घर जाने के लिए शोर करते। दिल्ली में मैक्स व पुष्पांजलि हॉस्पिटल, प्रयागराज में नंदिनी अस्पताल जार्ज टाउन में भर्ती कराया जाता था।

धीरे-धीरे वह पैरों पर चलने में असमर्थ और कमजोर होते गए और बिस्तर पर ही पड़े रहते। उन्हें उठाकर नित्यकर्म कराया जाता और खाना खिलाया जाता। १६ अप्रैल की सुबह फेफड़ों में परेशानी के कारण रामनगर से नंदिनी अस्पताल लाया गया, डॉक्टरों ने स्थिति क्रिटिकल बताया, पूरा परिवार वहाँ आ पहुँचा। प्रयागराज के मित्र व परिचितों का आना जाना लगा रहा।

तीसरे दिन मैं गांव वापस आ गया और २० अप्रैल को मैं एक विवाह में सम्मिलित होने लखनऊ जा रहा था कि रास्ते में भतीजे गुड्डू ने फोन पर अस्पताल के डॉक्टर से बात कराई जिसने बताया कि फेफड़े, गुर्दे तो प्रभावित थे ही, अब हृदय भी जवाब दे रहा है और ५-६ घंटे तक ही वह चल सकेंगे। मैं रास्ते से लौटकर नंदिनी अस्पताल पहुँचा और पाया कि हृदय की धड़कनें धीरे-धीरे कम होती जा रही हैं, सूचना मिलते ही सभी भाई भतीजे, संबंधी व परिचित वहाँ पहुँचने लगे और लगभग ५ बजे भाई नश्वर संसार से मुक्त होकर अनंत आकाश में समाहित हो गये।

अस्पताल से हम उन्हें अपने घर लाए जहाँ समाचार पाते ही मित्रों, परिचितों की शोकाकुल भीड़ इकट्ठा होने लगी और २१ अप्रैल को १० बजे दिन पुलिस गार्ड ने शोक शस्त्र कर उन्हें सलामी दी। तत्पश्चात सनातनी मर्यादानुसार शव को बड़े वाहन पर रखकर बादशाहपुर क़स्बे से होते हुए प्रयागराज में पतित पावनी गंगा के रसूलाबाद श्मशान घाट पर अंतिम संस्कार किया गया। अंतिम संस्कार से पूर्व वहाँ भी “गार्ड आफ आनर” प्रयागराज पुलिस ने दिया। मुखाग्नि उनके बड़े पुत्र अभिषेक कुमार सिंह आशू ने दी। रसूलाबाद घाट पर अत्यधिक भीड़ रही। प्रयागराज उनकी कर्मभूमि रही थी। उनके समय के तथा बाद के छात्रों, नेताओं व्यापारियों, संबंधियों आदि ने अश्रुपूरित नेत्रों से उन्हें अंतिम विदाई देकर उनकी आत्मा की मुक्ति की कामना की।

वहाँ से गांव आकर हमने ९ दिन तक पिंडदान कर मृतात्मा को जल दिए, दसवें दिन मुंडन व ११वें दिन (३० अप्रैल) शुद्ध तथा आत्मा की शांति के लिए कर्मकांड किया गया तथा महाब्राह्मणों एवं ब्राह्मणों को दान आदि देकर संतुष्ट किया गया। २ मई को तेरहवीं की गई जिसमें अतिथियों को भोजन कराया गया। इस दिन भी अभूतपूर्व भीड़ रही। ४ मई को वार्षिक श्राद्ध कर दिया गया जिससे कोई भी शुभ कार्य न रुके। परम्परा है कि वार्षिक श्राद्ध तक शुभ कार्य नहीं किए जाते।

कल तक सभी रिश्तेदार अपने घर लौट गए हैं। अब घर में शांति के साथ नीरवता व शोक छाया हुआ है। भ्रम लगता है कहीं से मुन्ना भाई तेज आवाज़ में हमें पुकारेंगे या डाँटेंगे लेकिन फिर याद आता है भाई जिस लोक में चले गए हैं वहाँ से न वह लौटेंगे न उनकी आवाज़ सुनाई देगी। बड़े भाई का साया हमारे ऊपर से उठ गया है और शेष रह गयी हैं उनकी मधुर स्मृतियाँ,जिसके सहारे हमें शेष जीवन काटना है। हमारे परिवार का शेर,रखवाला, रहनुमा व शान चला गया और हम शून्य में भटकने को अभिशप्त हैं। मुन्ना भाई अमर हैं, अमर रहेंगे।

निदा फ़ाज़ली के शब्दों में-

“तुम्हारी कब्र पर मैं फ़ातिहा पढ़ने नहीं आया,
मुझे मालूम था तुम मर नहीं सकते ।
तुम्हारी मौत की सच्ची ख़बर जिसने उड़ाई थी,
वो झूठा था, वो तुम कब थे?
कोई सूखा हुआ पत्ता हवा से गिर टूटा था,
वो तुम कब थे?”

स्मृतिशेष मुन्ना भाई को विनम्र श्रद्धांजलि एवं शत शत नयन।

लेखक बद्री प्रसाद सिंह रिटायर आईपीएस अधिकारी और दिवंगत अरुण कुमार सिंह मुन्ना के छोटे भाई हैं।

पिछला भाग…

अरुण कुमार सिंह मुन्ना (पार्ट 6) : बाद में सांसद धनंजय सिंह ने मुझे बताया कि यही प्रश्न प्रमुख सचिव गृह ने उनसे भी किया था लेकिन उन्होंने नकार दिया!

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