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हिंदुस्तान से रिटायरमेंट के पहले और बाद अवधेश जी ने मां सरस्वती की जमकर सेवा की!

अकु श्रीवास्तव-

मेरी इच्छा के बावजूद मुझे साफ मना कर दिया गया कि उस गंगा किनारे जाने से कोई फायदा नहीं है. अगर आप वहां जाएंगे भी तो कमरे के बाहर ही शीशे से आप देख पाएंगे और देखने में आपको भी तकलीफ होगी. उनको भी होगी क्योंकि वह आपसे बात करने की चेष्टा करेंगे और बात नहीं कर पाएंगे.

आप मेरी कसक को समझ सकते हैं और फिर मैंने फैसला किया कि उस गंगा के किनारे तभी जाऊंगा, जब अच्छी खबर आएगी. लेकिन अच्छी खबर नहीं आई. भाई अवधेश प्रीत का गंगा किनारे वाला घर मैंने देखा है. पहले जब वहां गया था तो खुशनुमा माहौल था और उनकी साहित्यिक अभिरूचियों के साथ किसी साहित्यकार के होने का बोध भी साफ दिखता था. किताबें, सिगरेट और बहुत कुछ उसका हिस्सा थे.

मेरी उनसे पहले मुलाकात भी 15 साल पहले ही हुई. तब मैं’ हिंदुस्तान’ बिहार का नया-नया संपादक होकर गया था और अवधेश प्रीत जी मैगजीन का काम संभालते थे. अखबार को नया स्वरूप देने की कोशिश और स्थानीय खबरों में मानवीय पहलू ज्यादा डालने के लिए उनको अलग किस्म की जिम्मेदारी भी दी गई, जिसे उन्होंने बखूबी निभाया.

हिंदुस्तान से रिटायरमेंट के पहले और बाद मां सरस्वती की सेवा जमकर की. स्वास्थ्य की बाधाओं के बीच भी वह साहित्यिक आयोजन में दिखते रहे. पटना बुक फेयर के एक आयोजन में 2 वर्ष पहले वह साथ थे.

मिलने के और कुछ और लिखने के वायदे भी किए। लेकिन बात आगे नहीं बढ़ स्की. एक हफ्ते पहले ही पटना में चुनाव यात्रा के दौरान उनसे मिलने की विफल कोशिशें के बाद अब यह विफलता स्थाई हो गई है. नमन अवधेश बाबू.

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