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आज संपादकाचार्य बाबूराव विष्णु पराड़कर जी की जयंती है, पढ़िये उनका एक भाषण!

आज संपादकाचार्य बाबूराव विष्णु पराड़कर जी की जयंती है। उनका एक भाषण उनके पौत्र आलोक पराड़कर ने उपलब्ध कराया है जो संयुक्त प्रांतीय चतुर्थ प्रेस कांफ्रेंस में स्वागताध्यक्ष पद से दिया गया था। भाषण में पराड़कर जी ने न सिर्फ हिंदी पत्रकारिता में काशी की देन का स्मरण किया है बल्कि पत्रकारिता में आ रहे बदलावों को भी रेखांकित किया है।


वह समय गया जब पत्रकारी मिशन हुआ करती थी

बाबूराव विष्णु पराड़कर-

मित्रो, काशी में आप लोगों का स्वागत करता हूं और हृदयसे करता हूं। जहां तक मेरा संबंध है यह केवल मौखिक है, अपनी अस्वस्थता और अकर्मण्यताके कारण मैं स्वागत प्रबंध में अब तक कुछ भी हाथ न बंटा सका। जो कुछ किया, मेरे सहयोगी मित्रों ने ही किया और यह उन्हीं के परिश्रम का फल है कि अनेक कठिनाइयों और विपरीत परिस्थिति में भी आज हम आप लोगों के दर्शन से कृतार्थ हो रहे हैं। काशी यद्यपि प्रांतीय राजधानी नहीं है, न कोई औद्योगिक केन्द्र है, पर विद्या का सम्मान सदा से यहां होता रहा है और भारत की संस्कृति का पालन-पोषण तथा संरक्षण प्रधानतः इसी स्थानसे होता रहा है। पत्रकार कला का जन्म यद्यपि अन्यत्र हुआ, पर काशी में भी, विशेषकर हिंदी-पत्रिकाएं यहां बहुत पहले निकली। ‘हरिश्चद्र मैगजीन’ साहित्यमें अपना स्थान कर गई। ‘भारत-जीवन’ अनेक वर्षों तक हिंदी साप्ताहिकों में आदरणीय स्थान पाता रहा। फिर ‘हिंदी-केसरी’ का भी उदय हुआ। सन् १९२० में ही यहां पहले-पहल दैनिक पत्र के रूप में ‘आज’ का जन्म हुआ और उसने हिंदी-पत्रकारी की जो सेवा की, वह सर्वप्रसिद्ध है। फिर ‘सूर्य’ निकला, ‘अग्रगामी’ निकला ।

कुछ कारणों से ‘अग्रगामी’ शीघ्र बन्द हो गया पर ‘सूर्य’ निकलता रहा है। आज तो यहां तीन-तीन दैनिक पत्र निकल रहे हैं और सफलताके साथ निकल रहे हैं। सन् १९२० में यहां किसी भी दैनिक या साप्ताहिकको ५० से अधिक प्रतियां नहीं बिकती थीं। आज एक-एक पत्र की हजार- हजारसे भी अधिक प्रतियां बिक रही है। मांग इससे भी अधिक है पर कागजके अभाव में उसकी पूर्ति नहीं हो रही है। मेरा विश्वास है कि समय सुधरते ही काशीमें समाचारपत्रों की खपत आज से दुगुनी हो जायगी।

केवल प्रचार ही नहीं, विषय, संपादन, समाचार आदि सब बातोंमें काशीके पत्रोंने अन्य हिन्दी पत्रोंको मार्ग दिखाया है। यदि में भूल नहीं रहा हूं तो कह सकता हूं कि हिंदी पत्रोंमें सबसे पहले टेलीप्रिंटर काशी के ‘आज’ ने लिया । इसके पहले यह बातचीत चल रही थी कि इलाहाबाद से काशी तक ‘आज’के लिए एक खास तार लगा दिया जाय। इसके लगाने का सारा खर्च श्री शिवप्रसाद गुप्त देने को तैयार थे, पर तार-विभाग चाहता था कि उस तार के लिए जो कुछ सालाना खर्च बढ़ जाय वह भी ‘आज’ पूरा करे। इस बात पर वह यत्न असफल रहा। कहने का तात्पर्य यह कि प्रधान नागरिकों, औद्योगिक और राजनीतिक केन्द्रों से कुछ दूर रहनेपर भी हिंदी पत्रकारी के लिए काशीने जो कुछ किया है, वह हमारे लिए कम गौरवकी बात नहीं है। मैं कहता हूं कि भविष्यमें भी हमलोग अपने बाहरी सहयोगियों के आगे नहीं तो साथ जरूर रहेंगे।

यह पत्रोंके संबंध की बातचीत हुई परंतु आज हम पत्रकारोंके सामने प्रश्न अपनी वृत्तिका – पेशेका है, जीवन का है। वह समय गया जब पत्रकारी एक मिशन था, एक धर्म था और उसके लिए थोड़े से पत्रकार अपना सर्वस्व दे देते थे। हिंदी में ऐसे अनेक पत्रकार हुए हैं जिन्होंने जन्मगत यही कार्य किया, पर अत्यन्त कष्ट में मरे। यह उन्हीं के परिश्रमका फल है कि हिंदी भाषियों में पत्र पढ़नेकी रुचि उत्पन्न हुई। कालकी गति बदली । अवस्था अत्यंत शीघ्रता से बढ़ने लगी। शिक्षा का भी कुछ अधिक प्रचार हुआ है। गांधी जी के असहयोग आंदोलन ने साधारण जनतामें भी देशकी स्थिति जानने को उत्सुकता उत्पन्न कर दी। पत्रोंकी मांग बढ़ी । स्वभावतः इन क्षेत्रोंमें अब वह लोग आने लगे जिनका दृष्टिकोण लाभका है- मिशन नहीं है। पहले जहां इस क्षेत्रमें केवल वही युवक आते थे जो देशप्रेम की भावनासे प्रेरित होकर इस साधन द्वारा देश-सेवा करना ही अपना कर्त्तव्य समझते थे, अब वह भी आने लगे हैं जो इनके द्वारा सुख- पूर्वक जीवन-निर्वाह भी करना चाहते हैं। अतएव हम चाहते हैं कि केवल पैसेवाले ही इस परिवर्तित स्थितिसे लाभ न उठावें, हमें भी अपने परिश्रमका उचित पुरस्कार मिले।

आज मुख्यतः पत्रकारों के सम्मुख यही प्रश्न उपस्थित है। इसके लिए अब तक भित्र- भिन्न प्रान्तोंमें भिन्न-भिन्न प्रकार के संघटन हुए है और भिन्न-भिन्न प्रकारके उद्योग किए गए हैं। यू० पी० प्रेस कांफ्रेंस इसी उद्योग का एक फल है। पत्रकारोंकी अवस्था सुधारने की ओर कांफ्रेंस विशेष रूपसे ध्यान दिया है। और मैं समझता हूं कि उसका जो अधिवेशन आज आरंभ हो रहा है, उसमें मुख्यतः यही विषय विचारणीय होगा। इस कांफ्रेंस की स्थायी समिति ने १ अक्तूबर १९४६ को दो उप-समितियां नियुक्त की थीं । इनमे से एक को स्थान-स्थानकी संस्थाओंको सम्बद्ध करनेके नियम और उनके अधिकारोंके सम्बन्धमें विचार कर रिपोर्ट देनेका भार सौंपा गया था। दूसरी को आज्ञा दी गयी थी कि वह एक ऐसी नियमावली बनावे जिसके अनुसार यह कांफ्रेंस केवल उन लोगोंकी संस्था हो जिनकी मुख्य वृत्ति ही पत्रकारी हो। यद्यपि कमेटियां दो थीं पर दोनोंके सदस्य एक ही थे। सर्वश्री महीपतराम नागर, बी० बी० टण्डन और एन० डी० अग्रवाल । तीनों सज्जनोंने विचार करके देखा तो पाया कि दो रिपोर्ट एक दूसरे से बिलकुल अलग लिखना सुविधाजनक न होगा अतः तीनों सज्जनोंने एक ही रिपोर्ट तैयार करके प्रधानमन्त्रीके पास भेज दी है। वह आप लोगोंके सामने विचारार्थ उपस्थित की जायगी। इसके संबंध में मैं स्वयं कुछ कहना नहीं चाहता था पर एक बातपर कुछ कह देना आवश्यक मालूम होता है।

कमेटीकी राय है कि केवल वे ही पत्रकार इसके सदस्य हों जिनका पत्रमें किसी प्रकारका स्वामित्व न हो अर्थात् उसके लाभका कुछ भी अंश जिन्हें न मिलता हो। शुद्ध आदर्शकी दृष्टिसे देखा जाय तो यह उचित मालूम होता है, परन्तु मुझे यह बात कभी व्यावहारिक नहीं मालूम देती । इस प्रान्तमें अधिकांश पत्र ऐसे हैं जिनके संपादक उनके मालिक भी हैं और यदि पत्रमें लाभ हो तो उन्हें उसमें अंश मिल सकता है। यदि सब- कमेटीने जो राय दी है, उसीके अनुसार सदस्यों की योग्यता मान्य कर ली जाय तो मुझे भय है कि कम-से-कम हिंदी उर्दूके अधिकांश संपादक इस संस्थाके सदस्य नहीं हो सकते। मैं इस पर अधिक कुछ नहीं कहना चाहता, केवल अपना एक संदेह आप लोगोंके सामने उपस्थित कर दिया है। इसका विचार करके ही आप लोग इस संस्थाका भावी संघटन निर्धारित करेंगे, इसमें सन्देह नहीं ।

ट्रेड यूनियन या व्यवसाय संघ सब उद्योग-धन्धोंमें होंगे ही परन्तु उनका भी एक समय होता है। हमें सोचना है कि अपना स्वतन्त्र व्यवसाय संघ हम अभी बना सकते हैं अथवा नहीं। इसके सिवा पत्रकारों की शिक्षा, वार्द्धक्य, बीमारी आदिके समय उनका निर्वाह, सहसा आई हुई विपत्ति के समय उनकी सहायता आदि अनेक विषय विचारणीय है। इस संबंध में इस ओर हमारे प्रान्तकी सरकारने भी कुछ ध्यान दिया है तथा एक कमेटी भी नियुक्त कर रही है, हमें उसका स्वागत करना चाहिए। अन्यान्य प्रान्तों में भी इस संबंध के अनेक प्रयत्न हो रहे हैं।

हमारे लिए यह सौभाग्यकी बात है कि श्री शिवराव जैसे अत्यन्त योग्य पत्रकार और विधानवादी पण्डित हमें सभापति मिले हैं। मैं उनका हृदयसे स्वागत करता हूं और आशा करता हूँ कि उनके नेतृत्वमें सम्मेलन अपना अच्छा संघटन करने में समर्थ होगा।

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