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सुख-दुख

धीरेंद्र मोहन जी ने बताया था- मैंने अपने बच्चों को सीधे पानी में फेंक कर तैरना सिखाया है!

विकास मिश्र-

12-13 साल पुरानी बात है। मेरी भानजी रुचि बहुत उत्साह में थी, बोली-मामा आपके क्रेडिट कार्ड से 27 हजार रुपये लेने हैं 5 या 6 दिनों के लिए, बदले में एक ब्लैकबेरी का फोन मिलेगा, 50 हजार रुपये के हीरे मिलेंगे, जबरदस्त ऑफर आया है एक कंपनी से। मैंने समझाया- यहां कुछ भी मुफ्त नहीं मिलता, जरूर कुछ न कुछ पंगा होगा, लेकिन नई उमर कहां आसानी से मानती है। उसने तर्क दिया कि कंपनी के सेल्समैन ने ऑफर दिया है, वो बस 5 दिन के लिए 27 हजार रुपये ब्लॉक करेंगे। मुझे पता था कि अगर उसके पास क्रेडिट कार्ड होता तो ये काम कर चुकी होती। बहुत समझाता तो भी सौ फीसदी समझ में आता नहीं। मैंने अपना क्रेडिट कार्ड दे दिया। 27 हजार रुपये कट गए।

हफ्ते भर के भीतर ब्लैक बेरी फोन भी आया। हीरे के चार टुकड़े भी आए, लेकिन 27 हजार वापस नहीं आए। हीरे हम यूं ही ज्वैलर के यहां ले गए तो उसने अपने पास से निकालकर वैसा ही पैकेट दिखा दिया। बोला-ये हीरा नहीं बल्कि हीरे की कटाई के जो टुकड़े होते हैं, वो है, 2-2 हजार रुपये में मिलता है ये। ब्लैक बेरी फोन भी 13-14 हजार से ज्यादा का नहीं था। पैसे फंस गए थे। मैंने मान लिया था कि बच्चे को ये सिखाने के लिए मैंने 27 हजार रुपये की फीस चुकाई है कि दुनिया में कुछ भी फ्री में नहीं मिलता।

सीखने के दो ही रास्ते हैं। एक तो ज्ञान, दूसरा अनुभव। कई बार ज्ञान से ज्यादा बढ़िया अनुभव सिखाता है। 2013 में प्रयागराज में कुंभ लगा था। सपरिवार प्रयागराज गया था। बेटे समन्वय की उम्र उस वक्त 12-13 साल थी। मुझसे पूछा-पापा क्या मैं अकेले घूमने जा सकता हूं। मैंने कहा-हां चले जाओ, मोबाइल भी दिया, बताया कि अगर तुम्हें लगे कि तुम भटक गए हो, तो किसी ऐसी जगह खड़े होकर फोन करना, जहां कोई बड़ा निशान हो। श्रीमती जी ने एतराज जताया-इतनी भीड़ में अकेले क्यों भेज रहे हैं। मैंने कहा- कब तक भीड़ से बचाओगी, जीवन के पाठ वहीं से सीखकर आएंगे।
2001 में मैंने मेरठ में दैनिक जागरण ज्वाइन किया था। मालिकानों की नई पीढ़ी ने कमान संभाल ली थी। तब देवेश जी यानी देवेश गुप्ता मेरठ, देहरादून, अलीगढ़ और आगरा देखते थे। उम्र मेरे ही आस पास थी। उनसे केमेस्ट्री शानदार रही। उनके पिताजी धीरेंद्र मोहन जी से तो मेरी और शानदार बनी, बहुत मानते थे, बातचीत होती थी तो अनुभवों का खजाना लुटाते थे। एक दिन उन्होंने किसी संदर्भ में बताया-‘देखो बच्चे को तैराकी सिखाने के दो तरीके हैं, एक तो पानी के भीतर सिखाओ, स्विमिंग पूल में ट्रेनर लगवाकर सिखाओ। दूसरा बच्चे को सीधे पानी में फेंको, बाहर से नजर रखो। डूबने लगे तो बचाओ..। मैंने अपने बच्चों को सीधे पानी में फेंककर तैरना सिखाया है।’

मुझे भी लगता है कि मैंने जीवन में जो कुछ भी सीखा, अध्ययन से ज्यादा अनुभव से सीखा। दूसरों को भी अनुभव से ही सिखाया। फील्ड भी ऐसी मिली, जिसमें रोजाना नए अनुभव होते हैं और ये अनुभव कुछ न कुछ सिखा जाते हैं। एक उदाहरण मैं बार-बार देता हूं। अगर कमरे में कोई मोमबत्ती जल रही है, कोई बच्चा, बार-बार उसकी लौ को छूना चाहता है तो स्वाभाविक है कि आप उसे रोकेंगे, दूर करेंगे। मेरा मानना है कि अगर बच्चा बार-बार लपट छूने की तरफ बढ़ रहा है तो एक बार उसका हाथ पकड़कर उसकी उंगली मोमबत्ती से छुआ दीजिए। बच्चा चाहे जिस उम्र का हो, दोबारा मोमबत्ती की लौ की तरफ नहीं बढ़ेगा।

मेरे बेटे समन्वय को दो साल की उम्र में ही दो-दो बार लगातार निमोनिया हो गया था। डॉक्टर ने ठंडी चीजें, खास तौर पर कोल्ड ड्रिंक पीने से मना किया था, वो भी कम से कम 14 साल की उम्र तक। लेकिन बाल मन, कैसे न मचलता कोल्ड ड्रिंक पर। जिस रात चुपके से फ्रिज से कोल्ड ड्रिंक निकालकर पीते, अगली सुबह खांसी-जुकाम उनकी चुगली कर देता था। जब कुछ समझने लायक हो गए तो मैंने कभी मना नहीं किया, कहा कि पीयो, दवाई खिला देंगे। जब जब कोल्ड ड्रिंक पी, तब-तब बीमार हुए। खुद समझ में आ गया कि ये उनके लिए हानिकारक है।

मैं बहुत करीब से देख रहा हूं कि लोग अपने बच्चों को अनुभव से बचा रहे हैं। माता-पिता का मोह उन्हें अभिभावक नहीं बनने दे रहा है। बच्चे के सामने ज्ञान उड़ेल रहे हैं। उसे जिंदगी का अनुभव नहीं दे रहे हैं। अभी कुछ दिन पहले ही मेरे एक प्रियजन ने फोन किया, उनका बेटा अपने दोस्त के साथ कहीं घूूमने जाना चाहता था। वो चाहते थे कि मैं मना करूं। मैंने उन्हें समझाया- भेज दो। आज रोकोगे तो कल बिना बताए, कोई और बहाना मारकर, झूठ बोलकर घूमने जाएगा। बेहतर है कि इतना कम्युनिकेशन और उदारता रखो, ताकि बच्चे को झूठ न बोलना पड़े।

अच्छा, अभी पहली वाली कहानी का क्लाइमेक्स रह गया। जिस कंपनी के एक्जीक्यूटिव ने मेरी भानजी रुचि रुचि शुक्ला को भरमाकर 27 हजार रुपये हड़पे थे, रुचि ने उसका पता लगाकर उसके गोदाम पर धावा बोल दिया वो भी मेरी जानकारी के बगैर। हम लोग रहते थे गाजियाबाद के शालीमार गार्डेन में, कंपनी का गोदाम था मेहरौली और छतरपुर के बीच। रुचि ने अकेले ही संग्राम छेड़ दिया। दो या तीन बार जाना पड़ा था। उसने ब्लैक बेरी फोन और तथाकथित हीरे वापस करके एक-एक पैसा वसूल किया। यही नहीं पांच दिन ब्लैक बेरी फोन भी इस्तेमाल किया गया। लड़ने की शिक्षा हमने नहीं दी थी, हमने तो बस मजबूत बनाया था। उसने सबक भी सीखा और इस सबक की फीस भी वापस ले ली।

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