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जॉब के लिए ज्ञान नहीं, बड़े संस्थान का ठप्पा जरूरी है!

प्रियांशी सिंह-

सिर्फ हिंदी ही नहीं, बड़े संस्थान में न पढ़ना भी बनाता है व्यक्ति को असहाय.., मीडिया जिसे लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माना जाता है। कहा जाता है यह एक ऐसी राह है जहां एक व्यक्ति स्वयं का विकास करता है और अपने ज्ञान को बढ़ाता है। यहां लोगों को समान भाव से देखा जाता है और इसका कार्य लोगों को जागरूक करना व उन्हें सही मार्ग दिखाना होता है। लेकिन आज की मीडिया का एक अनोखा रूप देखा मैंने जो किताबो में मुद्रित मीडिया की परिभाषा से बिल्कुल भिन्न है। क्योंकि आज का मीडिया ऑर्गेनाइजेशन अपने यहां ज्ञान से ज्यादा ऊंचे संस्थाओं के ठप्पे को तबज्जुब देता है।

एक छात्रा जो कड़ी मेहनत करता है रोज सुबह उठकर अखबार पड़ता है बड़ा पत्रकार बनने का सपना देखते हैं और ऊंचाइयों को छूना चाहता है। जैसे ही वह पत्रकारिता के क्षेत्र में अपनी स्नातक की पढ़ाई अपने शहर की यूनिवर्सिटी से पूरी कर लेता है उसके पत्रकार बनने के सपने में जंग लगने लगती है। क्योंकि जब वह जॉब के लिए किसी संस्थान में खड़ा होता है तो उसके ज्ञान को उसने कहां से पढ़ाई की है उससे आंका जाता है।

यदि छात्र ने पत्रकारिता की पढ़ाई IIMC यानी भरतीय जनसंचार संस्थान , जामिया मिल्लिया इस्लामिया, या माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय से कर ली तो उसे पत्रकारिता की सर्वश्रेष्ठ डिग्री हासील है। उसके एक अच्छे पत्रकार के गुण सम्मिलित है उसे तबज्जुब देना सभी मीडिया हाउसों का कर्तव्य सा बन गया हो मानो।

लेकिन यदि छात्र ने लखनऊ विश्वविद्यालय से पढ़ाई की है या अन्य किसी यूनिवर्सिटी से तो वह एक उत्तम पत्रकार नहीं हो सकता। उकसी CV डॉउनलोड तो होगी परंतु उसका इंटरव्यू नहीं होगा। बिना उसकी काबिलियत देखे यह निर्धारित कर लिया जाएगा कि वह उस पोस्ट के काबिल नहीं है।

एक सवाल अंतरात्मा को झझकोर रहा है कि ज्ञान और अच्छे पत्रकार बनने के लिए क्या आवश्यक है। अच्छे संस्थान की पढाई या सच में सूझ बूझ और काम करने के लिए उसकी निष्ठा। इस लेख से बस यह संदेश देना चाहती हूं कि मौका हर किसी को देना चाहिए क्योंकि बिना चखे किसी चीज का स्वाद नहीं आंका जा सकता। फिर आप तो उच्च पद पर आसित होकर एक व्यक्ति का भविष्य आंक रहे हैं।

आपको शायद इसका अनुभव न हो लेकिन कई दफा आपके यह निर्णय एक व्यक्ति को जीवन से हार मानने को मजबूर करते हैं। क्योंकि एक देशी शैली में पढ़ा भारतीय पहले तो अपनी हिंदी को मजबूत करता है फिर कठिन संघर्ष करते हुए वहां तक पहुंचता है लेकिन आपका यह बड़े संस्थान का ठप्पा उसे तोड़ कर रख देता है। शायद उसे असहाय कर देता है और एक पत्रकार स्वयं के अंदर अपनी सभी अच्छाइयों को मार देता है।

प्रियांशी सिंह
लखनऊ

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6 Comments

6 Comments

  1. Prabhanjan bhadauriya

    November 11, 2021 at 9:01 pm

    सबसे ज्यादा जरूरी आपके लिए अपनी हिंदी ठीक करना है। लेख में बहुत सारी गलतियां हैं।

    • Anshul Gaurav

      January 1, 2022 at 2:44 am

      श्री प्रभंजन भदौरिया…..आप लेख की गलतियो को गोली मारें…..आपको लेख पढ़कर, लेखिका जो कहना चाहती है वो समझ आ गया है तो इतना ही काफी है.

  2. Dhirendra

    December 1, 2021 at 9:23 am

    प्रियांशी सिंह यह सँघर्ष यही तक नही है…. आधी जिंदगी भी पत्रकारिता में खुद को साबित कर देने के बाद भी बड़े ब्रांड में काम करने वाले किसी फ्रेशर ,को अधिक तवज्जो मिलता है …. योग्यता नही परिचय को तव्वजो मिलता है, तब पत्रकारिता के पुरोधा बनकर बैठे लोगों पर क्रोध आता है।

    • Anshul Gaurav

      January 1, 2022 at 2:40 am

      सही जवाब……!!!

      • दिव्यांशु सिंह

        January 16, 2022 at 1:12 pm

        मैंने खुद ही हाल ही में पूर्वांचल विश्वविद्यालय से मास कम्युनिकेशन की डिग्री 74% के साथ दूसरे नंबर पर मेडल से हासिल की है । लेकिन सहारा समय के साथ इंटर्नशिप एक्सीलेंट के साथ होने के बावजूद वहां ज्वाइनिंग अधर में लटक गई क्योंकि वे सैलरी देने में असमर्थ हैं। अब लोग ये बोल रहे हैं की एक्सपीरियंस नही है तो हम ट्रेनिंग देंगे फ्री में । ऐसे में मेरे कार्य क्यों नहीं देख रहे ये लोग समझ नही आता । इतने चैनलों में देखा बड़ी बड़ी गलतियां करते हैं लोग लेकिन मुझे अपनी काबिलियत पर पूरा भरोसा है की वे काम करवा कर ही पैसे दें ।
        बिना काम किसी को एक्सपीरियंस कैसे होगा ।

  3. Anshul Gaurav

    January 1, 2022 at 2:39 am

    श्री प्रभंजन भदौरिया…..आप लेख की गलतियो को गोली मारें…..आपको लेख पढ़कर, लेखिका जो कहना चाहती है वो समझ आ गया है तो इतना ही काफी है.

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