बीबीसी का एक इंटरव्यू खूब चर्चा बटोर रहा है। इंटरव्यू में सवालों के घेरे में भारत के पूर्व चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड बैठे हैं।
“D.Y. Chandrachud Faith In the Judiciary Endures” नाम के थंबनेल से अपलोड 23 मिनट से ज्यादा अवधि के इस कन्वर्जेशन में धनंजय चंद्रचूड से अयोध्या के फैसले से लेकर अन्य मुद्दों पर जमकर सवाल जवाब लिया गया है।
बीबीसी के पत्रकार Stephen Sackur ने पूर्व चीफ जस्टिस डी.वाई. चंद्रचूड़ से सवाल उठाते हुए पूछा:
“क्या आप पीएम मोदी के करीब हैं, क्योंकि अयोध्या मामले के फैसले से पहले आपने भगवान राम से मदद मांगी थी?
—क्या यह भारतीय न्यायपालिका में पक्षपात को दर्शाता है?”
आप भी Video देखिए लेकिन उससे पहले कुछ प्रतिक्रियाएं पढ़ें…
रवीश कुमार-
आप भी देखिए कि जनाब अंग्रेज़ी सही बोल रहे हैं कि नहीं। भारत में ये अंग्रेज़ी बोल कर ही लोकप्रिय हो गए। कुछ लोगों ने इस देश में अंग्रेज़ी की डिक्शनरी रट कर अपना काम चला लिया और सब कुछ पा लिया।
पहले ही सवाल में जनाब जेंडर जस्टिस समझाने लग गए जबकि सवाल था कि आपके पिता जज थे, आप जज थे, अपर कास्ट हिन्दू का ही वर्चस्व है। कोई जवाब नहीं इनके पास।
कानूनी मामलों के ज़रिए विपक्ष को टारगेट करने के सवाल पर पूर्व चीफ जस्टिस आंकड़े दे रहे हैं। यहां स्टीवन से एक चूक हो गई। पूछना चाहिए था कि 21300 बेल देने के बाद भी उमर खालिद और दिल्ली दंगों में बंद लोगों को ज़मानत क्यों नहीं मिली?
अपूर्व भारद्वाज-
23 मिनट का वीडियो हर भारतीय पत्रकार को देखना चाहिए। स्टीफन सेकुर ने कुछ नया नहीं किया… बस सवाल पूछे। और वही सवाल सिस्टम की परतें उधेड़ गए।
राम मंदिर, 370, राहुल गांधी… हर विषय पर सवाल थे। सवाल इतने तीखे कि जवाब खामोशी में दब गए।
“क्या आप पीएम मोदी के करीब हैं, क्योंकि अयोध्या मामले के फैसले से पहले आपने भगवान राम से मदद मांगी थी?”
“क्या यह भारतीय न्यायपालिका में पक्षपात को दर्शाता है?”
यही असली पत्रकारिता है। सवाल पूछना। हमारे देश में?
सवाल ऐसे पूछे जाते हैं—
- “आप आम काटकर खाते हैं या चूसकर?”
- “आपको इतनी ऊर्जा कहां से मिलती है?”
- “एक फकीरी तो है आपमें!”
देश के अंजना, अर्णब, अमीश, रुबिका… सीखिए कि सत्ता से सवाल पूछना भक्ति नहीं, हिम्मत मांगता है।
तारीफ से नहीं, सवालों से सच सामने आता है।
देखें बीबीसी का यह पूरा वीडियो….



Anubhava Sinha
February 13, 2025 at 6:41 pm
अफसोसनाक उन लोगों के लिए जो तीखे सवालों का दावा कर रहे हैं। पत्रकार सकुर का चेहरा देखकर ही मुझे हंसी आ गई। लेकिन पूर्व सीजेआई को हंसने की जरूरत नही थी, वह नही हंसे। बीबीसी की मन:स्थिती जिन तत्वों से निर्मित है, वह उसे ऐतिहासिक घटनाओं को समझ पाने से रोकते हैं। दुर्भाग्यवश उसकी एक विचारधारा भी है जो ऐसे व्यक्ति से जुड़ी है जिसने परजीविता को न सिर्फ अपनाया बल्कि उसको अनुयायियों ने अपना लिया लेकिन अब वह छीज रहा है तो उल्टी होती रहती है।आने वाला समय उनके लिए कष्टदायी ही होगा क्योंकि उनका अपराध वैश्विक है।