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बीबीसी हिन्दी को रिपोर्टर का नाम छिपाना क्यों पड़ा?

रंगनाथ सिंह-

बीबीसी हिन्दी के अनुसार “ऐसा कहा जाता है कि राणा सांगा ने खानवा के मैदान पर बाबर के ख़िलाफ़ युद्ध के अलावा कोई बड़ा युद्ध नहीं लड़ा।” विभिन्न लड़ाइयों के दौरान राणा सांगा की देह पर लगे अस्सी घाव लीजेंड बन चुके हैं मगर बीबीसी हिन्दी के संपादकों की नाक पर बैठी मक्खी तक को पता नहीं चला कि उन्होंने कोई “बड़ा” युद्ध लड़ा था!

जाहिर है कि बीबीसी हिन्दी के संपादकों के लिए बड़ा युद्ध वही है जिसमें राणा सांगा बुरी तरह घायल होकर पीछे हटने को मजबूर हो गये थे और दिल्ली पर बाबर का कब्जा हो गया था। चलिए मान लेते हैं कि कहीं पर ऐसा कहा जाता होगा मगर बीबीसी हिन्दी के रिपोर्टर ने यह नहीं बताया है कि ऐसा कहाँ कहा जाता है! यह बात जहाँ कही जा रही थी वहाँ किसने सुनी क्योंकि बीबीसी हिन्दी ने इतने अहम विषय पर रिपोर्टर की बाइलाइन छिपा ली!

मीडिया में कहा जाता है कि जब रिपोर्टर बाइलाइन न देना चाहे तो समझो वह रिपोर्ट उससे जबरदस्ती लिखवायी गयी है या फिर उस रिपोर्ट में कुछ गड़बड़ है जिसकी जिम्मेदारी लेने से वह बचना चाहता है!

बीबीसी के संपादकों को इससे फर्क नहीं पड़ता है कि खानवा के युद्ध में दरअसल हुआ क्या था। खानवा का युद्ध दिल्ली पर कब्जे के लिए लड़ा गया था। खानवा के युद्ध के बाद बाबर का दिल्ली पर कब्जा बरकरार रहा और राणा सांगा को चित्तौड़ वापस जाना पड़ा। राणा की मृत्यु खानवा के युद्ध के करीब एक साल बाद चित्तौड़ के स्वतंत्र राज्य में हुई। ज्यादातर इतिहासकार मानते हैं कि बाबर की जीत का श्रेय तोप और बारूद को जाता है। मध्यकाल में एशिया में स्थापित हुए तीन बड़े साम्राज्य की स्थापना का श्रेय तोप और बारूद को दिया जाता है। इसलिए एक इतिहासकार ने इन्हें गनपाउडर एंपायर कहा है।

बेहतर मिलिट्री टेक्नोलॉजी का युद्ध पर क्या असर होता है इसे हम इजराइल और अरब देशों के युद्ध से समझ सकते हैं। नन्हें से इजराइल ने कई गुना ज्यादा आबादी वाले अरब देशों की संयुक्त सेनाओं को बुरी तरह हराया।

नेपोलियन बोनापार्ट वाटरलू के युद्ध में हारकर भी यूरोप का सबसे बड़ा सैन्य कमांडर माना जाता है मगर नेपोलियन से ज्यादा युद्ध जीतने वाले भारतीय योद्धाओं को उनके आखिरी युद्ध से ही तौला जाता है?

आजादी के बाद भारत की इतिहास-दृष्टि ने इतना ही विकास किया है कि जिस योद्धा की तारीफ बाबर तक ने की है उसके लिए बीबीसी हिन्दी विद्वेष भरी रिपोर्ट छापती है। बीबीसी हिन्दी से बेहतर जमीर बाबर का रहा होगा जिसने अपने दुश्मन को भी तारीफ के काबिल समझा।

विभिन्न विश्लेषकों के अनुसार राणा सांगा विवाद मूलतः एक राजनीतिक योजना थी। कहा जा रहा है कि जाटव बनाम राजपूत टकराव को बढ़ावा देकर 2027 में जाटवों को एक झटके में योगी आदित्यनाथ और बहन मायावती दोनों के खिलाफ कर के सपा की झोली में लाने की मंशा थी।

राजनीतिक चाल के तौर पर ऐसा बयान देना-दिलवाना समझ में आता है। इस चाल का नफा-नुकसान जो होगा वह अखिलेश यादव झेलेंगे मगर इस प्रकरण के बहाने भारत में इतिहास लेखन की आँत एक बार फिर उलटकर जनता के सामने आ गयी है। यह साफ हो गया है कि कुछ इतिहासकारों ने एक विवादित विषय को आप्त-वचन की तरह स्कूल की किताबों, मीडिया रिपोर्टों और टीवी धारावाहिकों में परोसा ताकि एक नरेटिव तैयार किया जा सके! स्कूल-ओपेन स्कूल के स्टडी मैटेरियल तैयार करने वालों और मीडिया में रिपोर्ट छापने वालों ने ऐसा क्यों किया होगा? यदि आपको जवाब पता हो तो कमेंट बॉक्स में जरूर बताएँ।

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