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जनपथ समाचार से जनसत्ता के अच्छे दिनों तक मुझे संपादक एक से बढ़कर एक मिले!

प्रभाकर मणि तिवारी-

पने लंबे पत्रकारीय जीवन में मैं इस मामले में कुछ हद तक किस्मत वाला रहा कि मुझे ज्यादातर बेहतर संपादक मिले. अस्सी के दशक में जब सिलीगुड़ी के ‘जनपथ समाचार’ से करियर शुरू किया था तब हिंदी पत्रकारिता में संपादक के गुट का वर्चस्व चलन में नहीं आया था. वर्चस्व का मतलब यह कि कोई संपादक एक से दूसरे अखबार में जाने पर अपनी पूरी टीम ले कर जाता है और वहां पहुंचते ही पुराने लोगों को किसी न किसी बहाने निकालना शुरू कर देता है.

जनपथ औऱ फिर गुवाहाटी से छपने वाले ‘पूर्वांचल प्रहरी’ में मालिक ही असली संपादक होते थे. उनको खबरों से ज्यादा इस बात की चिंता रहती थी कि सामाजिक कार्यक्रमों की खबरें और तस्वीरें ठीक से छप रही हैं या नहीं. गुवाहाटी में रहने के दौरान ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’ औऱ ‘धर्मयुग’ समेत कई पत्रिकाओं में लिखने लगा था. तब बिना किसी परिचय के लेख औऱ रिपोर्ट्स छप जाती थी. साप्ताहिक हिंदुस्तान की संपादक मृणाल पांडे से मुलाकात तो बहुत बाद में हुई. लेकिन उसके पहले ही पत्रिका में मेरी दर्जनों रिपोर्ट छप चुकी थी.

‘दैनिक हिंदुस्तान’ में तबके संपादक हरि नारायण निगम ने मदद तो की. पूर्वोत्तर से तीन महीने रिपोर्टिंग भी कराई, गुवाहाटी में पूर्वोत्तर का कार्यालय संवाददाता बनाने का भरोसा देकर. लेकिन यूनियन के दबाव में बाद में स्ट्रिंगर बनाने के लिए ही तैयार हुए. तब उस समूह में यूनियन के आगे न तो संपादक की चलती थी और न ही प्रबंधन की. मैंने साफ मना कर दिया था. अखबार में सहायक संपादक केके पांडे जी ने मेरे कई लेखों को संपादकीय पन्ने पर मुख्य लेख बनाया था.

तब ‘जनसत्ता’ में ‘खास खबर’ औऱ ‘खोज खबर’ पेज देखने वाले ज्योतिर्मय जी ने तो मेरे 50 से ज्यादा लेख छापे होंगे. उनसे कभी मुलाकात नहीं हुई. इसी तरह जनसत्ता रविवारी के संपादक मंगलेश डबराल ने ‘भूटान में लोकतंत्र की बयार’ पर मेरी कवर स्टोरी छापी थी.

‘धर्मयुग’ के तत्कालीन फीचर संपादक कुमार प्रशांत ने भी कई लेख मंगा कर छापे थे. इसके अलावा नए खुले ‘संडे मेल’ और ‘दिनमान टाइम्स’ में भी बिना किसी परिचय के कई रचनाएं छपी थी. बहुत बाद में एक बार एक लेख के भुगतान के सिलसिले में दिल्ली में बाराखंबा रोड स्थित संडे मेल के दफ्तर में जाना हुआ था.

बीबीसी हिंदी ऑनलाइन के संपादक रहे संतोष सिन्हा और बाद में इस पद पर आई सलमा जैदी (अब इस दुनिया में नहीं) ने भी बरसों तक बिना किसी मुलाकात के रिपोर्ट्स छापी.

जनसत्ता में रहते दिल्ली में रहने वाले संपादकों से अपना पाला कम ही पड़ता था. लेकिन अच्युतानंद मिश्र के कार्यकारी संपादक रहते कई बार बात होती रहती थी. नब्बे के दशक में केंद्रीय चुनाव डेस्क का काम देखने वाले रामबहादुर राय ने मुझे दो-दो बार पूर्वी उत्तर प्रदेश की कवरेज के लिए भेजा था. तब मैं सिलीगुड़ी में पोस्टेड था. जनसत्ता कोलकाता के संपादक श्याम आचार्य ने भी हमेशा प्रोत्साहित ही किया. उनके बाद यह पद संभालने वाले शंभूनाथ शुक्ल मुझे गुवाहाटी से चीफ रिपोर्टर बना कर यहां ले आए थे. लेकिन तब तक जनसत्ता के ‘अच्छे दिन’ खत्म हो चुके थे और प्रबंधन इस पर हावी हो चुका था. ऐसे में कोई संपादक चाह कर भी ज्यादा कुछ नहीं कर सकता था. दो साल से कुछ ज्यादा समय रहने के बाद वो भी अमर उजाला कानपुर चले गए. संपादक बन कर.

उनके जाने के बाद संपादक के बिना ही अखबार घिसटता रहा. वेतन आयोग के तहत होने की वजह से हम लोग कहीं जा भी नहीं सके. कोलकाता में वैसे भी इससे बेहतर संस्थान नहीं थे. दिल्ली में कार्यकारी संपादक रहे थानवी जी से कोलकाता में कभी-कभार मुलाकात हो जाती थी. लेकिन पता नहीं प्रबंधन को कोलकाता से क्या खुन्नस थी, संपादक के कहने पर भी यहां किसी को प्रमोशन नहीं हुआ.

अच्युतानंद जी के नागपुर में ‘दैनिक लोकमत’ का कार्यभार संभालने के बाद वहां भी नियमित रूप से लिखता रहा. वहां से हर महीने पारिश्रमिक मनीआर्डर के जरिए आता था. मैं तो रहता था दफ्तर में. यह सीधे पत्नी के हाथों में पहुंचता था. जाहिर है वो इससे खुश रहती थी. लेकिन यह सिलसिला लंबा नहीं चला था.

किसी के कहने पर चंडीगढ़ के ‘ट्रिब्यून’ में लिखना शुरू किया था. लेकिन पैसे कम थे औऱ समय नहीं मिल पाता था तो छोड़ दिया. हां, बीच में एक बार आलोक मेहता ने ‘नई दुनिया’ निकालने के समय आफऱ दिया था. लेकिन पैसों पर बात नहीं बनी. आगे चल कर जनसत्ता नहीं छोड़ने का फैसला सही साबित हुआ. कुछ समय बाद ही वह अखबार बंद हो गया था.

उसके बाद साल 2009 में मृणाल जी ने भी काफी बेहतर ऑफर दिया था. तब जनसत्ता में जितने पैसे मिलते थे उससे करीब तीन गुना. लेकिन मुझे महीने भर बाद ही दो-तीन सप्ताह के लिए यूरोप जाना था. वहां से लौट कर जनवरी में शायद ज्वाइन करता भी. लेकिन तब तक मृणाल जी ने ही नौकरी छोड़ दी. यह अध्याय शुरू होने से पहले ही खत्म हो गया.

उस दौर में दिल्ली में बड़े से बड़े संपादक से मिलना बेहद आसान था. अब तो बिना अपॉइंटमेंट के इसकी कल्पना तक नहीं की जा सकती. यह भी तय नहीं है कि अपॉइंटमेंट मिल ही जाएगा. मैंने यह दोनों दौर देखे हैं. हालांकि अब भी साल-दो साल में दिल्ली जाने पर कुछ बड़े संपादकों से मुलाकात हो जाती है.

लंबा अरसा हो जाने के कारण यादों पर समय की धूल पड़ना लाजिमी है. हो सकता है कुछ नाम छूट गए हों. उन सबसे माफी. . कुछ लोगों के नाम मैंने जानबूझ कर छोड़ दिए हैं. ऐसा करना ठकुरसुहाती के दायरे में आ सकता है. वजह–अब भी गाहे-बगाहे वहां लिखता रहता हूं.

मैं कभी किसी संपादक के गुट में नहीं रहा. कई बार इसका खामियाजा भी भुगतना पड़ा. लेकिन एकाध अपवाद को छोड़ कर संपादक के मामले में कुल मिला कर मेरा अनुभव बढ़िया ही रहा है. नौकरी में अपने आखिरी संपादक के साथ अनुभव बढ़िया नहीं रहा. लेकिन यह कहानी फिर कभी….फिलहाल गड़े मुर्दे उखाड़ने की इच्छा नहीं है.

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