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“सिस्टम की स्याही” से भड़ास को 17वीं वर्षगांठ की हार्दिक शुभकामनाएं!

सत्येंद्र कुमार-

गोरखपुर | मीडिया की चकाचौंध में जब कुछ पत्रकार नोटों की गद्दी पर ‘सत्य’ का गला घोंट रहे थे, तब कहीं कोने में एक ‘भड़ास’ उबल रही थी। कुछ चैनल TRP की पूजा में लीन थे, और कुछ संपादक न्यूज़ रूम में नहीं, बल्कि ड्रॉइंग रूम में बैठकर पावर पॉइंट प्रेज़ेंटेशन पर नैतिकता का स्लाइड शो चला रहे थे। तभी आया “भड़ास फॉर मीडिया” — न कोई मेकअप, न कोई प्रायोजक। एक ऐसा मुँहफट दोस्त जो कहे, “अबे ये पत्रकार नहीं, दलाल हैं और ये स्टूडियो नहीं, दलाली का चबूतरा है।”

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जब बाकी पत्रकार ‘गोदी’ में बैठे थे, तब भड़ास ने ‘कुर्सी’ खींच ली — वो भी बिना अनुमति के। जहाँ बाकी लोग “Exclusive” के नाम पर विज्ञापन परोसते थे, वहाँ भड़ास ने ‘एक्सपोज़’ करना शुरू कर दिया।

भड़ास दरअसल मीडिया की वो खाँसी है जिसे बाकी पत्रकार दबाना चाहते हैं — पर जब यह निकलती है, तो सीधा फेफड़े खोल देती है, क्योंकि अब यह खाँसी लाइलाज दमा बन चुकी है ।

“जब भेड़ की खाल में भौंकने लगे सरकारी भांड”

एक दौर था जब पत्रकार ख़बरें ढूंढते थे, अब ‘डील’ ढूंढते हैं। न्यूज़ रूम अब ‘रूम सर्विस’ बन गया है — जहाँ सत्ता जो ऑर्डर दे, वही परोसा जाता है और जो पत्रकार सवाल पूछने की ज़िद करता है, उसे “विचलित तत्व” घोषित कर दिया जाता है — जैसे वो देश के GDP में भयंकर गिरावट ला रहा हो। भड़ास को भी “विचलित तत्व” घोषित किया गया लेकिन भड़ास को न टीआरपी की फिक्र है, न विज्ञापनदाता के मूड की। वो तो जैसे कहता है, “सत्ताधारी से सवाल पूछना अगर गुनाह है, तो हाँ साहब, हम गुनहगार हैं!”

भड़ास के तेवर ऐसे हैं जैसे किसी ‘न्यूज़ चैनल’ के पीछे छुपे ‘रियल एस्टेट डीलर’ को लाइव पकड़ लिया गया हो। वहाँ ‘ब्रेकिंग न्यूज़’ नहीं, ‘ब्रेकिंग इमेज’ होती है — वो छवि, इन दलालों ने झूठ के मेकअप से गढ़ी होती है।

आजकल न्यूज़ एंकर वो कलाकार हैं जो ‘ब्रेकिंग न्यूज़’ को ‘ब्रेकिंग ड्रामा’ में बदलने की अद्भुत क्षमता रखते हैं। उनके चेहरे पर गुस्सा नहीं, ‘प्राइम टाइम की स्क्रिप्ट’ होती है। लेकिन भड़ास की एक ही स्क्रिप्ट है — “तेरी कहके लूंगा..!”

इन एंकरों का सारा गुस्सा विपक्ष के लिए आरक्षित होता है, और सारी मुस्कान सत्ता के चरणों में बिछी रहती है। कोई कभी इनसे पूछ ले कि “आप पत्रकार हैं या प्रवक्ता?” तो जवाब मिलेगा, “देश को खतरा है, और हम चौकीदारी कर रहे हैं!” (चौकीदारी, पर किसकी?)

भड़ास ऐसे एंकरों को देखकर मुस्कुराता नहीं, खांसता है — जोर की खाँसी, वो भी कड़वी। और कहता है, “ये न्यूज नहीं, नौटंकी है… ये पत्रकारिता नहीं, सरकारिता है।”

कभी-कभी लगता है भड़ास एक पागल है, जो सिस्टम की दीवारों पर सच की खरोंचें करता फिरता है और बाकी पत्रकारिता हँसती है — उस बनावटी ठहाके के साथ जो हर महीने की सैलरी स्लिप से दलाली की कहानी लिए निकलता है। भड़ास ने अपनी जिद से ऐसे कई “सिस्टम” खड़े कर दिए हैं जो सवाल पूछते हैं…आंखों में आंखें डालकर बात करते हैं… “एलान ए जंग” करते हैं…क्योंकि जब दलाली से जंग लाजिमी हो जाए तो लश्कर नहीं देखे जाते! ऐसे ही एक “सिस्टम की स्याही” से भड़ास को 17वीं वर्षगांठ की हार्दिक शुभकामनाएं!

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जहां कोई पत्रकार खुद के लिए गूंगा हो जाए या कर दिया जाए वहां यशवंत सर और भड़ास4मीडिया का काम शुरू होता है!

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