विवेक गुप्ता-
सीधा और साफ Bhadas4Media को आज 17 साल का सफर पूरे करने की बहुत बहुत बधाई. बधाई गूंगों की आवाज बनने के लिए. बधाई उनकी लड़ाई लड़ने के लिए जो दूसरों की लड़ाई लड़ते-लड़ते अपनी लड़ाई लड़ना भूल गए हैं. यशवंत सिंह सर की बेबाकी, निडरता और निष्पक्षता के लिए उन्हें साधुवाद. उन्हें आगे साथ मिलता है मनीष दुबे सर का, एक और एक मिलकर एक सौ एक हो जाते हैं.
सबकी आवाज तो पत्रकार उठाते हैं. लेकिन अपनी आवाज उठाते समय गूंगे हो जाते हैं या बना दिए जाते हैं. सबके दुख, दर्द को सरकार, प्रशासन के पास पत्रकार लेकर जाते हैं. लेकिन उन्हें ये नहीं पता अपना दुख, दर्द लेकर कहां और कब जाना है. सबकी समस्या का माध्यम बनकर समाधान कराने वाले, सबकी डूबती नैया पार लगाने वाले खुद बीच मझदार में फंस जाते हैं.
दुनिया भर में हो रहे शोषण की आवाज उठाते हैं और अपने संस्थानों में अपना ही शोषण करवा बैठते हैं. वो भी शांति के साथ सिर को झुकाकर. कहा जाता है चिराग तले अंधेरा. इसका सबसे बड़ा प्रत्यक्ष उदाहारण है आज का मीडिया. आजकल का मीडिया जिसमें पक्षपात, फेवरिज्म, बेरहम और शोषण करने वाला गैंग हावी है.
मीडिया संस्थानों में पत्रकारों का सबसे ज्यादा शोषण होता है. और बड़ी बात ये होती है यहां शिकार करने वाला और शिकार होने वाला भी पत्रकार ही होता है. जो पुराना होता है उसके पास पूरा गैंग होता है. तमाम संसाधन और ऊपर तक पहुंच होती है. वैसे भी बुरे लोगों का संगठन ज्यादा मजबूत होता है. गंदगी की पहुंच देर और दूर तक होती है. कहावत भी है एक गंदी मछली पूरे तालाब को गंदा कर देती है लेकिन ये बात कोई नहीं कहता एक अच्छी मछली पूरे तालाब को साफ कर देती है.
पत्रकार का पत्रकार के माध्यम से पत्रकार शोषण करता है. और ऐसा देखकर पत्रकार ही हाथ सेंकते हैं इस बात से अनजान होकर कि अगले होने वाले शिकार पत्रकार वो ही हैं.
शोषण करवाने के बाद भी उस पर दवाब होता है कि गिनती के मीडिया संस्थान हैं, गिनती के एडिटर हैं अगर आवाज उठाओगे तो कहां जाओगे. तुमको सब सच्चा, निडर या न्यायप्रिय समझने के बजाय उन्मादी, उत्पाती और विध्वंसक समझेंगे. आगे नौकरी मिलने में दिक्कत होगी.
अंग्रेज भी वीर क्रांतिकारियों को उन्मादी, उत्पाती और विध्वंसक ही समझते थे, तो क्या मीडिया में विद्यमान ऐसे लोगों में और अंग्रजों में कोई फर्क नहीं है. फर्क है अंग्रेज सीधे जान से मार देते थे और मीडिया में विद्यमान ऐसे लोग ऐसा मारते हैं कि वो तड़पकर अपने लिए मौत की भीख मांगता है. और वो भी नहीं मिलती.
अधिकतर पत्रकार मध्यम वर्ग से आते हैं. तो पैसे की समस्या जेनेटिक ही होती है. यानी घर की जिम्मेदारी और पेट की भूख के सामने आपकी इज्जत, आपका स्वाभिमान और आपकी निडरता हार जाती है.
आपके स्वाभिमान को आपकी पारिवारिक जिम्मेदारी के बदले खरीद लिया जाएगा. और अगर आपके अंदर लड़ने की, बेरोजगार रहने की हिम्मत नहीं है तो आपके पास सिर्फ एक ही विकल्प होगा सरेंडर होना. एक-एक बात मानना.
आपकी इस कमजोरी को जानकर आपके बॉस, आपके सीनियर आपका दबाकर शोषण करेंगे. जानते हैं कहां जाएगा मीडिया में, जॉब की कमी रहती है इस फील्ड में, इस उम्र में क्या करेगा. निकालो तेल इसका, करो शोषण, करवाओ चापलूसी.
यूं तो कहा जाता है कि मीडिया संस्थानों में एचआर पॉलिसी लागू होती है लेकिन ये केवल कहने भर के लिए ही होता है. एचआर, एडिटर के हाथ का खिलौना मात्र होता है. जिसे हर हाल में एडिटर की बात माननी ही होती है. और वो भी अप्रत्यक्ष, प्रत्यक्ष रूप से एडिटर की मनमर्जी संस्थान में लागू कराता है.
अगर संस्थान में किसी से आपका विवाद होता है जिसमें आपकी गलती नहीं है (आपकी गलती इतनी है कि आप सच्चे हैं, आपको लगता है आप यहां किसी की चापलूसी करने नहीं आए हैं) अगर आपके मैनेजर आपके खिलाफ है तो आप बेकसूर होते हुए भी दोषी करार दिए जाओगे. और आपका मैनेजर ये बात ऊपर तक मिर्च मसाला लगाकर पहुंचा देगा…
मैनेजर, एचओडी जैसी बड़ी पोस्टों पर बैठे लोग संस्थान के सबसे निर्णायक लोगों के खास होते हैं. बड़े लोग वहीं सुनते-समझते हैं जो ये लोग उनके कान में भरते हैं. छोटे लोगों के लिए न इनके पास वक्त होता है न ही उनकी बातें उनके कान के पर्दे को पार कर अंदर जा पाती है.
वहीं, जब निर्णायक लोगों के खास लोगों के खिलाफ कोई गंभीर शिकायत होती हैं, तो षड़यंत्र का ऐसा जाल बुना जाता है कि शिकायतकर्ता को ही रिजाइन देने के लिए मजबूर कर दिया जाता है.
अगर आपको पत्रकारिता का ‘प’ भी नहीं आता, सही, शुद्ध हिंदी लिखनी नहीं आती लेकिन आप चाटने में माहिर है और इत्तेफाक से आपका एचओडी बिल्कुल नाकाबिल हो. तो आप एचओडी के फेवरेट हो जाएंगे. वो आपको पूरे अधिकार दे देगा. आप काम करते रह जाएंगे और ये चापलूस अच्छा इंक्रीमेंट और प्रमोशन ले जाएगा. और आपको काबिल होते हुए भी ऐसे नाकाबिल लोगों की जी हुजूरी करनी पड़ेगी.
अगर आपने अपने सीनियर, अपने मैनेजर, अपने ब़ॉस की चापलूसी नहीं की तो आपका इस तरह से शोषण किया जाएगा कि आप खुद ही रिजाइन दे देंगे. अगर लड़ने की हिम्मत हो तो पीआईपी जिसे बड़े लोगों ने ‘पर्सनल इंटरेस्ट प्रोपेगेंडा’ बना दिया है वो सामने आ जाता है…फिर आपसे यह कहकर रिजाइन ले लिया जाएगा कि आपका व्यवहार ठीक नहीं है. मतलब वो कहना चाह रहे होते हैं कि आपको सही से चापलूसी करना, चाटना नहीं आता.
कई बार संस्थान के निर्णायक लोगों के कान ऊंचे लोगों ने इतने भर दिए होते हैं कि उनको सोचने समझने का मौका ही नहीं मिलता…निर्णायक लोगों के कानों तक छोटे लोगों की बातें नहीं पहुंच पाती. हां ऊंचे लोग लगातार इनके संपर्क में रहते हैं तो उनको सच-झूठ बता बताकर पूरी तरह से अपनी तरफ कर लेते हैं.
आपको सफाई देने का मौका भी नहीं मिलता और कभी कभी तो आप अपना गुनाह भी नहीं जान पाते हैं.
फिर इंसाफ के लिए दिखता है यशवंत सिंह सर का बनाया हुआ भड़ास4मीडिया. जो सारे लीगल, नोटिस, कानूनी कार्रवाई खुद झेलकर न्याय दिलवाने में गंदे लोगों को एक्सपोज करने में मदद करता है. और आज के जमाने में सामाजिक बेईज्जती होने से बड़ा न्याय कुछ नहीं होता… दिल से सलाम भड़ास4मीडिया, मनीष दुबे सर और यशवंत सिंह सर को…
साथ ही शोषण सहने वाले उन लोगों से ये कहना है. जिंदा हो तो जिंदा दिखना सीखों. अगर ऐसे ही कंफर्टजोन में शहीद भगत सिंह, राजगुरू, सुखदेव, नेताजी सुभाष चंद्र बोस चले जाते, अपने और अपने परिवार के बारे में सोच जाते तो क्या अंग्रेजों से आजादी मिल जाती?
जब आजादी मिली तो हमारे महान क्रांतिकारियों का सोचना था कि देश में आगे कहीं भी तानाशाही न हो (प्राइवेट संस्थान कोई देश से बाहर नहीं है) हमेशा सच, न्याय की जीत हो. और ये अब हम सब की जिम्मेदारी है. देश के अमर शहीदों की ही जिम्मेदारी नहीं थी सच के लिए, न्याय के लिए, इंसाफ के लिए, तानाशाही के खिलाफ अपना खून बहाएं. अब हमारा भी फर्ज है सच और इंसाफ की आवाज बुलंद करें. कोई अंग्रेजों से ताकतवर थोड़े ही हो जाएगा. सच से ताकतवर थोड़े ही हो जाएगा.
माना ऐसा करने के बाद आपको मीडिया के बड़े हुक्मरान मीडिया में नौकरी नहीं करने देंगे. अरे अंडे की ठेली लगा लो, चाय की दुकान खोल लो. माना बड़े रेस्टोरेंट के खाने की जगह आपके हाथ में सूखी रोटी होगी लेकिन यकीन करिएगा ये सूखी रोटी खाते समय आपकी आंखों में एक चमक होगी और आप फख्र से आईना देख सकेंगे…. और जो फख्र के साथ जी गया वही सही मायने में जिंदा है बाकी तो बस सांस ले रहे हैं…
(अगस्त 2023 से अगस्त 2024 के अनुभव के आधार पर)
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