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यशवंत सिंह…एक निडर, निश्चिन्त, निर्विकार और मस्तमौला संपादक!

शैलेश अवस्थी-

कानपुर के कवि स्व. प्रमोद तिवारी जी ने लिखा है.. “मैं कबीर तुलसी का वंशज दरबारों में नहीं मिलूंगा, सच्ची घटना हूं मैं तुमको अखबारों में नहीं मिलूंगा”…

जी हां, हम बात कर रहे हैं “भड़ास” के संस्थापक संपादक यशवंत सिंह की, जिन पर ये पंक्तियाँ सटीक लगती हैं। खबरचियों की खबर, आवाजाही, मीडिया प्रबंधनों की गतिविधियां, उठापटक, ख़ामोशी, हलचल और शोरशाराबा, अगर मिलेगा तो भड़ास में और वो भी बिना लागलपेट के। “दिल की बात कहे दिलवाला, सीधी सी बात न मिर्च-मसाला।

17 साल पहले शुरू हुआ भड़ास अब देश-दुनिया के पत्रकारों और मीडिया संस्थानों की जहां ज़रूरत बन गया है, वहीं पत्रकारों की जोरदार आवाज भी है। जिसकी कोई न सुने, उसकी गर्ज़ना भड़ास है।

भड़ास ने न जाने उन कितने पत्रकारों को प्लेटफार्म दिया, जिनको मीडिया संस्थानों ने चलता कर दिया। अब तो यहां हर विषय, राजनीति हो या अर्थ, संस्कृति हो या शिक्षा पर बेहतरीन ख़बरें, विश्लेषण, लेख और वो सामग्री भी मिल जाएगी, जो कोई और प्रकाशित करने की हिम्मत नहीं करता। यानि “यहां छिपता नहीं, छप जाता है”……।

यह आसान नहीं, यशवंत होना और बनना भी आसान नहीं, न जाने कितना तपे, अपमान, घृणा, क्रोध, ताने, अभाव.. सहे, लेकिन न तो यशवंत का स्वभाव बदला और न ही भड़ास का…। न जाने कितने ताकतवरों का निशाना बने, प्रलोभन दिए गए, पर हर बार साहस से सहकर निकल आए। “हम आए हैं तूफ़ान से कश्ती निकाल के”… यह सही है, कई बार लगा कि भड़ास बंद न हो जाए, लेकिन यशवंत के साथ उनकी ऐसी टीम और मनोबल बढ़ाने वाले लोग थे, जो उनके लिए दीया बनकर साथ चले और ऐसी रोशनी उठी कि विघ्नसंतोषियों को चकाचौंध कर दिया। अब इसे जज़्बा कहो, जांबाज़ी कहो या ज़रूरत।

यशवंत जी से मेरी पहचान 30 साल पुरानी है, जब हम अमर उजाला कानपुर में साथ थे। क्या दिन थे, वीरेंन डंगवाल जी जैसे विद्वान संपादक, महेश शर्मा, राजकेश्वर, अनिल श्रीवास्तव, अनूप बाजपेई, राजेश द्विवेदी, आशुतोष जैसे धुरंधर रिपोर्टर, गज़ब की टीम।

यशवंत जी के तेवर और अंदाज़ जैसा तब था, वैसा ही अब भी है। हमने साथ मिलकर एक स्टोरी की थी “इस सीता की रामकहानी”… बेहद संवेदनशील इस खबर का शानदार संपादन यशवंत जी ने ही किया था… यह कहानी थी एक लावारिस खूबसूरत लड़की की, जिसे अग़वा कर उसके साथ गलत काम किया गया और उसे मोतीझील के एक कोने में छोड़ दिया गया। वह भिखारी की मानिंद वहीं पड़ी रहती और गर्भवती हो गई।

घर-बार से ठुकराई गई सीता नाम की इस लड़की की कहानी तफसील से छपी तो जिला प्रशासन, सामाजिक संगठन सामने आए और उसे ठौर मिला।

यशवंत ने पत्रकारिता के मानक गढ़े, खबरचियों की खबर के वह ट्रेंड-सेटर हैं। अपने दम पर, अपनी शर्तों पर सहकारिता तर्ज पर न्यूज़ वेबसाइट भड़ास चलाते हैं। सीमित फंड में असीमित काम कर रहे हैं। गज़ब के हास्य पसंद, कटीले व्यंग सहने और कहने वाले, घूमक्कड़, कभी सुरूर में संगीत सुनते, कभी गंगा तट पर विचरण करते, कभी मित्रों की महफिल की शान तो कभी दिलवालों की जान।

मुझे लगता है कि भड़ास की कामयाबी के पीछे उनकी नया करने की सोच, लगन, समर्पण और हार न मानने का ज़ज़्बा है।.. “जो होता है, होने दो, यह पौरुषहीन कथन है, जो हम चाहेंगे होगा, इन शब्दों में जीवन है”….

मेरा मानना है,.. साहित्यकार कवि वात्सायन जी की इन पक्तियों में उनका सोच और स्वभाव झलकता है…उनके ढेर भर आलोचक भी हैं, होने भी चाहिए… “निंदक नियरे रखिये आंगन कुटी छवाय “…लेकिन यहां हम उनकी और भड़ास की कामयाबी की चर्चा कर रहे हैं।

भड़ास की 18वीं सालगिरह पर यशवंत जी और उनकी टीम को बहुत शुभकामनाएं…

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