भड़ास के जरिए मैंने जिंदगी में पहली बार न्यू मीडिया / सोशल मीडिया की शक्ति का अनुभव किया

जानिब ए मंजिल की ओर अकेला चला था मगर
लोग मिलते गए, कारवां बनता गया!!!

यशवंतजी की ओर से देशभर के पत्रकारों के नाम भड़ास पर पोस्ट हुआ संदेश न्याय की लड़ाई में उबाल ला चुका है। भड़ास के जरिए मैंने जिंदगी में पहली बार न्यू मीडिया / सोशल मीडिया की शक्ति का अनुभव किया। भड़ास की पूरी टीम को मेरा धन्यवाद! धन्यवाद देने का एक बड़ा कारण यह भी है कि मजीठिया के मामले में देश के पत्रकारों को एकजुट होने का मंच भी मिला है। भड़ास के यशवंतजी का मेरे को लेकर लेख आने के बाद मेरे पास पिछले दो दिनों से देशभर से बड़ी संख्या में पत्रकारों के फोन आ रहे हैं। अधिकांश पत्रकार मजीठिया की लड़ाई में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाना चाहते हैं।

मुझे लगता है कि यह समय पत्रकारों के जिंदगी का टर्निंग प्वाइंट है। दूसरे शब्दों में आर-पार की लड़ाई है। पत्रकारों ने फोन कर मुझे न सिर्फ बधाई दी बल्कि मेरा हौसला भी बढ़ाया। मैं जानता हूं कि मेरी लड़ाई अरबों रुपए का कारोबार करने वाली कंपनी से है। यह लड़ाई मैं देशभर के पत्रकारों के दम पर ही लड़ सकता हूं। मुझसे  पत्रकारों ने पूछा कि हम तो सब अलग-थलग पड़े हैं, ऐसे में मजीठिया की लड़ाई कैसे लड़ी जा सकती है। मैंने इन साथियों को बताया कि अपने शहर में  पत्रकारों का छोटा-छोटा समूह बना लें और वकीलों से राय मशविरा कर सुप्रीम कोर्ट में जाने के लिए ड्राफ्ट तैयार करा लें।

मैंने ये भी सुना है कि कंपनियां मजीठिया से बचने के लिए बड़ी संख्या में पत्रकारों के ट्रांसफर की तैयारी कर रही हैं या कर चुकी हैं, ताकि अधिकांश पत्रकार नौकरी छोड़कर चले जाने के लिए मजबूर हो जाएं। कंपनियों की दूसरी रणनीति यह है कि वो अपने स्थाई कर्मचारियों से इस्तीफा लिखवाएंगी तथा कान्टेक्ट कर्मचारी के रूप  में नया अप्वाइंटमेंट देगी। साथियों! ये समय भारत के पत्रकारों के लिए सबसे दुर्भाग्य का समय होगा। वर्तमान में जब सुप्रीम कोर्ट हमारी ताकत बना हुआ, तो हमारा कमजोर रहना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं है। मालिकों व कर्मचारियों के बीच हर युग में संघर्ष होता आया है और सबसे सुखद बात यह है कि हर युग में कर्मचारी जीते हैं। आप भरोसा रखिए कि जब दुनिया में कोई भी परिवर्तन आता है तो उसके  पीछे परमात्मा की शक्ति और उसकी इच्छा होती है। मजीठिया भी उसी का एक पार्ट है। यह हमारे लिए बना है। हमारा हक है। …और इसे लेने के लिए हमें ठान लेनी चाहिए। जो लोग इस मुगालते में हैं कि न्याय मांगने व देने वालों को खरीद लेंगे, उनकी गलतफहमी दो जनवरी को सहारा समय के मालिक सुब्रत राय की तरह दूर हो जाएगी।

मजीठिया की लड़ाई में एक-एक पत्रकार उसी तरह महत्वपूर्ण है, जिस तरह देश के लिए एक-एक सैनिक है। दोस्तों! मैं ये कोई आर्टिकल नहीं लिख रहा हूं बल्कि जो अनुभव कर रहा हूं, वो आप को बता रहा हूं। अभी नहीं तो कभी नहीं। हम  पत्रकारों  पर आने वाली  पीढियां हंसेंगी। हमारी पीढियां कहेंगी कि हम सशक्त भारत के सबसे कमजोर वर्ग हैं। मजीठिया देश के एक-एक पत्रकार को मिले, इस बात की लड़ाई लड़ने के लिए मैं चैन की नींद नहीं सो रहा हूं। उसी तरह आप भी आज से संकल्प लीजिए कि मजीठिया की लड़ाई में जो संभव होगा, मदद करूंगा। अगर आपने अपने हक की लड़ाई नहीं लड़ी तो ये बात मत भूलना कि आप अपने शोषण का रास्ता खुद बना रहे हैं। मैं आप से फिर से मुखातिब होउंगा, देश के तमाम उन पत्रकारों को धन्यवाद जिन्होंने भड़ास संपादक यशवंत जी के लेख के बाद मुझे फोन कर मेरा हौसला बढ़ाया।

सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं
मेरा मकसद है, ये तस्वीर बदलनी चाहिए

आप का
रजनीश रोहिल्ला
मोबाइन नंबर : 9950954588


मूल खबर….

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