नईदुनिया रायपुर में यूनियन वालों ने मार्केटिंग हेड और प्रसार हेड के खिलाफ दर्ज करा दी एफआईआर

नईदुनिया रायपुर के एड-अकाऊंट विभाग मे कार्यरत ए. चन्द्रशेखर रेड्डी ने समाचार पत्र कर्मचारी संघ (नईदुनिया प्रकोष्ट) को सूचना दी कि उन्हें प्रबंधन परेशान और प्रताड़ना कर रहा है. लिखित शिकायत मिलने के बाद यूनियन की तरफ से अध्यक्ष नसीम मोहम्मद, महासचिव पी.सी. रथ, कोषाध्यक्ष मुकेश वर्मा, प्रफुल मसीह, चंद्रशेखर रेड्डी एवं अन्य सदस्य सहायक श्रमायुक्त से मिले और वहां लिखित कंप्लेन दी. इन लोगों ने मार्केटिंग हेड जय दुबे व प्रसार हेड आलोक शर्मा के खिलाफ उचित कार्रवाही करने की मांग की. सहायक श्रमायुक्त ने कार्रवाई करने का आश्वासन दिया और प्रताड़ना के विरूद्ध एफआईआर करने की सलाह दी.

बाद में यूनियन के सभी पदाधिकारी एवं सिटी कार्यालय के सभी सदस्य कर्मचारी प्रसार हेड आलोक शर्मा से मिलने उनके केबिन में जा घुसे. सभी कर्मचारियों को एक साथ देखकर आलोक शर्मा सकपका गये और उनकी हलक सूख गई. यूनियन के अध्यक्ष नसीम मोहम्मद ने रेड्डी को प्रताड़ित करने के संबंध में पूछा तो आलोक शर्मा ने प्रताड़ना से इनकार कर दिया. हालांकि आलोक शर्मा अड़ियल रूख अपनाये रहा जिसके बाद यूनियन के लोग गंज थाने पहुंचे और आलोक शर्मा एवं जय दुबे के खिलाफ नामजद प्राथमिकी दर्ज कराई.

बताया जाता है कि चन्द्रशेखर रेड्डी को जय दुबे व आलोक शर्मा ने 3 से 4 घंटे तक अपने केबिन में अंदर से लाक कर बैठाये रखा. इस दौरान रेड्डी पर मजीठिया क्लेम वापस लेने का दबाव बनाते हुए उसके साथ गाली गलौच करते हुए जान से मारने की धमकी तक दी गई. रेड्डी द्वारा लिख कर देने से मना करने व रिजाईन लेने के लिए कहे जाने पर उसके उपर आफिस से 1 लाख रुपये व आफिशियल डाटा की चोरी का इल्जाम लगाकर अंदर करवाने की धमकी दी गई.

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मुंबई में नवभारत अखबार के 40 मीडियाकर्मियों ने बनायी यूनियन

केसर सिंह विष्ट अध्यक्ष और अरुण कुमार गुप्ता सचिव बनाये गये, वेज बोर्ड के लिये भी बनायी गयी कमेटी

मुंबई से एक बड़ी खबर आ रही है। यहां प्रमुख हिन्दी दैनिक नवभारत के कर्मचारियों ने वेज बोर्ड समेत कई मांगों को लेकर कल 12 मई को एक यूनियन का गठन कर लिया है। इस यूनियन का लिखित पत्र बकायदे प्रबंधन को भी दे दिया गया है। इस यूनियन में 40 सदस्य होने का दावा यूनियन के एक पदाधिकारी ने किया है।

मजीठिया वेज बोर्ड मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट में चले अवमानना मामले के बाद पहली बार ऐसा हुआ है जब किसी समाचार पत्र संस्थान में बाकायदे यूनियन का गठन किया गया है। यह यूनियन महाराष्ट्र मीडिया इम्प्लाईज यूनियन के अधीन गठित की गयी है। इसकी शाखा नवभारत प्रेस लिमिटेड सानपाड़ा, नयी मुंबई के नाम से काम करेगी। नवभारत की इस यूनियन में नवभारत के केसर सिंह विष्ट को अध्यक्ष, अरुण कुमार गुप्ता को सचिव और मोहन सिंह धामी को कोषाध्यक्ष चुना गया है।

मुंबई के बीयूजे में हुयी एक बैठक के बाद इस यूनियन के गठन की घोषणा की गयी। नवभारत प्रेस लिमिटेड सानपाड़ा, नयी मुंबई की इस यूनियन की कार्यकारिणी सदस्यों में शेर सिंह, किरण करकेरा, विष्णू मांजरेकर और सागर चव्हाण को शामिल किया गया है। इसके अलावा जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड सहित दूसरे वेज बोर्ड को नवभारत में लागू कराने के लिये वेज बोर्ड कमेटी भी बनायी गयी है जिसमें विष्णु भारद्वाज, अरुण कुमार गुप्ता, राजित यादव, विमल मिश्र और नागेश पांडे को शामिल किया है।

इस यूनियन में नवभारत के मुंबई और नयी मुंबई के कर्मचारियों को सदस्य बनाया गया है। इस यूनियन के लिये एक संविधान भी बनाया गया है। यूनियन की प्राथमिक सदस्यता सौ रुपये प्रतिमाह रखी गयी है।

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्सपर्ट
9322411335

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दैनिक जागरण कर्मचारी आर-पार लड़ाई को तैयार

प्रबंधकों की दमनकारी नीतियों के खिलाफ दैनिक जागरण की कर्मचारी यूनियनें एकजुट हो चुकी हैं। इस बार कर्मचारी आर-पार की लड़ाई के लिए पूरी तरह से तैयार हैं। प्रबंधन भी कर्मचारियों के आंदोलन को दबाने के लिए कई दमनकारी कदम उठा रहा है। मजीठिया वेज बोर्ड के अनुसार वेतन की मांग करने पर दैनिक जागरण प्रबंधन ने कभी जागरण परिवार कहे जाने वाले कर्मचारियों को बाहर का रास्ता दिखाना शुरू कर दिया है।

प्रबंधन की इस तरह की कार्रवाई से साफ जाहिर होता है कि वह अपनी नीति के अनुसार कर्मचारियों का शोषण करने, उनका हक मारने के लिए कुछ भी कर सकता है। मगर अब कर्मचारी भी अपने आंदोलन से पीछे हटने वाला नहीं है। लुधियाना में हुई जागरण कर्मचारी यूनियन की बैठक में पंजाब, हरियाणा, हिमाचल के अलावा नोएडा (यूपी) के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। बैठक में सभी कर्मचारियों में काफी जोश देखने को मिला। इस दौरान निर्णय लिया गया कि प्रबंधन किसी भी कर्मचारी के खिलाफ कोई उकसावे पूर्ण कार्रवाई करता है तो इसका सभी मिलकर विरोध करेंगे। सबसे बड़ी बात आज दैनिक जागरण में जो स्थिति बनी हुई है उसके लिए पूरी तरह से प्रबंधन ही जिम्मेदार है।

एक जागरणकर्मी द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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एक्सप्रेस यूनियन से नायडू-नंदू गुट का सूफड़ा साफ, पीयूष-बीएन पैनल भारी जीत

नई दिल्ली । इंडियन एक्सप्रेस न्यूपेपर्स वर्क्स यूनियन के चुनाव में नायडू-नंदू गुट का सूफड़ा साफ। नायडू-नंदू गुट की यह लगातार दूसरी हार है। यूनियन के कल हुए चुनाव में कार्याकारिणी के तीन स्थानों को छोड़कर बाकी सभी पदों पर पीयूष-बीएन पैनल के उम्मीदवारों ने नायडू-नंदू गुट के उम्मीपदवारों को भारी अंतर से पराजित किया। अध्यक्ष पद पर बीएन पांडेय ने नंदू पाठक को तीस मतों से अधिक से हरा दिया। नायडू गुट के पाठक को 88 जबकि बीएन पांडेय को 118 मत मिले।

इसी तरह महासचिव पद के लिए पीयूष वाजपेयी को 118 जबकि नायडू को 81 मत मिले। पिछले चुनाव में भी नायडू को बुरी तरह हार मिली थी। इसके अलावा पीयूष –बीएन पैनल ने उपाध्याक्ष के दोनों पदों पर कब्जा कर लिया। वीरेंद्र नौटियाल और इंद्रजीत वर्मा को उपाध्यक्ष चुना गया है। कोषाध्यक्ष पद के लिए राजेंद्र गोयल ,संयुक्त सचिव के लिए श्यामनंद ,संगठन सचिव के लिए राजकुमार पांडेय, सचिव के लिए रमेश नेगी को चुना गया है। इसके अलावा कार्याकारिणी के नौ सदस्य निर्विरोध चुने गए हैं बाकी के तीन पद नायडू-नंदू के खाते में गया । चार अन्य पर पीयूष-बीएन पैनल के सदस्य चुने गए।

मजीठिया//पीटीआई महाप्रबंधक हाजिर हो

नई दिल्‍ली। पीटीआई में पूरी तरह मजीठिया वेज बोडर्स की सिफारिशों को लागू नहीं करने और इस संबंध में संस्थान के प्रबंधन द्वारा दावा किए गए कोई दस्ताीवेज नहीं दिखा पाने की शिकायत श्रम विभाग ने मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट के यहां की है। इस पर 24 तारीख को सुनवाई होगी। सुप्रीम कोर्ट में पेश की गई रिपोर्ट में कहा गया संस्थान में संशोधित वेतनमान 1 अप्रैल 2014 से दिया जा रहा ।संस्थान का निरीक्षण 5 जून को किया गया। बताया गया है कि जो बकाया एरियर हे वो फेडरेशन के साथ समझौते के अनुसार नहीं दिया गया। निरीक्षक की रिपोर्ट के अनुसार प्रबंधन ने वह कथित समझौता पत्र पेश नहीं कर सका। निरीक्षक ने पीटीआई के महाप्रबंधक शकिल अहमद को दस्तावेज पेश करने को कहा था। अब इस आरोप में श्रम विभाग ने सक्षम अदालत से शिकायत की है।

फेसबुक पेज ‘मजीठिया मंच’ से साभार.

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पत्रकारों पर हो रहे हमले के विरोध में प्रदेश नेतृत्व के खिलाफ कानपुर में पत्रकारों का हल्ला बोल

विगत एक वर्ष से लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ पर बढ़ रहे अत्याचारों और उत्पीड़न ने तोड़ा पत्रकारों के सब्र का बांध। कानपुर में आज कई पत्रकार संगठनों ने मंच साझा कर सांकेतिक धरना प्रदर्शन करते हुए प्रदेश की सपा सरकार और बीजेपी के प्रदेश नेतृत्व को जमकर कोसा। कानपुर में विभिन्‍न पत्रकार संगठनों द्वारा आज फूलबाग स्थित गांधी प्रतिमा पर धरना प्रर्दशन कर पत्रकारों का उत्पीड़न न रुकने पर बड़े आंदोलन का बिगुल फूंक दिया।

इस धरने में प्रदेश सरकार को आड़े हांथो लेते हुए चेतावनी दी गयी कि अगर प्रदेश में पत्रकारों का उत्पीड़न नहीं रोक गया तो जल्द ही प्रदेश के पत्रकार मिलकर लखनऊ विधानसभा का घेराव करेंगे। इस धरने में मुख्य रूप से कानपुर, उन्‍नाव, लखनऊ, कन्‍नौज, वाराणसी और फतेहपुर आदि जिलों से पत्रकार संगठनो के प्रमुखों ने एक साथ शिरकत की।

शिरकत करने वाले पत्रकार संगठन

आल मीडिया एण्‍ड जर्नलिस्‍ट एसोसिएशन के अध्‍यक्ष आलोक कुमार।
आल इण्डिया रिर्पोटर्स एसोसिएशन के राष्‍ट्रीय प्रवक्‍ता तारिक आजमी।
कानपुर प्रेस क्‍लब के महामंत्री अवनीश दीक्षित।
आइरा के राष्‍ट्रीय उपाध्‍यक्ष एड. पुनीत निगम।
मीडिया रिपोर्टर्स एसोसिएशन के राष्ट्रिय महासचिव बलवन्त सिंह।
सहित कई पत्रकार संगठनो ने एक मत होकर प्रदेश की सरकार की आलोचना की।

बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष की जमकर हुई निंदा

आपको बता दें हाल ही में भाजपा प्रदेश अध्‍यक्ष द्वारा नेशनल चैनल पर पत्रकार आलोक कुमार के खिलाफ दिये वक्‍तव्‍य को निन्‍दनीय बताते हुये उनसे तत्‍काल सार्वजनिक माफी मांगने की मांग की। उन्‍होंने कहा कि माफी न मांगे जाने की सूरत में पत्रकार भाजपा से जुड़े सभी कार्यक्रमों का बहिष्‍कार करेंगे और अगले चरण में लखनऊ में भाजपा कार्यालय का घेराव किया जायेगा। कार्यक्रम में प्रमुख अवनीश दीक्षित, तारिक आजमी, पुनीत निगम, बलवन्त सिंह, आशीष त्रिपाठी आलोक कुमार, इब्ने हसन जैदी, श्रावण गुप्ता, दीपक मिश्रा अखलाख अहमद, नीरज लोहिया, उमेश कुमार सहित सभी पत्रकार उपस्थित रहे।

एस.आर.न्यूज़ के लिए जीतू वर्मा की रिपोर्ट.

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मजीठिया वेज बोर्ड और इंडिया एक्सप्रेस मुंबई : यूनियन के पदाधिकारी कंपनी के हाथों बिक गए!

मुंबई से मीडिया के एक साथी ने इंडियन एक्सप्रेस मुंबई की अंतरकथा लिख भेजी है. इस कहानी को पढ़ने से पता चलता है कि किस तरह आम मीडियाकर्मियों के भले के लिए बनी यूनियनें आजकल मालिकों के हित साधन का काम कर रही हैं. यही कारण है कि मीडिया के एक बड़े मसले मजीठिया वेज बोर्ड को लागू कराने को लेकर यूनियनों का रवैया बेहद नपुंसक है.

कायदे से यूनियनों को आपस में मोर्चा बनाकर मीडिया हाउसों के मुख्यालयों से लेकर दिल्ली का जंतर-मंतर घेर लेना चाहिए और रोजाना सौ की तादाद में मीडियाकर्मियों को मालिकों के घरों-आफिसों के बाहर धरने पर बैठना चाहिए. लेकिन यह सब काम कराने के लिए जिन यूनियनों को पहल करना था, वह मालिकों से सेटिंग गेटिंग करके मौन साधे हैं और कभी कभार बयान जारी करके अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर लेते हैं. सबसे उपर यूनियन की तरफ से जारी किया गया पत्र है. नीचे मीडियाकर्मी साथी द्वारा भेजा गया पत्र है. -यशवंत, एडिटर, भड़ास4मीडिया

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दैनिक जागरण नोएडा में यूनियन ने सीजीएम को बता दी औकात, महिला कर्मियों को करना पड़ा बहाल

इसे कहते हैं यूनियन की ताकत. दैनिक जागरण नोएडा के चीफ जनरल मैनेजर नीतेंद्र श्रीवास्तव ने मार्केटिंग से दो महिला कर्मियों को निकाल बाहर किया तो ये महिला कर्मी दैनिक जागरण की नई बनी यूनियन तक पहुंच गईं और अपनी आपबीती सुनाई. यूनियन ने सीधे सीजीएम नीतेंद्र श्रीवास्तव की केबिन पर धावा बोला और नीतेंद्र को घेर कर दोनों कर्मियों को बहाल करने का आदेश जारी करने के लिए मजबूर कर दिया. नीतेंद्र को लोगों ने जमकर खरी खोटी सुनाने के बाद भांति भांति के विशेषणों से नवाजा. बस केवल मारा नहीं. उधर, नीतेंद्र भी कहां बाज आने वाला था. बहाली के अगले रोज दोनों कर्मी जब काम पर आईं तो इन्हें साइन यानि कार्ड पंचिंग करने से रोक दिया गया और इन्हें कैंपस में इंटर नहीं करने दिया गया. इसके बाद यूनियन की पहल पर दोनों कर्मियों ने नोएडा पुलिस स्टेशन और लेबर आफिस में शिकायत डाल दी है या शिकायत करने की तैयारी कर ली है.

जागरण मैनेजमेंट मनमानी करने का आदी हो चुका है. दैनिक जागरण मैनेजमेंट नियम-कानून से चलना भी नहीं चाहता और कर्मचारियों का रोष भी बर्दाश्त नहीं कर पाता. साथ ही कर्मियों को चैन से काम भी नहीं करने देना चाहता. विगत महीने कर्मचारियों द्वारा दिए गए दस सूत्रीय मांगों पर डीएलसी आफिस में समझौता हो गया था. इसके बाद सब कुछ शांतिपूर्वक चल रहा था. लेकिन जागरण प्रबंधन ने मार्केटिंग विभाग की दो महिला कर्मचारियों को निकाल बाहर किया. उनके विभाग के इंचार्ज ने उनसे बदसलूकी की. महिलाएं रोने लगीं तो सारे कर्मचारी जुट गए और यूनियन के कई प्रतिनिधि भी आ गए. सब लोग सीजीएम के पास पहुंचे. पता चला कि पहले इन लड़कियों से इस्तीफा देने को कहा गया था. जब इस्तीफा नहीं दिया तो उनकी इंट्री और पंचिंग रोक दी गई. सीजीएम ने खुद को हर तरफ से घिरा देख और हड़ताल की नौबत आती देख महिला कर्मियों को बहाल कर दिया. सूत्रों के मुताबिक बाद में फिर इन महिलाओं की इंट्री रोकी गई तो इन महिलाओं ने पुलिस और लेबर आफिस में शिकायत डाल दी है या शिकायत की तैयारी कर ली है.

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सहारा के कर्मचारियों ने मुंबई में गठित की यूनियन, नाम- ‘सहारा इंडिया कामगार संगठना’

हम सहारा इंडिया परिवार के पीड़ित कर्मचारी हैं जो मुंबई के गोरेगांव कार्यालय में कार्यरत हैं. सहारा के पीड़ित हम इसलिये हैं कि पिछले लंबे समय से हम आधी अधूरी तनख्वाह में निर्वहन कर रहे हैं और उसमें ६ महिनों का तनख्वाह बकाया है. सहारा इंडिया में पहली कर्मचारी यूनियन का गठन मुंबई में हो चुका है जिसका नाम सहारा इंडिया कामगार संगठना है. प्रबंधन के लाख दावों और झूठे आश्वासनों के बाद भूखे परिवार के दर्द ने हमें मजबूर कर दिया कि हम संगठन के तहत झूठ के पुलिंदों की खिलाफत करें. हमारे दर्द को दबाने के लिए मुंबई में प्रबंधन ने तथाकथित अधिकारियों की टीम खड़ी रखी है जो झूठे आश्वासन, धमकी देना और स्थानांतरण करने की बातें कहते हैं. लेकिन इस तानाशाही से पीड़ित करीब दो सौ लोगों का सब्र आखिरकार टूट गया और लोग गोरेंगाव पुलिस थाने में पहुंचे, चुंकि बातें तनख्वाह की थी इसलिए पुलिस ने हमारी शिकायत को श्रम आयुक्त के पास भेज दिया.

श्रम आयुक्त के कार्यालय के निर्देशों के अनुसार हमारी टीम ने काम शुरू किया और अपने ऊपर हो रहे अन्याय की आवाज़ को मुखर कर रहे हैं. सहारा इंडिया के प्रबंधन में तथाकथित वरिष्ठ श्रम कार्यालय में तलब किये गए थे जहां उन्होंने लोगों की बकाया तनख्वाह और हर महीने कम से कम अस्सी प्रतिशत तनख्वाह देने को कहा गया, लेकिन अफसोस पहली बार ही प्रबंधन फेल हो गया. अब अगली सुनवाई ७ सितंबर को है, जहां यह तथाकथित वरिष्ठों को जवाब देना है. इस दौरान हमारे संगठन को इन तथाकथित वरिष्ठों ने धमकी देना शुरू कर दिया है. जिसकी शिकायत हमने लाचार होकर गोरेगांव पुलिस थाने में किया है.

हमारे हालातों को भड़ास फॉर मीडिया बुलंद करता रहा है इसलिए धन्यवाद लेकिन मैं आपका ध्यान आकर्षित उन कर्मचारियों की तरफ करना चाहता हूं जिनकी तनख्वाह पंद्रह हजार के इर्द-गिर्द है और प्रबंधन उन्हें मात्र आधी तनख्वाह दे रहा है. आखिर सात हजार रूपये में और वह भी चार महीने में एक बार दिये जाने पर हम कैसे अपने परिवार का भरण पोषण करें यह सबसे बड़ा संकट था, जिसके लिए हमने अपने प्रबंधन से जुड़े सभी अधिकारियों को पत्र लिखा, बात की लेकिन मुंबई में बैठे झूठे तथाकथित वरिष्ठों ने हमें नौकरी छोड़ने की बात कही. हम उसके लिए भी तैयार थे लेकिन हमारी तनख्वाह, पीएफ, ग्रेच्युटी और आगे की सर्विस के बारे में कुछ बोलने से बचते रहे.

जब हम संख्याबद्ध होकर अपनी पीड़ा बताने गए तो उल्टा कारवाई करने की धमकियां मिलने लगीं. सहारा कामगार संगठन के अध्यक्ष के रूप में हम अब आरपार की लड़ाई लड़ने को मजबूर हैं. हम भूखों मर रहे हैं जबकि प्रबंधन के नाम पर एचआर हेड काशिनाथ झा को फोर्ड इको स्पोर्ट गाड़ी दी जा रही है, इससे गदगद झा कर्मचारियों को धमकी दे रहा है. इसी प्रकार सभी वरिष्ठ अय्याशी में लगे हैं कंपनी से यह  पेट्रोल, घर के बिजली बिल, फोन, मोबाईल बिल, खाने का खर्चा ले रहे हैं जो उनकी मोटी लाखों रूपए की तनख्वाह के अलावा है.. हमारी मांग है कि अब कर्मचारी तभी मानेगा जब मालिकों के परिवार का कोई हमारी बात सुने और उसपर कारवाई करे. हमने अपने पत्र में सचेत किया है कि सहारा इंडिया के मुखिया सुब्रत रॉय के छोटे बेटे सीमांतो रॉय विदेश भाग सकते हैं. जबकि हमारी वर्षों की मेहनत के बाद तनख्वाह से काटी गई पीएफ की रकम अब तक पीएफ अकाउंट में ही नहीं जमा की गई.

हमारे संगठन में सभी कर्मचारी दस वर्षों से ज्यादा समय से सहारा इंडिया के साथ जुड़े हैं. परिवार के नाम पर हमसे प्रबंधन छलावा कर रहा है जिसके तहत उसने कर्मचारी के हक पीएफ को डकार लिया और अब हमारी पूरी सर्विस को डकारने की फिराक में हैं. संगठन के सचिव वेदप्रकाश मिश्रा ने प्रबंधन को चेतावनी देते हुए कहा है कि प्रबंधन के द्वारा किसी भी कर्मचारी को दी जा रही धमकियों से यदि माहौल बिगड़ता है तो इसकी पूरी जिम्मेदारी प्रबंधन की होगी. हमें पता है कि प्रबंधन साम दाम दंड भेद के तहत रोज़ी और रोटी की इस लड़ाई को कुचलने के लिए अपने दल्लों के बल पर पूरी कोशिश में लग गया है.

संपर्क सूत्र

विशाल मोरे
एम्प्लोई कोड नंबर – २११४७
मोबाईल नंबर – ८०९७३३०६५६

वेद प्रकाश मिश्रा
एम्प्लोई कोड नंबर – २०१०२
मोबाईल नंबर – ९९८७५५५१३१ 

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फेडरेशन के बैनर तले एकजुट हों यूनियनें, जय श्रमिक, जय बांस !!

कहा था न कि आप बांस नहीं करोगे तो आपको बांस कर दिया जाएगा। एक कहावत है-फटने लगी तो हर कोई बोला, हाजमोला हाजमोला। हम बात कर रहे हैं यूनियनों के जरिये अखबार प्रबंधन पर दबाव बनाने की। यह एक शुभ संकेत है कि कर्मचारियों की एकता रंग लाई और हाल ही में तीन-तीन यूनियनें चल पड़ी हैं। एक यूपी न्‍यूजपेपर कर्मचारी यूनियन, दूसरी जागरण प्रकाशन लिमिटेड कर्मचारी यूनियन 2015 और तीसरी सहारा कर्मचारियों की यूनियन। लेकिन आपने देखा कि किस प्रकार शांत माहौल होने पर भी सहारा के मुख्‍य द्वार पर भारी पुलिस बल जमा हो गया। कहीं यह कर्मचारियों को भयभीत करने का कुचक्र तो नहीं था।

साथियो, हमारा साथ कोई नहीं देने वाला है, क्‍योंकि हम संख्‍या में दूसरे वर्गों के मुकाबले कम हैं। हमारे साथ जो लोग हैं भी उनमें से तमाम भय, संकोच और लालच के कारण खुलेआम साथ नहीं आना चाहते। ऐसे में हम लड़ाई कैसे जीत पाएंगे। हमारा साथ कई सरकारें इसलिए भी नहीं देना चाहेंगी, क्‍योंकि हम उनकी पार्टी के लिए वोट बैंक भी नहीं हो सकते। असहाय समझ कर हमें छोड़ दिया जाता है। कुछ सरकारें तो ऐसी हैं, जहां सीएम से मुलाकात के लिए समय तक नहीं दिया जा रहा है। हम पर हमला कराया जाता है, लेकिन पुलिस वाले हमारी नहीं सुनते। वे कहते हैं कि जब तक हम संस्‍थान के साथ हैं, तभी तक हमारी सुनी जाएगी। मतलब साफ है-सारा जहां अखबार मालिकों के साथ है। अब अखबार मालिक प्रबंधन यूनियनों के साथ हुए समझौते की अदालतों में क्‍या व्‍याख्‍या करा देगा, कुछ ठीक नहीं है।

इस परिस्थिति में जरूरी हो गया है कि हमारी यूनियनें एक फेडरेशन के बैनर तले एकजुट हो जाएं, ताकि हमारी संख्‍या बढ़े और सरकार व प्रशासन को हमारी ताकत का पता चले। क्‍योंकि कहा गया है-सबै सहायक सबल को, निर्बल कोउ न सहाय। पवन जगावत आग को, दीपै देई बुझाय। अर्थात-सभी लोग शक्तिशाली की ही मदद करते हैं। कमजोर की कोई मदद नहीं करता। ठीक उसी प्रकार जैसे हवा आग को और भड़का देती है, लेकिन वह दीपक को बुझा देती है। अब आपको यह तय करना है कि अपनी ताकत बढ़ानी है या एक टिमटिमाते दिए की तरह हवा के एक झोंके में बुझ जाना है। जय श्रमिक। जय बांस।

श्रीकांत सिंह के एफबी वाल से

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सलाम जागरणकर्मियों, किसी ने सपने में भी नहीं सोचा था दैनिक जागरण में यूनियन बनेगी

: यूनियन के रूप में अवतरित दसावतार, जागरण कर्मियों की एकता मिसाल बनेगी : आपके हौसले, आपकी एकजुटता, आपका जुनून रंग ला रहा है। इस जुनून के आगे पहाड़ जैसा जागरण प्रबंधन की कोई चालबाजी कामयाब नहीं हो रही। यही पहली जीत है। दैनिक जागरण में कार्यरत सभी भाइयों से आग्रह है- आपकी एकता, धैर्य और संगठित रहना अन्य संस्थान के कर्मियों के लिए मिसाल बनती जा रही है। कभी जागरण में यूनियन बनेगी- ऐसा किसी ने सपने में भी नहीं सोचा।

कभी कोई वेजबोर्ड जागरण देने को मजबूर होता दिखाई देगा- कभी नहीं सोचा। बछावत वेजबोर्ड और मानीसाना वेजबोर्ड के वक्त लोगों में डर समाया था, तभी तो पुछल्ले अधिकारी भी तेवर दिखाने से बाज नहीं आते। वर्करों पर अपनी दबंगई, ज्यादतियां, उत्पीड़न करने जैसी कहानियां मालिकों  को सुनाकर अपनी नौकरी बचाए रखते और अन्य लाभ उठाने से चूकते नहीं। मालिक भी इन लालीपॉप जैसी कहानियां सुनकर खुषी से झूम उठते और वरदानस्वरूप पुछल्ले अधिकारियों को इस कुकृत्य पर डांटने, डपटने की बजाए मेहरबानियों की बौछार करने से नहीं चूकते। पीएफ/हाजिरी और अन्य छोटे-मोटे कार्य देखने वाले जीएम बनने का सपना संजोए बैठे हैं।

साथियों, 1991 में दी गई कुर्बानियां अब एक बड़ा वृक्ष बन गया। पुराने कर्मचारी जागरण की एक-एक चाल से वाकिफ हैं। अपना अनुभव नवनियुक्त कर्मियों को बताना, सावधान करना इनकी प्रत्येक चालों से। डरने की कोई बात नहीं, जो डरते हैं वो खाक जिया करते हैं। डरते-डरते तो 24 साल का लंबा सफर तय कर लिया, वरर्ना जागरण में कहां दम था कि 21 दिन झेल पाता। आज आपकी एकता, एकजुटता और आपके प्रत्येक निर्णय पर जागरण की गिद्धों वाली निगाह होगी, जागरण ने इतनी ऊंचाईयां हम मेहनतकश कर्मियों के बल पर तय की। जो संस्थान पुराने कर्मचारियों को अपनाता है, उनकी सेवाकाल को सेवाश्रम समझता है, उनकी इज्जत करता, तवज्जो देता है, वही संस्थान तरक्की करता है। उम्र के 51 वर्श पूरे होने पर इधर-उधर भटकते हुए मैं हमेषा एक अर्जुन अवतरित होने की कामना के साथ जी रहा था, भगवान ने मेरी सुन ली और ला खड़ा किया- यूनियन के रूप में अवतरित दसावतार को।

मैंने भी सेवाभाव से जीवन के अमूल्य 21 साल दैनिक जागरण को अर्पित किया। सोचा था- अब यहीं से खुशी-खुशी साथियों के सामने सेवामुक्त हो जाऊंगा। लेकिन दैनिक जागरण ने इस उम्र में सहारा देने के बजाए एक झटके में मेरा सपना चकनाचूर कर मुझे दर-दर भटकने, ठोकरे खाने, रोटी-रोटी को मोहताज कर दिया। एक पल में मेरा भविष्य जम्मू जाने का फरमान सुनाकर तय करके अंधकार में धकेल दिया। मेरा सारा परिवार तितर-बितर होकर तिनके की तरह बिखर गया। आत्मा बहुत रोई, दुखी भी हुआ पर हार नहीं मानी और आज भी इनसे दो-दो हाथ कर रहा हूं। मेरे साथियों, आपके बीच एक श्रेष्ठ कर्मचारी रामजीवन गुप्ता (पीटीएस, आईएनएस) अपनी व्यथा सुनाकर आपका मनोबल बढ़ा रहा। मैं आज आपकी संगठित एकता को देखकर गदगद हूं। मैंने भी सोच रखा है- जिंदगी रहे या नहीं पर संजय गुप्ता बनाम जागरण से हार नहीं मानूंगा। तुम गुप्ता से गुप्त लिखने लगे और अब लुप्त होने का वक्त आ गया। दूसरों का भविष्य तय करने वाले जागरण का भविष्य मजीठिया वेजबोर्ड लेने के पश्चात तय होगा।

रामजीवन गुप्ता

पीटीएस

आईएनएस

rahulguptan9@gmail.com

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मध्य प्रदेश में गुपचुप तैयार हो गई पत्रकारों की यूनियन, सभी बड़े अखबारों से सदस्यता

इंदौर : मजीठिया की लड़ाई में अब तक सबसे ठन्डे माने जा रहे मध्यप्रदेश में इसे लेकर गुपचुप तरीके से बड़ी लड़ाई की तैयारी चल रही है। यहाँ के कुछ पत्रकारों ने इस लड़ाई में पंजीकृत ट्रेड यूनियन का महत्व समझते हुए चुपचाप इसका गठन कर लिया है। 

न्यूज़ पेपर मालिकों और उनके चमचों को इसकी भनक तक नहीं लगी। इतना ही नहीं इस यूनियन के पदाधिकारियों ने व्यक्तिगत रूप से संपर्क कर भास्कर, नई दुनिया और पत्रिका के कई पत्रकारों और दूसरे कर्मचारियों को इसका सदस्य भी बना लिया। बताया जाता है कि यूनियन के पदाधिकारियों ने अन्य साथियों को समझाया कि लड़ाई में पंजीकृत ट्रेड यूनियन का बहुत महत्व है। यूनियन न केवल उनकी मजीठिया की लड़ाई उन्हें बिना सामने लाए लड़ सकती है बल्कि आए दिन होने वाली प्रताड़ना और ट्रान्सफर के मामलों में भी उनकी मदद कर सकती है। 

सोमवार 15 जून को इंदौर में यूनियन की बैठक हुई। इसमें भाग लेकर लौटे एक पत्रकार ने मैनेजमेंट के जासूसों को इस बारे में बताया है। मध्यप्रदेश पत्रकार गैर पत्रकार संगठन नाम की ये यूनियन देश के सबसे बड़े मज़दूर संगठन भारतीय मज़दूर संघ से जुड़ी हुई है। भारतीय मज़दूर संघ आरएसएस का संगठन है। इसके चलते यूनियन को केंद्रीय और प्रादेशिक श्रम विभाग से सहयोग भी मिल रहा है। प्रदेश सरकार पहले किसी अन्य अधिकारी को मजीठिया के मामले में रिपोर्ट देने के लिए नियुक्त करने वाली थी लेकिन इस यूनियन के नेताओं ने अपने संपर्कों से प्रभात दुबे की नियुक्ति कराई है।

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DUJ DEMANDS ACTION AGAINST ATTACKS ON JOURNALISTS

Sujata Madhok / S.K. Pande : The Delhi Union of Journalists is shocked at the murder of Shahjahanpur journalist Jagendra Singh and demands an immediate impartial inquiry into the horrific episode and arrest and due punishment for all those who are guilty.

DUJ also condemns the attack on Kanpur journalist Deepak Mishra who was allegedly shot at because of his complaint against local gambling mafia. It calls for immediate arrest of the attackers.

 DUJ regrets the slow pace of government action in both these crimes. It notes with alarm the increasing climate of lawlessness and impunity that is encouraging such attacks on journalists and social media activists in the country.

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प्रदेश के पत्रकारों की ठेकेदारी कर रही यूनियन के पास कितने पत्रकार ?

जहां शासन कमजोर होता है, वहां पर कोई भी उसकी छाती पर चढ़ बैठता है… पत्रकारों के स्वयंभू नेताओं के मामले में भी कुछ ऐसी ही स्थति है… श्रमजीवी पत्रकार संघ में राष्ट्रीय अध्यक्ष से लेकर प्रदेश अध्यक्ष तक का कार्यकाल आजीवन है…. इस कारण लगभग सभी पत्रकार इस यूनियन का साथ छोड़ चुके हैं…. कांग्रेस के ज़माने में इस यूनियन को लखनऊ के चाइना मार्किट में दफ्तर उपहार में मिल गया था, जिसकी कीमत अब करोड़ों में है…

यूनियन के प्रदेश अध्यक्ष की रोजी रोटी इसके ही किराये से चलती है, क्योंकि उनके पास बरसों से कोई अखबार और नौकरी नहीं है… फिर सूबे के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव और समाजवादी पार्टी प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से इनको लाखों रुपये की व्यवस्था हर साल क्यों करते हैं… सोचना चाहिए कि क्या इस पत्रकार विहीन यूनियन से पत्रकारों को साधने में उन्हें 1 % भी सफलता मिल पा रही है? 

फर्जियो ने उठाया पत्रकारों को राहत का जिम्मा… शराब और शबाब में तैरते श्रमजीवी.. 5वीं पास कैसे बना राष्ट्रीय पदाधिकारी श्याम बाबू ढीमर…  किसी की रजिस्टर ट्रस्ट पर किया कब्जा… देशभर में दुकानदारी की नीयत… जालौन और उत्तरप्रदेश की श्रमजीवी यूनियन की चान्डाल चौकड़ी में कोई नहीं पत्रकार… काले चिट्ठे का खुलासा… सटोरियों का सरगना… चंदे का बादशाह… लड़की  सप्लायर… राजनीतिक और अधिकारियों के बिस्तर गर्म करने वाले हैं श्रमजीवी यूनियन के पदाधिकारी..  यूपी का एक हिस्ट्री शीटर और शराबी कैसे बन गए पत्रकारों के रहनुमा…

नवजीत सिंह संपर्क : 9161336688 ईमेल – smartnavjeetsingh@gmail.com 

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जागरण कर्मचारियों की यूनियन से इलाहाबाद हाईकोर्ट ने किया पांच सप्‍ताह में जवाब तलब

इलाहाबाद : हाईकोर्ट इलाहाबाद ने दैनिक जागरण प्रबंधन की अपील पर जागरण कर्मियों की यूनियन से जवाब तलब कर लिया है। अपना पक्ष रखने के लिए यूनियन को पांच सप्‍ताह का समय दिया गया है। ये जवाब यूनियन अध्‍यक्ष इष्‍टदेव सांस्‍कृत्‍यायन और महामंत्री रत्‍न भूषण से मांगा गया है।

जागरण प्रबंधन ने यूनियन के रजिस्‍ट्रेशन को चुनौती देते हुए अदालत से कहा है कि इसे कानूनन मान्यता उपयुक्त नहीं है। यूनियन के अध्‍यक्ष और महामंत्री जागरण में प्रबंधकीय दायित्व संभाल रहे हैं। प्रबंधन की कानूनी आपत्ति के बाद हाईकोर्ट ने यूनियन अध्‍यक्ष इष्‍टदेव सांस्‍कृत्‍यायन और महामंत्री रत्‍न भूषण से जवाब मांगा है। जागरण के वकील ने हाईकोर्ट को बताया है कि ये दोनों पदाधिकारी पदेन प्रबंधन पक्ष के हैं इसलिए ट्रेड यूनियन एक्‍ट 1926 के अनुसार ये यूनियन का हिस्‍सा नहीं हो सकते। ऐसे में याचिकाकर्ता की आपत्ति पर बिना विचार किए यूनियन का पंजीकरण बरकरार नहीं रह सकता। प्रबंधन की ओर से यह याचिका यूनियन के पंजीकरण 6 मई से पहले 28 अप्रैल 2015 को ही हाईकोर्ट में दाखिल कर दी गई थी।

Court No. – 19

Case :- WRIT – C No. – 33271 of 2015

Petitioner :- Jagran Prakashan Limited And Anr.

Respondent :- Registrar Etrade Union And 4 Others

Counsel for Petitioner :- Chandra Bhan Gupta

Hon’ble Mahesh Chandra Tripathi,J.

Heard Shri Chandra Bhan Gupta, learned counsel for the petitioner.

By means of present writ petition, the petitioner has prayed for quashing the

registration certificate bearing No.9967 of 2015-16 issued on 6.5.2015 by

respondent no.1 in favour of Jagran Prakashan Ltd. Employees’ Union,

2015, Noida, Gautam Budh Nagar; quashing the communication letter

issued on 7.5.2015 by the respondent no.1 informing registration of

respondent no.3 and directing the respondent no.1 to consider the objection

filed by the petitioner dated 28.4.2015 and 5.5.2015.

Learned counsel for the petitioner submits that in the present matter the

respondent nos.4 and 5 are working under the petitioners in supervisory

and managerial capacity and incharge of “Sakhi” and “Tarang” magazine

and as such they cannot be part of any trade union and the registration

under the Trade Union Act, 1926 without deciding the objections filed by the

petitioner cannot be sustained. The matter requires consideration.

Issue notice to respondents, returnable at an early date. Steps be taken

within a week. The respondents may file counter affidavit within five

weeks. One week, thereafter, is granted to file rejoinder affidavit. List

thereafter.

Till the next date of listing, the effect and operation of the impugned

registration certificate dated 6.5.2015 would be kept in abeyance.

(Mahesh Chandra Tripathi,J.)

Order Date :- 28.5.2015

SP/

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वर्किंग जर्नलिस्ट यूनियन के कार्यालय में तोडफ़ोड़

भोपाल : वर्किंग जर्नलिस्ट यूनियन के कार्यालय एफ-88/19, तुलसी नगर, सेकेण्ड स्टॉप में कुछ अज्ञात बदमाशों ने रात्रि साढ़े 10 बजे घुसकर तोड़फ़ोड़ की। 

घटना के समय संगठन के अध्यक्ष राधावल्लभ शारदा हैदराबाद प्रवास पर थे। उनके निवास पर उनका पुत्र ललित शारदा सपरिवार थे लेकिन किसी कारणवश वे ऑफिस से घर के अंदर गये, तभी अचानक पांच अज्ञात बदमाश ऑफिस में घुस गये। ऑफिस में घुसकर उन्होंने तोडफ़ोड़ शुरू कर दी। पुत्र घर से बाहर की तरफ दौड़कर पहुंचा लेकिन चार लोग भागते हुए दिखे।

ललित शारदा ने तुरंत ऑफिस में अंदर जाकर देखा तो टेबिल का कांच टूटा हुआ था, कुर्सियां बिखरी पड़ी हुई थीं और कम्प्यूटर भी गिरा पड़ा था। उसने पूरे घटनाक्रम के फोटो खींचे। राधावल्लभ शारदा से फोन पर बात कर पूरे घटनाक्रम की जानकारी दी। भोपाल लौटकर उन्होंने कार्यालय का जायजा लेने के बाद थाना टी.टी. नगर में अज्ञात बदमाशों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई।

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जेबी यूनियन का पर्दाफाश होने से जागरण प्रबंधन गुंडागर्दी पर उतरा

दैनिक जागरण प्रबंधन गुंडागर्दी पर उतर आया है। अखबार की कानपुर यूनिट में डाइरेक्‍टर पद पर तैनात सतीश मिश्रा जेबी यूनियन का पर्दाफाश होने से इतना बिलबिला गए हैं कि जगदीश मुखी से मारपीट करने पर उतर आए। जगदीश मुखी को कार्यालय में प्रवेश नहीं करने दिया जा रहा है। जगदीश मुखी नोएडा कार्यालय में इलुस्‍ट्रेटर के रूप में काम कर रहे थे। कुछ माह पूर्व उनका तबादला कानपुर कर दिया गया था। उस समय उनकी पारिवारिक परिस्थितियों को दरकिनार कर उन्‍हें जबरन कानपुर भेज दिया गया। इससे पूर्व भी एक मशीनमैन से कानपुर में मारपीट की गई थी। उसके बाद रतन भूषण का तबादला कानपुर किया गया, जिससे रुष्‍ट कर्मचारियों ने विगत सात जुलाई को नोएडा में काम बंद कर दिया था। कर्मचारियों की इस एकजुटता से प्रबंधन को झुकना पड़ा था और उस समय किए गए तबादले वापस ले लिए गए थे। 

इस घटना के बाद दैनिक जागरण प्रबंधन के कान खड़े हो गए थे और सतीश मिश्रा ने नोएडा आकर जेबी यूनियन गठित करने का गुरु मंत्र दिया था। इसी यूनियन के जरिये प्रबंधन सुप्रीम कोर्ट के सामने कुछ हेराफेरी करने की जुगत भिड़ा रहा था कि यूनियन के कागजात लीक हो गए और प्रबंधन की मंशा सबके सामने आ गई। नोएडा से जम्‍मू स्‍थानांतरित मुख्‍य उपसंपादक श्रीकांत सिंह पर भी नोएडा में दैनिक जागरण प्रबंधन ने हमला करा दिया था और मौके पर उनसे 36 हजार रुपये छीन लिए गए थे। इस मामले की जांच वरिष्‍ठ पुलिस अधीक्षक डॉक्‍टर प्रीतेंद्र सिंह के आदेश पर क्षेत्राधिकारी द्वितीय डॉक्‍टर अनूप सिंह कर रहे हैं।

अब हालत यह हो गई है कि दैनिक जागरण प्रबंधन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बल पर अत्‍याचार की सीमा लांघ रहा है, जिससे केंद्र सरकार और भाजपा की किरकिरी हो रही है। इससे कर्मचारियों में रोष बढ़ रहा है। दैनिक जागरण प्रबंधन ने यह साबित कर दिया है कि उसे नियम, कानून, पुलिस प्रशासन और अदालतों तक की कोई परवाह नहीं है। इससे खार खाए कर्मचारी किसी भी दिन धरना और प्रदर्शन करने को बाध्‍य हो सकते हैं। कर्मचारियों का अहित करने के लिए पिछले कई दिनों से उच्‍चस्‍तरीय बैठकों का दौर नोएडा कार्यालय में चल रहा है। 

फोर्थ पिलर एफबी वॉल से

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जागरण की जेबी यूनियन न इस घाट लगी, न उस घाट, फंस गए बात-बहादुर अधरझूल में

पिछले दिनों एक फर्जी यूनियन और उसके फर्जी पदाधिकारियों के बारे में जानकारी दी गई थी और यह बताया गया था कि यूनियन का गठन दैनिक जागरण प्रबंधन की शह पर कराया गया। अब कन्‍फ्यूजिया गए होंगे कि दैनिक जागरण प्रबंधन कर्मचारियों के साथ फिरकी क्‍यों ले रहा है। आखिर जिस प्रबंधन ने कंपनी में आज तक कोई यूनियन नहीं बनने दी और जो यूनियन बनी भी, उसे शहीद करा दिया तो अब वही क्‍यों यूनियन का गठन होने दे रहा है। मजे की बात तो यह है कि यूनियन पदाधिकारियों के नाम सार्वजनिक होने के बावजूद उनसे यह पूछा तक नहीं गया कि भाई ऐसी क्‍या तकलीफ है, जो यूनियन बना रहे हो।

अब सूत्र यह बता रहे हैं कि दैनिक जागरण प्रबंधन यूनियन के पदाधिकारियों को न तो कोई मलाई ऑफर कर रहा है और न ही उनसे कोई पूछताछ कर रहा है। इससे पदाधिकारी थोड़ा कुंठित महसूस कर रहे हैं। भाई यूनियन तो बन गई। अब उसका कोई लाभ न तो प्रबंधन को मिल रहा है और न ही कर्मचारियों को। ऐसी यूनियन आखिर किस काम की, जिसमें कई क्रांतिकारियों तक को शामिल नहीं किया गया हो।

उधर, बिना किसी यूनियन के कुछ क्रांतिकारी दिल्‍ली के मुख्‍यमंत्री अरविंद केजरीवाल से मिल आए। वे भी खाली हाथ नहीं लौटे, उनसे जोरदार आश्‍वासन लेकर ही लौटे। अब इस स्थिति से दैनिक जागरण प्रबंधन बिलबिला गया है और यूनियन पदाधिकारियों पर दबाव बना रहा है कि कुछ करो। अब यूनियन पदाधिकारी क्‍या करें। वे कुछ करने लायक होंगे, तभी न करेंगे कुछ। खिसियानी बिल्‍ली खंभा नोचने वाली स्थिति पैदा हो गई है। फर्जी यूनियन के कुछ असली पदाधिकारी कर्मचारियों को इसलिए धमका रहे हैं कि प्रबंधन कुछ खुश हो जाए और उनकी झोली में थोड़ी मलाई डाल दे लेकिन प्रबंधन है कि प्रसन्‍न होने का नाम ही नहीं ले रहा है। कोई बात नहीं, लगे रहो इंडिया।

 from Fourth Pillar FB Wall

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मजीठिया वेतनमान से बचने के लिए दैनिक जागरण प्रबंधन ने किया इतना बड़ा फ्रॉड

लो जी, दैनिक जागरण प्रबंधन प्रायोजित फर्जी यूनियन की पूरी जानकारी और वह भी पूरे प्रमाण और दस्‍तावेज के साथ। यूनियन का नाम है-”जागरण प्रकाशन लिमिटेड इम्‍प्‍लाइज यूनियन 2015”। 

अब नाम से ही पता चलता है कि यह यूनियन कालजयी नहीं, सालजयी है। यूनियन के नाम में 2015 जोड़ने का मतलब तो यही लगता है कि इसका काम 2015 में ही रहेगा। मणिसाना की तरह मजीठिया को भी सांठगांठ के हवाले कर छुट्टी पा लेनी है। यूनियन में जिन कर्मचारियों के नाम हैं, उन्‍हें किसी तरह धोखा देकर शपथ पत्र पर हस्‍ताक्षर करा लेने हैं या उन्‍हें बिना कुछ बताए फर्जी हस्‍ताक्षर बना देने हैं। प्रबंधन के सलाहकारों ने भी तो यही कहा होगा-दैनिक जागरण बहुत बड़ा समूह है। उससे कौन पूछने जा रहा है कि यह फर्जी काम है। हम तो बड़ा से बड़ा अपराध करके बच सकते हैं। हमारे साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जो हैं। इस परामर्श में यदि कपिल सिब्‍बल भी शामिल हैं, तो समझिए वह दैनिक जागरण को फर्जीवाड़ा के दलदल में फंसाते जा रहे हैं।

मजे की बात तो यह है कि दैनिक जागरण जिस प्रकार अपने कर्मचारियों का खून चूस रहा है, उससे आम कर्मचारी को किसी प्रकार की सहानुभूति की उम्‍मीद तो है नहीं। फिर ये कैसी उदारता कि जागरण प्रबंधन ने खुद कर्मचारियों की ओर से यूनियन का सदस्‍यता शुल्‍क जमा करा दिया है। उसकी बाकायदा रसीद कटी है, लेकिन इसकी जानकारी यूनियन में शामिल किए गए कई पदाधिकारियों तक को नहीं है। यहां हम पदाधिकारियों के नाम का भी खुलासा कर देते हैं। आप खुद उनसे पूछ लीजिए। यूनियन के पेपर का पहला पेज भी यहां दिया जा रहा है। उससे आप अपना हस्‍ताक्षर भी मिला लें कि वह असली है या टोटल फर्जी।

यूनियन के कर्ता-धर्ताओं की ये सूची असली या नकली?

यूनियन का नाम-जागरण प्रकाशन लिमिटेड इम्‍प्‍लाइज यूनियन 2015, अध्‍यक्ष-इष्‍टदेव सांकृत्‍यायन, उपाध्‍यक्ष-नरवीर सिंह, उपाध्‍यक्ष-प्रदीप कुमार सिंह, महामंत्री-रतन भूषण प्रसाद सिंह, संयुक्‍त मंत्री-चक्रपाणि पाठक, संयुक्‍त मंत्री-अरुण कुमार बरनवाल, संगठन मंत्री-दिलीप कुमार दिवेदी, कार्यालय मंत्री-राजेश कुमार झा, प्रचार मंत्री-वृजकिशोर यादव, कोषाध्‍यक्ष-कृष्‍ण कुमार पाठक । कार्यकारिणी सदस्‍य – रवींद्र पाल सिंह, हरीश सिंह, कृष्‍ण मोहन त्रिवेदी, हरपाल सिंह, ललित मोहन बिष्‍ट। 

यह तो रही दैनिक जागरण प्रबंधन प्रायोजित यूनियन की कार्यकारिणी। आगे सदस्‍यों के नामों का भी खुलासा किया जाएगा, ताकि आप समझ सकें कि आपके साथ मजीठिया मामले में किस तरह फ्रॉड किया जा रहा है और माननीय सुप्रीम कोर्ट को भी झांसा देने की तैयारी कितने जोर शोर से की जा रही है।

FourthPillar एफबी वॉल से 

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बहुत दिनों बाद ‘सर्वहारा’ के ‘अधिनयाकवाद’ की कोई खबर सुनाई दी है… सुनिए केरल के दो घटनाक्रम…

Sangam Pandey : खबर केरल के कोच्चि जनपद की है। अमेरिका के एक कलाकार यहाँ के एक कला-उत्सव में भाग लेने आए थे। आयोजन की समाप्ति के बाद जब वे अपना सामान समेटकर ट्रक में लदवाने लगे तो सिर्फ दस फुट की दूरी तक छह बक्से पहुँचाने के उनसे दस हजार रुपए माँगे गए। खीझकर उन्होंने कहा कि मैं अपनी कृतियाँ नष्ट कर दूँगा, पर इतना पैसा नहीं दूँगा। उन्होंने केरल की लेबर यूनियनों को माफिया की संज्ञा दी और अपने विरोध को व्यक्त करने के लिए खुद द्वारा अपनी कृतियों को नष्ट किए जाने का एक वीडियो यूट्यूब पर डाल दिया। वासवो नाम के इन अमेरिकी कलाकार के साथ हुए इस बर्ताव जैसा ही बर्ताव उत्सव में भाग लेने गए भारतीय कलाकार सुबोध केरकर के साथ भी हुआ। उन्हें दो ट्रकों पर अपना सामान लोड कराने के साठ हजार रुपए देने पड़े।

 

आए दिन ताकतवर लोगों के अतिचारों की खबरों के बीच यह बहुत दिनों बाद ‘सर्वहारा’ के ‘अधिनयाकवाद’ की कोई खबर सुनाई दी है। 1990 के बाद के भूमंडलीकरण ने मजदूर की हस्ती को इतना निरीह बना दिया है कि उसके हित की कोई भी बात विकास के रास्ते का रोड़ा समझी जाती है। ऐसे में केरल की यह घटना निश्चित ही काफी अलग किस्म की है। खासकर इसलिए कि जनसंख्या नियंत्रण, स्त्री-पुरुष अनुपात, साक्षरता दर आदि सभी सूचकांकों में केरल देश का अव्वल राज्य है। वहाँ के गाँव आज भी ऐसे हैं कि दिल्ली में सरकारी नौकरियों से रिटायर होने वाले मल्लू अक्सर वहाँ वापस लौट जाते हैं। किसी भी समाज को अगर सुचारू रखना है तो सबसे पहले आमदनियों के अनुपात को सुचारू बनाना होता है, और इसका सबसे बड़ा संकेतक है– वहाँ के मजदूर की हैसियत।

इस घटना से हम भाँप सकते हैं कि केरल तुलनात्मक रूप से अगर एक सुचारू राज्य है तो इसमें वहाँ की ट्रेड यूनियन संस्कृति की एक बड़ी भूमिका है। लेकिन फिर भी केरल इस देश की अर्थव्यवस्था का ही एक हिस्सा है। इस अर्थव्यवस्था में फासले इतने ज्यादा हैं कि एक मजदूर के श्रम का जो मूल्य उसके लिए ‘सही’ है वह चुकाने वाले को ‘बहुत ज्यादा’ लगता है। कहना सिर्फ यही है कि अमेरिकी कलाकार के साथ हुई ‘ज्यादती’ को मात्र व्यक्तिगत संदर्भ में न देखकर एक बड़े परिप्रेक्ष्य में देखें।

वरिष्ठ पत्रकार और आलोचक संगम पांडेय के फेसबुक वॉल से.

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मजीठिया की सिफारिशें लागू कराने के लिए यूनियन ने लिखा उपश्रमायुक्‍त को पत्र

नोएडा : यूपी न्‍यूज पेपर इंप्‍लाइज यूनियन के जिला महामंत्री एवं उपाध्‍यक्ष आरपी सिंह चौहान ने जिले के अखबारों में मजीठिया वेतनमान लागू कराने के संदर्भ में उपश्रमायुक्‍त को एक पत्र लिखा है। पत्र में उन्‍होंने श्रम कानूनों के प्रतिपालन का निरीक्षण कराने, अखबार उद्योगों का वर्गीकरण कराने, मजीठिया वेज बोर्ड की संस्‍तुतियों को लागू कराने एवं कर्मचारियों के एरियर भुगतान का आग्रह किया है।  

श्रमायुक्त को प्रेषित पत्र की छायाप्रति

पत्र में उन्‍होंने कहा है कि 6 जून 2014 को भी एक पत्र प्रेषित किया गया था, जिसमें मजीठिया वेज बोर्ड की संस्‍तुतियों को लागू कराने और कर्मचारियों के एरियर भुगतान का आग्रह किया गया था, लेकिन आज तक न तो किसी भी समाचार पत्र ने कोई उचित कदम उठाया है और न ही अखबार उद्योग का वर्गीकरण कराया गया है।

उन्‍होंने कहा है कि आज तक पत्र पर कार्यवाही की कोई सूचना तक नहीं दी गई। इससे क्‍या यह माना जाए कि अखबार उद्योग के मालिकों के दबाव में या किन्‍हीं अन्‍य कारणों से मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशों को लागू नहीं करा रहे हैं। श्रम कानूनों का प्रतिपालन कराने में भी कोई रुचि नहीं ली जा रही है। 

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पीटीआई यूनियन और प्रबंधन की साठगांठ!

: कानाफूसी : पीटीआई के साथियों को यह खबर जानकर नए साल पर हैरानी हो सकती है लेकिन खबर सत्‍य है। पीटीआई यूनियन और मजीठिया वेज बोर्ड के कथित हीरो ने सन 2002 में प्रबंधन के साथ एक समझौता किया था। इसके अनुसार यूनियन ने प्रबंधन को तीन साल तक कॉन्‍ट्रैक्‍ट पर कर्मचारियों को रखने की अनुमति दी थी। अब यही यूनियन के सर्वेसर्वा कह रहे हैं कि कॉन्‍ट्रैक्‍ट वाले साथियों का वेतन 35 हजार से ऊपर नहीं होना चाहिए। इन नेताओं से पूछना चाहिए कि प्रबंधन के साथ किन हालातों में यह समझौता किया गया और अगर तीन साल तक ही समझौता था तो फिर इतने साल तक कॉन्‍ट्रैक्‍ट पर लोगों को कैसे रखा जा रहा है। वैसे सभी साथियों को मुबारक कि यूनियन कॉन्‍ट्रैक्‍ट के साथियों के लिए सुप्रीम कोर्ट जाने की तैयारी करने वाली है।

पीटीआई यूनियन की गीदड़ भभकी : हाल ही में पीटीआई यूनियन की बैठक में यूनियन के सर्वेसर्वा और सुप्रीम कोर्ट के वरिष्‍ठ वकील कोलिन गोंजाल्विस के शब्‍दों में मजीठिया वेतन बोर्ड की लड़ाई के हीरो एमएस यादव ने प्रबंधन को धमकी दी है कि अगर कॉन्‍ट्रैक्‍ट वाले सााथियों को मजीठिया के अनुसार एरियर नहीं दिया तो यूनियन भी सुप्रीम कोर्ट चली जाएगी। यादव जी और कॉन्‍ट्रैक्‍ट वाले साथियों को बधाई। देर आयद दुरुस्‍त आयद। यादव जी, जो अपने यहां मजीठिया पूरी तरह लागू करने के लिए सीना ठोंक रहे थे, ने आधिकारिक तौर पर मान लिया कि उनकी यूनियन ने कॉन्‍ट्रैक्‍ट वाले सााथियों से पैसा तो ले लिया लेकिन उन्‍हें मजीठिया का पूरा लाभ नहीं दिलवाया। बीच में यह भी हवा चली थी कि कॉन्‍ट्रैक्‍ट वाले सााथियों का एरियर खाने के लिए प्रबंधन और यूनियन के बीच कोई समझौता हुआ है। हालांकि इसकी कोई पुष्टि नहीं हो पा रही है लेकिन प्रबंधन की गतिविधियों से साफ है कि ऐसा कोई समझौता हुआ था क्‍योंकि इसी दौरान लखनऊ के एक बड़े अधिकारी को सेवानिवृत होना था लेकिन वे अभी तक जमे हुए हैं।

फिर यादव जी का ये बिना बरसात वाली बारिश का क्‍या राज है। पहला तो ये कि जब श्री गोंजाल्विस को यह पता चला कि उनका हीरो जीरो निकला और पीटीआई में तो मजीठिया पूरी तरह लागू हुआ ही नहीं तो वे दुखी हो गए। दूसरा ये कि सालों से कार्यविस्‍तार ले लेकर पीटीआई को एक नंबर से छठे नंबर का संस्‍थान बनाने वाले महाराज किशन राजदान यानि कि एम के राजदान की इस बार दाल गलने वाली नहीं लग रही। समझा जाता है कि राजदान का पत्ता इस बार साफ हाने वाला है। न सिर्फ एमके राजदान पांच सालों से सेवा विस्‍तार ले रहे हैं बल्कि खबर ये भी है कि यूनियन के भी कई पदाधिकारी प्रबंधन से सेवा विस्‍तार लेकर मजे ले रहे हैं। इस तरह पीटीआई दुनिया का शायद पहला संस्‍थान होगा जहां प्रबंधन के अधिकारी से लेकर यूनियन के पदाधिकारी भी सेवा विस्‍तार पर हैं। कोलिन साहब के हीरो की बात तो अलग ही है। इनके कारनामे जग जाहिर है। वैसे इनके हाथ लंबे हैं। अब अच्‍छा है अगर किसी बहाने ये अपना हाथ प्रबंधन की ओर बढ़ा रहे हैं… शायद कुछ और मिल जाएगा।

फेसबुक पर ‘मजीठिया मंच’ के फेसबुक वॉल से साभार. कानाफूसी कैटगरी की खबरें सुनी सुनाई बातों पर आधारित होती हैं. इन पर भरोसा करने से पहले अपने स्तर पर तथ्यों की जांच पड़ताल कर लें.

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मजीठिया की लड़ाई : श्रम विभाग अवैध कमाई का सबसे बड़ा जरिया, सीधे कोर्ट जाएं

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद भी मजीठिया न देना दैनिक भास्कर, जागरण के मालिकों के लिए गले का फंस बन सकता है। इन दोनों अखबारों के मालिक अपने अपने अखबारों के कारण ही खुद को देश का मसीहा समझते हैं। देश का कानून ये तोड़ मरोड़ देते हैं। प्रदेश व देश की सरकारें इनके आगे जी हजूरी करती हैं। लेकिन अब देखना होगा कि अखबार का दम इनका कब तक रक्षा कवच बना रहता है क्योंकि जनवरी में मानहानि के मामले में सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई है। कारपोरेट को मानहानि के मामले में सिर्फ जेल होती है। अब देखना होगा कि सहाराश्री के समान क्या अग्रवाल व गुप्ता श्री का भी हाल होता है या फिर मोदी सरकार अखबार वालों को कानून से खेलने की छूट देकर चुप्पी साध लेती है। मोदी सरकार पत्रकारों को मजीठिया दिलवाने के मामले में बेहद कमजोर सरकार साबित हुई है। मालिकों को सिर्फ नोटिस दिलवाने से आगे कुछ नहीं कर पाई।

आश्चर्य तो तब होता है जब श्रम विभाग वाले अखबारों को मजीठिया वेज बोर्ड देने की नोटिस भेजता है तो अखबार प्रबंधन दो टूक लिखकर दे देता है कि यहां सभी को मजीठिया दिया जा रहा है, जो शिकायतें मिल रही हैं, वो झूठी हैं। श्रम विभाग इसके बाद समाचार पत्र संस्थानों से दोबारा यह पूछने की हिम्मत नहीं जुटा पाता कि किनको किनको मजीठिया मिल रहा है, कृप्या उनके नाम और एकांउट नंबर दें। पिछले माह किसे कितना मिला, किसका क्या पद था, ये बताएं। ये सब श्रम विभाग वाले नहीं पूछते। कई बार श्रम विभाग वाले पूछते कुछ हैं और जवाब कुछ और मिलता है। उधर, समाचार पत्र के मालिक यह भी कह देते है कि यहां कोई मजीठिया वेतनमान लेना ही नहीं चाहता। कल को ये लोग लिखकर दे देंगे कि उनके यहां कोई पत्रकार सेलरी ही नहीं लेना चाहता। मजदूर मजदूरी के लिए ही काम करता है। पर ये मालिक ऐसे ऐसे कुतर्क गढ़ देते हैं कि हंसी आती है। श्रम विभाग को इनके खिलाफ कार्यवाही करनी चाहिए।

दरअसल श्रम विभाग अवैध कमाई का सबसे बड़ा जरिया है। कोई भी निजी संस्थान श्रम कानूनों का पूरी तरह पालन नहीं कर पाता। इसलिए हर महीने इनका बड़ी कंपनियां, छोटी कंपनियां और दुकानों से वसूली बंधी होती है। इस वसूली पर प्रेस की नजर ना पड़े, इसलिए उनसे दूरी बनाकर रखते हैं। एक कपड़े के व्यापारी ने बताया कि लेबर इंस्पेक्टर पहली बार आया तो 50 गलती निकाला। जैसे किस दिन संस्थान बंद रहता है, दीवाल पर यह नहीं लिखा है। 14 साल से कम वाले बाल मजदूर संस्थान में एक भी नहीं है, इसकी घोषणा नहीं है। दीवार का रंग अलग नहीं है, श्रमिकों का रजिस्टर मेंटेन नहीं है आदि-आदि। अंत में बात यह तय हुई कि हर तीन महीने में एक-एक हजार आकर लेते जाना और कुछ मत पूछना, ना ही केस कोर्ट में लगाना। बस यही हाल हर संस्थान में है। और श्रम विभाग में यह पैसा नीचे से लेकर ऊपर तक बंटता है इसलिए शिकायत पर कोई सुनवाई नहीं करता। नौकरी से निकालने की कोई शिकायत लेबर आफिस में किया तो शिकायतकर्ता की परेशानी और आफिस की बल्ले-बल्ले होती है। शिकायत के बाद अधिकारी कंपनी के महाप्रबंधक को फोन लगाकर इस बात की बोली लगाता है कि आप पैसा दे दो, मैं शिकायत को ठंडे बस्ते में डाल दूंगा या हल्का केस बनाऊंगा। फिर पेशी पर पेशी। अंत में श्रमिक नहीं माना तो बोल देते हैं कि हमने शासन को भेज दिया है। अब ऊपर स्तर से निर्णय होगा कि कोर्ट लगाएंगे या कुछ और करेंगे। इसलिए बेहतर होता है कि हर विवाद स्वयं कोर्ट में जाकर लड़ें। महज कुछ पैसों के चक्कर में लेबर आफिस के भ्रष्ट अधिकारी जिंदगी भर चक्कर लगवा देते हैं। हां वेतन भुगतान के मामले में जल्द कार्यवाही जरूर करते है। वह भी पैसा वसूली के कारण।

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित. पत्र लेखक ने अपना नाम न प्रकाशित करने का अनुरोध किया है.

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भड़ास के जरिए मैंने जिंदगी में पहली बार न्यू मीडिया / सोशल मीडिया की शक्ति का अनुभव किया

जानिब ए मंजिल की ओर अकेला चला था मगर
लोग मिलते गए, कारवां बनता गया!!!

यशवंतजी की ओर से देशभर के पत्रकारों के नाम भड़ास पर पोस्ट हुआ संदेश न्याय की लड़ाई में उबाल ला चुका है। भड़ास के जरिए मैंने जिंदगी में पहली बार न्यू मीडिया / सोशल मीडिया की शक्ति का अनुभव किया। भड़ास की पूरी टीम को मेरा धन्यवाद! धन्यवाद देने का एक बड़ा कारण यह भी है कि मजीठिया के मामले में देश के पत्रकारों को एकजुट होने का मंच भी मिला है। भड़ास के यशवंतजी का मेरे को लेकर लेख आने के बाद मेरे पास पिछले दो दिनों से देशभर से बड़ी संख्या में पत्रकारों के फोन आ रहे हैं। अधिकांश पत्रकार मजीठिया की लड़ाई में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाना चाहते हैं।

मुझे लगता है कि यह समय पत्रकारों के जिंदगी का टर्निंग प्वाइंट है। दूसरे शब्दों में आर-पार की लड़ाई है। पत्रकारों ने फोन कर मुझे न सिर्फ बधाई दी बल्कि मेरा हौसला भी बढ़ाया। मैं जानता हूं कि मेरी लड़ाई अरबों रुपए का कारोबार करने वाली कंपनी से है। यह लड़ाई मैं देशभर के पत्रकारों के दम पर ही लड़ सकता हूं। मुझसे  पत्रकारों ने पूछा कि हम तो सब अलग-थलग पड़े हैं, ऐसे में मजीठिया की लड़ाई कैसे लड़ी जा सकती है। मैंने इन साथियों को बताया कि अपने शहर में  पत्रकारों का छोटा-छोटा समूह बना लें और वकीलों से राय मशविरा कर सुप्रीम कोर्ट में जाने के लिए ड्राफ्ट तैयार करा लें।

मैंने ये भी सुना है कि कंपनियां मजीठिया से बचने के लिए बड़ी संख्या में पत्रकारों के ट्रांसफर की तैयारी कर रही हैं या कर चुकी हैं, ताकि अधिकांश पत्रकार नौकरी छोड़कर चले जाने के लिए मजबूर हो जाएं। कंपनियों की दूसरी रणनीति यह है कि वो अपने स्थाई कर्मचारियों से इस्तीफा लिखवाएंगी तथा कान्टेक्ट कर्मचारी के रूप  में नया अप्वाइंटमेंट देगी। साथियों! ये समय भारत के पत्रकारों के लिए सबसे दुर्भाग्य का समय होगा। वर्तमान में जब सुप्रीम कोर्ट हमारी ताकत बना हुआ, तो हमारा कमजोर रहना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं है। मालिकों व कर्मचारियों के बीच हर युग में संघर्ष होता आया है और सबसे सुखद बात यह है कि हर युग में कर्मचारी जीते हैं। आप भरोसा रखिए कि जब दुनिया में कोई भी परिवर्तन आता है तो उसके  पीछे परमात्मा की शक्ति और उसकी इच्छा होती है। मजीठिया भी उसी का एक पार्ट है। यह हमारे लिए बना है। हमारा हक है। …और इसे लेने के लिए हमें ठान लेनी चाहिए। जो लोग इस मुगालते में हैं कि न्याय मांगने व देने वालों को खरीद लेंगे, उनकी गलतफहमी दो जनवरी को सहारा समय के मालिक सुब्रत राय की तरह दूर हो जाएगी।

मजीठिया की लड़ाई में एक-एक पत्रकार उसी तरह महत्वपूर्ण है, जिस तरह देश के लिए एक-एक सैनिक है। दोस्तों! मैं ये कोई आर्टिकल नहीं लिख रहा हूं बल्कि जो अनुभव कर रहा हूं, वो आप को बता रहा हूं। अभी नहीं तो कभी नहीं। हम  पत्रकारों  पर आने वाली  पीढियां हंसेंगी। हमारी पीढियां कहेंगी कि हम सशक्त भारत के सबसे कमजोर वर्ग हैं। मजीठिया देश के एक-एक पत्रकार को मिले, इस बात की लड़ाई लड़ने के लिए मैं चैन की नींद नहीं सो रहा हूं। उसी तरह आप भी आज से संकल्प लीजिए कि मजीठिया की लड़ाई में जो संभव होगा, मदद करूंगा। अगर आपने अपने हक की लड़ाई नहीं लड़ी तो ये बात मत भूलना कि आप अपने शोषण का रास्ता खुद बना रहे हैं। मैं आप से फिर से मुखातिब होउंगा, देश के तमाम उन पत्रकारों को धन्यवाद जिन्होंने भड़ास संपादक यशवंत जी के लेख के बाद मुझे फोन कर मेरा हौसला बढ़ाया।

सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं
मेरा मकसद है, ये तस्वीर बदलनी चाहिए

आप का
रजनीश रोहिल्ला
मोबाइन नंबर : 9950954588


मूल खबर….

दैनिक भास्कर को औकात दिखाने वाले सीनियर रिपोर्टर रजनीश रोहिल्ला को आप भी सलाम करिए

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कानपुर में एक और प्रेस क्लब का गठन, कृष्ण कुमार सिंह अध्यक्ष बने

गणेश शंकर विद्यार्थी की कर्मस्थली कानपुर में पत्रकारों ने मिलकर कानपुर प्रेस क्लब का गठन किया. प्रेस वार्ता के दौरान अध्यक्ष कृष्ण कुमार सिंह गौर और उपाध्यक्ष मयंक शुक्ला ने बताया हमारा उद्येश सभी पत्रकारों के सम्मान, सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा के लिए संग़ठन से आगे एक परिवार की तरह काम करना है. कानपुर प्रेस क्लब अन्य सभी पत्रकार संगठनों के साथ मिलकर पत्रकारपुरम के लिए मुख्यमंत्री को जल्द ही ग्यारह सूत्री ज्ञापन सौंपेगा. अगली बैठक में जल्द ही सभी पत्रकारों के साथ मिलकर कानपुर प्रेस क्लब का विस्तार किया जाना सुनिश्चित किया गया है.

उधर, नए प्रेस क्लब के गठन को लेकर सवाल भी उठने लगे हैं. लोगों का कहना है कि कितने कानपुर प्रेस क्लब बनेंगे. वहीं कुछ का कहना है कि प्रेस क्लब के पदाधिकारियों के खराब आचरण से क्षुब्ध होकर कुछ पत्रकारों ने नया प्रेस क्लब गठन करने जैसा कदम उठाया है. ज्ञात हो कि कानपुर प्रेस क्लब के कुछ पदाधिकारी कई पत्रकारों को फर्जी बताकर उनको अपमानित करते रहते हैं. इसी से नाराज होकर अब जमीनी पत्रकारों ने अपना संगठन बनाया है.

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मजीठिया के लिए चंडीगढ़ एक्सप्रेस इंप्लाई यूनियन पहुंची सुप्रीम कोर्ट

मजीठिया वेज बोर्ड की संस्तुतियों पर अमल से बचने के लिए प्रिंट मीडिया के मालिकान जितने और जिस तरह-किस्म की कुटिल चालें, साजिशें, षड्यंत्र, तिकड़में, करतूतें, धमकियां, पैंतरे, पहुंच-पैरवी, जोड़-तोड़ आदि का इस्तेमाल कर रहे हैं, सहारा ले रहे हैं, उसे देख-समझ-जान कर यह अनुमान लगाना कठिन हो गया है कि क्या ये वही लोग हैं जो लोकतंत्र के चौथे खंभे के ध्वजवाहक होने का दावा करते हैं? जो राग अलापते हैं, वादा करते हैं व्यक्ति-समाज, राजनीति, अर्थनीति, देश-दुनिया की सभी-सच्ची-सही समस्याओं-परेशानियों-मुसीबतों-दिक्कतों को उजागर करने का, प्रकाशित करने का, दिखाने का, बताने का, रू-ब-रू कराने का और संबंधित आरोपियों-दोषियों-गुनहगारों को कठघरे में खड़ा कराने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ने का?

ये मालिकान-धनपशु अपने कर्मचारियों-मातहतों के शोषण-उत्पीडऩ, उनका हक मारने-छीनने-झपटने-ऐंठने-हड़पने के जितने कुकृत्य-कारनामे, बदमाशियां-गुंडागर्दियां कर रहे हैं, उसकी मिसाल शायद ही कहीं और मिले। उनकी सारी ऊर्जा-शक्ति-ताकत अभी फिलहाल इसमें लगी है कि कर्मचारी उनके विरुद्ध किसी भी तरह की प्रक्रिया-कार्य-प्रयास में न संलग्न हों, बस चुपचाप-खामोशी से, सिर झुका कर-नजरें नीची करके काम किए जाएं, ड्यूटी निभाते रहें, बढ़े काम के बोझ को बिना किसी ना-नुकुर, विरोध-प्रतिरोध के करते रहें-करते जाएं और जितना मिलता है उसे लेकर संतोष करें और जीवन की गाड़ी खींचते जाएं। लेकिन ये नामुराद मालिकान अपने गुमान, अपने अभिमान-अहंकार-घमंड, पैसे और पहुंच के गुरूर में इस हकीकत को भूल गए, विस्मृत कर गए कि कामगार-कर्मचारी जब अपने पर आता है, अपने हक के लिए कमर कस कर मैदान में उतर पड़ता है तो बड़े-बड़े कथित-तथाकथित ताकतवरों के होशोहवास का कोई ठौर-ठिकाना नहीं रह जाता, उनका क्या-कैसा हाल होता है, इसे बताने नहीं समझने-बूझने, जानने-महसूस करने और इतिहास के पन्नों पर नजर दौड़ाने की जरूरत है।

बहरहाल, ताजातरीन मिसाल इंडियन एक्सप्रेस चंडीगढ़ के कर्मचारियों ने प्रस्तुत की है। इन कर्मचारियों की यूनियन और उसके पदाधिकारियों ने द इंडियन एक्सप्रेस अखबार समूह के महामहिम चेयरमैन-मालिक विवेक गोयनका की कारस्तानियों-कारगुजारियों-वादाखिलाफी से जाजिज-तंग आकर अंतत: सुप्रीम कोर्ट के दरवाजे पर दस्तक दे दी है। इंप्लाई यूनियन ने इससे पहले वार्ताओं, लेबर कमिश्नर के माध्यम से नोटिसों-तारीखों का लंबा-उबाऊ-खर्चीला खेल झेला। इसमें शामिल-संलग्न रहा विवेक गोयनका का एक आजमाया हुआ मोहरा-कारिंदा आर.सी.मल्होत्रा। बताते हैं कि मल्होत्रा अपनी मालिकानपरस्ती के लिए लंबे समय से कुख्यात-बदनाम रहा है। वह इससे पहले टाइम्स ऑफ इंडिया में हुआ करता था। वहां उसने कर्मचारियों के उत्पीडऩ की एक तरह से ट्रेनिंग ली और टाइम्स कर्मचारियों को परेशान करने, उत्पीडि़त करने का एक तरह से अप्रतिम रेकॉर्ड बनाया था। उसकी इसी खासियत की वजह से शायद विवेक गोयनका उसे इंडियन एक्सप्रेस में ले आए और ऊंचा ओहदा देकर उसे कर्मचारियों को परेशान करने के अपनी (विवेक) समझ से पुनीत काम में लगा दिया।

मजीठिया वेज बोर्ड के बारे में सुप्रीम कोर्ट का फैसला आए करीब आठ माह हो गए हैं। इसे अमलीजामा पहनाने की एक्सप्रेस कर्मचारियों की मांगों को विवेक के निर्देश पर मल्होत्रा के ही नेतृत्व में लटकाया जाता रहा। अनेक तरह की अड़चनें लगाई-अड़ाई जाती रहीं। सबसे बड़ी और अहम अड़चन तो यह लगाई गई कि कर्मचारियों को पहले से मिल रहे तमाम लेकिन आवश्यक-अनिवार्य भत्तों को खत्म कर दिया जाए और तब मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशों पर अमल हो। वह भी तीसरी श्रेणी में। प्रबंधन की इस घोर अमानवीय शर्त का यूनियन ने ठोस, बेहद तार्किक ढंग से दृढ़ता से विरोध किया। लेकिन मल्होत्रा नीत प्रबंधन पर कोई असर नहीं पड़ा, या यों कहें कोई असर नहीं पड़ रहा था। पर इधर मल्होत्रा अचानक सक्रिय हो गया तो उसकी वजह रही दिल्ली एक्सप्रेस कर्मचारी यूनियन द्वारा मल्होत्रा के छलावे से तंग आकर सुप्रीम कोर्ट की शरण लेना। सुप्रीम कोर्ट ने एक्सप्रेस प्रबंधन को एक निश्चित समय में मजीठिया संस्तुतियों को क्रियान्वित करने का निर्देश दिया। इससे भयभीत (दिखावटी) मल्होत्रा ने चंडीगढ़ यूनियन के साथ फिर से वार्ताओं-बैठकों का दौर चलाया, चिकनी-चुपड़ी बातें कीं, आश्वासन दिए, लेकिन उसके रुख-रवैए में अमल के चिन्हों-निशानों की नदारदगी देख यूनियन ने और समय गंवाए बगैर सर्वोच्च न्यायालय की शरण लेना उचित समझा। यूनियन ने कंटेम्ट केस नंबर 450 दायर कर दिया है। यानी दिल्ली और चंडीगढ़ की एक्सप्रेस कर्मचारी यूनियनों ने मजीठिया वेज बोर्ड की संस्तुतियों को लागू कराने और इसे लागू करने-कराने में बाधा बने अखबार मालिक-प्रबंधकीय लोगों को सजा देने का निर्णय अंतत: सबसे बड़ी अदालत के हवाले कर दिया है।

मात्र ट्रिब्यून ने लागू किया है मजीठिया

इस संदर्भ में उल्लेखनीय यह है कि उत्तर भारत, खासकर चंडीगढ़, पंजाब, हरियाणा और हिमाचल प्रदेश से प्रकाशित होने वाले ढेरों अखबारों में मात्र द ट्रिब्यून अखबार समूह ने मजीठिया वेज बोर्ड की संस्तुतियों को अमलीजामा पहनाया है। कहने को अमर उजाला अखबार ने मजीठिया पर अमल किया है लेकिन कितना और कैसे, इसका उदाहरण है उसका हिमाचल का एक रिपोर्टर जिसने अखबार संपादक-प्रबंधन के शोषण-उत्पीडऩ से परेशान होकर हिमाचल हाईकोर्ट की शरण ले ली है। पंजाब केसरी अखबार का रुख-रवैया, दशा-सूरत किसी से छिपी नहीं है। वहां किसी तरह के कायदे-कानून का चलन है भी, यह बात-याद, माथे पर जोर डालने पर भी किसी भी पुराने-नए श्रमजीवी पत्रकार-गैर पत्रकार कर्मचारी के स्मृतिपटल पर चढ़ती ही नहीं। रही बात भारत के सबसे बड़े समाचार पत्र दैनिक भास्कर की तो वहां मजीठिया की बात करना सबसे बड़ा जुर्म-क्राइम है। उसके चंडीगढ़ ऑफिस में मजीठिया के मुद्दे पर मातमी माहौल है। हां, लुके छिपे ढंग से उसके कर्मचारी मजीठिया को लेकर आहें जरूर भरते हैं पर इसके लिए खुलकर सामने आने की बात उठते ही नौकरी जाने के भय से सहम-डर जाते हैं और अपनी खोल में दुबक जाते हैं। उनका मुंह, जबान, बोली फिर पूर्ववत सिल जाती है, स्टिच हो जाती है।

चंडीगढ़ से वरिष्ठ पत्रकार भूपेंद्र प्रतिबद्ध की रिपोर्ट.

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