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सियासत

क्या गांधी वाकई भगत सिंह की फाँसी टाल सकते थे? सौ साल पुराने झूठ की पड़ताल

सुशोभित-

क्या गांधी जी भगत सिंह की फाँसी को टाल सकते थे, लेकिन भगत सिंह के प्रति ‘दुर्भावनावश’ या ‘ईर्ष्यावश’ उन्होंने वैसा नहीं किया? आइए, आज इस सौ साल पुराने झूठ और दुष्प्रचार की कलई खोलते हैं!

सबसे पहली बात यह है कि भगत सिंह ने एक जघन्य अपराध किया था और हम में से किसी को भी इसे स्वीकारने से संकोच नहीं करना चाहिए। उन्होंने भूल से एक ​निर्दोष की हत्या की थी। उन्हें इस पर कोई अफ़सोस भी नहीं था, उलटे बाद में उन्होंने इसे न्यायोचित ठहराया! जिस लाठीचार्ज में लाला लाजपतराय की मृत्यु हुई, उसका आदेश जेम्स स्कॉट ने दिया था, लेकिन भगत सिंह ने जॉन सॉन्डर्स को मार डाला। सॉन्डर्स महज़ 21 साल का नौजवान था। किसी माँ का बेटा था। उसे आठ गोलियाँ मारी गईं। अव्वल तो ​किसी की मृत्यु का बदला लेने के लिए किसी और की हत्या करना अपने आपमें कोई ज़िम्मेदाराना सोच नहीं है। प्रतिकार के और भी दूसरे वैध तरीक़े हो सकते हैं। उसमें भी भूल से किसी निर्दोष को मार देना, गोली चलाने से पहले उसकी पहचान की ठोक-बजाकर तस्दीक़ तक नहीं करना तो और घोर लापरवाही है।

चन्नन सिंह नाम का एक हिन्दुस्तानी सिपाही भगत सिंह और उनके साथियों का पीछा करने आया तो उसे भी मार दिया गया। वह तो अपना देशवासी ही था, कोई ग़रीब आदमी था जो केवल अपनी नौकरी कर रहा था। यहाँ तक कि सभी अंग्रेज़ भी उस समय बुरे नहीं थे। उनमें से बहुत सारे नेकदिल, उदार और हिन्दुस्तानियों के लिए हमदर्दी रखने वाले थे। कोई अंग्रेज़ होने भर से मृत्यु का पात्र नहीं हो जाता। भगत सिंह और उनके सा​थियों ने पहले ही पोस्टर्स छपवा रखे थे कि उन्होंने स्कॉट को मारकर लालाजी की मौत का बदला ले लिया है। लेकिन जब पता चला कि उन्होंने सॉन्डर्स को मार दिया है तो पोस्टरों में स्कॉट का नाम बदलकर सॉन्डर्स कर दिया गया और यह जताने की कोशिश की कि उनके ​निशाने पर सॉन्डर्स ही था। भगत सिंह को इस हत्याकाण्ड के लिए ही मृत्युदण्ड मिला था, इसे गांधी जी चाहकर भी बदल नहीं सकते थे।

दूसरी बात यह है कि भगत सिंह स्वयं नहीं चाहते थे कि उनकी फाँसी की सज़ा टल जाए। वो शहीद होने पर आमादा थे और एक मिसाल क़ायम करना चाहते थे। उन्होंने सेंट्रल लेजिस्लेटिव असेम्बली में यह भलीभाँति जानते हुए आत्मसमर्पण किया था कि उन्हें सज़ा दी जाएगी और फाँसी भी दी जा सकती है। जब उनके पिता सरदार किशन सिंह संधू ने उनकी फाँसी टालने के लिए प्रिवी काउंसिल को एक अन्तिम अपील लिखी तो वो उन पर बहुत नाराज़ हुए और यह तक कह बैठे कि- “मुझे शर्म आती है ये कहते हुए कि आप मेरे पिता हैं!” भगत सिंह पर ग़दर पार्टी के करतार सिंह सराभा और उनके साथियों का गहरा प्रभाव था। करतार सिंह मात्र 19 वर्ष की आयु में फाँसी के तख़्ते पर शहीद हुए थे। वे भगत सिंह के रोल मॉडल थे।

तीसरी बात यह है कि भगत सिंह की विचार-प्रक्रिया से सहमत नहीं होने के बावजूद गांधी जी ने अपने स्तर पर उन्हें बचाने की भरसक कोशिशें की थीं। जब भगत सिंह को फाँसी दी जाने वाली थी, उसी समय तत्कालीन वाइसरॉय लॉर्ड इरविन से गांधी जी की बैठक होने वाली थी। वह एक ऐतिहासिक घटना थी। ब्रिटिश भारत के इतिहास में यह पहला अवसर था, जब राज का सर्वोच्च अधिकारी देश के किसी स्वाधीनता सेनानी के साथ बराबरी से बात कर रहा था। नमक तोड़ो आन्दोलन (सविनय अवज्ञा) के चलते जेलें भरी जा चुकी थीं। लाखों लोग जेलों में क़ैद थे। लॉर्ड इरविन ने गांधी जी से कह दिया था कि अगर वो भगत सिंह का मसला छेड़ते हैं तो वो उनसे बात नहीं करेंगे। गांधी जी के सामने दुविधा थी कि जो लाखों लोग जेलों में बंद हैं, उन्हें छुड़वाएँ या उन भगत सिंह के लिए शांति-प्रक्रिया को बेपटरी होने दें, जो स्वयं जीवित रहना नहीं चाहते थे।

इसके बावजूद गांधी जी ने भरसक प्रयास किए और लॉर्ड इरविन से बातचीत शुरू होने से पहले कई बार उनसे भगत सिंह की सज़ा माफ़ करने की अपील की। उन्होंने लॉर्ड इरविन को बार-बार चिट्ठियाँ लिखीं। इन पत्रों को आप सम्पूर्ण गांधी वांग्मय (खण्ड 45 : दिसम्बर 1930 : अप्रैल 1931) में पढ़ सकते थे। गांधी जी अपने स्तर पर जो कुछ कर सकते थे, वो उन्होंने किया। नेहरू जी तो जेल में जाकर भगत सिंह से मिले भी थे। कांग्रेस पार्टी के तत्कालीन अध्यक्ष मदन मोहन मालवीय ने भी अपनी ओर से भगत ​सिंह के ​लिए दया याचिका दायर की थी।

भगत सिंह के फाँसी पर चढ़ने के आग्रह को भी मैं उनकी प​रिपक्वता नहीं समझता। वे प्रखर थे, बौद्धिक थे, उनका एक आभामण्डल था। युवाओं पर उनका प्रभाव था। उस समय उनका जीवित रहना ज़्यादा ज़रूरी था। वो स्वतंत्रता आन्दोलन में जीवित रहकर ​जितना योगदान दे सकते थे, उतना मरकर नहीं दे पाते। वो आगे चलकर देश का नेतृत्व कर सकते थे!

प्रश्न यह है कि हम लोग मरने और मारने वालों को इतना महिमामण्डित क्यों करते हैं? कारण यह है कि हमारे दिलों में हिंसा की मूर्ति स्थापित है, जिसकी हम पूजा करते हैं। हिंसा से बड़ा देवता आज कोई दूसरा नहीं है। पिस्तौल चलाने वालों, बम फेंकने वालों, जूते उछालने वालों को हम नायक समझते हैं। जबकि इस दुनिया को वो करोड़ों बेनाम लोग चला रहे हैं, जो चुपचाप, ईमानदारी से अपना काम करते हैं- सफ़ाईकर्मी, अध्यापक, चि​कित्सक, मज़दूर, किसान। लेकिन इन लोगों के​ लिए हमारे दिल में कोई सम्मान नहीं, जो अपनी पहचान मिटाकर जी रहे हैं और इस दुनिया को अपनी धुरी पर टिकाए हुए हैं। हिंसक तौर-तरीक़े अपनाने वालों को हम अपना हीरो समझते हैं। क्यों?

प्रसंगवश, यह बताते चलूँ कि भगत सिंह कम्युनिस्ट थे। वामपंथी- जो कि आज एक गाली मानी जाती है। उन पर बोल्शेविक और अराजकतावादी विचारधारा का प्रभाव था। उनकी पार्टी का नाम हिन्दुस्तान सोश​लिस्ट रिपब्लिक एसोसिएशन था। अपनी शहादत से चंद मिनटों पूर्व भगत सिंह लेनिन को पढ़ रहे थे। फाँसी के तख़्ते की ओर ले जाने के लिए आए सिपाही से कहा उनका यह वाक्य तो अब किंवदंती बन चुका है- “ज़रा रुको, एक क्रांतिकारी की दूसरे से मुलाक़ात हो रही है!” तब उनके हाथों में क्लारा ज़ेटकिन की किताब ‘लेनिन के संस्मरण’ थी, जो 1924 में प्रकाशित हुई थी।

भगत सिंह ने जेल में लेनिन-दिवस भी मनाया था। 21 जनवरी 1930 को लाहौर षड्यंत्र केस के आरोपियों को अदालत में पेश किया गया। संयोग से उस दिन लेनिन की छठी पुण्यतिथि भी थी। क़ैदियों ने लाल रूमाल बाँध रखे थे। जैसे ही जज साहब कुर्सी पर विराजे, भगत सिंह के नेतृत्व में क़ैदियों ने नारे लगाना शुरू कर दिए- “समाजवादी क्रांति ज़िन्दाबाद, कम्युनिस्ट इंटरनेशनल ज़िन्दाबाद, सर्वहारा ज़िन्दाबाद, लेनिन का नाम अमर रहेगा, साम्राज्यवाद का नाश हो…” इसके बाद भगत सिंह ने अदालत में एक टेलीग्राम पढ़कर सुनाया, और उसे कम्युनिस्ट इंटरनेशनल को भेजने की इजाज़त चाही।

टेलीग्राम में लिखा था : “आज लेनिन-दिवस पर हम उन सभी को दिली मुबारक़बाद देना चाहते हैं, जो महान लेनिन के विचारों को आगे बढ़ाने के लिए प्रयासरत हैं। आज सोवियत संघ में जो महान प्रयोग हो रहा है, हम उसकी क़ामयाबी की दुआ करते हैं। हम अंतरराष्ट्रीय कामगार आंदोलन की आवाज़ में अपने नारों को मिला दे रहे हैं। सर्वहारा की जीत होगी, पूँजीवाद और साम्राज्यवाद परास्त होगा।”

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