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सियासत

देश का असल मजाक किसने उड़ाया- मीडिया ने, अल्ट्रा देशभक्तों ने या खुद सरकार ने?

अशोक कुमार पांडेय-

देश का असल मज़ाक़ किसने उड़ाया? सबसे ज़्यादा गोदी मीडिया ने जो अब गिद्ध मीडिया बन चुका है। कराची से इस्लामाबाद तक क़ब्ज़े जैसी परम मूर्खतापूर्ण ख़बरे चलाकर इन्हें लगा था कि ये मोदी की 56 इंच वाली इमेज को 156 इंच तक ले जाएँगे। शायद सरकार को भी यही लगा इसीलिए इनकी लगाम नहीं कसी गई। अब पाकिस्तान में उन पर मीम बन रहे हैं, देश में मज़ाक़ उड़ रहा है और 56 इंच 16 इंच से भी छोटा लग रहा है।

दूसरे नंबर पर ख़ुद को असली देशभक्त समझने वाले बैसाख नंदन भक्तों ने। एक चार साल आर्मी से रहा ख़ुद को मेजर लिखने वाला ईरान के विदेशमंत्री को गाली दे गया चैनल पर। अब ईरान में वह वायरल हो गया और सरकार को सफ़ाई देनी पड़ी।

इसके बनिस्बत सरकार के आलोचक यू ट्यूब चैनलों को देखिए। सबने बेहद संतुलित तरीक़े से सिर्फ़ वेरिफ़ायड ख़बरें चलाईं। मेरे यहाँ पाकिस्तानियों ने भी लिखा कि दोनों तरफ़ फ़र्ज़ी ख़बरें हैं आप सही बता रहे हैं।

सरकार के घोषित विरोधियों, राहुल गांधी सहित पूरे विपक्ष ने संयम से देश का साथ दिया। उनकी किसी बात से देश का मज़ाक नहीं उड़ा। संदेश गया सब एक साथ हैं। सोचियेगा ये चैनल, ये अल्ट्रा देशभक्त असल में देश का कितना नुक़सान करते हैं।

जिसका डंका सारी दुनिया में बजता था, उसके साथ खुलकर कोई देश क्यों नहीं आया? हमारी पारंपरिक नीति ग्लोबल साउथ और रूस के क़रीब रहने की थी।

रूस वैसे भी इन दिनों युद्ध में उलझा है लेकिन BRICS को लेकर जिस तरह का फ्लिप-फ्लॉप हुआ है, एक निरर्थक यूक्रेन यात्रा जिस तरह से हुई उसके बाद से ज़ाहिर है कि रूस आपको उतना विश्वसनीय नहीं समझेगा।

हम पश्चिम की तरफ़ जाते दिखे, प्रो अमरीका, प्रो यूरोप, लेकिन वहाँ भी स्थाई मित्र नहीं तलाश सके, वी वॉन्ट पार्टनर्स नॉट प्रीचर्स की विदेश मंत्री की दहाड़ अखबारों में अच्छी लगती है, कूटनीति में बड़बोलापन है। व्यापार में पार्टनर हो सकते हैं देश बाक़ी में होना बहुत कुछ पर निर्भर करता है।

अमरीका के पाकिस्तान में बहुत से stakes हैं, वह पूरी तरह उसके खिलाफ़ नहीं हो सकता, यह सब जानते हैं। इजरायल कभी जंगी हालात में ज़बानदराज़ी के आगे अमरीका के साथ नहीं खड़ा हुआ, किसी और के साथ क्या होगा? हाँ इजरायल के समर्थन का मतलब था पश्चिम एशिया के हमारे परंपरागत साथी खुल के आपके साथ नहीं आएंगे। इजरायल से सामरिक सहयोग जैसे-जैसे बढ़ा हमारा, तुर्किए ने पाकिस्तान में अपना निवेश बढ़ाया।

ग्लोबल साउथ के पड़ोसियों पर हमने ध्यान नहीं दिया और देश में इस्लामोफोबिया बढ़ने दी।

एंकरों के चीखते वीडियो, मुस्लिमों के साथ दुर्व्यवहार के वीडियोज़, स्पेसेज में बेशुमार नस्ली नफ़रत, बड़े नेताओं के सांप्रदायिक बयान, हेट स्पीचेज़ अब कुछ भी देश की सीमाओं में नहीं रहता, ट्विटर और दूसरे सोशल मीडिया के चलते दुनिया भर में जाता है। मालदीव और बांग्लादेश ही नहीं ग्लोबल साउथ के ज़्यादातर देशों की मुस्लिम आबादी और उनका नेतृत्व अगर हमसे संशकित हुए तो यह स्वाभाविक है। यूरोप में भी हमारी छवि खराब हुई। अफ्रीका जैसा देश बिल्कुल निष्पृह रहा।

दरअसल जो एक नैतिक बढ़त थी पाकिस्तान पर हमारी वह खत्म हो गई, हम भी उनके जैसे ही सांप्रदायिक, नस्ली और स्त्रीविरोधी साबित होते गए सोशल मीडिया के उभार और अल्ट्रा देशभक्तों की बढ़ती हुई उग्रता के साथ।

पक्षधर नीति की जगह सबको साधने और प्रायोजित इवेंट्स तथा मीडिया मैनेजमेंट के जरिए बनाई गई वैश्विक छवि अंतर्राष्ट्रीय मीडिया में इस बार की निगेटिव कवरेज के चलते बिखर गई है। संभव है हमारा नेतृत्व नए सिरे से सोचे, हालाँकि मिस्री साहब के परिवार के साथ कल जो कुछ हुआ है, उसके बाद बहुत उम्मीद लगती तो नहीं।


सन्त समीर-

कल रात शहबाज शरीफ़ की प्रेसवार्ता जिसने भी सुनी होगी, उसने सङ्केत भी पकड़ा ही होगा कि पाकिस्तान सुधरा नहीं है, बस पैंतरे बदल रहा है। चीन का जैसा स्तुति गान पाक प्रधानमन्त्री ने किया, उसने हमारे जैसे लोगों की शङ्काओं को विश्वास में बदल दिया है कि तुर्किए के अलावा चीन ने भी पाकिस्तान की मदद युद्ध के दौरान ही शुरू कर दी थी।

जो भी हो, ऐसी उम्मीद नहीं थी कि मोदी जी इतना निराश करेंगे। मुझे याद आ रहा है कि लोकसभा चुनाव के समय अच्छे-भले माहौल में जाने किनकी सलाहों पर अमल करते हुए उन्होंने अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारी थी। ऐसा लगता है ट्रम्प की दोस्ती के नाटक में मोदी जी फँस गए और इस बार यह कुल्हाड़ी उनसे ज़्यादा देश के पैरों में लगी है। यह कुछ वैसा हुआ है कि आसान-सा कैच हाथ में आने को था कि हमने आँखें बन्द कर लीं।

हाँ, भारत की सेना की जितनी तारीफ़ की जाए, कम है। उसने वह कर दिखाया है, जिसके लिए हम इज़राइल की तारीफ़ करते हैं, पर दुर्भाग्यपूर्ण सच यह भी है कि भारत ने जीत हासिल नहीं की है, बल्कि मिलती हुई जीत को अपने ही हाथों बहुत हद तक दीर्घकालिक हार में बदल दिया है।

लाख जङ्गबन्दी करते रहिए, पर मेरा अन्दाज़ा यही है कि यह दुर्भाग्य फिर उदय होगा। कहीं ऐसा न हो कि दुर्भाग्य उदय तब हो, जब भारत के भीतर बैठे पाकिस्तानपरस्त हद से ज़्यादा मज़बूत हो चुके हों।

मुझे पता है कि काँग्रेस आ जाए तो मेरा भला आसानी से हो जाएगा और मेरी मुफ़लिसी दूर हो जाएगी। कुछ तो हैं काँग्रेस में, जिनके जेहन में अभी तक मैं ज़िन्दा हूँ। मुझे वह दिन भी याद है जबकि मेरी कुछ बातों से प्रभावित होकर स्व. शीला दीक्षित ने अपने हाथों से मेरे लिए भोजन की थाली लगाई थी और मुझे एक ज़िम्मेदारी सौंपने की बात चली थी, पर मेरा जीने का अपना तरीक़ा रहा है तो मैंने उस दिशा में अपने क़दम नहीं बढ़ाए। काँग्रेस की लानत-मलामत भी मैं करता ही रहा हूँ, पर काँग्रेसियों ने मेरा कभी नुक़सान नहीं किया। बावजूद इसके जब देश की बात आती है तो मैं काँग्रेस का विरोध करता हूँ और अक्सर मोदी जी का समर्थन करता हूँ। कारण साफ़ है कि राहुल गान्धी और अखिलेश यादव को मिलाजुलाकर देखूँ तो ये दोनों मूर्खताओं के सङ्घनित रूप से ज़्यादा नहीं मुझे लगते। हाँ, कल को इनकी समझदारी बढ़ी तो देखा जाएगा।

जो भी हो, मेरा सच यही है कि मैंने मोदी जी से उम्मीद तो भरपूर लगाई थी, लेकिन कल की घटना से थोड़ी निराशा हुई। अब यही सोच सकता हूँ कि वे चीज़ों समझेंगे और आगे की रणनीति ठीक दिशा में बनाएँगे। इस बात से कोई यह न समझे कि मैं युद्ध छेड़ने की बात कर रहा हूँ। मैं हद से ज़्यादा युद्ध-विरोधी व्यक्ति रहा हूँ, लेकिन युद्ध और शान्ति का मर्म तो समझना पड़ेगा।

यहीं पर इन्दिरा गान्धी याद आ रही हैं। उनको कोई बहुत अच्छा प्रधानमन्त्री मैं नहीं मानता, पर १९७१ के युद्ध के सन्दर्भ में अगर इस समय उन्हें हर तरफ़ याद किया जा रहा है, तो यह एकदम से अर्थहीन नहीं है।

और अन्त में, अपनी प्रचलित छवि के विपरीत गान्धी ने कभी वीरोपासना की बात थी, ठीक उसी भावना के साथ भारत की सेना को सलाम!

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