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भारत से बौद्ध धर्म का कट-ऑफ पॉइंट कौन-सा माना जाना चाहिए?

चंद्रभूषण-

कौन-सी दीमक बोधिवृक्ष की जड़ में लग गई?
एक सवाल है, कुछ कह सकें तो जरूर कहें

भारत से बौद्ध धर्म का कट-ऑफ पॉइंट कौन-सा माना जाना चाहिए? यानी वह बिंदु, जिसके बाद इस देश में उसका बचे रहना असंभव हो गया। वह दीमक कौन-सी थी, जो बोधिवृक्ष की जड़ में लग गई थी? जिसके बारे में जितने मुंह उतनी बातें कही जाती हैं लेकिन अभी तक जिसकी ठीक से पहचान तक नहीं हो पाई है? और वह लगी ही कब?

इतिहासकार और पुरातत्वशास्त्री डी. डी. कोसंबी लिखते हैं कि ‘श्रमणों की अवनति का बीज उनके द्वारा स्वीकृत राज्याश्रय में था’, जबकि डी.पी. चट्टोपाध्याय जैसे दर्शनशास्त्री और विद्वान विश्लेषक भारत में बौद्ध धर्म की जड़ें कमजोर होने के लिए ईसा की दूसरी-तीसरी सदी में, मोटे तौर पर सम्राट कनिष्क के समय में और उसके बाद बौद्ध धर्म के पूरी तरह मठाश्रयी हो जाने और अपने अस्तित्व के लिए जनता से कटकर राजाओं और बड़े सेठों के अनुदान पर निर्भर होते जाने को जिम्मेदार मानते हैं। यह बात उन्होंने लामा तारानाथ की किताब के अंग्रेजी अनुवाद ‘हिस्ट्री ऑफ बुधिज्म इन इंडिया’ में अपनी लंबी प्रस्तावना टीका में लिखी है।

मठाश्रय, राज्याश्रय और सेठाश्रय का यह काम महायान में ईसा युग की पहली दो सदियों में मौजूद बौद्ध धर्म के बाकी सत्रह पंथों से पहले हो गया था, लेकिन गौर करें तो भारत से बौद्ध धर्म के विलोप में इस बदलाव की भूमिका छोटी ही होनी चाहिए। कारण यह कि यह बदलाव भारत में ही नहीं, देर-सबेर हर जगह, बौद्ध धर्म की हर शाखा में देखा गया। फिर श्रीलंका, तिब्बत, चीन, कोरिया, जापान और दक्षिण-पूर्वी एशिया में ‘धर्म’ खोखला क्यों नहीं हुआ?

रामधारी सिंह ‘दिनकर’ ने ‘संस्कृति के चार अध्याय’ में वज्रयानी साधुओं के नैतिक अधोपतन की भारत से बौद्ध धर्म के विलोप में काफी बड़ी भूमिका बताई है। इसे बौद्ध धर्म के आम जनता से अलगाव और लोगों के उससे परे चले जाने का सबसे बड़ा कारण बताते हुए वे कहते हैं- ‘केवल उत्पीड़नों से धर्म का पतन असंभव था। संभव यह इसलिए हुआ कि बौद्ध साधुओं के चरित्र खराब होने लगे थे।’ कमाल है कि उसी अध्याय ‘बौद्ध साधना पर शाक्त प्रभाव’ में वे वज्रयान, सहजयान और कालचक्रयान को महायान पर शाक्त प्रभाव के रूप में व्याख्यायित करते हैं।

हजारीप्रसाद द्विवेदी अपनी किताब ‘नाथ संप्रदाय’ में सिद्ध करते हैं कि शैव, शाक्त, बौद्ध और कुछ अन्य तंत्र भी दसवीं सदी आते-आते एक-दूसरे के बहुत करीब आकर थोड़ा और बाद में नाथपंथ के विभिन्न संप्रदायों में बदल गए थे। ऐसे में बौद्ध मत में आ रहे बदलावों को सामाजिक उथल-पुथल से पैदा होने वाली किसी बड़ी आलोड़न प्रक्रिया के अंग की तरह भी देखा जा सकता था। लेकिन इस तरफ जाने के बजाय दिनकर जी ‘नैतिकता’ में गिरावट को लेकर बौद्धों को घेरने में ज्यादा दिलचस्पी लेते हैं अपनी बात के पक्ष में राहुल सांकृत्यायन की किताब ‘बुद्धचर्या’ से एक लंबा उद्धरण प्रस्तुत करते हैं। वाकई यह बड़ी आश्चर्यजनक बात है कि राहुलजी की इस मोटी किताब की प्रस्तावना में ब्राह्मणों और व्यापक भारतीय समाज के नैतिक पतन के लिए भी बौद्धों को जिम्मेदार ठहराया गया है।

‘मंजुश्री-मूलकल्प ने तंत्रों के लिए रास्ता खोल दिया। गुह्य समाज ने अपने भैरवी चक्र, शराब, संत्री संभोग तथा मंत्रोच्चारण से उसे और भी आसान बना दिया। आठवीं शताब्दी में एक प्रकार से भारत के सभी बौद्ध संप्रदाय वज्रयान गर्भित महायान के अनुयायी हो गए थे।…बड़े-बड़े विद्वान और प्रतिभाशाली कवि आधे पागल हो चौरासी सिद्धों मे दाखिल हो संध्या भाषा में निर्गुण गान करते थे। आठवीं शताब्दी से बारहवीं शताब्दी तक का बौद्ध धर्म वस्तुतः वज्रयान या भैरवी चक्र का धर्म था। इन पांच शताब्दियों में धीरे-धीरे एक तरह से सारी भारतीय जनता इनके चक्कर में पड़कर कामव्यसनी, मद्यप और मूढ़विश्वासी बन गई थी।….लाभ-सत्कार का द्वार उन्मुक्त होने से ब्राह्मणों और दूसरे धर्मानुयायियों ने भी बहुत अंश में इनका अनुसरण किया।’

आश्चर्यजनक यह बात इसलिए इसलिए लगती है क्योंकि ‘आधे पागल’, ‘चौरासी सिद्धों में दाखिल’, ‘संध्या भाषा में निर्गुण गान’ करने वालों में शीर्ष व्यक्ति सरहपा का ‘दोहाकोश’ राहुलजी ने ही न सिर्फ खोजा बल्कि बहुत लंबी टिप्पणी के साथ उसका एक महत्वाकांक्षी अनुवाद भी प्रकाशित किया। नेपाल और तिब्बत में उन्होंने लंबा समय बिताया, जहां मंजुश्री-मूलकल्प और गुह्य समाज की उपासना पद्धति का बहुत सम्मान है। अगर वे यह कहना चाहते हैं कि यह उपासना पद्धति और इस किस्म की रचनाशीलता पांच सौ वर्षों में बौद्धों और पूरे भारतीय समाज को पतन की राह पर ले गई, तो नेपाल के नेवार बौद्धों और तिब्बत के अधिकतर पंथों में एक हजार साल से भी ज्यादा समय से इसकी उपस्थिति इन समाजों को गर्त से भी नीचे पाताल में ले जा चुकी होती। फिलहाल हम मानकर चलें कि ‘बुद्धचर्या’ के लेखन में श्रीलंकाई थेरवाद का प्रभाव अधिक सघन है और यह राहुलजी के शुरुआती दौर की रचना है।

श्रीलंका के थेरवादी चिंतक और उनके अनुयायी इस मामले में ज्यादा बुनियादी सवाल उठाते रहे हैं। विलोप का जिम्मा भारत में छाए महायान और वज्रयान पर डालते हुए वे इन बुधिस्ट पंथों को बुद्ध के मूलभूत जीवन मूल्यों से ही हटा हुआ बताते हैं। मसलन, इनमें दैवी शक्तियों की भरमार, मंत्र-तंत्र-मिथकों पर भरोसा और विश्लेषणात्मक दृष्टि का अभाव। डॉ. आंबेडकर के श्रीलंकाई थेरवाद में दीक्षित होने और वहां से आगे बढ़कर नवयान का धर्मचक्र प्रवर्तन करने के बाद उनकी वैचारिक रोशनी में कुछ समय तक महायान और वज्रयान को बौद्ध धर्म में ब्राह्मणवाद की घुसपैठ की साजिश की तरह भी देखा गया। लेकिन मूलतः श्रीलंकाई थेरवाद से ही निकले इन दावों पर यकीन तब किया जाता, खुद जब थेरवाद भारत में टिक पाया होता। वह तो दुर्भाग्यवश, औरों के पहले ही भारत से जा चुका था।

तिब्बती इतिहासकारों के अलावा आम लोग भी सन 1197 ई. में तुर्क सरदार बख्तियार खिलजी द्वारा नालंदा, उदंतपुरी और विक्रमशिला महाविहारों के विध्वंस और भिक्षुओं के जनसंहार को भारत में बौद्ध धर्म के विलोप के लिए जिम्मेदार ठहराते रहे हैं। लेकिन यह एक जटिल समस्या का हल चुटकी बजाकर खोज लेने जैसा है।

धर्मों पर हमले होते रहे हैं और वे उनसे बेदाग निकल जाते रहे हैं। छोटे से यहूदी धर्म की जिजीविषा हमारे सामने है, जिसकी जड़ निरंतर हमलों के बावजूद अपने मूल-स्थान में भी कभी नहीं टूटी। ईसाइयत को अपने पहले तीन सौ वर्षों में ऐसे-ऐसे अत्याचारों का सामना करना पड़ा कि आज भी सुनकर दिल दहल जाता है। इस्लाम को दुनिया में आए कुल बारह साल ही हुए थे, जब मोहम्मद साहब के लिए उनकी बिरादरी ने मृत्युदंड घोषित किया और रातोंरात उन्हें अपना शहर छोड़ना पड़ा। इसके बाद कुल दस साल ही वे जी पाए। उनके छह सौ साल बाद इस्लाम को फिर से अस्तित्व का संकट झेलना पड़ा, जब मंगोलों ने उसकी राजधानी बगदाद को घुटनों-घुटनों खून में डुबो दिया था।

दूर क्यों जाएं, महमूद गजनवी से लेकर मोहम्मद गोरी तक और उसके बाद भी भारत में हिंदू धर्मस्थलों पर कमोबेश उतने ही, बल्कि उससे कहीं ज्यादा हमले हुए, जितने बौद्ध स्थलों पर हुए थे। लेकिन ये सारे विध्वंस इनमें से किसी भी धर्म का कुछ नहीं बिगाड़ पाए। फिर करुणा, सहिष्णुता और सचेतनता पर आधारित, बुद्ध का चलाया हुआ इतना पुराना धर्म अपने मूल देश में ही इतना खोखला कब-कैसे हो गया कि सिर्फ एक धक्के ने उसकी जड़ें उखाड़ दीं?

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