
17 जनू को भास्कर डॉट काम पर प्रकाशित एक खबर यूपी के राज्यपाल बीएल जोशी ने दिया इस्तीफा, शीला और शिवराज का पद छोड़ने से इनकार में लिखा है कि ”बता दें कि आगामी 31 जून को देश के 7 राज्यपालों का कार्यकाल समाप्त हो रहा है।” सबको पता है कि जून महीने में केवल 30 तारीख ही होती है। पर भास्कर वाले 31 जून भी पैदा कर दे रहे हैं।
देश का सबसे बड़ा समाचार पत्र समूह अब पाठकों को कैसी गलत जानकारी पढ़ा रहा है। पाठक भास्कर समूह पर आंखें मूंदकर भरोसा करते थे, लेकिन बीते कुछ समय से भास्कर के उपरी प्रबंधन ने आंखे मूंद ली है। लोग कुछ भी यहां लिखते छापते रहते हैं। भास्कर डाट काम वैसे भी पोर्न पत्रकारिता और सनसनी पत्रकारिता के लिए कुख्यात रहा है।
भास्कर डाट काम के एक पाठक द्वारा भड़ास को भेजे गए पत्र पर आधारित.
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vivek
June 17, 2014 at 6:55 pm
भास्कर डॉट कॉम में इंचार्ज सुशील तिवारी का आतंक के आगे कौन टिकेगा?
भास्कर डॉट कॉम में पिछले कुछ महीनों से काम कर रहे पत्रकार ललित फुलारा के इस्तीफे की खबरें आ रही है। सूत्रों के अनुसार, ललित फुलारा भास्कर डॉट कॉम भोपाल के इंचार्ज डीएनई सुशील तिवारी की करतूतों से तंग आ गए और उन्होंने नौकरी को लात मार दिया। गौरतलब है कि सुशील तिवारी को भोपाल टीम की कमान सौंपे जाने के बाद से ही लगातार इस्तीफों का दौर शुरू हुआ। टीम में जिन लोगों से सुशील तिवारी को खुन्नस थी, उन्हें चुन-चुनकर टारगेट किया गया। 2012 के जून में भास्कर डॉट कॉम में बड़ा परिवर्तन किया गया था जिसके तहत तत्कालीन इंचार्ज को प्रोमोट कर नोएडा बुला लिया गया।
तब भोपाल टीम को कौन संभालेगा, इसके लिए तीन दावेदारों में से एक थे सुशील तिवारी। ये तीनों दावेदार भास्कर टीम के सबसे पुराने सदस्य थे और इनमें से बाकी दो दावेदार वरिष्ठता और योग्यता के आधार पर सुशील तिवारी से बेहतर थे। लेकिन उस समय के तत्कालीन इंचार्ज के करीबी और विश्वस्त होने की वजह से सुशील तिवारी को बहुत ही शातिर तरीके से भोपाल टीम का इंचार्ज बनाया गया। उस समय टीम के अधिकांश सदस्य नहीं चाहते थे कि सुशील तिवारी इंचार्ज बने क्योंकि लोग उसको योग्य नहीं मानते थे लेकिन भास्कर में यह परंपरा है कि वहां टीम के किसी अयोग्य को ही कमान सौंपा जाता है क्योंकि वही मैनेजमेंट की फटकार सहकर और चापलूसी कर काम कर सकता है और ऐसे ही कमजोर आदमी को इंचार्ज बनाकर मैनेजमेंट जो चाहे वह करा सकता है।
मैनेजमेंट ने यह फैसला ले लिया था कि सारे वरिष्ठों को दरकिनार कर सुशील तिवारी को ही इंचार्ज बनाना है। सुशील तिवारी को शादी के बहाने घर भेजा गया। फिर पीछे टीम की मीटिंग बुलाई गई जिसमें एचआर हेड और बाकी बड़े अधिकारी मौजूद थे। मीटिंग से पहले यह कहा गया कि जिसको भी सुशील तिवारी के इंचार्ज बनने पर ऐतराज हो, वह खुलकर बोले क्योंकि निर्णय सबकी सहमति से लिया जाएगा। दरअसल मैनेजमेंट यह पता लगाना चाहती थी कि कौन-कौन सुशील तिवारी के खिलाफ है। अधिकांश लोग उस मीटिंग में चुप रहे क्योंकि सबको नौकरी प्यारी थी लेकिन कुछ लोग झांसे में आ गए और उन्होंने विरोध कर दिया। आखिरकार यह फैसला थोपा गया कि सुशील तिवारी भोपाल टीम की कमान संभालेंगे और बाकी दो वरिष्ठ नोएडा ऑफिस में बैठेंगे। यानि तिवारी के रास्ते के हर कांटे को साफ किया गया। उसके कुछ दिनों बाद जिन लोगों ने मीटिंग में विरोध किया था, उन्हें नौकरी से इस्तीफा देने पर मजबूर किया गया।
इंचार्ज बनते ही सुशील तिवारी ने एक-एक कर अपने दुश्मनों को निपटाना शुरू किया। सुशील तिवारी अपनी नौकरी बचाने के चक्कर में हर उस शख्स से खौफ खाता है जो उसका जरा भी विरोध करता हो। वहीं हर उस शख्स पर मेहरबान हो जाता है जो उसकी चापलूसी करता हो। इस संस्कृति में जो फिट नहीं हो पाता उसे इस्तीफा देने पर मजबूर किया जाता है। इस तरह से कई शिशु पत्रकार तो भास्कर डॉट कॉम से इस्तीफा देकर पत्रकारिता ही छोड़ बैठे। इसलिए जो भी साथी भास्कर डॉट कॉम ज्वाइन करने जाएं वह पहले सुशील तिवारी को जान लें, पहचान लें और सोच समझकर वहां नौकरी करने का निर्णय लें वरना उनके साथ भी वही होगा जो ललित फुलारा के साथ हुआ।
Hanuman Mishra
June 18, 2014 at 10:31 am
😆 वैसे महोदय आपने भी 17 जून को “17 जनू ” लिखा है। हो जाता है कभी-कभी 🙂
Sandeep Sharma
June 18, 2014 at 12:00 pm
अरे यह तो कम है। भास्कर डॉट कॉम में तो मानों चापलूसी ही नौकरी पाने का सबसे बड़ा तरीका है। सुशील तिवारी के पहले जो प्रभारी भी चापलूसों से घिरे रहते हैं। उनकी नजर में अच्छा वहीं है जो उनका गुणगान करे। जिन दो लोगों को भोपाल से तबादला किया गया वो भी कम नहीं थे। उन्होंने ने भी संपादक को तेल लगने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। हालांकि ज्यादा दम सुशील तिवारी के तेल में था।
भास्कर डॉट कॉम के लिए यह वाक्य उपयुक्त रहेगा : “पूरे कुएं में भांग घुली है।”
पुराने प्रभारी ने जानबूझकर तिवारी को प्रभारी बनवाया ताकि वो बतौर रबर स्टाम्प उसे इस्तेमाल कर सकें।
भास्कर डॉट कॉम में केवल उन्हीं की नौकरी चल सकती है जो तिवारी और उसके संपादक का गुणगान करें और उनकी प्रशंसा का ढोल पीटते रहें।
हालांकि यह भासकर की कार्यशैली भी बन चुकी है। हाहा हाहा