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राजकमल प्रकाशन के इस कार्यक्रम को पसंद करने लगे हैं रवीश कुमार!

Ravish Kumar-

बारिश में धुल कर भी भूरे रंग की कार अच्छी नहीं लग रही थी। कसूर रंग का रहा होगा। इंडिया इंटरनेशनल सेंटर से निकलते ही दिल्ली की धुली हुई सड़कें ऐसे चमक रही थीं जैसे उसके एक किनारे पर मरकरी की कतार बिछा दी गई है। अंखियों के झरोखे से का गाना जाम में फंस गया। एक मन था मेरे पास जो, अब खोने लगा है…पीं पीं पीं, ध्यान आया कि मेरी कार से भी बड़ी कार पीछे आ लगी है और उसे मेरी कार का होना बर्दाश्त नहीं हो रहा।

भविष्य का स्वर सुनने गया था। राजकमल प्रकाशन का यह कार्यक्रम पसंद करने लगा हूँ। मशहूर और स्थापित लोगों को सुनने तो सब जाते हैं लेकिन किसी नए को सुनने के लिए घर से निकल कर जाना आसान नहीं। हॉल खचाखच भरा था लेकिन पाँव रखने की जगह बची हुई थी, उसी को भरने के लिए पिछले दरवाज़ें को बार-बार खोला जा रहा था जिससे शीशे की दीवार में तेज़ कंपन होती थी और उसकी आवाज़ से अवरोध पैदा हो रहा था। दिमाग़ के भीतर बिछाई गई तंत्रिकाएं उड़ने लगीं और सर दर्द का आभास होने लगा। ध्यान चला जा रहा था लेकिन कोशिश थी कि नए वक्ता को सुनूं।

कोशी ने तो जैसे बस में सवार हिन्दी रचना संसार के युवा और बुुजुर्गों को अचानक से उतार लिया और अपनी दुनिया में खींच कर बताया कि एक शरीर के भीतर बीमारियों का सिलसिला किस तरह बंध जाता है और उसके बीच भी कला की चित्कार निकलती रहती है। दवा के रुप में नहीं बल्कि प्रतिरोध के रुप में। इंब्रॉइडरी को देखने का नज़रिया बदलते हुए कोशी से विकलांगता के यथार्थ से सबको भिड़ा दिया। हिन्दी के वरिष्ठ, स्थापित और नवोदित साहित्यकार इस सभा में बड़े ध्यान से सबको सुन रहे थे। कोशी का आना आम के बाग में कहीं से जामुन के टपक आने जैसा लगा। सुंदर।

तसनीफ़ ने तो हिन्दी और उर्दू की दुनिया की अनुपस्थिति को जिस तरह से उभारा आनंद आया। विषय ऐसा था कि तालियां बजनी थीं लेकिन उन्होंने अपनी अपनी भाषा की दुनिया में कैद पाठकों का ऐसा संसार पेश किया कि कभी हम इधर से उधर को देखने लगे और कभी उधर से इधर को। फ़हीम नाटक संसार के भीतर रचनाओं के बंटने, कटने, छंटने का फैलाव समेट रहे थे। उनकी एक बात याद रह गई कि स्कूल के बच्चों में कुछ बदल रहा है। रची हुई चीज़ों को फिर से रचने की चाह की जगह नया रचने का धुन सवार हो रहा है। वर्तमान से बग़ावत करने वाले ही भविष्य का स्वर रचते हैं। तीनों वक्ताओं से कुछ न कुछ सीख कर लौट आया।

राजमकल प्रकाशन को बधाई। इस आयोजन में आने का अवसर देने के लिए। जब आपको पता नहीं होता है कि कौन बोलने वाला है। कैसा बोलेगा, पहले कभी सुना नहीं तो जाना ठीक रहेगा या नहीं, इन सब फैसलों से खुद को झटकते हुए चला गया। किसी नए को सुनना ही आपके भीतर विनम्रता और ग्राह्यता का भाव पैदा करता है। कभी मुझे भी लोगों ने सुना, मैं यही सोच कर खुश हुआ कि मैं भी नए को सुनकर वापस आ रहा हूँ।पिछली बार भी गया था तो पावर्ती तिर्की को सुनकर मज़ा आ गया था। इस बार भी मज़ा आया। बस वक्ताओं को दस दस मिनट का ही समय मिला तो इतने में उनकी चाह पूरी नहीं हुई होगी लेकिन पहली बार पेश होने का अपना तनाव होता है, रोमांच होता है, उसका तो उन्हें अनुभव हुआ ही होगा।

राजकमल प्रकाशन का मैं लेखक हूं तो अच्छा लगा कि यह प्रकाशन अस्सीवें वर्ष में प्रवेश कर चुका है। अमोद माहेश्वरी और अपने संपादक जी सत्यानंद को साहित्यकारों को संभालते देख कर लगा कि संपादन केवल पुस्तकों का नहीं होता है। संपादक का सामाजिक व्यवहार कितना संपादित होता होगा। उसका कुछ भी नहीं होता है।पीछे रहने का अभ्यास दुनिया में होते हुए भी अनुपस्थित रहने का पुरस्कार है।

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