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आदरणीय प्रिय मीडिया : भोजपुरी में चोली, साया, साड़ी, लहंगा, ब्लाउज खत्म हुआ तो गुप्तांगों पर गीत गाये जाने लगे!

भोजपुरी गायक कलाकार शैलेंद्र मिश्रा ने भी यह पोस्टर एडिट कर (एडिट कर ही शेयर करने लायक है) शेयर किया है. जिज्ञासा हो पूरा पोस्टर देखने की, तो आसानी से सोशल मीडिया में पूरा देख सकते हैं. सार्वजनिक रूप से साझा है. डंके की चोट पर…

निराला बिदेसिया-

आदरणीय-प्रिय मीडिया…

पुराना साल जानेवाला है. नया साल आनेवाला है. नये साल के आगत पर मीडिया के स्वागत में भजपुरी (आप भोजपुरी से ज्यादा भजपुरी को ही तवज्जो देते हैं) इंडस्ट्री ने ‘मीडिया की बहन’ को ला दिया है. यह होना था. हो रहा है. हां, थोड़ा लेट से.

इसके पहले यादव, बाभन, भूमिहार, ठाकुर, चमार, कुरमी, दुसाध आदि की बहन-बेटियों को केंद्र में रखकर गाना बना. कुछेक मीडिया संस्थानों ने उसका विरोध किया, चिंता जताई. विद्रूपता के खिलाफ आवाज उठाई. पर, उनकी संख्या कम है. अधिकांश ताकतवर मीडिया संस्थानों ने (न्यूज वेबसाइटों आदि से ज्यादा बड़े नामदार अखबारों, न्यूज चैनलों के वेबसाइटों को गौर से देखिए) परोक्ष तौर पर इसका समर्थन किया. दूसरे रूप में. व्यू को मानक के तौर पर स्थापित करने की कोशिश की.

यह बताया कि भोजपुरी का परचम लहरा रहा है. इतने मिनट में इतना व्यू. एक दिन में मिलियन व्यू. यह सब सूचनाएं, खबर में रूप में बताकर. तो, फिर बात वहीं तक कैसे रूकती!

मिथकीय नायक भष्मासुर की कथा सिर्फ शंकर पर थोड़ी लागू हुआ था. उसके बाद भी होते रहा है. एक-दूसरे की बहन, बेटी, बहू, मौसी, बुआ को गाली देने का दौर चला, परवान चढ़ा तो एक समय के बाद उसमें संभावनाएं खत्म हो गयी हैं.

चोली, साया, साड़ी, लहंगा, ब्लाउज खत्म हुआ तो गुप्तांगों पर गीत गाये जाने लगे. इसी तरह जब एक-दूसरे की बहन-बेटी से गायक कलाकार फरिया लिये, तो नयेपन के बोध के लिए इस बार मीडिया की बहन को लाये हैं. यह कहकर बात नहीं टाल सकते कि यह उन्होंने अपनी मीडिया के लिए कहा है या किया है. मीडिया तो मीडिया है. सोशल मीडिया के जमाने में, न्यू मीडिया के जमाने में, मल्टीमीडिया के जमाने में राष्ट्रीय मीडिया ​का मिथ और भ्रम अब खत्म हो चुका है, क्योंकि सबका मानक और मालिक एक ही हो चुका है, लोकप्रियता-व्यू-लाइक-कमेंट.

कल शाम एक संजिदा लेखिका साथी से बात हो रही थी. वह कुछ दिनों से लगातार जानकारी जुटा रही हैं, भोजपुरी गीतों पर. उन्हें यह पोस्टर दिखाया था. संयोग से आज सुबह हमारे छोटे भाई, भोजपुरी गायक कलाकार शैलेंद्र मिश्रा ने भी इसे एडिट कर (एडिट कर ही शेयर करने लायक है, इसलिए) शेयर किया है. जिज्ञासा हो पूरा पोस्टर देखने की, तो आसानी से सोशल मीडिया में पूरा देख सकते हैं. सार्वजनिक रूप से साझा है. डंके की चोट पर. गाना तो जरूर ही सुनिएगा पूरा. न्यूज एलीमेंट भी मिलेगा.

भोजपुरी के नाम पर ऐसे ही न्यूज तो 90 प्रतिशत रहते हैं मुख्यधारा की मीडिया में भी. भोजपुरी को लेकर जो चरस आपने बोया है कुछ वर्षों में, उस चरस के नशे का कोप भी तो अब भुगतना होगा. फर्क यह है कि आपने बड़े नामदारों के बहन-बेटियों के नंगा करने वाले गाने की सफलता की खबर बनायी कि फलां का वीडियो इतने मिनट में इतना मिलियन. फलां का रील सारा रिकार्ड तोड़ रहा. यह काम आप वर्षों से कर रहे हैं. आपकी देखादेखी भोजपुरी में एक समानांतर मीडिया का भी विकास हुआ. अपना तंत्र.

इतनी तेजी से इस मीडिया का विकास हुआ कि पटना में 1550 रुपये का मीडिया किट मिलने लगा. 1550 रुपये में पत्रकार बने का बोर्ड आप पटना में देख सकते हैं. माइक, लोगो के साथ, पूरा पॉडकास्ट सेट मिल जाता है, इतने में. मोबाइल का दाम इसमें शामिल नहीं है. माइक संभालने के बाद ​जिसका भांज लग गया, औसतन कमाई महीने में लाख रुपये की. यह औसतन है. इस कमाई का अनुपात स्त्री देह को और नंगा करने के अनुपात में बढ़ता जाता है. तीन लाख रुपये महीने तक भी कमा रहे हैं, अनेक लोग. पांच लाख रुपये भी.

अब ये हर दिन आन कैमरा स्त्री के गुप्तांग का वर्णन करते हैं. एक और प्रमुख स्रोत हैं इनके पास. मंच पर गाने वाले कलाकारों से इनका सांठगांठ है. मंचों पर जो कलाकार गुप्तांगों का चित्रण-वर्णन कर गीत गाते हैं, वे इनके लोग होते हैं या फिर पत्रकार बने लोग, उन कलाकारों के लोग होते हैं. मंच पर पोर्न फिल्म चलता है. संवाद और हरकतों के माध्यम से.

ये मोबाइल कैमरा वाले मीडियाकर्मी उसे दिखाकर लाखों कमाते हैं. जिस मीडिया वाले का जितना व्यू जाता है, उसका एक कट मनी उन गायक कलाकारों के पास जाता है, जो मंच पर अश्लील हरकते करते हैं. या कहें कि इसके लिए ही वे ज्यादा करते भी हैं ताकि ज्यादा व्यूज जाए तो ज्यादा कट मनी आये. यह सब कुछ व्यू के लिए होता है. अब आप ऐसा नहीं कह सकते कि यह भोजपुरी के छुटभैयों का अपना मामला है. ना, भोजपुरी तो आपका भी गहरी रुचि का मामला है. आप भोजपुरी में खूब रुचि लेते हैं. आप तो रोज ही दिखाते, बताते हैं कि फलाना रील कितने मिनट में कितना मिलियन पहुंचा. फलाना गाना कितने घंटे में कितना मिलियन पहुंचा. यह राह आपने दिखाई-बनाई है. कथित मुख्यधारा की मीडिया ने.

मुख्यधारा की ताकतवर मीडिया की बनायी राह पर ही ये अनगिनत चैनल उभरे हैं. आपने भोजपुरी में सफलता के मानक तय किये. आपने बताया कि व्यू ही सफलता का सार्वभौमिक सत्य है. आपने माहौल बनाया तो फिर पॉडकास्टर ऐसे कलाकारों को बुलाकर भोजपुरी की पहचान के तौर पर स्थापित करने लगे.

बड़े-बड़े मीडिया हाउस के कार्यक्रम में ये भोजपुरी का पूरा प्रतिनिधित्व करते हुए, भोजपुरी की पूरी पहचान के तौर पर जाने लगे. आप बड़े लेवल पर ऐसा करते हैं. छोटे लोगों ने, 1550 रुपये में अपना मीडिया चालू कर, अपने व्यू के लिए अपने स्टार भी खड़ा कर लिये. अपने स्टार खड़ा कर उनका लाइव करने लगे. और आपका भ्रम है कि बड़े वाले नाम सिर्फ आपके पास आते हैं इसलिए वे खास हैं.

इन छोटेवालों का भी व्यू लाइक इतना है कि वे इन्हें भी उसी तरह से इंटरव्यू देते हैं. अपना वीडियो कट भेजवाते हैं, वायरल होने के लिए. इसलिए इस भ्रम में ना रहिएगा कि यह मीडिया अलग है ओर वह मीडिया अलग. फर्क बस इतना ही रह गया है कि जो भोजपुरी वाले मीडियाकर्मी हैं, उनमें से अधिकांश अब माइक लेकर, आन कैमरा अश्लील हरकतें और संवाद के साथ रिपोर्टिंग करते हैं, आटोट्यून पर गाना गाकर नाचते हुए रिपोर्टिंग करते हैं, आपके यहां अभी यह चलन नहीं आया है.

अभी तक मामला ‘महाजनो येन गत: स पंथा’ की तर्ज पर चल रहा है. इन छोटे मीडियावालों ने आपको फॉलो किया है. पर, यथा प्रजा-तथा राजा का भी चलन तो रहा है. संभव है, इनके व्यू-लाइक को देखते हुए कल आपके यहां भी उसी तरह से शुरू हो जाए, क्योंकि आखिरकार लक्ष्य तो दोनों का एक ही है, मानक तो एक ही है, पैमाना तो एक ही है, व्यू-लाइक-कमेंट.यह महज मसखरापन नहीं है. भोजपुरी में एक गीत गाया था बालेश्वर ने, चन्ना के खेतवा छोट-छोट गोरिया, आवा घुसुक आवा गन्ने में… उस समय उसका विरोध नहीं हुआ था.

नतीजा, आगे धीरे-धीरे गोरी भोजपुरी गीतों में आबजेक्ट बनती गयी. इस बार हल्का सा टेस्ट किया है भजपुरी वालों ने मीडिया को गरियाकर. आपको अगर यह हल्की बात लगेगी तो कल से ये तस्वीर लगाकर गीत बनायेंगे और आप कुछ नहीं कर पायेंगे इनका. इन्होंने होली के समय में यह टेस्ट नहीं किया है. काशी की परंपरा में होली के बाद बुढ़वा मंगर का समय या उत्सव होता, कोई बनारसी ऐसा करता, तो एक हद तक क्षम्य भी रहता कि बनारसी है, होली का समय है, बुढ़वा मंगर उत्सव के बहाने ऐसी हरकत कर दिया होगा…

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