राजशेखर त्रिपाठी-
बिहार में पहले चरण के साथ आधा चुनाव संपन्न हो गया। पहले चरण की वोटिंग से चंद रोज़ पहले एक यू-ट्यूब जर्नलिस्ट ने ‘ऑब्जर्वेशन’ पेश किया। ‘चुनाव बाद बिहार में जो राजनीतिक उथल-पुथल होने वाली है, उसका असर केंद्र तक देखने को मिलेगा।’
अब यहां तक तो बात सही है कि चुनाव बाद की उथल-पुथल का असर केंद्र तक देखने को मिलेगा। मगर मेरा सवाल ये है कि क्या कोई उथल-पुथल सचमुच होगी भी?
अगर आप ने चुनाव के दौरान बिहार का दौरा किया, या पटना में सक्रिय पत्रकारों के टच में हैं, तो वहां तो बदलाव की कोई नयी बयार नहीं बह रही। आश्चर्य नहीं कि बाद के नतीजे भी इसी का ‘आउट-कम’ होंगे! हां, किसी को कोई अलग ‘अंडर करंट’ दिख रहा हो तो बात अलग है।
बिहार में जाति पर वोट एक ‘ओपन एंड शट ट्रुथ’ है। पहले चरण की वोटिंग के दौरान भी ये ज़ाहिर था। पटना में चार दशक से ज्यादा वक्त तक प्रोफेसर रहे कर्मेंदु शिशिर लगभग तिक्त स्वर में कहते हैं-
‘बिहार विशुद्ध रुप से एक सामंती राज्य रहा है। यहाँ की बेबस जनता अगर अपनी जाति की छतरी से बाहर रहे तो वह जी ही नहीं सकती। यहाँ जनता को सरकार नहीं जाति ही संरक्षण देती है। जंगल में निहत्था होना खतरनाक है। बिहार में जाति के बगैर जीना खतरनाक है।’
कर्मेंदु शिशिर ठीक कह रहे हैं। इसी जातीय समीकरण के सहारे नीतिश कुमार 20 साल से सत्ता में हैं। लालू परिवार ने 15 साल राज किया, जिसमें राजनीति की ‘बिगिनर’ रही, और सीधे सीएम बनी राबड़ी देवी के 8 साल भी शामिल हैं।
बहरहाल यहां मकसद जीत-हार की भविष्यवाणी और सस्ता विश्लेषण करना नहीं है। बिहार में जातिवाद सिर्फ सियासत तक सीमित नहीं, उससे कहीं गहरे पैठा है। उदाहरण के तौर पर एक किस्सा सुनिए – दिल्ली से चुनावी दौरे पर गयी एक टीम नालंदा के सिलाव पहुंची। सिलाव अपनी खाजा मिठाई के लिए दूर-दूर तक मशहूर है। यूं भी नालंदा सीएम नीतीश कुमार का ज़िला है। सिलाव में इस टीम को खाजे की दर्जनों दुकानें नजर आयीं। हर दुकान का नाम मां काली के नाम पर। जैसे आगरे में पेठे की हर दुकान पंक्षी पेठा ही बेचती है। ज़ाहिर है ऐसे में जिज्ञासा स्वाभाविक थी – ‘भाई इनमें असली और सबसे पुरानी दुकान कौन है?’
सवाल का जवाब दो-टूक और बेबाक –
‘अरे काहे की असली और काहे की पुरानी, सबका नाम खाली काली माता के नाम पर है, मगर खाजा बिकता है प्रोपराइटर की जाति पर। हर आदमी अपनी जाति वाली दुकान से ही खाजा खरीदता है।’
ये जवाब वोटिंग से बमुश्किल हफ्ते भर पहले का है। अब आप अंदाज़ा लगा लीजिए कि जब ‘जातिवादी फिक्सिंग’ इस लेवल पर है तो चुनाव में कितनी ही उथल-पुथल होगी?
अब दूसरी नज़ीर दुलार चंद यादव मर्डर केस की ले लीजिए। दुलार चंद यादव कभी लालू-नीतीश के क़रीबी होते थे। मोकामा टाल के इलाके में दुलार चंद का एकछत्र साम्राज्य था। तक़रीबन दर्जन भर बूथ अकेले जिताने का माद्दा रखते थे। मगर उनका सियासी सूरज ढला तो प्रशांत किशोर की जन सुराज में आ गए। उनके मर्डर की कहानी लगभग सबके सामने है, जो बची है उसकी जांच जारी रहेगी।
मगर दुलार चंद मर्डर केस में नाम आते ही अनंत सिंह उर्फ छोटे सरकार को नीतीश ने जेल भेजा। छोटे सरकार नीतीश की पार्टी से ही उम्मीदवार हैं। हर चुनाव से पहले जेल से बाहर लाए जाते हैं, इस बार जेल भेज दिए गए। मगर मामला इतना सिंपल नहीं है, मोकामा में किसी ने इसके लिए नीतीश कुमार को कुछ नहीं कहा। ‘पोलराइजेशन’ यादव बनाम भूमिहार दिखा। इस यादव बनाम भूमिहार का फायदा देखिये। अनंत सिंह के मुक़ाबले मोकामा से दूसरे भूमिहार बाहुबली सूरजभान की पत्नी वीणा देवी आरजेडी की उम्मीदवार थीं। वोटिंग के दौरान एक पत्रकार ने बताया – सूरजभान की वजह से जो भूमिहार वोट कटता भी वो ‘सिम्पैथी वोट’ में तब्दील हो गया। मोकामा से बूथ खुलते ही बंपर वोटिंग की ख़बरें आयीं – ये बंपर वोटिंग क्या कहती है बताने की ज़रूरत नहीं।
दूसरी बात नीतीश ने छोटे सरकार को जेल भेजा, मगर उनका प्रचार संभालने के लिए केंद्रीय मंत्री ललन सिंह को भेजा। अंतिम दौर में ललन सिंह ने आचार संहिता को ताक पर रख कर धुआंधार प्रचार किया। सबसे आक्रामक तो ये था कि- हर आदमी ललन सिंह बन कर वोट करे। जो विरोधी हैं, उनको घर से निकलने ही मत दो।
केंद्रीय मंत्री ललन सिंह भी भूमिहार हैं, और पार्टी में छोटे सरकार के संरक्षक माने जाते हैं। बहरहाल जब वोटिंग के ठीक पहले तक समीकरण अगर ऐसे बिठाए जा रहे हों – तो कोई बिहार में किस उथल – पुथल और केंद्र में किस असर (बदलाव) की बात करे। फिलहाल आप भी देखिए- हम भी देखते हैं। नतीजों के लिए इंतजार कीजिए ऑफीशियल बाल दिवस का।


