Connect with us

Hi, what are you looking for?

Local News Community

सुख-दुख

दिल पर हाथ रखकर बताइए कि क्या भारत में मीडिया स्वतंत्र है?

अभिरंजन कुमार-

नॉर्वे की एक पत्रकार द्वारा भारत के प्रधानमंत्री पर इस बात के लिए सवाल उठाना कि आप सवालों के जवाब क्यों नहीं देते – इस घटना के पक्ष और विपक्ष में कई विश्लेषण हो सकते हैं।

हालांकि यदि प्रधानमंत्री की जगह मैं होता, तो कहता –

“मेरी प्यारी बहन, हालांकि इस कार्यक्रम में सवाल-जवाब निर्धारित नहीं थे, फिर भी आप पूछिए, क्या पूछना चाहती हैं। चूंकि हमारे अन्य कई कार्यक्रम भी पूर्व निर्धारित हैं और समय की भी कमी है, इसलिए दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का प्रधान सेवक और प्रेस फ्रीडम का प्रबल हिमायती होने के नाते मैं सिर्फ आपका कोई एक सवाल ले सकता हूं, ताकि इस कार्यक्रम का अनुशासन भी न बिगड़े और दुनिया में प्रेस की प्रतिष्ठा भी अक्षुण्ण रहे।”

आप देखते कि इसके बाद सारा माहौल ही बदल जाता, क्योंकि इसके बाद दुनिया में चर्चा यह हो रही होती कि

  1. भारत के प्रधानमंत्री प्रेस कॉन्फ्रेंस और सवालों से नहीं भागते।
  2. भारत के प्रधानमंत्री लोकतंत्र और प्रेस फ्रीडम का सम्मान करते हैं।
  3. भारत के प्रधानमंत्री स्त्री का सम्मान करते हैं।
  4. भारत के प्रधानमंत्री “वसुधैव कुटुंबकम” के सिद्धांत का पालन करते हैं। एक छोटे से देश की एक आम पत्रकार को”मेरी प्यारी बहन” कह रहे हैं।
  5. भारत के प्रधानमंत्री हाजिरजवाब हैं। पत्रकार के औचक सवाल से अत्यंत भारी हो गए माहौल को मुस्कुराते हुए एक पल में हल्का कर दिया।

और सबसे बड़ी बात कि

  1. पत्रकार को सीधे तौर पर बिना कुछ कहे ही इस बात का करारा जवाब भी दे दिया कि यदि आपका देश कथित रूप से दुनिया का सबसे स्वतंत्र मीडिया वाला देश है, तो यह मत भूलिए कि हमारा देश वास्तव में दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है।

दरअसल सवालों से बचकर भाग जाना कोई समाधान नहीं होता। सवालों की खासियत ही यही होती है कि जब तक जवाब नहीं आ जाते, तब तक वह आपका पीछा करते हैं। हां, यदि आपके पास कोई जवाब नहीं है तो फिर भागते रहिए। कौन रोक लेगा आपको?

इसी मामले में आप देख लीजिए। चूंकि प्रधानमंत्री बहुत पावरफुल हैं, तो बहुत आसान है कि उनके समर्थक नॉर्वे की उक्त पत्रकार की निंदा करके अपने नेता का बचाव कर लें, लेकिन इस बचाव से दुनिया तो छोड़िए, आधा भारत भी संतुष्ट नहीं है।

कारण – यह दोनों ही बातें हास्यास्पद हैं।

कोई कहे कि महज 55 लाख की आबादी वाले भारत के किसी मंझोले शहर जितने बड़े देश नॉर्वे का मीडिया दुनिया का सबसे स्वतंत्र मीडिया है, तो यह बालसुलभ टिप्पणी जैसा हास्य पैदा करता है। जैसे कोई पांच साल का बच्चा शक्तिमान सीरियल देखकर अपनी दोनों बांहों के डोले दिखाकर बोलता है – मैं हूँ शक्तिमान।

और,

यदि कोई कहे कि दुनिया की सबसे ज्यादा आबादी वाले देश भारत का मीडिया स्वतंत्र है, तो यह भी हास्यास्पद है, बाहुबली विधायक अनंत सिंह के ऊटपटांग बोल जैसा, अथवा पप्पू यादव के लिंग बोध भूलकर हड़बड़ाहट में दिए गए बयान जैसा।

दिल पर हाथ रखकर बताइए कि भारत के मीडिया में क्या स्वतंत्र है?

  1. पिछले 12 साल में सरकार ने कितनी सारी योजनाएं चलाईं। क्या कभी भी किसी एक भी योजना का रियलिटी चेक मीडिया में दिखाई देता है?

अगर भारत का मीडिया 12 साल बाद भी स्वच्छ भारत, सांसद आदर्श ग्राम, स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट, मेक इन इंडिया, स्किल इंडिया, मुद्रा योजना, गंगा-यमुना सफाई योजना इत्यादि, जिनपर देश के लाखों करोड़ रुपए खर्च हो चुके हैं, की रियलिटी चेक नहीं कर सकता, तो यह मीडिया है, या भजन मंडली है?

  1. शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में देश में हालात हर रोज़ बद से बदतर होते जा रहे हैं। करोड़ों छात्र, युवा, आम लोग परेशान हैं। लेकिन क्या कभी इनपर कोई एक रिपोर्ट कहीं दिखाई देती है?

सरकारी स्कूलों/अस्पतालों की दुर्दशा, प्राइवेट स्कूलों/अस्पतालों की लूट, ज़्यादातर विश्वविद्यालयों का गुंडागर्दी और भ्रष्टाचार का अखाड़ा बन जाना, प्रायः हर परीक्षा में पेपर लीक, घूसखोरी, पैरवी इत्यादि का बोलबाला, छात्रों की आत्महत्याएं यदि भारत के मीडिया को दिखाई नहीं देती, तो यह आंख वाला मीडिया है या अंधा मीडिया?

  1. कृषि क्षेत्र की बदहाली और 2022 तक ही किसानों की आमदनी दोगुनी करने के दावे vs सच्चाई पर कहीं कोई चर्चा भारत के मीडिया में है?

किसानों के बच्चे खेत बेच बेचकर मजदूर बनते जा रहे हैं। महंगाई दोगुनी हो गई, आमदनी आधा रह गई। अब तो 2026 भी आधा बीत गया। यदि अब भी भारत के मीडिया में इसकी कहीं कोई चर्चा नहीं है तो यह मीडिया देश के आम लोगों के लिए काम कर रहा है या माफिया तत्वों की दलाली कर रहा है?

  1. भारत के भ्रष्ट थानों और अदालतों की सोच और कार्य प्रणाली में यदि पिछले 12 वर्षों में कहीं कोई सुधार दिखा हो तो दिखाइए। लेकिन यदि नहीं दिखा हो, स्थिति दिन पर दिन बदतर हुई है, तो मीडिया में क्या इसपर भी बात नहीं होनी चाहिए?

क्या आपको पता है कि भारत के थानों और अदालतों के चक्कर काट काट कर हर रोज़ हमारे कितने सारे लोग नष्ट हो जा रहे हैं?

क्या वोट बैंक के लिए केवल दलित-पिछड़ा अलगाववाद को हवा देने से इनके हालात बेहतर होंगे, या यह सुनिश्चित करने से कि देश की न्याय व्यवस्था से माफिया, धनबलियों, बाहुबलियों, अपराधियों का कब्जा हटे और यह देश के आम गरीबों, शोषितों, वंचितों के हक और हित में काम करे।

  1. सरकार के विधायक, सांसद, मंत्री, महामंत्री, प्रधानमंत्री की आलोचना में कहीं कोई एक शब्द भी सुनाई देता है क्या?

किसी के आवारा लड़के ने किसानों को कुचल दिया, किसी पर महिला एथलीटों के यौन शोषण के आरोप लगे, किसी की नाक के नीचे पेपर पर पेपर लीक होते रहे और हमारे बच्चे सुसाइड करते रहे – क्या ऐसे किसी भी अक्षम्य और अक्षम नेताओं के कृत्यों को लेकर मीडिया हमलावार हुआ?

मीडिया हमलावार किसपर हुआ? केवल विपक्ष पर?

मैं मानता हूं कि लोकतंत्र में विपक्ष भी एक बड़ा स्टेक होल्डर है, इसलिए यदि उसमें भी कमियां हैं तो उसकी भी आलोचना होनी चाहिए, लेकिन केवल विपक्ष की आलोचना? यह तो किसी भी कोण से स्वतंत्र प्रेस का लक्षण नहीं है।

  1. गंभीर से गंभीर विफलताओं पर सरकार के किसी मंत्री, महामंत्री, प्रधानमंत्री का एक भी कठोर इंटरव्यू मुझे पिछले 12 साल में कोई दिखा दे, तो मान जाऊं!

ज़्यादातर इंटरव्यू में देश के कथित बड़े-बड़े पत्रकार बस यही पूछते रह गए कि अपनी भरपूर जवानी और रवानी का राज़ बताइए। क्या स्वतंत्र मीडिया का यही कर्म और धर्म है?

  1. पग पग पर भ्रष्टाचार है, अपराधियों को संरक्षण है, परिवारवाद है, जातिवाद है, सांप्रदायिकता है, लेकिन इनकी आलोचना में कहीं कोई रिपोर्ट मेन स्ट्रीम मीडिया पर कभी दिखाई देती हो, तो कृपया मेरा ज्ञानवर्धन करें।
  2. मीडिया में दिन-रात सरकार द्वारा सेट किए गए एजेंडे पर प्रलाप चल रहा है, सरकार के प्रवक्ताओं से पहले और ज्यादा सरकार का बचाव चैनलों के प्रवक्ता कर रहे हैं। यह कोई स्वतंत्र मीडिया की निशानी है क्या?
  3. मीडिया में पक्ष और विपक्ष के लोगों की प्रायोजित डॉग फाइट तो बहुत है, जिसमें अंत में सरकार को जिताना और विपक्ष को हराना सुनिश्चित है, लेकिन क्या कहीं भी कोई भी एक भी निष्पक्ष आवाज़ आपको सुनाई देती है?

आखिर यह कैसा स्वतंत्र मीडिया है, जिसमें से तमाम निष्पक्ष आवाज़ों को बाहर कर दिया गया है?

तो सच तो यह है कि अपने तीन दशकों के मीडिया जीवन में पहले भी मुझे मीडिया की स्वतंत्रता में कुछ कमी महसूस होती रही, जिसके बारे में समय-समय पर मैंने लिखा और बोला भी, लेकिन आज जितना परतंत्र मीडिया मैंने कभी नहीं देखा।

और अंत में, यदि एक और सच कह दूंगा तो बहुतों को मिर्ची लग जाएगी, लेकिन मैं कहूंगा, क्योंकि सच बोलने से मैं कभी न पीछे हटा हूँ, न हटूंगा।

कांग्रेस की सरकारों के दौरान भी मीडिया की स्थिति बहुत अच्छी नहीं थी। इमर्जेंसी से लेकर डेफेमेशन बिल लाने के प्रयासों तक जो हुआ, वह भी इतिहास है, लेकिन ऐसे कुछ दागदार कालखंडों को छोड़कर कांग्रेस के जमाने में भी मीडिया आज के भारत के मीडिया से लाख गुना ज्यादा स्वतंत्र और निष्पक्ष था।

हम लोगों ने कांग्रेस की सरकारों की खुलकर आलोचना की, बल्कि हम जैसे पत्रकारों ने तो कभी भी उनकी तारीफ़ नहीं की, फिर भी हमारे लेख अखबारों में छपते रहे, टीवी चैनल वाले अपनी बहसों में हमें बुलाते रहे।

लेकिन आज तो बिल्कुल अघोषित इमरजेंसी जैसी स्थिति है। हम हर पल इस अघोषित इमरजेंसी की सेंसरशिप को तीक्ष्णता से महसूस करते हैं, और अपनी बात को रखने के लिए आज हमारे पास सोशल मीडिया के सिवा दूसरे विकल्प बचे ही नहीं हैं।

तो बताइए, कहां है भारत में स्वतंत्र मीडिया?

यदि हमारे द्वारा उठाए जा रहे मुद्दे झूठे हैं, गलत हैं या अवास्तविक हैं, तो हमें खारिज कर दीजिए, लेकिन यदि हम वही बोल रहे हैं, जिसका सामना देश के करोड़ों लोगों को हर रोज़ करना पड़ रहा है, तो यह भी भारत के मीडिया में क्यों नहीं होना चाहिए?

धन्यवाद।

Pahad Ki Dada: Hill Mail Uttarakhand
CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

भड़ास लीगल टीम : Bhadas Legal Team

भड़ास मेल: [email protected]

Latest 100 भड़ास

विज्ञापन