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आज के अखबार : भाजपा की राजनीति और देश की दशा-दिशा, अंदरुनी उठा-पटक भी नहीं बताते

दिल्ली के इंडियन एक्सप्रेस में तमिलनाडु सरकार का यह विज्ञापन तमिल में रुपये की बात करता है और हस्ताक्षर इसमें है नहीं। इसके जबाव में डबल इंजन वाले कई राज्य भारत में कई मामलों में पहले होने का दावा कर सकते हैं। देखते रहिये।

संजय कुमार सिंह

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी हाल में तमिलनाडु गये थे। मुख्यमंत्री एमके स्टालिन की अनुपस्थिति में कह आये कि राज्य के नेता तमिल में दस्तखत नहीं करते हैं। इसपर मैं पहले लिख चुका हूं। आज उल्लेख इसलिए कि दिल्ली के अखबारों में आज पूरे पहले पन्ने का तमिलाडु सरकार का विज्ञापन है जिसमें मुख्यमंत्री की आपादमस्तक तस्वीर भी है। विज्ञापन में कई आर्थिक मामलों में राज्य को देश भर में अव्वल बताया गया है। प्रधानमंत्री जब तमिल में मेडिकल की पढ़ाई कराने की चुनौती दे आये हैं तो तथ्य है कि हिन्दी में मेडिकल पढ़ाने की कोशिश में मध्य प्रदेश सरकार ने मेडिकल की किताब का अनुवाद करवाया था जिसकी पर्याप्त आलोचना हुई थी। नरेन्द्र मोदी उस समय के मुख्यमंत्री को केंद्र में ले आये और हिन्दी में मेडिकल शिक्षा की दशा-दिशा पर कोई खबर नहीं है। दूसरी ओर, जब दक्षिण भारत पर नई शिक्षा नीति और त्रिभाषा फॉर्मूले के तहत हिन्दी थोपने की कोशिश चल रही है, राज्य के मुख्यमंत्री इसका विरोध कर रहे हैं तो प्रधानमंत्री बांटों और राज करो की नीति पर चलते नजर आ रहे हैं। इस बीच तमिलनाडु की राजधानी चेन्नई में उनके प्रतिनिधि राज्य सरकार के काम में रोड़ा बने हुए हैं और कल सुप्रीम कोर्ट ने राज्यपाल के खिलाफ सख्त टिप्पणी की है। अमूमन राज्यपाल के खिलाफ ऐसी टिप्पणी होती नहीं है और हुई है तो बेहद शर्मनाक है। अखबारों के शीर्षक के रूप में इन टिप्पणियों की चर्चा करने से पहले बता दूं कि राज्यपाल केंद्र सरकार के प्रतिनिधि के रूप में सरकारी वेतन भत्ते लेकर राज्य सरकार और राज्य की जनता के खिलाफ काम कर रहे थे। अब रंगे हाथों पकड़े गये हैं। ऐसे में इस्तीफा देकर अपनी छवि बचा सकते हैं। पूर्व में राज्यपालों ने इस्तीफे दिये भी हैं। द टेलीग्राफ की एक खबर बताती है भाजपा प्रमुख के चयन के लिए आरएसएस को प्रभावित करने के उद्देश्य से मोदी का दौरा और उनकी अभी तक की कोशिश नाकाम रही है। अभी तक इस पर सहमति नहीं हो पाई है इसीलिए किसी नाम की घोषणा नहीं हुई है। आप जानते हैं कि लगभग 11 साल प्रधानमंत्री रहने के बाद मोदी पहली बार संघ मुख्यालय गये थे। इसका मकसद भाजपा प्रमुख के नाम पर सहमति बनाना था लेकिन नौ दिन बीत जाने के बाद भी घोषणा नहीं हुई है।  

यह सही है कि जो राज्यपाल बनाये उसकी बात नहीं मानना मुश्किल होता है और मानना संवैधानिक दायित्व निभाने में निष्पक्ष रहने की शपथ के खिलाफ है। ऐसे में मामला गुपचुप भले चल जाये पकड़े जाने पर इस्तीफा देकर अपनी साख बचाना ज्यादा जरूरी होता है। कम से कम बच्चों की नजर में आदर्श बने रहने के लिए। लेकिन भाजपा में इस्तीफे होते नहीं हैं और राज्यपाल भी इस्तीफा नहीं देकर भाजपाई बने रहें तो खबर यह भी है। पर मेरे आठ अखबारों में इसपर किसी भाजपा नेता, राज्यपाल या स्वतंत्र टीकाकार की टिप्पणी कम से कम पहले पन्ने पर नहीं है। इसमें यह बताया जाना चाहिये था कि राजनीतिक मकसद से काम करना क्यों अनैतिक और अनुचित है। इस स्थिति के राजनीतिक मायने क्या हैं। कुल मिलाकर, स्थिति यह है कि केंद्र की भाजपा सरकार विपक्षी सरकारों को काम नहीं करने देती है। विधायक खरीद कर, रिश्वत में मंत्रीपद देकर सरकारें गिरा भी देती है, ईडी सीबीआई लगाकर परेशान करती है फिर भी विधानसभा अध्यक्ष समय रहते फैसला नहीं करें, सुप्रीम कोर्ट में भी सुनवाई न हो पाये, राज्यपाल इस्तीफा देकर चले जायें – यह सब हो चुका है।  इसके बावजूद बहुमत मिलता रहे तो सरकार के लिए मनमानी करना सामान्य हो सकता है। हालांकि, इसमें चुनाव आयोग की भूमिका संदिग्ध है और न सिर्फ उसपर कई आरोप हैं, चुनाव आयुक्त की नियुक्ति से लेकर नियुक्ति करने वाले पैनल का मामला भी विवादों में है। ऐसे में सरकार की मनमानी के खास मायने हैं पर अखबारों में राज्यपाल के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के अलावा कुछ विशेष (पहले ऐसे मौकों पर विशेष संपादकीय भी होते थे) नहीं है। यही नहीं, मुख्यमंत्री ने सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को ऐतिहासिक कहा है। और भी बातें हैं जो कहीं प्रमुखता से हैं या नहीं पर विशेष संपादकीय जैसा कुछ नहीं है।    

इंडियन एक्सप्रेस ने फ्लैग शीर्षक से बताया है कि विधेयकों पर राजभवन के निर्णय लेने की समय सीमा निर्धारित कर दी गई है। मुख्य शीर्षक है, “विधेयकों को मंजूरी रोकने की तमिलनाडु के राज्यपाल की कार्रवाई को सुप्रीम कोर्ट ने ‘अवैध’ कहकर खारिज किया”। इस मूल खबर के साथ सिंगल कॉलम की एक खबर है, “केरल ने कहा कि फैसला उसकी अपील पर भी लागू होता है। इसपर सुनवाई अगले महीने है”। इसके साथ तीन कॉलम की एक खबर का शीर्षक है, “राज्यों के लिए ऐतिहासिक जीत : तमिलनाडु; केरल ने कहा कि राज्यपालों को चेतावनी पर ध्यान देना चाहिये। इसके साथ एक्सप्रेस एक्सप्लेन्ड भी है। इसका शीर्षक है, फैसला क्यों खास या अलग है बमुश्किल उपयोग में लाये जाने वाले अधिकार का उपयोग हुआ है, मजबूत संदेश गया है। आज जब ज्यादातर अखबारों की लीड तमिलनाडु के राज्यपाल के रवैये पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी है तब जनसत्ता की लीड का शीर्षक है, वक्फ कानून लागू, सरकार भी पहुंची सर्वोच्च न्यायालय। उपशीर्षक है – कहा, आदेश पारित करने से पहले उसका पक्ष भी सुना जाये। यह खबर आज नवोदय टाइम्स में भी लीड है। शीर्षक है, वक्फ कानून लागू। उपशीर्षक है, सुप्रीम कोर्ट में केंद्र ने कैविएट भी दाखिल की। इसके साथ हाईलाइट किया गया अंश है, केंद्र ने जारी की अधिसूचना और 15 अप्रैल को हो सकती है सुनवाई। यहां यह गौरतलब है कि केंद्र सरकार बिना मांग जो कानून बनाती है उसे राष्ट्रपति की मंजूरी मिल जाती है और सुप्रीम कोर्ट में चुनौती भी दी जाती है। दूसरी ओर, राज्य सरकारों (गैर भाजपाई) के कानूनों को राज्यपाल की सहमति नहीं मिलती है और जब मिलती है तो इन्हें सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने के मामले बहुत कम होते हैं।

नवोदय टाइम्स में तमिलनाडु के राज्यपाल के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में टिप्पणी लीड नहीं है। सेकेंड लीड का शीर्षक है, तमिलनाडु के राज्यपाल के रोके 10 विधेयकों को सुप्रीम कोर्ट की मंजूरी। उपशीर्षक दो बुलेट प्वाइंट हैं 1) न्यायालय ने राज्यपाल रवि को लगाई फटकार, विधेयक पारित करने की समय सीमा तय की। यहां यह उल्लेखनीय है कि केंद्र सरकार के इलेक्टोरल बांड के खिलाफ फैसले में जांच के आदेश नहीं दिये गये थे और ऐसे कानून के लिए (शायद) किसी को सजा नहीं दी जा सकती है तो वह भी नहीं हुआ। लेकिन केंद्र सरकार बहुमत की आड़ में जो करने जा रही थी वह गैरकानूनी घोषित हो चुका है। इसी तरह चंडीगढ़ के चुनाव अधिकारी की करतूत को अवैध ठहराया जा चुका है उसे खारिज किया जा चुका है पर उन्हें सजा नहीं हुई। कारण चाहे जो हो राज्यपाल के मामले में तो सजा होनी नहीं थी। आलोचना ही पर्याप्त है। इसलिए उनका इस्तीफा न्यूनतम नैतिकता के लिहाज से जरूरी है पर उसकी खबर नहीं है। अपने समय में भाजपा ऐसे मौकों पर विरोध करती थी, इस्तीफे की मांग करती थी। अब यह सब नहीं होता। उसके समर्थक और प्रचारक चुप रहते हैं या जॉर्ज फर्नाडींज को इमरजेंसी में डायनामाइट कांड में हथकड़ी लगाई गई थी, उसका विरोध नहीं हुआ तो अवैध रूप से अमेरिका गये युवाओं को बेड़ियों में सैनिक मालवाहक से युवाओं को वापस भेजे जाने की आलोचना क्यों हो रही है जैसे सवाल उठाते हैं। कुछ बड़े प्रचारक पहले ऐसे तर्क पेश करते हैं फिर व्हाट्सऐप्प के जरिये आम लोगों तक ऐसे तर्क पहुंचाकर बुलडोजर न्याय को बहादुरी के रूप में स्थापित कर दिया गया है। पर वह अलग मुद्दा है।

अमर उजाला की लीड का शीर्षक है, “विधेयकों को लटकाये रखना अवैध, राज्यपाल संविधान से चलें, पार्टी से नहीं : सुप्रीम कोर्ट”। उप शीर्षक है, “तमिलनाडु के 10 बिल रोकने पर ऐतिहासिक निर्णय :राज्यपाल के पास विधेयक रोकने का वीटो पावर नहीं”। हिन्दुस्तान टाइम्स का शीर्षक है, “सुप्रीम कोर्ट ने कहा, तमिलनाडु के गवरनर रवि ने विधेयकों को अवैध रूप से रोक रखा था”। इसके साथ छपी एक खबर का शीर्षक है, “स्टालिन ने ऐतिहासिक फैसले की प्रशंसा की”। टाइम्स ऑफ इंडिया में भी यह खबर लीड है। शीर्षक है, “सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों के विधेयकों पर फैसला करने के लिए राज्यपालों के लिए समय सीमा तय की”। द हिन्दू का शीर्षक है, “सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु के राज्यपाल की खिंचाई की, विधेयक पास करने की समय सीमा तय की”। दि एशियन एज का शीर्षक भी लगभग यही है, “विधेयकों (को पास करने) में देरी के लिए सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु के राज्यपाल की खिंचाई की, समय सीमा निर्धारित की”।  

आज तमिलनाडु के राज्यपाल के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के अलावा पश्चिम बंगाल में शिक्षको की नियुक्ति को सुप्रीम कोर्ट द्वारा रद्द कर दिये जाने से हो रही परेशानी का मुद्दा महत्वपूर्ण है। यह तथ्य है कि जज भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़कर सांसद हैं, संघ की लाइन पर भाषण देने, उसपर कायम रहने के बावजूद कार्रवाई नहीं होना और जिस जज को भ्रष्टाचार के आरोप में फंसाया गया हो सकता है उसके मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट बार एसोसिशन की सक्रियता, मूल खबर का कई दिनों तक नहीं छपना और छपने पर अग्निशमन अधिकारी का भ्रम फैलाने वाला बयान, स्पष्टीकरण बताता है कि सब ठीक नहीं है। सरकार अदालतों से लड़ती भिड़ती दिख रही है और इसमें किसी के पैसे मार लेने के आरोप में गिरफ्तार व्यक्ति को सुप्रीम कोर्ट से हफ्ते भर में जमानत मिल जाने, पत्रकार को जमानत मिलने के बावजूद रिहा होने में कई दिन लगने तथा दंगे के मामले में गिरफ्तार प्रतिभाशाली छात्रों, डॉक्टर आदि को जमानत नहीं मिलना, सुनवाई ही नहीं हो पाने जैसे मामले हैं। कई फैसले दबाव में लिये गये लगते हैं। भगवान की सलाह पर फैसला, मुख्य न्यायाधीश के घर जाकर प्रधानमंत्री का पूजा करना और नॉन बायोलॉजिकल होने जैसी समझ अपनी जगह है ही। ऐसे में सरकार और न्याय व्यवस्था के बीच टकराव के संकेत भी हैं।

आज एनसीआर या दिल्ली से सटे गाजियाबाद के एक एटीएम से मुझे पांच सौ का यह नोट मिला जो किनारे से जला हुआ है।

दिल्ली हाईकोर्ट के जज के घर के बाहर स्टोर में आग लगने, नकदी मिलने (जलने) उन्हें जब्त नहीं किये जाने, संबंधित जज के यह कहना कि नकदी के बारे में उन्हें जानकारी ही नहीं है और पूर्व में नकदी, हथियार और नशे की चीजें प्लांट कर लोगों को फंसाये जाने के मामले, जज लोया की मौत की जांच न होने और तमाम अनुत्तरित सवाल बताते हैं कि इस देश में सबकुछ ठीक नहीं है। वर्षों से। सरकार जानबूझकर गड़बड़ कर रही है या अयोग्य और अक्षम है – ऐसी बातों की जांच और पुष्टि के बिना देश की भलाई की उम्मीद कैसे की जाये। यह चिन्ता किसकी है। मीडिया की तो नहीं लग रही है। ऐसे में आज पहली बार मुझे बैंक के एटीएम से एक ऐसा नोट मिला है जिसके किनारे जले हुए हैं। मेरा बचपन बिहार में बीता है और बचपन में सुना था कि नोटों में कीड़े लग जाते हैं पर स्टोर में रखे होने, जल जाने पर सार्वजनिक होने और जो बचा उसे जब्त नहीं किये जाने का मामला पहली बार सुना है। अब अगर जले हुए नोट सर्कुलेशन में भी हैं तो कालाधन खत्म करने की सरकार की घोषणा और नोटबंदी की जरूरत पर क्या कहा जाये। जले हुए नोट का पता लगने पर उन्हें जब्त नहीं किया जाना, जनप्रतिनिधियों को अगर गलत नीति बनाने के लिए जेल भेजा जा सकता है तो नोटबंदी के बावजूद काला धन खत्म नहीं होने और नकदी बरामद होने का राज कई दिनों में नहीं सुलझने वाली इस व्यवस्था को क्या कहा जाये। यह सब अखबारों और मीडिया में दिखना चाहिये पर ऐसा है नहीं।  

बंगाल में बड़े पैमाने पर शिक्षकों की नियुक्ति अवैध करार दिये जाने के कारण बनी स्थिति की चर्चा भी दिल्ली के अखबारों में (पहले पन्ने पर) नहीं है। द टेलीग्राफ की एक खबर के अनुसार कोई वैकल्पिक व्यवस्था होने तक बर्खास्त शिक्षकों के स्वैच्छक तौर पर काम करने की सलाह को मानने से शिक्षकों ने इनकार कर दिया है। कुछ वकीलों का कहना है कि यह अवमानना का मामला हो सकता है। इस संबंध में द टेलीग्राफ में आज छपी सुभांकर चौधरी की खबर का गूगल अनुवाद (संपादित)। बर्खास्त शिक्षकों और अन्य स्कूल कर्मचारियों ने काम पर लौटने या स्वैच्छिक सेवा देने से इनकार कर दिया है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट द्वारा उनकी नौकरी खत्म करने के बाद मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के अस्थायी समाधान को ठुकरा दिया है। नौकरी से निकाले गए स्कूल कर्मचारी, अपनी नौकरी की रक्षा के लिए मुख्यमंत्री की “प्रतिबद्धता” से नाखुश हैं, वे कुछ ठोस और त्वरित उपाय चाहते हैं। योग्य शिक्षक अधिकार मंच के प्रवक्ता चिन्मय मंडल ने कहा, “हमें उम्मीद थी कि मुख्यमंत्री कोई स्पष्ट रास्ता निकालेंगी ताकि हमारी नौकरियों की रक्षा की जा सके। लेकिन मुख्यमंत्री ने हमें स्वैच्छिक सेवा प्रदाताओं के रूप में अपनी क्षमता में स्कूल जाते रहने के लिए कहा, जिन्हें बाद में मुआवजा दिया जाएगा। इसलिए, नागरिक स्वयंसेवकों की तरह, हम नागरिक शिक्षक बन गए हैं। हमारे साथ ऐसा व्यवहार नहीं किया जा सकता है।” सोमवार को नेताजी इंडोर स्टेडियम में बर्खास्त कर्मचारियों के साथ बैठक के दौरान ममता ने उन्हें सलाह दी कि वे स्कूल लौट आएं क्योंकि नई भर्ती प्रक्रिया के माध्यम से उन्हें बहाल किए जाने तक “स्वैच्छिक सेवा” देने पर कोई रोक नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट ने 3 अप्रैल को बंगाल के सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों में 25,773 शिक्षण और गैर-शिक्षण कर्मचारियों की नौकरियों को रद्द कर दिया था, जिसमें कहा गया था कि 2016 की पूरी भर्ती प्रक्रिया “दूषित” थी। यहां भी सुप्रीम कोर्ट ने दूषित प्रक्रिया के लिए किसी को दोषी ठहराने की बजाय नियुक्ति को ही रद्द कर दिया है। इसपर मैं पहले यहां लिख चुका हूं। बंगाल की इस मुश्किल के बारे में राहुल गांधी ने राष्ट्रपति से अपील की है कि वे बेरोजगार कर दिये गये ‘बेदाग’ लोगों को बचाएं। खबरों के अनुसार, लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को पत्र लिखकर उनसे यह सुनिश्चित करने के लिए हस्तक्षेप करने की मांग की है कि बंगाल में सुप्रीम कोर्ट के आदेश से बर्खास्त किए गए “बेदाग” शिक्षकों की नौकरी न जाए। राहुल ने शिक्षक शिक्षा अधिकार मंच से प्राप्त एक ज्ञापन भी भेजा है। यह प्रभावित शिक्षकों का एक मंच है। मंच के शिक्षकों ने उनसे मुलाकात की थी और राष्ट्रपति को पत्र लिखने का आग्रह किया था।

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