
संजय कुमार सिंह-
1. पंचायत चुनाव में भाजपा की भी भागीदारी थी। हिन्सा के लिए उसकी जिम्मेदारी नहीं है? वैसे भी मुख्यमंत्री ने पुलिस को कार्रवाई की खुली छूट दी है। भाजपा शासित किस राज्य में ऐसा है? खबर यह भी है कि टीएमसी अपने कार्यकर्ताओं को ही सुरक्षा नहीं दे पाई और सबसे ज्यादा हत्या / मौत टीएमसी कार्यकर्ताओं की हुई है। किसने की होगी? कहने की जरूरत है कि मरने वाले हिंसा शुरू नहीं करते हैं, मारने वाले ही जोखिम लेंगे और सफल होंगे। यही नहीं, अगर इसमें भाजपा का हाथ नहीं है तो भाजपा केंद्रीय एजेंसियों से जांच की मांग क्यों करती है?

2. बिहार में अभी हाल तक भाजपा की सरकार थी। अभी भी भाजपा के समर्थन में रहे नीतिश कुमार ही मुख्यमंत्री हैं। क्या नीतिश कुमार अक्षम मुख्यमंत्री हैं? पिछले चुनाव के चुनाव के बाद लालू के कथित ‘भ्रष्ट’ बेटे को सरकार में शामिल करने के मुद्दे पर नीतिश कुमार ने इस्तीफा दे दिया था। पर भ्रष्टाचार के आरोपों का क्या हुआ और नीतिश कुमार अब भाजपा के साथ क्यों नहीं हैं और भ्रष्टाचार के आरोपों पर अभी तक क्या कुछ हो पाया है? भाजपा मामले गिनाने की बजाय नीतिश का खुलकर विरोध क्यों नहीं कर रही है?
3. मणिपुर में तो भाजपा की ही सरकार है उसे बर्खास्त करके राष्ट्रपति शासन लगाकर दिल्ली से नियंत्रण करने का कोई खास मतलब नहीं है। इसलिए मुख्यमंत्री के इस्तीफे के बावजूद उन्हें पद पर रहने के लिए मजबूर किया गया है। और वे संभाल नहीं पा रहे हैं, केंद्र से सहायता नहीं है (या इसीलिए है)। पर राजस्थान में कानून व्यवस्था की हालत खराब है तो केंद्र सरकार क्या कर रही है? आखिर जनता को तो सुरक्षा चाहिये ही, भाजपा क्यों नहीं दे रही है। वैसे भी, उसके कार्यकर्ता राजस्थान में क्या कर रहे हैं? आपको पता नहीं हो, हमें तो है ही।
4. क्या ऐसे मामले भाजपा शासित राज्यों में नहीं हुए हैं। तब भाजपा कहां रहती है और तब ऐसे ट्वीट क्यों नहीं करती है?
5. क्या यह कहने की जरूरत है कि यह ट्वीट और भाजपा का यह तेवर (बेशर्मी वाला) सिर्फ मणिपुर की घटना से हुई बदनामी की भरपाई के लिए है। अगर इनपर सब मौन साधे हैं तो इसलिए कि इनकी जानकारी ही नहीं है। भाजपा ने आरोप लगाये तो कम से कम एक मामले का पश्चिम बंगाल के डीजीपी ने खंडन कर दिया और कहा कि कोई सबूत नहीं है, संबंधित महिला ने बयान तक दर्ज नहीं कराये हैं। इसलिए आपके आरोपों पर यकीन नहीं है।
मीडिया स्वतंत्र होता और गोदी में है तो आपने इन खबरों को छपने दिया होता (जैसे पहले छपते थे) तो निर्भया जैसा आंदोलन होता पर वो भी आपकी पार्टी की मेहरबानी से नहीं हो सकता है। अगर समझ में नहीं आया कि क्यों, तो बता दूं कि मीडिया की मजबूरी है कि वह भाजपा शासित राज्यों में अपराध की खबर छापे और भाजपा शासित राज्यों की नहीं छापेगी तो उसपर सवाल उठेंगे और बेशर्मी खुल जाएगी। वैसे भी एक गलती से दूसरी गलती सुधर नहीं जाएगी। मणिपुर का मामला अन्य राज्यों से बिल्कुल अलग है।
विपक्ष तो आपका (सत्तारूढ़ पार्टी का) ही विरोध करेगा। इसमें नया या गलत क्या है? अपनी सरकार का विरोध वह क्यों करे? उसका विरोध आपको करना है, नहीं जानते? सिर्फ दिल्ली पता है? साफ है, ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ के नारे के बावजूद आपकी पार्टी विपक्षी राज्यों में भी महिला उत्पीड़न के मामलों का समय पर विरोध नहीं करती है। बलात्कारियों औऱ यौनशोषण करने वालों का संरक्षण छिपा हुआ नहीं है। वैसे भी, आपको इन मामलों की याद तब आई जब आप मणिपुर मामले में घिर गये।
कायदे से आपने ये मामले पहले प्रकाश में लाये होते और विरोध किया होता तो मणिपुर का वीडियो लीक होने पर भी नहीं घिरते और रविशंकर प्रसाद को यह नहीं पूछना पड़ता कि संसद के सत्र के पहले ऐसे मुद्दे क्यों आते हैं। मैं जानता हूं, वो नहीं जानते हैं तो बता दे रहा हूं कि देश का दबा कुचला संसद में सवाल उठने पर ही न्याय पाता रहा है। इसलिए यह पुराना तरीका है। यह अलग बात है कि भाजपा राज में तब भी कार्रवाई नहीं होती और सवाल हटाना तो छोड़िये, सदस्य को ही अयोग्य ठहराने जैसा मामला हो चुका है। पर वह अलग मुद्दा है।
इसलिए, शर्मनाक आपका यह ट्वीट है। हमारा नहीं बोलना नहीं। वैसे भी आप कार्रवाई कीजिये मीडिया को कहिये कि ऐसे मामले कहीं भी हो, प्रमुखता से जानकारी दे और पुलिस प्रमुख केंद्र सरकार को सूचित करे। आपकी सरकार कार्रवाई करे – तारीफ भी होगी और विपक्ष की बदनामी भी। पर सिर्फ विपक्ष को कोस कर कितने दिन सत्ता में रह लेंगे और रह भी लेंगे तो पार्टी का भविष्य कितने दिन का रहेगा?
शर्मनाक, यह भी है कि केंद्र सरकार में होने के बावजूद भाजपा को ना मणिपुर की खबर मिली और न इन घटनाओं की। ऐसे में यह भी नहीं पूछा जा सकता है कि इन्हें रोकने और अपराधियों को सजा देने के लिए क्या किया गया। ऐसी तो भाजपा की सरकार और व्यवस्था है। मणिपुर ही शर्मनाक था पर आपको खुद इन घटनाओं की जानकारी देने में शर्म नहीं हैतो किसे शर्मनाक कहूं? हद कर दी आपने।


