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उत्तर प्रदेश

आंतरिक गुटबन्दी के चक्रव्यूह से बाहर नहीं निकल पा रही है बीजेपी यूपी!

कई नेताओं को लगी निजी आईटी सेल की बीमारी ने उन्हें रियल से हटाकर रील के सब्जबाग में ऐसा फंसाया कि वह धरातल से ऊपर तैर रहे, बानगी जौनपुर की-विकास के नाम पर दूसरे के प्रयास में खुद क्रेडिट लेने की होड़ लगी…

कैलाश सिंह-

लखनऊ/ दिल्ली | चार जून 2024 को विगत लोकसभा चुनाव के परिणाम आने के पूर्व से उत्तर प्रदेश भाजपा में अंदरूनी कलह जो धधक उठी थी उसकी चिंगारी आज भी राख के नीचे सुलग रही है।

हरियाणा, महाराष्ट्र, जम्मू और फ़िर दिल्ली में पार्टी ने जो फतह हासिल की उसमें राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के योगदान को पार्टी हाई कमान भी नहीं नकार सकता है। रहा सवाल मुख्यमन्त्री योगी आदित्यनाथ का तो उनका कद सनातन संस्कृति के पुनर्जागरण ने इतना ऊंचा कर दिया कि अब उनका राजनीतिक विरोध करना सूरज को दीपक दिखाने सरीखा हो गया है।

यदि प्रयागराज के महाकुंभ में हुई भगदड़ या कथित मौतों के आंकड़े की बात को दरकिनार कर दिया जाए तो उसमें उमड़े जन प्रवाह की आंधी ने उन्हें हिंदुत्व के शीर्ष पर पहुंचा दिया। लेकिन पार्टी के भीतर की आंतरिक कलह का धुआँ राजनीतिक फिज़ाओं में तैर रहा है। उस धुएँ और तपिश का असर प्रदेश के कमोबेश हर जिले में देखने को मिल रहा है।

राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, दरअसल भाजपा के प्रतिनिधियों और संगठन के कार्यकर्ताओं में गुटबन्दी इस कदर हावी है कि हर कोई एक-दूजे को नीचे ढकेलने और उसके द्वारा विकास के लिए किए जा रहे प्रयास का क्रेडिट अपने खाते में करने की फिराक में लगा है। देश और प्रदेश की राजधानी के बीच पिछले गतिरोध को यही नेता जीवित रखे हुए हैं। जमाना ‘चमत्कार को नमस्कार’ का है।

विभिन्न प्रांतों में पार्टी की हो रही लगातार जीत ने हाई लेवल की लड़ाई को पीछे छोड़ दिया है। संघ व भाजपा में दूर हो चुके गतिरोध का प्रमाण पार्टी की लगातार जीत से मिल रहा है, फ़िर भी संगठन के पदों पर बदलाव रुके होने से कार्यकर्ता अभी उसी दुविधा में पड़े हैं।

पूर्व केंद्रीय गृह राज्य मन्त्री स्वामी चिन्मयानंद ने ‘तहलका संवाद’ से हुई बातचीत में साफतौर पर कहा कि राज्य में मुख्यमन्त्री के पद पर योगी आदित्यनाथ के बने रहने को बर्दास्त नहीं करने वाले कथित नेता या प्रतिनिधि निरंतर गिरगिट की तरह रंग बदल रहे हैं, जबकि योगी का वैचारिक बुलडोजर अब प्रयागराज के महाकुंभ से निकलकर संभल के निर्माणाधीन तीर्थ स्थल का रुख कर लिया है।

दूसरी तरफ़ पार्टी में अंदरूनी गुटबन्दी की बानगी जौनपुर में देखिए- यहां महाराष्ट्र कांग्रेस से भाजपा में लोकसभा के प्रत्याशी बनकर आये पूर्व गृह राज्य मन्त्री कृपाशंकर सिंह और उनके नौ रत्नों को छोड़कर आमजन तक को पता था कि वह चुनाव हार रहे हैं, क्योंकि इनका यहां कोई जनाधार नहीं के बराबर है। ये अपने निजी आईटी सेल और नौ रत्नों के उड़नखटोले से आज भी नहीं उतर पाए हैं।

इन दिनों वह प्रदेश के खेल व युवा कल्याण मन्त्री गिरीश यादव द्वारा लाई गई विकास योजनाओं की क्रेडिट खुद लेने के नाम की चर्चाओं से सुर्खियों में हैं। जबकि श्री यादव पूर्व के कार्यकाल में जातीय मोहपाश में जकड़े थे, लेकिन दूसरे वर्तमान कार्यकाल में विकास योजनाओं की झड़ी इसलिए लगा रहे हैं ताकि उन्हें तीसरा कार्यकाल और मजबूत स्थिति में मिले। हालांकि इनके साथ लगे संगठन के कुछ पदाधिकारी लाभ के चक्कर में कई नेताओं की द्योढ़ी के भँवरे बने हैं।

एक महिला माननीय का हमजातीय गुट जुदा राह पर चलता है। वह तो बिना कार्य कराए हुए उसकी क्रेडिट प्रेस वार्ता करके लेने में माहिर हैं। एक अन्य माननीय तो पार्टी की चौखट पर खड़े होकर अपनी आईटी सेल की रील पर तैरते हुए रियल राजनीति से दूर होते जा रहे हैं।

इसी तरह भाजपा के एक कथित माननीय अपने बड़बोलेपन और नौटंकी के लिए जाने जाते हैं। वह कभी मुख्यमन्त्री के विरोध तो कभी उनकी चारण गाथा के लिए मशहूर हैं। इनका विकास कार्य धरातल पर कम और जुबान पर ज्यादा रहता है। ये जिले के पुरोहित गैंग की मसाज से लेकर आईटी सेल तक की सेवाएं लेते हैं। इसी पुरोहित गैंग ने महाराष्ट्र से जौनपुर में नेता बनने आये एक लक्ष्मी पुत्र को जजमान और संन्यासी बनाकर रख दिया। ये तमाम कार्यक्रमो में केवल डोनेशन के लिए बुलाये जाते हैं।

जाहिर है ये भाजपा के हर गुट में ममरखी देते हैं। जौनपुर में एक नेता ऐसे भी हैं: चार दशक से रिकार्ड 14वीं बार को- आपरेटिव बैंक के वर्तमान चेयरमैन, 1990 से 1996 तक एमएलसी रहे, कांग्रेस के प्रदेश संगठन में विभिन्न पदों पर रहे, सपा सरकार में लैकफेड के चेयरमैन रहे और अब भाजपा में लोकसभा चुनाव के दौरान शामिल हुए ‘कुंवर वीरेंद्र प्रताप सिंह’ का जनाधार इनके जन सरोकार के चलते चार दशक से यथावत है।

आज़ भी जिले के हर विधान सभा के हर गांव के हर वर्ग में इनकी लोकप्रियता कायम है। ये जिस पार्टी में रहे उसमें गुटबाजी से हमेशा दूर रहे। लेकिन आमजन के लिए हमेशा उपलब्ध रहते हैं, शायद इसी लिए श्री सिंह आज भी राजनीति में प्रासंगिक हैं।

लेखक तहलका न्यूज नेटवर्क राजनीतिक संपादक हैं।

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