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रीलबाजों और मोबाइल के एडिक्टों के लिए ऑक्सफोर्ड का नया शब्द- ब्रेन रॉट

रंगनाथ सिंह-

भारतीय मीडिया का ब्रेन रॉट-

कुछ लोग इसे उपलब्धि की तरह देख सकते हैं कि अमीर और गरीब देशों के बच्चे अब एक ही बीमारी की चपेट में आ रहे हैं। मगर बड़ों का क्या? जी हाँ, अमीर देशों को अपने बच्चों के जिस ब्रेन रॉट की चिन्ता हो रही है, वही चिन्ता मुझे अपने देश के बड़ों को लेकर रही है।

कोई मुझसे पूछे तो कहूँगा कि ब्रेन रॉट उस अवस्था को कहते हैं जिसमें दुनिया के पूर्व गुलाम देश राजनीतिक आजादी मिलने के 77 साल बाद भी पुराने कब्जेदार द्वारा किसी एक शब्द को Word of the Year घोषित करने के छोटे से कौतुक पर लहालोट होकर नागिन डांस करने लगते हैं!

मुझे लगता है कि कोलोनियल गुलाम रहे देशों के बुद्धिजीवी वर्ग की मति मैकालेकरण की रील देख-देखकर काफी पहले भ्रष्ट हो चुकी है!

आपकी क्या राय है!


विजय विनीत-

ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस से छपनेवाली डिक्शनरी में हर साल एक नया शब्द शामिल किया जाता है जिसकी दुनियाभर में चर्चा होती है. इस साल यानि साल 2024 में जो शब्द शामिल किया गया है, वो है- brain rot. इस शब्द को लेकर भारत में भी तमाम बड़े न्यूज नेटवर्क ने स्टोरी की है.

ब्रेन रॉट शब्द शामिल किए जाने के पीछे गहन शोध और किया गया सर्वे है जिसके पीछे का तर्क यह है कि दुनियाभर के देशों में लोग जिस तरह से स्क्रीन स्क्रॉल करते जाने और लगातार रील्स देखने की लत के शिकार होते जा रहे हैं, इससे उनके दिमाग़ और व्यवहार पर बहुत ही गहरा और बुरा असर पड़ रहा है. बीबीसी हिन्दी ने इस पर रिपोर्ट करते हुए स्टोरी की शीर्षक में लिखा है कि ब्रेन रॉट की हिन्दी क्या होगी ?

मैं पिछले आठ महीने से वनमाली कथा में “डिजिटल डिटॉक्स” पर एक नियमित कॉलम लिख रहा हूं जिसका नाम है डिजिटल डिटॉक्स. इस कॉलम के लिए मैं अपने इस विषय पर लगातार किताबें, रिपोर्ट और सर्वे तो पढ़ता ही रहता हूं, साथ ही आसपास के लोगों का व्यवहार भी देखता हूं, उन पर ग़ौर करता हूं. पिछल महीने मैंने इसी विषय पर जालंधर में “डिजिटल डिटॉक्स क्यों ज़रूरी है” को लेकर छात्रों-अध्येताओं के बीच बात की. इस बातचीत में मैंने एक संदर्भ शामिल किया-

पिछले साल जब मेरी माँ गुज़री तो मुझसे कई लोग मिलने आए, कुछ ने थोड़े दिन के लिए अपने पास रहने का प्रस्ताव दिया. उनमें से एक जब मैं बेतहाशा रोए जा रहा था तो मेरी बगल में बैठकर इन्स्टाग्राम की डीपी बदल रहे थे. मैंने मंच से जब यह कहा और लोगों के चेहेर पर नज़र डाली तो उनके भाव बदल गए थे.

अपराजिता शर्मा अब इस दुनिया में नहीं हैं जिन्होंने इमोजी की तरह हिमोजी की शुरुआत की और दिल्ली विश्वविद्यालय के मिरांडा हाउस में हिन्दी पढ़ाया करतीं. अपाराजिता की चिता से जब लपटें उठने लगीं तो एक साहब ने एकदम से मोबाइल निकाला और फेसबुक लाइव करने लगे. मैं तेजी से उनके पास गया और मोबाइल उनसे लेते हुए कहा कि इसे बंद कीजिए. उनका जवाब था कि मैं तो सोच रहा था कि जो उन्हें चाहने वाले हैं, वो अंतिम यात्रा के कार्यक्रम को अपने यहां से बैठकर देख सकें.

लगभग दो महीने पहले मैं दिल्ली के लोदी रोड श्मशान घाट पर गया. हमारे एक बेहद आत्मीय के परिजन की चिता चल रही थी. चिता के सामने हम जैसे लोग बैठे थे कि एक ने मोबाइल निकाला और लगातार स्क्रॉल करना शुरु किया और फिर वो मोबाईल में ही खो गए.

यहां बस तीन प्रसंग. मैं ऐसे दर्जनों प्रसंग नोट करता जा रहा हूं. कभी इन पर विस्तार से लिखूंगा. डिजिटल डिटॉक्स कॉलम के तहत हादसे की आशंका लेकर कुछ लिखा भी है. फिलहाल ये कि अब जबकि बीबीसी हिन्दी में ब्रेन रॉट की हिन्दी क्या होगी शीर्षक से सवाल किया है तो मुझे एकदम से यही शब्दी ध्यान आ रहा है- दिमाग़ी सडांध. हालांकि ब्रेन क्रिया है जिसे मैं हिन्दी करते हुए भाव में बदल दे रहा हूं.

फिर भी..जिस तेजी से हम मोबाईल फोन की गिरफ़्त में पड़ जा रहे हैं और जो असर सामने से दिख रहा है, हम महसूस कर पा रहे हैं कि हमारा दिमाग़ सड़ते जाने का दिशा में बढ़ रहा है जिस पर स्मार्टनेस की छद्म परत चढ़ती नज़र आती है. बाक़ी यादाश्त और फोमो की समस्या पर तो पिछले बीस साल से चर्चा हो ही रही है.

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