श्याम कुमार-
कुछ दिन पूर्व जब मैं उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक के आवास पर गया था तो वहां वह भारी भीड़ से घिरे हुए थे, जिसके बाद उन्होंने लखनऊ से बाहर के दौरे पर प्रस्थान कर दिया। जाते समय वह अपने सहायक राकेश से मेरे लिए कह गए कि ‘दादा जो कहें, नोट कर लो और मुझे लौटने पर बताना।’ आम धारणा यही है कि ऐसे कथनों का कोई अर्थ नहीं हुआ करता।
मैं ब्रजेश पाठक के आवास से लौटने लगा तो नम्रता पाठक जी मिल गईं। वह वास्तव में सुगृहिणी भारतीय नारी हैं। उन्होंने सदा की तरह बड़ा सम्मान दिया तथा सोमवार, १८ मई को सायंकाल छह बजे यहां आवास पर आयोजित होने वाले सुंदरकांड-पाठ आयोजन के लिए आमंत्रित किया। उन्होंने राकेश को मेरा विशेष ध्यान रखने के लिए भी सहेजा। बाद में सुंदरकांड-पाठ में आमंत्रित करते हुए ब्रजेश जी के स्टाफ का फोन आया।
सोमवार को मैं सायंकाल छह बजे से कुछ पहले जब ब्रजेश पाठक के यहां पहुंचा तो देखकर आश्चर्य हुआ कि उनके आवास पर आयोजन का बड़ा भव्य इंतजाम किया गया है। बाहर तक आकर्षक सजावट थी तथा भोज की भी व्यवस्था थी। मैं समझ रहा था कि मैं वहां जल्दी पहुंच गया हूं, लेकिन वहां पर पहले से काफी लोग आ गए थे।
ब्रजेश पाठक बाहर घूमकर व्यवस्था देख रहे थे। आज पुनः उन्होंने धोती पहन रखी थी। धोती में उनका व्यक्तित्व बहुत प्रभावशाली परिलक्षित होता है। अब बहुत कम लोग धोती पहने हुए मिलते हैं। इससे पहले गांधी टोपी गायब हो चुकी है। मेरे मित्र एवं केन्द्रीय मंत्री रहे संघप्रिय गौतम ही कदाचित अकेले ऐसे नेता रह गए हैं, जो हमेशा गांधी टोपी पहना करते हैं। अखिलेश यादव टोपी पहनते हैं, किन्तु वह गहरे लाल रंग की होती है, जिसके बारे में लोग कहते हैं कि उस टोपी का रंग देखकर सपा शासन में अयोध्या में राममंदिर आंदोलन के दौरान कारसेवकों के किए गए नरसंहार के खून की याद आ जाती है।
ब्रजेश पाठक के यहां जब मैं भीतर प्रवेश करने लगा तो वहां तैनात दरोगा ने रोककर पूछा कि किससे मिलना है? तब तक वहां ब्रजेश जी पहुंच गए और वह मुझे हाथ पकड़कर भीतर बढ़े। फिर किसी को सहेजा कि ‘दादा को सहारा देकर ले जाओ।’
मैंने सोचा कि आवास में स्थित कार्यालय में थोड़ी देर बैठ लूं और पानी पी लूं, लेकिन पुलिस ने वहां नहीं जाने दिया। तब मैं मंच के सामने लगी सोफों की लाइन में तीसरी पंक्ति के सोफे पर बैठ गया। वहां पहली पंक्ति में नवनियुक्त मंत्री मनोज कुमार पांडेय बैठे थे।
कुछ देर बाद वह चले गए तो परिवहन राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) दयाशंकर सिंह वहां आए। अन्य मंत्री भी आ रहे थे। लोग मंत्रियों को अपना चेहरा दिखाने को आतुर थे। कुछ देर बाद दयाशंकर सिंह शायद उठकर भीतर गए और बाद में पुनः आ गए। तभी मंच के पास नम्रता पाठक जी दिखाई दीं। आज वह साड़ी में थीं और जूड़ा बांधे हुए थीं। उसी समय वहां ब्रजेश जी आ गए तथा पति-पत्नी ने वस्त्र में गांठ बांधकर मंच पर पूजा-अर्चना की। नम्रता जी वहीं एक ऊंची मचिया पर बैठ गईं तथा ब्रजेश जी अतिथियों के स्वागत आदि में व्यस्त हो गए।




सबसे आगे लगे प्रथम पंक्ति वाले सोफों का रोचक माहौल था। जो भी विशेष व्यक्ति वहां आकर बैठता था, उसे किसी मंत्री के आने पर उठ जाना पड़ता था। बाद में ब्रजेश पाठक वहां आकर मंत्री ओमप्रकाश राजभर के बगल में बैठ गए। तभी सुरक्षाकर्मियों ने आकर ब्रजेश पाठक के कान में कुछ कहा तो वह उठकर बाहर प्रवेशद्वार पर चले गए। संभवतः मुख्यमंत्री आने वाले थे, जिनके स्वागत में उन्हें वहां रहना था। कुछ देर बाद ब्रजेश पाठक मुख्यमंत्री को लेकर वहां आए।
मंत्रियों के आने का क्रम जारी रहा। डा. दिनेश शर्मा भी आए। डा. दिनेश शर्मा को देखकर एक चर्चित प्रकरण याद आया। वह उपमुख्यमंत्री थे तो लोगों की फरियादों पर अपने निर्देश में वह ‘नियमानुसार’ शब्द लिख दिया करते थे, जिससे लोगों ने उनका नाम ही ‘मिस्टर नियमानुसार’ रख दिया था। ‘नियमानुसार’ शब्द ऐसा है, जिसका चतुर नौकरशाही किसी काम को टरकाने में बड़ी कुशलता से फायदा उठाती है और भ्रष्टाचार पनपता है।
मुख्य पुजारी जी गदगद थे कि उन्हें मुख्यमंत्री के समक्ष सुनाने का अवसर मिला है, इसलिए ‘सुंदरकांड’ की समाप्ति के बाद वह विभिन्न भजनों आदि से वातावरण को भक्तिमय करने लगे। मैं दो घंटे से अधिक समय से सोफे पर बैठा हुआ था। सुबह मैंने हलका नाश्ता किया था, जिसके बाद कुछ खाने का समय नहीं मिला। पिछला वाला दिन भी कुछ इसी प्रकार बीता था।
अतः भूख-प्यास व कमजोरी के कारण वहां अधिक बैठना संभव नहीं हुआ तो मैंने बगल में बैठे सज्जन से धीरे से कहा कि वह उठने में मेरी मदद करें। उनकी मदद से मैं सोफों की पंक्ति से निकलकर जब गलियारे में आया तो वहां पुलिस भरी हुई थी, जिनमें अनके इंस्पेक्टर थे। उन्हें आश्चर्य हुआ कि मुख्यमंत्री मौजूद हैं और मैं बाहर निकलने की धृष्टता कर रहा हूं।
एक इंस्पेक्टर जब पास आया तो मैंने उसे अपनी हालत बताई। वह मुझे सहारा देकर कुछ आगे ले गया औैर उसके बाद ड्यूटीवाले दूसरे इंस्पेक्टर ने सहारा देकर बाहर वाले प्रवेशद्वार तक पहुंचाया। उसके पूछने पर मैंने बताया कि मुझे लेने कोई आ रहा है। इंस्पेक्टर ने मुझे सड़क के किनारे बनी मुंडेर पर बिठा दिया। तभी उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य कार से उतरे और भीतर चले गए।
मैं बाहर शोर के बीच मुझे लेने आने वाले व्यक्ति से मोबाइल पर बात करने की कोशिश करने लगा। इतना समझ में आया कि वह राजभवन वाले चौराहे पर आ गया है, जिसके बाद रास्ता बंद है, इसलिए वह आगे नहीं आ पा रहा है। मैं बैठा हुआ था, तभी पत्रकार प्रभात त्रिपाठी पत्रकार कृष्ण कुमार ‘कृष्ण’ के साथ दिखाई दिए। मैंने उनसे राजभवन चौराहे तक पहुंचाने के लिए कहा, लेकिन वे विवश लगे और स्वयं पैदल राजभवन चौराहे की तरफ चले गए।
मैंने भी हिम्मत की तथा अकेला पैदल राजभवन चौराहे की ओर चला। कमजोरी इतनी अधिक थी कि चला नहीं जा रहा था। रास्ते में पुलिस के कुछ वाहन खड़े थे, लेकिन न उन्होंने मदद के लिए पूछा, न मेरी हिम्मत मदद मांगने की हुई।
खैर, मैं कांखते और लड़खड़ाते हुए भीषण मुश्किल से चौराहे तक पहुंचा, जहां मुझे लेने आने वाला व्यक्ति स्कूटर लिए खड़ा था, जिस पर बैठकर मैं किसी तरह घर पहुंचा और पानी पीकर लगभग बेहोशी की स्थिति में बिस्तर पर पसर गया।
आदरणीय श्याम कुमार जी, आपकी यह आपबीती केवल एक संस्मरण नहीं, बल्कि सत्ता की चकाचौंध और वक्त की निष्ठुरता पर एक गहरा कटाक्ष है। पद और प्रभाव की भीड़ में अक्सर ‘इंसान’ और ‘अनुभव’ पीछे छूट जाते हैं। यह पढ़कर मन व्यथित है कि जिस व्यवस्था को आपने दशकों तक अपनी कलम से सींचा, वहीं आपको इस अवस्था में संघर्ष करना पड़ा। व्यवस्थाएं आती-जाती रहेंगी, पर आपकी लेखनी और गरिमा सदैव अटल रहेगी। आपके उत्तम स्वास्थ्य की कामना करता हूँ।
-पंकज सिंह कर्णवानी
आदरणीय श्याम कुमार जी, आपकी यह आपबीती केवल एक संस्मरण नहीं, यह पढ़कर मन व्यथित है कि जिस व्यवस्था को आपने दशकों तक अपनी कलम से सींचा, वहीं आपको उम्र की इस अवस्था में संघर्ष करना पड़ा। व्यवस्थाएं आती-जाती रहेंगी, पर आपकी लेखनी और गरिमा सदैव अटल रहेगी। आप सभी के प्रिय का सुझाव आप सभी साधन संपन्न लोगों के लिए जैसा कि मैं कार्यक्रम की योजना एवं समीक्षा बैठकों में मैं हमेशा जोर देता हूं कि जिस व्यक्ति को हम लोग चाहे अनचाहे अथवा अनभिज्ञ व्यक्ति जो हमारे सामाजिक कार्यक्रमों या व्यक्तिगत कार्यक्रम में आमंत्रित होते हैं सभी का अगर संभव हो सके तो सम वेता अतिथि संस्कार सlमर्थ अनुसार अवश्य करना चाहिए खासतौर पर जलपान, भोजन एवं अगर संभव हो सके तो ट्रांसपोर्टेशन इन सभी को भी हमें अपने कार्यक्रमों खासकर व्यक्तिगत कार्यक्रम में शुरुआत से संपूर्णता तक कार्यक्रम की भव्यता का अंग मानकर ही कार्यक्रमों को संपादित करना चाहिए तभी हमारे कार्यक्रमों की सुभीता संपूर्णता सुनिश्चित होती है जैसा कि आपने अपने संस्मरण कहां की आदरणीय उपमुख्यमंत्री श्री बृजेश पाठक जी ने व्यक्तिगत आपको अटेंशन देते हुए आपको सम्मानित तरीके से अंदर प्रवेश करवाया किंतु आपको भी ध्यान देना चाहिए की उम्र की इस दहलीज पर आपको अपने किसी युवा साथी को अपने साथ ऐसे कार्यक्रमों में पूर्व अनुमति स्वरूप अवश्य ले जाया करिए जिससे आपका वह ख्याल रखेगा और उसे आगे की दिशा भी मिलेगी l आपके उत्तम स्वास्थ्य की कामना के साथ सभी को जय सियाराम ।
आप सभी का प्रिय
इंजी. श्याम सुंदर सिंह (नैतिक)
धर्म जागरण समन्वय
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ
राष्ट्रीय गीता संगोष्ठी प्रभारी
श्रीमद् भगवत गीता वैदिक न्यास
राष्ट्रीय संयोजक
हिंदुत्व की पाठशाला


