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साहित्य

निष्पक्ष पत्रकार करे तो क्या करे, पक्ष-विपक्ष दोनों गरियाते हैं!

बुद्धिजीवी की दुकान (पार्ट 1)- परेशानी यही थी सबको कि मैं 2002 दंगों तक सीमित रहूँ, 84 दंगों की बात न करूँ!

अभिरंजन कुमार-

सत्ता पक्ष को आईना दिखाओ तो कहता है कि आपको विपक्ष की गलतियाँ नज़र नहीं आतीं? विपक्ष को आईना दिखाओ तो कहता है कि आपको सत्ता पक्ष की गलतियाँ नज़र नहीं आतीं?

जीवन की आधी सदी गुज़र गई, तो अहसास हुआ कि सारी गलती मेरी ही थी, क्योंकि मुझे बस किसी एक ही पक्ष की गलतियों पर फोकस करना था. दूसरे पक्ष की गलतियों पर नेत्रहीन बन जाना था – बाबा, मोको सूझत नाहीं. जो बुझात है तोको, मोको बूझत नाहीं.

हिंदी के मशहूर समालोचक डॉ. विश्वनाथ त्रिपाठी ने एक भरी सभा में 2007 में ही मुझे आगाह कर दिया था कि ये नहीं चलेगा कि आप सबको गलत कहें, चाहे इधर रहें या उधर रहें, आपको किसी एक के पक्ष में खड़ा होना ही पड़ेगा. तब मुझे लगा था कि डॉ. त्रिपाठी भी गलत हैं, क्योंकि ये क्या बात हुई कि एक के गलत को तो गलत कहा जाए, लेकिन दूसरे के गलत को गलत न कहा जाए?

सारा बवाल शुरू हुआ था मेरी एक कविता “बुद्धिजीवी की दुकान” से, जिसमें मैंने 1984 के सिख विरोधी दंगों और 2002 के गुजरात दंगों दोनों की निंदा करते हुए देश के बुद्धिजीवियों के सेलेक्टिव अप्रोच और दोहरे रवैये की आलोचना की थी. सबकी परेशानी का कारण केवल इतना ही था कि मैं 1984 दंगों की बात क्यों कर रहा हूँ. अपेक्षा थी कि केवल 2002 दंगों की निंदा तक ही सीमित रहूँ.

इस विवाद के कारण आधुनिक हिंदी कविता की एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण कृति होने के बावजूद मेरे कविता संग्रह “उखड़े हुए पौधे का बयान” का बॉयकॉट कर दिया गया. जिस किताब की “लॉन्चिंग” उस वक़्त हिंदी साहित्य जगत की एक बड़ी घटना थी, उसकी “लिंचिंग” बड़ी ही निर्ममता से एक ही झटके में कर दी गई. यह लिंचिंग कितने संगठित तरीके से की गई थी, और किस तरह से यह अब तक जारी है, इसे इन तीन स्पष्ट उदाहरणों से आप आसानी से समझ जाएंगे:

1. बिहार राज्य प्रगतिशील लेखक संघ के तत्कालीन महासचिव ब्रज कुमार पांडेय जी ने उस किताब पर पटना में परिचर्चा कराने की योजना रद्द कर दी, जबकि उस किताब के लोकार्पण समारोह में प्रगतिशील लेखक संघ के उस वक्त के राष्ट्रीय महासचिव कमला प्रसाद जी स्वयं भी मौजूद थे, और उन्होंने खुद ही उस कविता संग्रह को मील का पत्थर बताया था. ब्रज कुमार जी ने तब मुझे बताया था कि वे मजबूर हैं, क्योंकि उनपर अनेक लोगों का काफी दबाव है.

2. हिंदी की समालोचना पत्रिका “आलोचना” में तत्कालीन कार्यकारी सम्पादक अरुण कमल जी ने उस कविता संग्रह की समीक्षा तक नहीं छपने दी, जबकि “आलोचना” के प्रधान संपादक स्वयं डॉ. नामवर सिंह थे, जिन्होंने मेरी किताब की समूची पांडुलिपि पहले पृष्ठ से लेकर आखिरी पृष्ठ तक स्वयं चेक की थी, और पेंसिल से कई संशोधन भी सुझाए थे, जिनमें से कुछ को मैंने स्वीकार भी किया था. इतना ही नहीं, डॉ. नामवर सिंह जो किसी किताब की भूमिका नहीं लिखते थे, मेरी किताब की भूमिका भी लिखने को तैयार थे, लेकिन कमलेश्वर जी से पहले ही तय हो चुका था कि इसकी भूमिका (जो फ्लैप पर छपी) वही लिखेंगे. नामवर जी उस संग्रह की अनेक कविताओं पर मोहित थे, लिहाजा उसके लोकार्पण में वे स्वयं तो आए ही, दिग्गज कवि केदारनाथ सिंह को भी लेकर आए. केदारनाथ सिंह ने भी उस पूरी किताब को पढ़ा था. दोनों ही दिग्गजों ने उस संग्रह की भूरि भूरि प्रशंसा की थी.

3. हाल ही में जब मैंने तथ्यों और सबूतों के साथ प्रमाणित कर दिया कि कवि नरेश सक्सेना ने उसकी एक कविता “हँसो गीतिके हँसो” के विचार और शिल्प का अनुकरण अपनी कविता “गिरना” में किया है; यहां तक कि अपनी पोल खुल जाने पर स्वयं नरेश सक्सेना भी निरुत्तर होकर भाग खड़े हुए; तब भी हिंदी साहित्य से जुड़े अनेक लोग सब कुछ देख समझ कर भी तटस्थ हो गए और मौन साध लिया. जबकि सबको पता है कि नरेश सक्सेना जी की कविताओं में मौलिकता का सर्वथा अभाव है. वे दूसरों की कविताएं पढ़ते हैं, और उनमें से जो भी विचार उन्हें पसंद आ जाता है, उसका वे अपने शब्दों में अपने तरीके से भावांतरण कर देते हैं. मध्यकालीन कवि बिहारी के एक दोहे के ऐसे ही भावांतरण को उन्होंने अपनी मौलिक कविता के रूप में प्रचारित किया, जिसकी कई काव्य प्रेमी पहले ही पोल खोल चुके हैं. लेकिन चूंकि सक्सेना जी एक संगठित साहित्यिक गिरोह का हिस्सा हैं, इसलिए उनके बारे में सभी चुप्पी साध लेते हैं.

हालांकि इन सारे षडयंत्रों और गिरोहबाजियों से व्यक्तिगत मेरी सेहत पर कोई फर्क़ नहीं पड़ता; और साहित्य में, समाज में, मीडिया में, राजनीति में मर्यादाएं बची रहें, इसलिए बहुत सारी व्यथाओं को भी अब तक पीता चला गया, रहीम बाबा की नेक सलाह मानते हुए कि निज मन की व्यथा मन ही राखो गोय; लेकिन क्या हिंदी साहित्य जगत के ऐसे-ऐसे कांड कभी भी सामने नहीं लाए जाने चाहिए, जिनके जरिए न जाने कितने गिरोहबाज स्थापित कर दिए गए और न जाने कितनी ही प्रतिभाओं का गला घोंट दिया गया?

सत्य नहीं होता सुपाच्य किंतु यही वाच्य! धन्यवाद.

पार्ट टू…

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