अभिरंजन कुमार-
“बुद्धिजीवी की दुकान” एक लंबी कविता थी, जिसके इसी अंश (चित्र देखें) पर हिंदी साहित्य से जुड़े बुद्धिजीवियों में बवाल मच गया था और उनके संगठित गिरोह ने बहुत धूम धाम से लॉन्च हुई किताब “उखड़े हुए पौधे का बयान” (2006) की लिंचिंग करने की ठानी. हालांकि मुझे इससे कोई फर्क न पड़ना था, न पड़ता है, क्योंकि साहित्य और मीडिया में मैं किसी गॉडफादर के दम से नहीं, बल्कि साक्षात् गॉड के दम से आया और लगातार सच बोलते हुए भी अब तक मौजूद हूँ.

चूंकि कविता का यह अंश न केवल 1984 के सिख विरोधी दंगों, 2002 के गुजरात दंगों, देश में व्याप्त साम्प्रदायिक राजनीति और कथित धर्मनिरपेक्षता की आड़ में लगातार रचे जा रहे साम्प्रदायिक षड्यंत्रों की एक खुली और सशक्त आलोचना था, बल्कि हिंदी साहित्य के कथित बुद्धिजीवियों के दोगलेपन और उनके संगठित गिरोह की क्षुद्र और अमानवीय सोच पर भी करारा प्रहार था, इसलिए वे लोग बुरी तरह से तिलमिला और बिलबिला उठे थे.
उन लोगों का कहना था कि यह सब लिखकर आप मोदी, भाजपा, आरएसएस को बचा रहे हैं, क्योंकि इससे गुजरात दंगों की आलोचना डाइल्यूट होती है. जबकि मेरा कहना था कि अगर आप लोगों में से किसी एक भी प्रमुख हिंदी कवि ने पिछले 20 साल में 1984 के सिख विरोधी दंगों की निंदा में सिर्फ एक कविता भी लिख दी होती, या जिस नफरत के साथ मोदी, भाजपा, आरएसएस पर हमलावर हैं, उसके सौवें हिस्से के बराबर सख्ती भी राजीव गांधी, काँग्रेस और 1984 के दंगाइयों के खिलाफ दिखाई होती, तो मुझे यह कविता लिखने की जरूरत ही नहीं पड़ती.
मैंने कहा कि चूंकि पिछले दो दशकों से पीड़ित सिख समुदाय अकेले ही इंसाफ़ की लड़ाई लड़ रहा है और उसे हम हिंदी वालों की कोई भी सहानुभूति, समर्थन या सहयोग प्राप्त नहीं है, इसलिए एक हिंदी कवि और पत्रकार होने के नाते व्यक्तिगत मेरे लिए यह बहुत शर्म की बात है और अपने पूरे समाज की तरफ से मैं इसका प्रायश्चित कर रहा हूं. इस बात से गुजरात दंगों की आलोचना बिल्कुल भी डाइल्यूट नहीं हो रही. मेरे लिए एक हिन्दू, एक मुसलमान, एक सिख तीनों की जान बराबर है. आप लोगों की तरह चुनाव में वोटों का वेटेज देखकर मैं मानव जिंदगियों की कीमत नहीं लगा सकता. भाजपा तो इस वक्त सत्ता में भी नहीं है, फिर मुझे उसका बचाव करके या आज के सत्ताधारियों की आलोचना करके क्या मिलने वाला है?
मुझे वेदना इस बात की थी कि कॉंग्रेस पार्टी, उसका पूरा इको सिस्टम और हिंदी में उसके तमाम चंपू साहित्यकार जहाँ गुजरात दंगों के खिलाफ मोर्चा खोले हुए थे, वहीं सिख विरोधी दंगों के सज्जन कुमार और जगदीश टाइटलर जैसे मुख्य आरोपी (जो बाद में अदालत से दोषी सिद्ध हुए) यह कविता लिखे जाते समय भी कॉंग्रेस के सांसद थे, लेकिन हिंदी जगत में इसके खिलाफ कोई प्रतिरोध नहीं था. इससे पहले भी ये लोग और अन्य कई दंगाई राजीव गांधी और नरसिंह राव की सरकारों में सांसद और मंत्री बनाकर सुरक्षित और संरक्षित किए गए थे.
इसलिए सिख विरोधी दंगों के लगभग दो दशकों के बाद मुझे कोई सपना नहीं आया था कि अपनी कविता में हालिया गुजरात दंगों के साथ मैं उसका भी जिक्र करूँ, बल्कि इस जिक्र की मजबूत वजहें और ठोस पृष्ठभूमि थी. इसी पृष्ठभूमि में मेरा आग्रह था कि हम लोगों को पीड़ित सिख समुदाय को इन्साफ़ दिलाने के लिए भी आवाज उठानी चाहिए, अन्यथा इतिहास हमें माफ नहीं करेगा. लेकिन इस पवित्र, निष्कलुष और निष्पक्ष आग्रह के कारण हिंदी के गिरोहबाज स्वनामधन्य साहित्यकारों ने मेरा साथ देने के बजाय मेरी किताब का बहिष्कार करके मुझे मिटाने का कुत्सित षड्यंत्र रचा, जिसके बारे में केवल कुछ घटनाओं (सभी नहीं) का जिक्र मैंने अपने पिछले पोस्ट में किया.
हलांकि माता सरस्वती ने मुझे व्यक्तिगत रूप से इतना सक्षम अवश्य बनाया है कि मुझे किसी गिरोह के षडयंत्रों से कोई फर्क़ नहीं पड़ता, इसलिए देखा जाए तो मुझे कोई आवश्यकता भी नहीं थी कि मैं इन प्रसंगों का खुलासा करूँ, लेकिन चूंकि हिंदी साहित्य के इस ऐतिहासिक कलंक में मैं शामिल नहीं था, हर मनुष्य की जान को मैंने बराबर वेदना और सम्वेदना से देखा है और अपने सिख भाइयों बहनों के इन्साफ के लिए भी आवाज उठाने में कम से कम मैं पीछे नहीं रहा हूँ, यह स्पष्ट करने के लिए कभी न कभी मुझ इन प्रसंगों का खुलासा करना ही था.
हिन्दी समाज की जानकारी के लिए आज यह भी बताना चाहता हूँ कि कॉंग्रेस पार्टी ने जब सिख विरोधी दंगों के दंगाइयों का बेशर्मी से बचाव करना जारी रखा और 2009 के लोकसभा चुनाव में एक बार फिर से सज्जन कुमार और जगदीश टाइटलर को टिकट दे दिया, तो इससे नाराज होकर एक सिख पत्रकार जरनैल सिंह ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान केन्द्रीय गृहमंत्री पी चिदंबरम पर जूता फेंक दिया था. उस वक्त मैं NDTV में था. मैंने जरनैल सिंह को फोन किया और कहा कि यद्यपि मैं किसी पर भी जूता फेंके जाने के पक्ष में नहीं हूँ, लेकिन जहाँ मेरे तीन हजार से अधिक सिख भाइयों बहनों की निर्ममता से हत्या कर दी गई और सत्ता द्वारा अपराधियों को लगातार संरक्षण दिया जा रहा है, उसे देखते हुए भावनात्मक रूप से मैं आपके साथ हूँ. साथ ही, मुझे इस बात की शर्मिदगी भी है कि जिस लड़ाई को हम सब लोगों को एक साथ मिलकर लड़ना था, दंगों के 25 साल बाद आज भी उसे आप जैसे हमारे चंद भाई-बहन अकेले ही लड़ने को मजबूर हैं.
इसके बाद भी सिख विरोधी दंगों के खिलाफ और पीड़ितों को इन्साफ दिलाने के लिए मैंने कई लेख लिखे, जो इन्टरनेट पर उपलब्ध हैं.
एक बात आज फिर से मैं सबको बता देना चाहता हूँ कि हमारे सिख भाई बहन इस देश की रीढ हैं. उनका उदय ही हुआ इस देश को मुगल आक्रमणकारियों के आतंक से बचाने और हम सबकी रक्षा करने के लिए. इसलिए उनके प्रति कभी भी किसी भी मोड़ पर सहानुभूति, समर्थन और सहयोग की कमी इस देश को विनाश के रास्ते पर ले जाएगा.
चूंकि उनकी आबादी कम है और मुख्य रूप से वे एक ही राज्य में सिमटे हुए हैं, केवल इसलिए यदि इस देश के राजनीतिक दल या बुद्धिजीवी उनकी अनदेखी करेंगे, तो मुझ जैसे लोग अपने नफे नुकसान की परवाह किए बगैर आगे भी इसका कड़ा प्रतिवाद करेंगे. धन्यवाद.
पिछला भाग…
बुद्धिजीवी की दुकान (पार्ट 1)- परेशानी यही थी सबको कि मैं 2002 दंगों तक सीमित रहूँ, 84 दंगों की बात न करूँ!



