
संजय कुमार सिंह
इंडियन एक्सप्रेस की एक खबर हिन्दुओं को ‘जागरूक’ मान लेने की सरकारी अपेक्षा बताती है और नियमों को उलटकर सरकारी काम आसान बनाने की ओर बढ़ती लगती है। ऐसे में हिन्दुत्व की रक्षा के प्रचार के बावजूद हिन्दुओं को अपनी मान्यता या अच्छे पुनर्जन्म के लिए सजग रहना जरूरी हो जायेगा।
हिन्दुओं में मान्यता है कि अंगदान करने वाले का पुनर्जन्म उस अंग के बिना होता है। मेरी इससे कोई सहमति नहीं है और वैसे तो पुनर्जन्म ही विवाद का विषय है पर मुद्दा हिन्दुत्व और खतरे में पड़े भारत के हिन्दुओं की रक्षा का हो तो उनकी मान्यताओं की भी रक्षा होनी ही चाहिये। सरकार लोगों की जागरूकता बढ़ाने के लिए धर्म के आधार पर चल रही मान्यताओं को खत्म करने के लिए कुछ करना चाहे, उसे ठकोसला साबित किया जा सकता है तो वह भी किया जाना चाहिये। दूसरी ओर, अंग दान जरूरी है तो उसके लिए भी काम होना चाहिये। लोगों को अंग दान के लिए प्रेरित किया जाना चाहिये और यह सब शिक्षा से आसानी से हो सकता है। वह सब छोड़कर सरकार ऐसा काम करने जा रही है जिससे अंगदान बढ़ तो जायेगा लेकिन चोर दरवाजे से। इंडियन एक्सप्रेस की इस खबर के अनुसार विशेषज्ञों ने मान लिया है कि अस्पताल में किसी की मौत हो तो यह माना जायेगा कि वह कॉर्निया दान देने के लिए सहमत है (या था) उसके परिवार की अनुमति लेने की जरूरत भी नहीं होगी।
खबर के अनुसार अस्पताल में मरने वाले का दान करने के लिए सहमत होना – सिद्धांत रूप में स्वीकार कर लिया गया है। अपवाद सिर्फ वे होंगे जो पहले ही अपनी असहमति दर्ज करा चुके होंगे। जाहिर है यह बहुत मुश्किल मामला है और लोग दान देने की सहमति दर्ज कराते तो यह स्थिति नहीं बनती। संभव है, इसीलिए नियम को उलट दिया जा रहा है और सहमति देने की जरूरत ही नहीं होगी, असहमति दर्ज कराइये। यह स्थिति तब है जब मृत्यु के बाद शव दान करने वालों से पैसे मांगे जाते हैं। यह काम निचले स्तर के कर्मचारी करते हैं जो रात में शव लेने घर जाते हैं। वे समझते हैं या यह अहसास दिलाते हैं कि रात में ही शव ले जाकर मोरचरी में सुरक्षित रखकर अहसान करेंगे वरना परिवार परेशान होता रहेगा। एक परिवार ने अगले दिन इसकी शिकायत की तो कार्रवाई चाहे जो हुई अधिकारी ने अपनी समस्या बताई और रात में भी अधिकारियों के मौजूद होने के सुझाव पर कहा कि रात में काम कम होगा तो ड्यूटी पर तैनात कर्मचारी सो जायेगा। समस्या वैसे ही रहेगी। मैं इससे पूरी तरह सहमत हूं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि समस्या का इलाज नहीं किया जाये या उसके लिए परेशान नहीं हुआ जाये।

कथनी और करनी का अंतर
यह उदाहरण ये बताने के लिए कि सरकारी नियमों की अपनी परेशानी है, उससे भ्रष्टाचार पनपता है तो नियम बनाने में इस बात का भी ध्यान रखा जाना चाहिये। इलाज सिर्फ इलेक्टोरल बांड ले आना नहीं है। इस मामले में आसान होगा कि लोगों को जागरूक बनाया जाये, शिक्षा दी जाये पर वे वोट बैंक नहीं बनेंगे। और सरकार या राजनीति अगर अपना लाभ देखना चाहेगी तो कथनी और करनी का अंतर होगा ही। मैं उसी को रेखांकित करना चाहता था हालांकि अभी वह मेरी चिन्ता का विषय नहीं है। इंडियन एक्सप्रेस में आज कनाडा के राजनयिकों के दिल्ली छोड़ने और भारत के राजनयिकों के ओटावा छोड़ने की खबर पहले पन्ने पर है। आज की लीड, टाइम्स ऑफ इंडिया की सेकेंड लीड बताती है कि वरिष्ठ नागरिकों के लिए स्वास्थ्य बीमा कराया जाये, टर्म लाइफ इंश्योरेंस लिया जाये तो उसपर जीएसटी माफ हो सकता है। इस संबंध में अंतिम निर्णय जीएसटी कौंसिल नवंबर में लेगी। राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस या इंडिया गठबंधन ने स्वास्थ्य बीमा पर जीएसटी का मामला उठाया था और चुनाव के समय इस खबर का कारण विपक्ष का वही दबाव है। सरकार अगर नागरिकों को कोई राहत दे रही है तो श्रेय लेगी ही और उसे दिया भी जायेगा लेकिन विपक्ष की मांग पर ऐसा हो रहा है तो यह भी बताया जाना चाहिये। पत्रकारिता यही है कि इस सूचना को निष्पक्ष रूप से रख दिया जाये। इंडियन एक्सप्रेस ने इसे पांच कॉलम में लीड बनाया है। बेशक खबर के लिहाज से महत्वपूर्ण है लेकिन मांग और विचार खबर है या निर्णय? खासकर तब जब सत्तारूढ़ दल चुनाव में खराब स्थिति का सामना कर रही है और जीत जाती है तो आलोचना ईवीएम की होती है।
मुख्य न्यायाधीश की चिन्ता और खबर
ईवीएम की शिकायत पर सुप्रीम कोर्ट में भी कार्रवाई नहीं होती है तो यह भी मुद्दा है। पहले ऐसा नहीं होता था या ऐसे मामले एकाध ही होते थे। उनमें मान लिया जाता था कि हमारी ही समझ गलत होगी, सुप्रीम कोर्ट का फैसला सही ही होगा। अब जब सरकार की अधिकतर कार्रवाई कोर्ट में चुनौती देने लायक रही है और ज्यादातर मामले में फैसला सुप्रीम कोर्ट में ही हुआ तो सुप्रीम कोर्ट (असल में मुख्य न्यायाधीश) को भी छवि की चिन्ता है। अमूमन मुख्य न्यायाधीश अपना काम करते हैं लेकिन वर्तमान मुख्य न्यायाधीश छवि के प्रति भी जागरूक हैं और इतिहास कैसे याद करेगा यह सोचकर चिन्तित हैं। ऐसे में प्रधानमंत्री ने उनके घर जाकर पूजा की और मामले को सार्वजनिक कर दिया। अब न्याय की मूर्ति ही बदल गईं तो मुख्य न्यायाधीश भी सफाई देते नजर आ रहे हैं। इंडियन एक्सप्रेस में आज पणजी डेलटाइन से छपी खबर के अनुसार उन्होंने कहा है कि सुप्रीम कोर्ट जनता की अदालत है, इसका मतलब नहीं है कि संसद में विपक्ष की भूमिका निभाये। अगर ऐसा है तो सरकार से संबंधित मामले सुप्रीम कोर्ट में जायें ही क्यों? अभी तक की स्थिति से लगता है कि केंद्र सरकार को बहुमत मिला है तो वह ईडी, सीबीआई और जीएसटी अधिकारियों की सहायता से किसी को भी भ्रष्ट घोषित कर सकती है, परेशान कर सकती है। पर यह अधिकार राज्यों में बहुमत पाने वालों के पास नहीं है। आम आदमी पार्टी के बड़े नेताओं को केंद्र सरकार की इच्छा के कारण ही उनके सरकारी कामों के लिए जेल में रखा गया जबकि केंद्र सरकार के कामों के लिए कोई कार्रवाई नहीं हुई। इलेक्टोरल बांड बड़ा साफ उदाहरण है। मुझे लगता है अगर सुप्रीम कोर्ट ने आम आदमी पार्टी को केंद्र की तरह आजादी दी होती तो आज इस स्पष्टीकरण की जरूरत नहीं पड़ती। हालांकि, मेरे लिये मुद्दा यह है कि पणजी की खबर दिल्ली में पहले पन्ने पर है। बेशक, इस स्थिति के लिए सरकार भी जिम्मेदार है।
गौरी लंकेश की हत्या के आरोपी शिन्दे सेना में
इंडियन एक्सप्रेस में आज इस खबर के साथ एक खबर छपी है, गौरी लंकेश की हत्या के आरोपी जमानत पर बाहर आने के बाद शिन्दे सेना में शामिल हुए। इससे पहले खबर थी, अभिनेता शाहरुख खान के बेटे आर्यन खान को गिरफ्तार करने वाले आईआरएस अधिकारी समीर वानखेड़े नौकरी छोड़कर चुनावी मैदान में उतरने जा रहे हैं। तब कहा गया था कि वे भी शिवसेना शिंदे गुट से धारावी सीट से उम्मीदवार होंगे। आप जानते हैं कि शाहरुख खाने के बेटे को निरपराध जेल में रखा गया, जमानत नहीं मिली और अब संबंधित अधिकारी ऐसी सेना में शामिल होने जा रहे हैं (हो सकते हैं) जिसने टूटकर ही सही, महाराष्ट्र में भाजपा की सरकार बनवाई और उस सरकार के बारे में सुप्रीम कोर्ट का फैसला भले देर से आया सबको मालूम है और यह भी कि उसे लागू क्यों नहीं कराया जा सका। यह सब हुआ है तो सुप्रीम कोर्ट की जिम्मेदारी नहीं है पर स्पष्टीकरण तो मुख्य न्यायाधीश को देना पड़ रहा है। वानखेड़े सेना ज्वायन करें या नहीं, या किसी और पार्टी में चले जायें मुद्दा यह है कि पद पर रहकर नागरिकों (खास कर सरकार विरोधियों) को परेशान किया जाता है और सुप्रीम कोर्ट कुछ नहीं कर पाया। यह तथ्य है, इतिहास में दर्ज हो या नहीं।
पुनर्मूषिको भवः?
ऐसी ही एक दिलचस्प खबर आज इंडियन एक्सप्रेस और नवोदय टाइम्स में लीड है। इसके अनुसार जम्मू और कश्मीर फिर होगा पूर्ण राज्य। इंडियन एक्सप्रेस की खबर कहती है, राज्य का दर्जा चाहने वाले उमर सरकार के प्रस्ताव को उपराज्यपाल ने सहमति दी। यह सही है कि राज्य बन गया तो उपराज्यपाल की भी तरक्की होगी। इसलिए उनकी सहमति का बहुत मतलब नहीं है लेकिन क्या केंद्र सरकार की सहमति के बिना ऐसा हुआ होगा? आप जानते हैं कि अनुच्छेद 370 हटाने के मौके पर राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेशों में बांट दिया गया था। पांच साल बाद चुनाव हुए, सरकार बनी तो फिर से राज्य बनाने का प्रस्ताव पास हुआ है। खबर के लिहाज से यह अपने आप में महत्वपूर्ण है लेकिन इन्हीं दो अखबारों में लीड है। अमर उजाला की आज की लीड का शीर्षक है, 24 घंटे में 30 से अधिक उड़ानों को बम से उड़ाने की धमकी … सतर्कता बढ़ाई, सुरक्षित पहुंचे विमान। उपशीर्षक है, इनमें सात उड़ानें शामिल, विस्तारा की सबसे अधिक पांच… जांच में कुछ नहीं निकला। जाहिर है, कुछ लोग जो मानसिक बीमार भी हो सकते हैं, किन्हीं कारणों से ऐसा कर रहे हैं। जब बार-बार ऐसा हो रहा है तो खबर यह है ही नहीं कि धमकी दी गई – अब खबर यह होती कि धमकी देने वाला पकड़ा गया, फलां है, अमुक कारण से ऐसा कर रहा था आदि। पर द हिन्दू ने भी इसे आज सेकेंड लीड बनाया है। हालांकि एक दिन में 20 धमकियां भी कुछ ज्यादा ही है। अगर लोगों को ऐसी धमकी देने या फोन करने का डर नहीं है तो इसे भी समझने की जरूरत है कि आखिर क्यों।
पूर्व रॉ एजेंट का प्रत्यर्पण
टाइम्स ऑफ इंडिया की आज की लीड भारत सरकार के एक पूर्व रॉ अधिकारी को अमेरिका की एफबीआई द्वारा वांडेट घोषित किये जाने के बाद की खबर है या उसका फॉलोअप है। कायदे से आज के अखबारों में इस मामले में एक खबर जरूर होना चाहिये था। टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर का शीर्षक है, पूर्व रॉ एजेंट के प्रत्यर्पण में वर्षों लग सकता है। वैसे तो यह कोई नई बात नहीं है और हम बैंक का कर्ज लेकर भागे लोगों का मामला 10 साल से देख रहे हैं तो समझ सकते हैं कि जो भारत सरकार के कहने पर (यही आरोप है) कोई काम कर रहा था उसका प्रत्यर्पण सरकार क्यों करेगी। पर खबर तो खबर है। दूसरे अखबारों में नहीं है यह चौंकाने वाली बात हो सकती है।
गैंगस्टर की प्रेस कांफेंस
इस क्रम में एक और दिलचस्प खबर द टेलीग्राफ में है। इसका शीर्षक है, गैंगस्टर ने सिद्दीक की हत्या का बचाव किया। नई दिल्ली डेटलाइन से इमरान अहमद सिद्दीक की खबर इस प्रकार है, एक स्वयंभू गैंगस्टर ने उत्तर प्रदेश में पुलिस हिरासत से वस्तुतः एक प्रेस कांफ्रेंस कर ली। इसमें उसने अप्रत्यक्ष रूप से लॉरेंस बिश्नोई गिरोह के साथ अपने संबंध को स्वीकार करते हुए महाराष्ट्र के राजनेता बाबा सिद्दीकी की हत्या को उचित ठहराया गया। तीन पुलिसकर्मी चुपचाप देखते रहे। हत्या के आरोप में गिरफ्तारी के तुरंत बाद मथुरा जिला अस्पताल से बाहर ले जाते समय 26 वर्षीय घायल योगेश उर्फ राजू एक वीडियो में कहता दिख रहा है, “बाबा सिद्दीकी को मार दिया गया क्योंकि वह अच्छा आदमी नहीं था।” कहने की जरूरत नहीं है कि यह मीडिया के जरिये एक ऐसी कहानी गढ़ने की कोशिश है जिसका कोई मतलब नहीं था। जो अच्छा आदमी नहीं हो उसे मार देना कैसे सही है और मार देने वाला कैसे अच्छा आदमी है और कैसे तय होगा कि कोई अच्छा आदमी कैसे होता है। खबर में आगे लिखा है, “उनके (सिद्दीकी) खिलाफ महाराष्ट्र संगठित अपराध नियंत्रण अधिनियम के तहत आरोप थे। कहा जाता है कि उनके दाऊद गिरोह से संबंध थे।” तथ्य यह है कि इसके बावजूद उन्हें पुलिस सुरक्षा मिली हुई थी और हत्या पुलिस सुरक्षा में हुई है। शुक्रवार शाम तक वीडियो व्यापक रूप से प्रसारित होने के साथ, पूर्व पुलिस प्रमुखों, वरिष्ठ वकीलों और कई सामान्य नेटिज़न्स ने पूछा कि पुलिस एक संदिग्ध गैंगस्टर को हिरासत में रहते हुए मीडिया को संबोधित करने की अनुमति कैसे दे सकती है। माना जाता है कि अदालत में आते-जाते आरोपी पत्रकारों पर एक- दो डायलॉग मारते हैं – जबकि पुलिस उन्हें अलग करने की कोशिश करती है। लेकिन ऐसा लगता है कि योगेश को बिना किसी रोक-टोक के प्रवचन देने की अनुमति दी गई है। वीडियो 103 सेकंड लंबा है और ऐसा प्रतीत होता है कि इसे योगेश की मीडिया से बातचीत शुरू होने के कुछ समय बाद शूट किया गया है।
उत्तर प्रदेश में उपचुनाव
आप जानते हैं कि उत्तर प्रदेश में उपचुनाव हैं। चुनाव आयोग ने महाराष्ट्र और झारखंड विधानसभा चुनावों के साथ 48 विधानसभा सीटों, 2 लोकसभा सीटों पर होने वाले उपचुनाव की तारीखों का एलान कर दिया है। उत्तर प्रदेश की नौ सीटों पर भी उपचुनाव का शेड्यूल जारी किया गया है। इनमें अयोध्या की मिल्कीपुर सीट नहीं है। वहां अभी उपचुनाव नहीं होंगे क्योंकि चुनाव आयोग के अनुसार, भाजपा के पूर्व विधायक बाबा गोरखनाथ ने 2022 में चुनाव जीते सपा विधायक अवधेश प्रसाद के खिलाफ इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दायर कर रखी है। ये पिटीशन अभी पेंडिंग है। ऐसे में समाजवादी पार्टी ने चुनाव आयोग पर भाजपा के पक्ष में काम करने का आरोप लगाया है। पार्टी की तरफ से कहा गया कि कानपुर की सीसामऊ सीट का मामला भी अदालत में है लेकिन, आयोग वहां चुनाव करवा रही है। जो भी हो, प्रधानमंत्री चुनाव प्रचार कर रहे हैं और आज दि एशियन एज की खबर के अनुसार नरेन्द्र मोदी बनारस में हैं और आज 6000 करोड़ की हवाई अड्डा परिोजनाओं की शुरुआत करेंगे।
दि एशियन एज में चार कॉलम में छपी खबर के अनुसार भाजपा महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश के हिन्दुओं में एकजुटता लाने की कोशिशों को बढ़ावा दे रही है। इसके लिए बंटेंगे तो कटेंगे जैसा नारा सोशल मीडिया पर छाया हुआ है। इसे योगी संदेश नाम दिया गया है। महाराष्ट्र में भाजपा का लक्ष्य फिर से ‘हरियाणा जैसा’ नतीजा हासिल करना है। ऐसे में आज कुछ अखबारों में चुनावी खबर लीड भी है। हिन्दुस्तान टाइम्स की लीड का शीर्षक है, भाजपा ने झारखंड की सूची जारी की; राजद ने सोरेन की योजना का विरोध किया। इसके साथ दूसरी खबर है महाराष्ट्र में सत्तारूढ़ महायुति ने राज्य में सीटों के बंटावारे को लेकर वार्ता की। टाइम्स ऑफ इंडिया में राजद वाली खबर पहले पन्ने पर दो कॉलम में है। शीर्षक है, जेएमएम, कांग्रेस ने झारखंड में सीटों के बटवारे की घोषणा की तो राजद ने नाराजगी जताई। इसके साथ बताया गया है कि चंपई सोरेन और बाबू लाल मरांडी भाजपा की पहली सूची में है। द हिन्दू की लीड का शीर्षक है, इंडिया ब्लॉक ने झारखंड के चुनाव के लिए सीटों का बंटवारा किया।
आजसू के संस्थापक की तैयारी और खबर
इन खबरों की खास बात यह है कि ऑल झारखंड स्टूडेंट्स यूनियन के संस्थापक सूर्य सिंह बेसरा ने भ्रष्टाचार मिटाओ, झारखंड बचाओ का नारा दिया है। इनके नेतृत्व में 10 राजनीतिक दलों ने मिलकर झारखंड में तीसरा विकल्प बनाया है जिसे जनमत नाम दिया गया है। 18 सदस्यों की इसकी संचालन समिति है। जो चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही थी। इस क्रम में गांधी जयंती के मौके पर दिल्ली के कांस्टीट्यूशन क्लब में राउंट टेबल ऑन झारखंड इलेक्शंस का आयोजन किया गया था। दूसरी ओर, कल खबर छपी थी कि आजसू ने भाजपा से ताल मेल में सीटों की घोषणा कर दी है। मैंने कुछ पत्रकार मित्रों से जानने की कोशिश की। तो पता चला खबर सही है। मेरा मानना है कि झारखंड में बेसरा की तैयारी कुछ रंग ला सकती है। ऐसे में भाजपा से तालमेल संभव नहीं है। आज की खबर से पता चल रहा है कि यह समझौता आजसू के एक गुट से हुआ है। जाहिर है, खबरों से भ्रम फैलाने का काम इरादतन या गैर जानकारी में, होता ही है। स्थिति यह है कि बेसरा की तैयारियों का प्रचार किया जाये तो उसका मतलब यह भी निकलता है कि भाजपा ने वोट बांटने के लिए बेसरा को सक्रिय किया होगा। मीडिया कि यह जिम्मेदारी है कि वह अपनी खबरों से स्थिति स्पष्ट करे पर हो उल्टा रहा है।


