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CCI ने WhatsApp–Meta डेटा शेयरिंग मामले में NCLAT से मांगी सफाई, 2 दिसंबर को अगली सुनवाई

नई दिल्ली: व्हाट्सऐप द्वारा यूज़र डेटा को पैरेंट कंपनी मेटा के साथ विज्ञापन उद्देश्यों के लिए साझा करने के मुद्दे पर एक बार फिर विवाद गहराया है। भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (CCI) ने नेशनल कंपनी लॉ अपीलेट ट्रिब्यूनल (NCLAT) में याचिका दायर कर यह स्पष्ट करने की मांग की है कि क्या हाल ही में हटाई गई पांच साल की रोक के बाद अब व्हाट्सऐप विज्ञापन के लिए यूज़र डेटा Meta के साथ साझा कर सकता है।

NCLAT ने 4 नवंबर को डेटा शेयरिंग पर लगी पांच साल की रोक हटाई थी, जिसके तुरंत बाद CCI ने 18 नवंबर को दाखिल अपने आवेदन में इस फैसले के कई बिंदुओं पर स्पष्टीकरण मांगा है। CCI का कहना है कि फैसले में यूज़र कंसेंट, पारदर्शिता और एकीकृत कंसेंट फ्रेमवर्क की बात कही गई है, लेकिन यह स्पष्ट नहीं किया गया कि ये नियम व्हाट्सऐप के सभी डेटा कैटेगरी पर समान रूप से लागू होंगे या विज्ञापन-संबंधी डेटा को अलग तरीके से देखा जाएगा।

CCI ने यह भी तर्क दिया है कि फैसले की भाषा से यह संकेत मिल सकता है कि एक समान कंसेंट सिस्टम लागू होने के बाद विज्ञापन और गैर-विज्ञापन डेटा के उपयोग में अंतर समाप्त हो सकता है, जिसका असर प्लेटफॉर्म्स की कंसेंट डिजाइनिंग पर पड़ेगा।

NCLAT की चेयरपर्सन जस्टिस अशोक भूषण और तकनीकी सदस्य अरुण बरोका की पीठ ने CCI की याचिका पर नोटिस जारी कर दिया है और मेटा व व्हाट्सऐप को अपना पक्ष रखने के लिए समय दिया है। मामले की अगली सुनवाई 2 दिसंबर को होगी।

इसी बीच, मेटा और व्हाट्सऐप की ओर से एक अलग आवेदन भी दायर किया गया है, जिसमें उन्होंने 4 नवंबर के फैसले के कुछ हिस्सों को गोपनीय बताते हुए उन्हें सार्वजनिक आदेश से हटाने (रेडैक्ट करने) का अनुरोध किया है।

मामले की पृष्ठभूमि

विवाद की शुरुआत 2021 में व्हाट्सऐप की विवादित प्राइवेसी पॉलिसी से हुई, जिसमें Meta समूह से डेटा साझा करने को अनिवार्य बना दिया गया था। इस पॉलिसी में यूज़र्स को किसी भी डेटा फ्लो से ऑप्ट-आउट होने का विकल्प नहीं दिया गया था, जिसके कारण CCI ने स्वतः संज्ञान लेकर जांच शुरू की।

2024 में CCI ने मेटा और व्हाट्सऐप पर 213.14 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया और पांच साल तक Meta समूह के साथ डेटा साझा करने पर रोक लगाई। साथ ही, व्हाट्सऐप को डेटा संग्रह और उपयोग को लेकर स्पष्ट जानकारी देने का निर्देश दिया गया।

मेटा और व्हाट्सऐप ने इस आदेश को NCLAT में चुनौती दी, जहां जनवरी 2025 में उन्हें अंतरिम राहत मिली और रोक को अस्थायी रूप से हटा दिया गया।

4 नवंबर 2025 को NCLAT ने अंतिम फैसला सुनाया, जिसमें जुर्माना और अधिकतर शर्तें बरकरार रखीं, लेकिन विज्ञापन के लिए डेटा शेयरिंग पर लगी पांच साल की रोक हटा दी। NCLAT ने कहा कि यदि यूज़र्स को मीनिंगफुल चॉइस, ऑप्ट-इन/ऑप्ट-आउट विकल्प और पारदर्शिता दी जाए, तो व्यापक प्रतिबंध आवश्यक नहीं है।

साथ ही NCLAT ने यह भी माना कि डेटा और प्राइवेसी से जुड़े मुद्दों की जांच करने का अधिकार CCI के पास है, हालांकि उसने Meta द्वारा डेटा का अनुचित लाभ उठाने की CCI की निष्कर्ष पर सहमति नहीं जताई।

सुनवाई में क्या हुआ?

CCI की स्पष्टीकरण याचिका पर सुनवाई के दौरान मेटा की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल और व्हाट्सऐप की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने इस कदम का विरोध किया। उनका कहना था कि 4 नवंबर का फैसला स्पष्ट और ठोस है, और यदि CCI असहमत है तो उसे समीक्षा की याचिका दायर करनी चाहिए, न कि स्पष्टीकरण मांगना।

CCI ने अनुरोध किया कि उसकी याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में संभावित अपील से पहले ही निर्णय दे दिया जाए, ताकि उठाए गए सवाल महज औपचारिकता बनकर न रह जाएं।

बड़ा सवाल: डेटा प्राइवेसी बनाम प्रतिस्पर्धा कानून

इस मामले ने एक बड़ी बहस को जन्म दिया है कि भारतीय प्रतिस्पर्धा कानून और उभरते डेटा प्राइवेसी मानकों में संतुलन कैसे बनाया जाए। जहाँ NCLAT ने यूज़र कंसेंट और उद्देश्य-सीमा (purpose limitation) पर जोर दिया है, वहीं विज्ञापन के लिए दीर्घकालिक डेटा शेयरिंग पर लगी रोक हटाने से प्राइवेसी समुदाय में चिंताएँ भी बढ़ी हैं।

भारत के 50 करोड़ से अधिक व्हाट्सऐप यूज़र्स पर क्या असर?

फिलहाल इसका अर्थ यह है कि व्हाट्सऐप Meta के विज्ञापन सिस्टम के साथ व्यापक डेटा इंटीग्रेशन की ओर बढ़ सकेगा—लेकिन केवल तभी, जब वह अधिक पारदर्शिता और उपयोगकर्ताओं को ग्रैन्युलर चॉइस प्रदान करने वाली व्यवस्था तैयार करे।

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