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शिक्षण-प्रशिक्षण संस्थाओं पर लग रहा ग्रहण, अब CCRT में डायरेक्टर नियुक्ति प्रक्रिया सवालों के घेरे में

शिक्षा और संस्कृति के क्षेत्र पर इन दिनों सवालों के बादल मंडरा रहे हैं। नीट पेपर लीक मामले ने जहां लाखों अभ्यर्थियों के भविष्य को तनाव और अनिश्चितता में धकेल दिया, वहीं अब शिक्षा और संस्कृति से जुड़े एक बड़े विभाग में नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर भी गंभीर सवाल उठ रहे हैं।

संस्कृति मंत्रालय के अंतर्गत आने वाली प्रतिष्ठित संस्था Centre for Cultural Resources and Training यानी CCRT में डायरेक्टर पद की भर्ती प्रक्रिया को लेकर पारदर्शिता और निष्पक्षता पर सवाल खड़े किए जा रहे हैं। सूत्रों के मुताबिक भर्ती प्रक्रिया में transparency और fairness का समुचित पालन नहीं किया जा रहा। हालांकि फिलहाल ये केवल आरोप हैं और इनकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।

फिर भी, जब किसी महत्वपूर्ण सरकारी पद की नियुक्ति प्रक्रिया पर सवाल उठते हैं तो यह समझना जरूरी हो जाता है कि डायरेक्टर स्तर की नियुक्तियों का सामान्य सरकारी ढांचा क्या होता है और कथित तौर पर किन बिंदुओं पर उल्लंघन की आशंका जताई जा रही है।

सरकारी संस्थानों में डायरेक्टर स्तर की नियुक्तियां सामान्यतः Recruitment Rules यानी आरआर नियमों के तहत की जाती हैं। इन नियमों में स्पष्ट रूप से निर्धारित होता है कि पद के लिए आवश्यक शैक्षणिक योग्यता क्या होगी, कितने वर्षों का अनुभव जरूरी होगा, कौन अभ्यर्थी पात्र माना जाएगा, स्क्रीनिंग की प्रक्रिया कैसे होगी, इंटरव्यू किस प्रकार आयोजित किया जाएगा और चयन समिति में किन अधिकारियों को शामिल किया जाएगा।

आमतौर पर सबसे पहले विज्ञापन जारी किया जाता है। इसके बाद देशभर से आवेदन आमंत्रित किए जाते हैं। फिर scrutiny प्रक्रिया के दौरान यह जांच होती है कि अभ्यर्थी निर्धारित eligibility criteria पूरा करता है या नहीं। इसके बाद योग्य पाए गए उम्मीदवारों को इंटरव्यू के लिए शॉर्टलिस्ट किया जाता है।

लेकिन विवाद उस समय शुरू हुआ जब आरोप लगे कि योग्य और अयोग्य, दोनों तरह के अभ्यर्थियों को शॉर्टलिस्ट कर लिया गया। आरोप है कि कुछ ऐसे उम्मीदवारों को भी इंटरव्यू चरण तक पहुंचा दिया गया जो कथित रूप से निर्धारित पात्रता मानकों को पूरा नहीं करते। इतना ही नहीं, इनमें कुछ ऐसे नाम भी बताए जा रहे हैं जो स्वयं संस्कृति मंत्रालय में कार्यरत हैं। इससे conflict of interest यानी हितों के टकराव का सवाल भी गंभीर रूप से उठ खड़ा हुआ है।

ऐसी स्थिति में चयन प्रक्रिया की पारदर्शिता पर संदेह पैदा होता है और पूरी प्रक्रिया केवल औपचारिकता बनती दिखाई देने लगती है। हालांकि इन आरोपों और आशंकाओं की अब तक आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।

मामला इसलिए भी संवेदनशील माना जा रहा है क्योंकि conflict of interest का अर्थ ऐसी स्थिति से होता है, जहां किसी अधिकारी, कर्मचारी या उससे जुड़े व्यक्ति का व्यक्तिगत या संस्थागत संबंध निर्णय प्रक्रिया को प्रभावित कर सकता है या ऐसा प्रतीत हो सकता है।

यही वजह है कि सरकारी नियुक्तियों में impartiality यानी निष्पक्षता को अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। यदि किसी चयन प्रक्रिया में favoritism, influence या eligibility violation जैसे आरोप सिद्ध होते हैं तो यह मामला गंभीर कानूनी और प्रशासनिक प्रश्न खड़े कर सकता है।

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