जगनमोहन रेड्डी ने अपनी सरकार के दौर में, विशाखापटनम के ऋषिकोंडा में 500 करोड़ का महल बना लिया, खबर चर्चा में है।
मगर डेढ़ लाख करोड़ का शहर बन रहा है। ये बात किसी ने आपको नहीं बताई।
बात चंद्रबाबू नायडू के सपनों के शहर अमरावती की है। अमरावती, वैसे तो पुराणों में इंद्र के शहर का नाम है। लेकिन यह नायडू के द्वारा बनवाई जा रही, आंध्र प्रदेश की नई राजधानी का नाम भी है।
किस्सा तब से शुरू होता है, जब आंध्र प्रदेश में नायडू काबिज थे, राजधानी हैदराबाद थी। कि तभी राज्य का विभाजन हुआ, तेलंगाना बना। हैदराबाद शहर तेलंगाना के हिस्से में आ गया।
कुछ समय के लिए तो दोनों राज्य हैदराबाद ही शेयर करते, ठीक वैसे ही जैसे चंडीगढ़ को पंजाब और हरियाणा करते हैं। लेकिन सुनर लेटर, नए राज्य के लिए, एक नई राजधानी की जरूरत थी।
नायडू ने विशाल, आधुनिक, वर्ल्ड क्लास राजधानी का सपना देखा। यह सपना मोदी जी के धौलेरा, याने दिल्ली से 6 गुना बड़े और न्यूयार्क से 10 गुना भव्य स्मार्ट सिटी वाली बकवास भर नहीं था।
नायडू ने सीरियसली काम शुरू किया। बड़ी मात्रा में जमीन अधिग्रहण, आर्किटेक्चर, प्लानिंग, सर्वे में ही हजारों करोड़ खर्चे हो गए। इतने में नायडू चुनाव हार गए।
जगनमोहन रेड्डी ने सरकार बनाई। उन्हें यह प्रोजेक्ट, एक सफेद हाथी, और बेकार का फिजूलखर्च लगा। नई राजधानी का प्रोजेक्ट ठंडे बस्ते में चला गया।
बनिस्पत, रेड्डी ने बने बनाये, एक पुराने खूबसूरत शहर विशाखापटनम को ही राजधानी बनाने की बात की। वहां कुछ नए भवन बनाये।
ऋषिकोंडा हिल पर जो भवन बने, इसी क्रम में बने। इसमें पूरे पांच सौ करोड़ खर्च हो गए। न्यूज वालों की मानें, तो सीएम के ऑफिस कम रेजिडेंस में इटालियन मार्बल, और 15 लाख का कमोड, 40 लाख का टब लगा है।
मने, भयंकर ही शीश महल बना है। ऐसा न्यूज वाली छम्मो चीख-चीख कर बता रही है, और स्टूडियो में बैठा एंकर, जनता का धन बर्बाद होने पर, झूम-झूम के अपना सर पीट रहा है।
लेकिन मुझे फर्क नहीं पड़ता, उस भवन में 5 करोड़ लगे, या 50 …या फिर सच में पूरे 500 करोड़ ही लगे हों।
क्योंकि किसी भी हालत में, यह किसी बियाबान में 50 हजार करोड़ की लागत से एक समूचा शहर बसाने की सनक से बेहद सस्ता है।
ये 50 हजार करोड़ तो पुराना एस्टिमेट है। 5 साल बाद चंद्रबाबू नायडू फिर से सत्ता में लौट आये हैं। पुराना प्रोजेक्ट फिर गर्म बस्ते में लौट आया है।
विकास के प्रोपगेंडा में अब बताया जा रहा खर्चा, मात्र डेढ़ लाख करोड़ जा चुका है।
और उनकी टेक पर केंद्र सरकार टिकी है, वे हार्ड बारगेनर भी है। केंद्र से धन की पाइपलाइन बिछी हुई है।
इसमें कितने लाख करोड़ बह रहे है, किस नाले में जा रहे है, यह एंकर को नहीं पता। न्यूज वाली छम्मो को वहां घुसने की परमिशन नहीं।
जगनमोहन से मुझे कोई सिंपथी नही। वो छोटी मोटी रीजनल पार्टी के फालतू टाइप स्वार्थी नेता हैं। सत्ता में थे, तो बीजेपी से बढ़िया प्रेम सम्बन्ध रखे, इनके 22 लोकसभा और 10-12 राज्यसभा सांसद वस्तुतः बीजेपी की गोद में ही खेलते थे।
इसका लाभ लेकर तब, उन्होंने नायडू को जेल तक भिजवा दिया। वक्त बदला है, अब नायडू के हाथ में सत्ता है।
तो बीजेपी उनके साथ है, और जगनमोहन मुकदमे झेल रहे हैं।
मुझे चिढ़ ये दो कौड़ी के चैनलों से है। सारे सुपारी किलर हैं। कई जमूरे इसे जगनमोहन की प्राइवेट प्रॉपर्टी बता हैं, कोई उसे ऐशगाह कह रहा है।
उन्हें हर जिले में बने 2 करोड़ के पार्टी ऑफिस, झंडेवालान में बना शीशमहल या 1200 करोड़ का केंद्रीय भाजपा कार्यालय के शौचालय में घुसकर टब के फोटो लेने की हिम्मत नहीं। इसे बनाने के पैसे कौन सी मनरेगा की मजदूरी से आये, कोई पूछता नहीं।
500 करोड़ पर कपड़ा फाड़कर नाचने वालों से, डेढ़ लाख करोड़ के अमरावती राजधानी प्रोजेक्ट की स्क्रूटनी कभी सुनी नहीं गयी। लेकिन ऋषिकोंडा की स्टेट टूरिज्म बोर्ड की प्रॉपर्टी पर प्रायोजित हल्ला मचा रहे हैं।
ये पूरा विषय इसलिए लिख रहा हूं कि आप कुछ भी देखें- पढ़े, तो पहले अपने सरसों बराबर दिमाग पर जोर लगायें।
आज जो भी न्यूज टीवी पर आपको दिखाई दे रही है, उसमे झोल है। कोई न कोई झूठ है, चालाकी है। समाचार, सिर्फ बेईमानी की बारिश है।


