हरिवंश-
आज चंद्रशेखर की 98वीं जयंती है. उनके असाधारण नेतृत्व के स्मरण का अवसर. 1990-91 के आर्थिक संकट में कैसे उन्होंने मुल्क को दिवालियापन से बचाया? देश की साख डूबने ही वाली थी. कुछ दिनों का भी विदेशी मुद्रा भंडार नहीं था. महज एक सप्ताह के आयात बिल का भुगतान संभव था. इस संकट की जड़ें लंबी व गहरी थीं. इंदिरा गांधी के कार्यकाल (1971-72) में इसकी शुरूआत हुई. राजीव गांधी और वी.पी. सिंह की सरकारों ने इस संकट को आगे बढ़ाया. बार-बार चेतावनी के बाद समाधान नहीं निकाला. नतीजतन यह और गहरा हुआ.

1991 में देश ने निर्णायक अर्थसंकट का दौर देखा. जयतीरथ राव जैसे कई जाने–माने अर्थशास्त्री कहते हैं कि उस वक्त चंद्रशेखर सरकार ने सोना गिरवी रखने का साहसिक कदम नहीं उठाया होता, तो 1991 में ही भारत कथा का अंत हो गया होता. बहुत संक्षेप में जानें कि यह मामला क्या था? 1991 में चंद्रशेखर प्रधानमंत्री बने. उन्हें पूर्ववर्ती सरकारों से किस स्थिति में मुल्क की बागडोर मिली?
चंद्रशेखर का व्यक्तित्व अनूठा था. वह स्पष्टवादी थे. उनके व्यक्तित्व के कई असाधारण पहलू थे. पर, आज सिर्फ एक प्रसंग पर चर्चा. साहस उनकी पहचान था. समाजवादी विचारों से प्रेरित थे. लेकिन सोच व्यावहारिक थी. उन्होंने कभी सत्ता की राजनीति नहीं की. देशहित उनके लिए सर्वोपरि था. 1970-71 में उन्होंने इंदिरा गांधी को चुनौती दी. कांग्रेस वर्किंग कमेटी के चुनाव में वह उनकी इच्छा के खिलाफ चुने गए. यह उनकी लोकप्रियता का सबूत था. सुभाषचंद्र बोस के बाद वह पहले नेता थे, जिन्होंने शक्तिशाली कांग्रेस हाईकमान के प्रत्याशी को पराजित किया. उस दौर में इंदिरा जी का एकछत्र राज था. उनकी नीतियों पर सवाल उठाना आसान नहीं था. चंद्रशेखर ने यह साहस दिखाया.
‘युवा तुर्क’ के दिनों से ही देश के गंभीर सामाजिक-आर्थिक सवालों को मुख्य राजनीति का मुद्दा बनाया. उन्होंने वैकल्पिक रास्ता सुझाया. जब मुल्क में इमरजेंसी लगी, उसके पहले ही अपनी पत्रिका ‘यंग इंडियन’ में खुला लेख लिखकर तत्कालीन सत्ता (श्रीमती गांधी) को जेपी (जयप्रकाश नारायण) जैसे संत से टकराव से बचने की सलाह दी. वह चाहते थे कि राजनीति संवाद पर आधारित हो. सत्ता की जिद पर नहीं.
1970-71 में मशहूर अर्थशास्त्री प्रो. जयदेव शेट्टी ने किताब लिखी. ‘इंडिया इन क्राइसिस’. इसमें मुल्क के गहराते आर्थिक संकट का जिक्र था. 1980 के बाद पुन: इंदिरा जी की लोकलुभावन नीतियों ने राजकोष पर बोझ डाला. उच्च ब्याजदर पर विदेशी ऋण लिए गए. इससे देश कर्ज के जाल में फंसा. इसकी चेतावनी कई बड़े अर्थशास्त्रियों ने दी. इससे पहले एक और बड़ा संकट लालबहादुर शास्त्री के समय आया. खाद्यान्न की कमी थी. सूखा पड़ा. देश हिल गया था. लेकिन इंदिरा जी की नीतियों ने संकट को और गहराया. उन्होंने ‘सत्ता’ के लिए अनेक लोकलुभावन नीतियों को अपनाया.
इनमें ‘लीकेज’ (भ्रष्टाचार व कुशासन) की शुरुआत हुई. उनकी योजनाएं वोट की दृष्टि से आकर्षक थी. उन्हें सत्ता तो मिली, पर इसका खामियाजा मुल्क की दीर्घकालिक आर्थिक नीतियों ने भुगता. चंद्रशेखर ने यह खतरा भांपा. उन्होंने चेतावनी दी. ऐसी नीतियां देश को मंझधार में ले जाएंगी. यह दूरदृष्टि उनकी वैचारिकी का हिस्सा थी.
जनता सरकार भी जन उम्मीदों पर खरी नहीं उतरी. मुल्क की आर्थिक सेहत सुधारने की दिशा में कोई ठोस पहल नहीं हुई. फिर इंदिरा जी की सरकार आयी. फिर राजीव गांधी का कार्यकाल. देश पश्चिमी बाजारों की ओर बढ़ा. यह दौर उत्साह का था. लगा, भारत रातोंरात बदल जाएगा. वी.पी. सिंह वित्त मंत्री थे. उन्होंने राजीव को ‘विवेकानंद का अवतार’ कहा. लेकिन संकट गहराता गया. शासक वर्ग की विलासिता चर्चा में रही. एक घटना मशहूर हुई. प्रधानमंत्री के विमान में इटली की कटलरी मंगवाई गई. गवर्नेंस में अनेक कमियां दिखीं. 1987 में पालिसी पैरालाइसिस का दौर शुरू हुआ. मुल्क की रहनुमाई जिन हाथों में थी, उनमें साहस की कमी थी. व्यापक दृष्टिकोण का अभाव था. देश की माटी-पानी से जुड़ाव कम था. नतीजा हालात बिगड़ते गए.
1980 के दशक के अंत में हालात और खराब हुए. वी.पी. सिंह की सरकार बनी. उन्होंने संकट को अनदेखा किया. वह राजीव के वित्त मंत्री रह चुके थे. आर्थिक स्थिति से वाकिफ थे. लेकिन सत्ता की राजनीति में उलझे रहे. कोई कदम नहीं उठाया. मधु दंडवते उनके वित्त मंत्री थे. संकट को जानते-समझते हुए भी वह संकट रोकने में नाकाम रहे. रिजर्व बैंक के गवर्नर चेतावनी देते रहे. वित्त सचिवों ने भी आगाह किया. देश की साख खतरे में थी. उनकी बातें अनसुनी रहीं. देश मंझधार में फंस गया.
1990 में चंद्रशेखर प्रधानमंत्री बने. उन्हें संकटग्रस्त देश मिला. शपथ लेते ही वित्त सचिव विमल जालान मिलने को बेचैन थे. न मंत्रिमंडल बना था, न सरकार ने संसद में विश्वास मत पाया था. पर वित्त सचिव ने कहा, मिलना अत्यंत आवश्यक है. चंद्रशेखर मिले. उन्होंने गंभीर स्थिति बताई. विदेशी मुद्रा भंडार खत्म होने की कगार पर था. केवल सात दिन का भुगतान संभव था. चंद्रशेखर ने पूछा. क्या यह संकट मेरे शपथ की प्रतीक्षा में था? या पहले से था? जालान ने बताया. यह पहले से ही था. पर, राजीव गांधी के समय से बढ़ा था. वी.पी. सिंह के कार्यकाल में बदतर हुआ. दोनों को जानकारी थी. लेकिन किसी ने कदम नहीं उठाया. चंद्रशेखर ने चुनौती स्वीकार की.
शंकर आचार्य ने अपनी किताब—‘Essay on Macroeconomic policy and Growth in India’ में इस आर्थिक संकट की पृष्ठभूमि पर विस्तार से बताया है. 1991 में, भारत में एक बड़ा आर्थिक संकट आया था, जिसमें विदेशी मुद्रा भंडार बहुत कम हो गया था. निर्यात गिर गया था. महंगाई बढ़ गई थी. इस संकट के कई कारण थे. मसलन सरकार का लंबे समय से ज़्यादा ख़र्च. व्यापार के नियमन और विदेशी निवेश को लेकर नकारात्मक रवैया. ऐसी नीतियाँ बनाना जिनसे निर्यात को बढ़ावा न मिले और आयात को बढ़ावा मिला. व्यापार घाटे को पूरा करने के लिए विदेशों से ज़्यादा कर्ज़ लिया गया. कमज़ोर वित्तीय क्षेत्र. खाड़ी युद्ध के कारण तेल की क़ीमतें बढ़ने से स्थिति और बिगड़ गई.
चुनौतियां कई थीं. पंजाब में आतंकवाद. असम में चुनावी अशांति. अयोध्या में राम जन्मभूमि विवाद. श्रीलंका में लिट्टे का संघर्ष. हर तरफ अस्थिरता थी. आर्थिक स्थिति भयावह थी. ये सारे मुद्दे पहले की सरकारों की सौगात थी. चंद्रशेखर के सामने.
नरेश चंद्रा, कैबिनेट सचिव थे. उन्होंने अपने लेख ‘Selling the Country’s Jewels’ (देखें, ‘द हिंदू’, 01 अगस्त, 2016) में जिक्र किया है. अर्थव्यवस्था के पैरामीटर बेहद खराब थे. बड़े ऋण चुकाने की क्षमता नहीं थी. ऋणदाता चिंतित थे. क्या भारत कर्ज के जाल में फंस गया है? संकट असाधारण था. आम आदमी भी समझ सकता था. लेकिन राजनीतिक अस्थिरता ने इसे जटिल बनाया.
चंद्रशेखर की सरकार अल्पमत में थी. कांग्रेस का बाहरी समर्थन था. राष्ट्रपति वेंकट्टरमण ने अपने संस्मरणों में लिखा है. राजीव गांधी ने एक साल तक समर्थन का भरोसा दिया था. लेकिन यह वादा टूटा. नरेश चंद्रा ने लिखा कि चंद्रशेखर ने कठिन निर्णय लिए. तमिलनाडु और असम की सरकारें बर्खास्त कीं. कुछ राज्यपाल बदले. विदेश नीति में कदम उठाए. अमेरिकी विमानों को ईंधन भरने की अनुमति दी. लेकिन समर्थन की कमी थी. स्थिति नहीं बदली. असम में चुनाव. पंजाब चुनाव (नरसिंह राव सत्ता में आये, रोक लगी).
आर्थिक संकट से निपटने का फैसला ऐतिहासिक था. चंद्रशेखर ने सोना गिरवी रखा. नरेश चंद्रा ने इसका वर्णन किया. यह आसान नहीं था. चंद्रशेखर को पता था, इसकी क्या राजनीतिक कीमत उन्हें चुकानी होगी? डर था. वह सोना बेचने वाले प्रधानमंत्री कहे जाएंगे. अधिकारियों ने समझाया. यही एकमात्र विकल्प है, नहीं तो देश दिवालिया होगा. दो विकल्प थे. खाई में गिरना. या समुद्र में डूबना. चंद्रशेखर ने कठिन रास्ता चुना. चर्चाएं हुईं. रिजर्व बैंक के गवर्नर ने कहा. यह नीतिगत फैसला है. सरकार को निर्देश देना होगा. 25 टन सोना गिरवी रखा गया. तस्करी में जब्त यह सोना, सरकारी खजाने में था. 400-500 मिलियन डॉलर मिले. राशि बड़ी नहीं थी. लेकिन साख पर असर हुआ. बैंकों को भरोसा मिला. भारत डिफॉल्ट से बचेगा. नरेश चंद्रा ने इसके बारे में विस्तार से बताया है. विश्व बैंक की आशंकाएं दूर हुईं. ऋण देना शुरू किया.
चंद्रशेखर जन सभाओं में बताते, देश पर संकट था, हम किसान परिवार से हैं. हमने अपनी परंपराओं से सीखा है. खेत रेहन पर रहता है. घर का जेवर दे कर छुड़ाते हैं. फिर श्रम से कमाते हैं. जेवर वापस लाते हैं. हम यही करेंगे. आर्थिक सुधार की असल शुरुआत उन्होंने ही की. पर, बाद की सरकार को इसका क्रेडिट मिला.
जयतीरथ राव जैसे अर्थशास्त्री ने भी अपनी किताब में लिखा है. यह फैसला निर्णायक था. इसके बिना भारत 1991 में बिखर जाता. हमेशा के लिए साख खो देता. यह भारतीय परंपरा जैसा था. संकट में लोग गहने गिरवी रखते हैं. बाद में मेहनत से छुड़ाते हैं. चंद्रशेखर ने यही सोचा. यह देश की अस्मिता बचाने का उपाय था. उन्होंने कभी किसी पर दोषारोपण नहीं किया. पीएम मैं, दायित्व मेरा. मुँह नहीं मोड़ कर आगे आनेवाले प्रधानमंत्री पर देश की अस्मत बचाने का दायित्व छोड़, अपने फर्ज से मुँह नहीं मोड़ूँगा. जो पहले के लोगों ने किया है, लज्जाहीनता, अदूरदर्शिता, अविवेक के साथ.
चंद्रशेखर ने अन्य विकल्प देखे. निजाम के गहनों को बेचने का प्रस्ताव आया. क्रिस्टीज ने 850 करोड़ की पेशकश की. चंद्रशेखर ने ठुकराया. टोक्यो में दूतावास की संपत्ति बेचने का सुझाव था. 900 करोड़ की पेशकश थी. विदेश मंत्रालय ने मना किया. चंद्रशेखर ने सबसे प्रभावी रास्ता चुना.
उनकी कार्यशैली तार्किक थी. वह समस्याओं को जटिल नहीं बनाते थे. अयोध्या विवाद को सुलझाने की कोशिश की. सभी पक्षों से संवाद किया. शरद पवार ने लिखा है, अपनी आत्मकथा में. यह मसला हल होने वाला था. लेकिन राजीव ने समर्थन वापस लिया. हरियाणा के दो कांस्टेबल की जासूसी की घटना को समर्थन वापसी का आधार बनाया गया. कांग्रेस ने हरियाणा सरकार बर्खास्त करने की मांग की. चंद्रशेखर नहीं झुके. उन्होंने इस्तीफा दे दिया. लेकिन वोट ऑन अकाउंट पास कराया. ताकि सरकारी खर्च रुके नहीं. राजीव गांधी स्तब्ध. शरद पवार को दो उनके घर भेजा. चंद्रशेखर बोले. निर्णय नहीं बदलता.
चंद्रशेखर का व्यक्तित्व सादगी से भरा था. वह साहसी थे. सत्ता की लालसा नहीं थी. देशहित पहले था. वह जनता की भावनाओं को समझते थे. लेकिन लोकलुभावन वादों में नहीं फंसे. उनकी सरकार का कार्यकाल छोटा था. लेकिन प्रभाव बड़ा था. उनकी 98वीं जयंती पर यह याद करना जरूरी है. संकट में साहसिक निर्णय ही देश को बचाते हैं.
चंद्रशेखर की वैचारिकी समाजवादी थी. वह अव्यावहारिक आदर्शवाद में विश्वास नहीं करते थे. जमीन से जुड़े थे. उनकी बातें स्पष्ट थीं. वह लोकप्रियता के पीछे नहीं भागे.
आज उनकी जयंती पर उनकी दूरदृष्टि याद करनी चाहिए. वह समस्याओं को भविष्य के नजरिए से देखते थे. उनकी सरकार ने अल्प समय में बहुत कुछ किया. वह आज भी प्रेरणादायक है. उनकी सादगी और साहस नेताओं के लिए मिसाल है.
आज फिर राज्य सरकारें लोकलुभावन वादे कर रही हैं. उच्च ब्याज पर ऋण ले रही हैं. सुप्रीम कोर्ट ने भी चेतावनी दी है. मुफ्त रेवड़ियां खतरनाक हैं. ये लोगों को परजीवी बना रही हैं. कोर्ट ने कहा है, मुफ्त राशन और पैसा काम से दूर कर रहा है. यह सामाजिक और आर्थिक खतरा है.
थिंक टैंक एमके ग्लोबल की रिपोर्ट बताती है. चुनावी वर्षों में राजकोषीय घाटा बढ़ता है. इससे कई राज्य बहुत गंभीरता से प्रभावित हैं. दक्षिण के एक राज्य पर 20,000 करोड़ से ज्यादा बकाया है. बैंकों की हालत बिगड़ रही है. क्रिसिल रेटिंग्स का अनुमान है. इस साल राज्यों का घाटा 1.1 लाख करोड़ तक पहुंचेगा. यह स्थिति है.
लोकलुभावन नीतियों का लालच छोड़ना होगा. कठोर निर्णय लेने की हिम्मत चाहिए. उनकी कार्यशैली प्रेरणा देती है. सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी ने बहस को गंभीर किया है. क्या राजनीतिक दल इसे समझेंगे?
चंद्रशेखर का पूरा जीवन एक सबक है. संकट में साहस और समझदारी जरूरी है. उनकी सादगी प्रेरित करती है. उनकी स्पष्टता रास्ता दिखाती है. उनकी 98वीं जयंती पर हम संकल्प लें. उनके आदर्श अपनाएं. देश को संकट से बचाएं. उनकी विरासत हमें मजबूत भविष्य की ओर ले जाए.
लेखक राज्यसभा के सभापति और पूर्व वरिष्ठ पत्रकार हैं!
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