जब देश की जनता छठ पर ट्रेनों में ठुंसी हुई सफर कर रही थी, प्लेटफॉर्मों पर अफरातफरी मची थी और रेल मंत्री के सारे दावे बेअसर साबित हो रहे थे—तब पत्रकार रजत शर्मा सरकार से सवाल पूछने के बजाय उसका बचाव करते दिखे। अपने शो में उन्होंने रेल मंत्री की “पर्सनल इनवॉल्वमेंट” और “जनता की गलती” का हवाला देकर सारी जिम्मेदारी यात्रियों पर डाल दी। सवाल यह है—क्या अब पत्रकारिता का मतलब सरकार की जवाबदेही तय करना नहीं, बल्कि उसके लिए जनसंपर्क अधिकारी बन जाना रह गया है?
रजत शर्मा ने जो ट्वीट किया है वो पढ़ें…
छठ पूजा के लिए लोग पहले भी जाते थे. Trains में भीड़ पहले भी होती थी. कई लोग train की छत पर बैठ कर सफर करते थे. कुछ लोग train पर लटक कर अपनी जान पर खेल कर घर जाते थे और कोई इसकी परवाह नहीं करता था. रेलवे में इस तरह के travel को normal माना जाता था. भीड़ अब भी है, trains अब भी कम पड़ रही हैं. लेकिन रेलवे को अब लोगों की परवाह है. इसकी वजह है Railway Minister का personal involvement. अश्विनी वैष्णव ने data study करके plan बनाया, special trains चलाईं, facilities बढ़ाईं पर जब लोगों को पता चला कि अब special trains चल रही हैं, अब ज़्यादा सहूलियत है तो जो लोग पहले छठ पर घर नहीं जाते थे उन्होंने भी अपने bags pack कर लिए. भीड़ और बढ़ गई. अंदाज़ा गलत हो गया. इंतज़ाम कम पड़ने लगे. पर लोगों को इस बात का संतोष है कि रेलवे उनके travel की, उनकी सुविधाओं की चिंता करता है और ये विश्वास बड़ी चीज़ है.
ये सब वही पत्रकार हैं जो दूसरों के हगने के बाद लोटा लेकर बुलाए जाते हैं हाथों से “गांव” धुलने के लिए….उसके बाद बिना हाथ धुले सूंघ कर बताना होता है कि साहेब ने कल रात क्या खाया था… पत्रकारिता के इस स्तर को इससे ज्यादा बदबूदार ढंग से नहीं समझाया जा सकता….बेहतर होता इन सबको अपने साथ शौचालय में खींच कर दिल्ली से पटना की यात्रा करवाई जाती…!! ये पत्रकारिता की लाशें हैं जो बोल रही हैं….
-पवन सिंह
शर्मा के ट्वीट पर आए कुछ कमेंट्स भी पढ़िए….
श्रीराम यादव-
अरे कहना क्या चाहते हो ??? छठ पूजा, घर, ट्रेन …. अश्विनी वैष्णव की जय बोलकर भी ट्वीट खत्म कर सकते थे।
अखिलेश मिश्रा-
ये आदमी चाटुकारिता की पराकाष्ठा पार कर चुका है। वाक़ई गिरने में न्यूटन के सेब से भी ज़्यादा ख़तरनाक है। पर शर्मा जी की मेहनत का फल कटहल होगा।
शुहैब इकबाल-
आपका काम है 12000 स्पेशल रेल गाड़ियों की सूची सरकार से लेकर उसकी पूरी छानबीन करवाना की ये चल भी रहीं हैं या नहीं। अगर चल रहीं है तो इसकी जानकारी अपने प्रोग्राम में देना। और अगर नहीं चल रही है तो सरकार से सवाल करना। बातें बनाना नहीं।
अनिल कुमार-
ये संघी शर्मा जी, ट्रेनों में भारी भीड़ और असुरक्षित यात्रा को सामान्य बात बता रहे हैं, इनसे सवाल है कि अगर सब कुछ पहले जैसा ही है तो भाजपा ने क्या किया और सरकार बनाने की क्या जरूरत थी?
विकास चिकारा-
महराज, आपके मुख से वर्तमान सरकार की आलोचना भी निकली है क्या कभी? कोई तो ऐसा काम किया होगा इन सत्ताधीशों ने जिसकी आलोचना बनती हो।
राव साहब-
आप लोग दलाली में इतना ढल चुके हैं कि एक सवाल नहीं कर सकते हैं बस सिर्फ पहले भी ऐसा हुआ करता था तो आज भी ऐसा हो रहा है, अरे भाई पहले वाला को इसलिए तो हटाया गया था ना कि आने वाला सुधार लाए पर आप लोग का क्या ही है बस साहब को नाराज नहीं होना चाहिए चाहे जनता जाए भाड़ में। वैसे 12000ट्रेन.
कपिल डांग-
बिल्कुल सही फरमाया महोदय, भीड़ पहले भी होती थी और भीड़ आज भी है, लेकिन हां, पहले पत्रकार सरकार से सवाल करता था लेकिन आज सरकार की नाकामियों का बचाव करता नजर आ रहा है, चापलूसी का अपना ही रिकॉर्ड रोज तोड़ता है और शर्म की बात तो यह है कि उसके बावजूद अपने को काले कपड़ों में सफेद समझता है।



