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सुख-दुख

लघु पत्र-पत्रिकाओं की रियायती डाक सेवा समाप्त, कार्पोरेट कूरियर को बढ़ावा दे रही सत्ता

गौरी नाथ-

गभग 15 साल पहले एक महीने से ज़्यादा की समयावधि पर निकलने वाली (त्रैमासिक, अर्धवार्षिक, वार्षिक, अनियमित अवधि वाली) पत्रिकाओं के लिए रियायत हटाकर डाक विभाग ने अपनी सेवाओं में व्यापक परिवर्तन किया था। यूँ तब भी कई लोग मुद्रित पुस्तक की श्रेणी में पत्रिकाएँ भेजकर जैसे-तैसे काम चला लेते थे। विरोध उस तरह कहीं दिखा ही नहीं। जबकि तभी यह साफ़ हो गया था कि सरकार लघु पत्रिकाओं पर अंकुश लगाना चाहती है।

दरअसल हमारी सरकारों को यह पता चल गया है कि उसकी नीतियों की सर्वाधिक आलोचना लघु पत्रिकाओं और छोटे-छोटे प्रकाशन गृह से निकलने वाली किताबों में ही रहती है। इसलिए इस बार ज़्यादा कठोर कदम उठाते हुए पत्रिकाओं के साथ किताब, पम्पलेट आदि तमाम मुद्रित सामग्री को भेजी जाने वाली रियायती डाक सेवा ही समाप्त कर दी गई है।

ऐसा करके एक तरफ़ लघु पत्रिकाओं, छोटे प्रकाशन गृहों और छोटे-छोटे संगठनों से जारी होने वाली मुद्रित सामग्री पर अंकुश लगाने की तैयारी है, तो दूसरी तरफ़ कॉर्पोरेट घराने की कूरियर सेवाओं को बढ़ावा देने का प्रयास है।

क़ानून-व्यवस्था को लचर और इन्साफ़ चाहने वाले को असहाय कर देने के खेल खेलने वाले विरोध के स्वर को उभरने ही नहीं देना चाहते हैं। विकट असहिष्णुता के इस माहौल में दमन और सेंसरशिप को सत्ता अपने तरीक़े से कारगर करने में लगी हुई है।

सोचिए कि संविधान और लोकतंत्र की बात, भाईचारे और आज़ादी की बात, प्रेम और सौहार्द की बात इस माहौल में खुलकर हम-आप कहाँ और कैसे करेंगे?

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