संजय कुमार सिंह-
वोट चोरी से चुनाव जीतने के आरोप और राहुल गांधी का यह कहना कि हमें डिजिटल डाटा दीजिये हम साबित कर देंगे कि नरेन्द्र मोदी ने 25 सीटें बेईमानी से जीती हैं – मायने रखता है। यह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा के लिए भी चुनौती है। इसका मुकाबला सत्ता की ताकत और सत्ता में रहते हुए कमाये गये पैसों से नहीं, ईमानदारी और पारदर्शिता के साथ होना चाहिये। प्रधानमंत्री और सरकार को चुनाव आयोग का बचाव करने की बजाय चुनाव आयोग से कहना चाहिये कि मांगे गये डेटा दिये जायें या क्यों नहीं दिये जा रहे हैं। जाहिर है, बेईमानी साबित हो जाये तो इस्तीफा देना चाहिये। प्रधानमंत्री पर जो आरोप है वह इंदिरा गांधी पर लगे आरोप के मुकाबले काफी बड़ा और गंभीर है। दूसरी ओर जज जब राहुल गांधी को सच्चा भारतीय होने की सीख दे रहे हैं तो नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री रहते उनसे निष्पक्षता की उम्मीद नहीं है। प्रधानमंत्री की आगे की कार्रवाई से साबित होगा कि वे आरोपों को सही मानते हैं या नहीं। अगर गलत हैं तो चुनौती स्वीकार करनी चाहिये।
आइये देखते हैं बिन्दुवार मामला क्या है – इनमें ज्यादातर का जिक्र मेरी किताब, ईवीएम वाशिंग मशीन में धुली – में भी है।
भाजपा का सत्ता में आना -भाजपा गलत प्रचार करके सत्ता में आई। सीएजी के आरोप से लेकर स्विस बैंक में रखे काले धन तक।
कांग्रेस मुक्त भारत – सत्ता में आते ही कांग्रेस मुक्त भारत का लक्ष्य बताया गया। यह लोकतांत्रिक नहीं था। अब सोचिये कि भारत कांग्रेस मुक्त होता तो क्या होता।
राहुल गांधी को पप्पू बनाना – तब राहुल गांधी ने कहा था कि वे भाजपा को हरायेंगे और भाजपा पप्पू साबित करने में लगी रही।
ईवीएम मामले में सुनवाई नहीं – अब वह मुद्दा नहीं है। इसका मतलब यह नहीं है कि शिकायत नहीं है। जो चल रहा है उससे लगता है कि सिर्फ ईवीएम से चुनाव जीतना संभव नहीं हुआ तो अब मतदाता सूची का खेल बढ़ाना पड़ा है।
सुप्रीम कोर्ट का आदेश – दूसरे और तीसरे नंबर के उम्मीदवार की शिकायत पर जांच का आदेश दिया था। पर नहीं माना गया।
भारी फीस, नियम बदलना – दोबारा गिनती के लिए भारी फीस रखी गई। 48,000 रुपये, जीएसटी अलग से। फिर भी नियम तय नहीं हुए, समय निकल गया। गिनती नहीं हुई। नियमबदल गये।
मतदाता सूची से छेड़छाड़ – इसे तो लोग मान ही रहे हैं। बहुतों ने कहा है कि यह तो पहले से होता रहा है। पुराने उदाहरण भी हैं। इस बार सिर्फ सबूत के साथ पूरी गिनती साबित की गई है।
चुनाव आयुक्तों को परेशान करना – निष्पक्ष या सरकार विरोधी चुनाव आयुक्त को परेशान करने के उदाहरण हैं।
चुनाव आयुक्तों का पद छोड़ जाना – अचानक समय से पहले इस्तीफे भी हुए हैं। नोटिस पीरियड पूरा करने के लिए कहा गया पर शक है। सरकारी नौकरी थी, चुनाव कराने के बाद रिलीव किया जा सकता था।
मौजूदा चुनाव आयुक्त की नियुक्ति – सबको पता है कि नियमों का उल्लंघन करके हुई है। सुप्रीम कोर्ट में तारीख पर तारीख पड़ रही है। एसआईआर पर रोक नहीं, ना सही माना गया। कई बार सुनवाई हुई लेकिन मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति का मामला लटका है।
भाजपा और चुनाव आयोग का पक्ष – मुख्य चुनाव आयुक्त सरकार की पसंद हैं और सरकार तथा पार्टी उनका पक्ष ले रही है। संवैधानिक संस्था होने का दावा ठीक है। लेकिन मुखिया की नियुक्ति ही संदेह या विवाद में है तो उसे दुरुस्त करने के बाद ही स्वतंत्र और निष्पक्ष संवैधानिक भूमिका निभाने की अपेक्षा की जानी चाहिये।
विपक्ष की मांग पर सुनवाई नहीं – लोकसभा में एसआईआर पर चर्चा नहीं हुई। सरकार के तर्क यही थे कि चर्चा की जरूरत नहीं है। स्वतंत्र और निष्पक्ष संवैधानिक संस्थान प्रमुख विपक्षी दल की मांग नहीं सुन रहा है। आम जनता के खिलाफ जा रहा है, कानून और नियम बदले जा रहे हैं।
डिजिटल वोटर लिस्ट नहीं देना – डिजिटल इंडिया का प्रचार और डिजिटल वोटर लिस्ट नहीं देना ही अति है। अब पता चला कि उसे मशीन से नहीं पढ़ा जा सके इसके लिए एनक्रिप्ट भी कर दिया गया है – क्यों?
कानून बदलना – वीडियोग्राफी और डेटा नहीं रखना, 45 दिन में डिलीट करना पूर्णतः अवैज्ञानिक है। यह मान भी लिया जाये कि डाटा देखने में 3600 साल ही लगेंगे तो रिकार्ड क्यों करना और कर लिया तो रखने में क्या दिक्कत? संभव है बाद में तकनीक आ जाये जिससे कम समय में पढ़ा जा सके। या कुछ खास को देखने से काम चल जाये जैसे एक विधानसभा क्षेत्र से पूरे देश का अनुमान लग गया है।
सच्चे भारतीय होने का ज्ञान – देश के लिये काम करने या सत्तारूढ़ पार्टी का सक्षम विरोध करने वाले को सच्चा भारतीय होने का ज्ञान दिया गया। उसका उपयोग और प्रचार किया गया। जो बिल्कुल अनुचित और शरारतपूर्ण है।
वोट चोरी के तरीकों का खुलासा – ठीक है कि ये तरीके नये नहीं हैं, उदाहरणों की कमी नहीं है, साबित करने की जरूरत नहीं है फिर भी शपथपत्र पर मांगने का क्या मतलब? यही व्यवस्था चलती रही तो एफआईआर कराने के लिए भी शपथ पत्र देना होगा?
अब चुनाव आयोग का शपथ मांगना – राहुल गांधी को सजा हो गई थी, संसद की सदस्यता चली गई थी। शिकायतकर्ता से शपथपत्र नहीं मांगा गया था पर अब राहुल गांधी से मांगा जा रहा है। वे कह चुके हैं कि संसद के सदस्य के रूप में तो शपथ ले चुके हैं।
राहुल गांधी के पांच सवाल – चुनाव आयोग को विपक्ष के नेता के इन सवालों का जवाब देना चाहिये। ये सवाल न तो समान्य हैं औरन टालने लायक। चुनाव आयोग फंसा हुआ लग रहा है। टालने से इसकी पुष्टि होगी भले चुनाव आयोग के पास विकल्प न हो।
राहुल गांधी के पास विकल्प नहीं है – मुझे नहीं लगता है कि राहुल गांधी के पास आगे के लिए कोई विकल्प है। इसलिये, विपक्ष भले कुछ न कर पाये, भले भाजपा सत्ता में बनी रहे, अगला खुलासा और भी मारक होगा। इसकी तुलना कथित 2जी घोटाला और स्विस बैंक में काले धन के आरोपों तथा उसे भूल जाने से नहीं की जा सकेगी।
वेबसाइट बंद होना – आज चर्चा रही कि राहुल गांधी को गलत साबित करने या और खुलासों से रोकने के लिए वेबसाइट बंद कर दी गई। यह सही भी हो तो अजीब संयोग है और गलत हो तो चुनाव आयोग अपना बचाव नहीं कर पाया।
राहुल गांधी का दावा – गंभीर है कि डाटा दीजिये और साबित कर दूंगा कि सरकार चोरी के वोट से बनी है। अगर झूठे आरोप लगाने के लिए कार्रवाई न हो तो चुनौती स्वीकार की जानी चाहिये। चुनौती चुनाव आयोग न स्वीकार करे प्रधानमंत्री को करनी चाहिये। यह चुनौती प्रधानमंत्री के लिए भी है और जैसा आरोप है चुनाव आयोग सरकार या भाजपा के लिए यह सब कर रहा है तो भाजपा को भी कहना पड़ेगा कि वह ऐसा नहीं करवा रही है। पर चुनाव आयोग का बचाव करके भाजपा ने साबित कर दिया है कि लाभार्थी वही है।
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