
संजय कुमार सिंह
हिन्दी और अंग्रेजी अखबारों में छपे अपने एक लेख के जरिये राहुल गांधी ने चुनाव आयोग पर हमला बोल दिया। यह हमला बहुत ही सधा हुआ और घातक है लेकिन ज्यादातर अखबारों ने उसे बताना तो छोड़िये, छिपाने और बचाने की कोशिश की है। इस हद तक कि अमर उजाला का शीर्षक है, “प्रतिकूल नतीजों पर चुनाव आयोग को मैच फिक्सिंग बताना बेतुका, कानून का अपमान : आयोग”। उपशीर्षक है, महाराष्ट्र को लेकर कांग्रेस नेता राहुल गांधी के आरोपों पर चुनाव आयोग का पलटवार, कहा – यह हजारों कार्यकर्ताओं को हतोत्साहित करने वाला। कहने की जरूरत नहीं है कि यह शीर्षक या खबर संपूर्ण तथ्यों को बयान नहीं कर रहा है। जहां तक चुनाव आयोग और ईवीएम की निष्पक्षता की बात है, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी लोकसभा चुनाव में सीटें कम आने पर यह कह चुके हैं – मैंने पूछा, ये बताओ ईवीएम जिंदा है या मर गया। तभी उन्होंने यह भी कहा था, ये लोग तय कर बैठे थे कि भारत के लोकतंत्र और चुनावी प्रक्रिया से भरोसा उठ जाए। उन्होंने आगे कहा कि चार जून (2024) की शाम तक जो लोग ईवीएम की विश्वसनीयता पर सवाल उठा रहे थे, उनके मुंह पर ताला लग गया। अगले पांच साल तक अब ईवीएम पर कोई चर्चा नहीं होगी। लेकिन हो सकता है कि 2029 के बाद फिर से विपक्षी दल ईवीएम पर सवाल उठाएं। पीएम मोदी ने आगे कहा कि मतदान के बीच विपक्ष ने चुनाव को रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट का भी दरवाजा खटखटाया था। तथ्य यह है कि लोकसभा चुनाव में भी गड़बड़ी की शिकायतें हैं और एक दो नहीं कई हैं। इतनी कि बैसाखी के बावजूद सरकार नहीं बनती पर वह मामला दूसरा है।
यह तथ्य है कि भाजपा सत्ता में आने से पहले ईवीएम के खिलाफ थी। भाजपा नेताओं की कम से कम दो किताबें हैं, ईवीएम को हैक करके दिखाया जा चुका है और तबकी सरकार ने हैक करने वाले को परेशान भी किया था जो अब याद नहीं किया जाता है। अब कहा जाता है, प्रतिकूल नतीजों पर चुनाव को मैच फिक्सिंग बताना बेतुका है। इसमें यह बात दब जाती है कि अनुकूल नतीजों के कारण ही भाजपा ईवीएम (और चुनाव आयोग) का पक्ष ले रही है। वरना प्रधानमंत्री कह चुके हैं विपक्ष चाहता है कि, ये लोग तय कर बैठे थे कि भारत के लोकतंत्र और चुनावी प्रक्रिया से भरोसा उठ जाए। राहुल गांधी ने चुनाव आयोग से फिर कहा है बिना हस्ताक्षर के, मध्यस्थों को टालू नोट जारी करना गंभीर सवालों का जवाब देने का तरीका नहीं है। अगर आपके पास छिपाने के लिए कुछ नहीं है, तो मेरे लेख में उठाये गए सवालों के जवाब दीजिये और निम्नलिखत के जरिये इसे साबित कीजिये
• महाराष्ट्र सहित सभी राज्यों के लोकसभा और विधानसभा के सबसे हालिया चुनावों की समेकित, डिजिटल और मशीन से पढ़ने योग्य मतदाता सूची प्रकाशित करें जो ।
• महाराष्ट्र के मतदान केंद्रों के शाम पांच बजे के बाद की सभी सीसीटीवी फुटेज जारी करें।
• बचने और भागने जैसे टाल-मटोल वाले रवैये से आपकी विश्वसनीयता नहीं रहेगी। सच बोलने से सुरक्षित रहेगी।
स्थिति यह है कि प्रधानमंत्री और विपक्ष के नेता – दोनों भारत के लोकतंत्र और चुनावी प्रक्रिया पर भरोसा बनाये रखने की बात करते हैं लेकिन अलग समय पर। उसे हारने पर प्रचारित किया गया है जबकि सत्ता नहीं थी तो भाजपा ईवीएम के खिलाफ थी अब नहीं है। अपने ही चुने आयुक्त और आयोग के खिलाफ होना तो मुश्किल है ही परन्तु उसका पक्ष लेने से बचा जा सकता है। लेकिन सच्चाई यह है कि प्रधानमंत्री के समर्थक और प्रचारक ईवीएम, चुनाव आयोग का समर्थन करते हैं और इसके खिलाफ बोलने वालों के खिलाफ हो जाते हैं। अमर उजाला के आज के शीर्षक से यह स्पष्ट है वरना खबर जो है उसे इंडियन एक्सप्रेस के शीर्षक से जानें तो इस प्रकार है, राहुल ने चुनाव आयोग पर यह कहते हुए हमला किया कि चुनाव आयोग के आंकड़े मेल नहीं खाते हैं, अधिकारयों ने कहा बदनाम करने की कोशिश। जाहिर है, अमर उजाला ने राहुल गांधी के आरोप की मूल बातों में से किसी को शीर्षक में नहीं रखा है, शीर्षक है चुनाव आयोग का पलटवार। और आप जानते हैं कि पलटवार बिना दस्तखत के मध्यस्थों के जरिये हुआ है। मुझे लगता है कि लोकतंत्र के लिए यह स्थिति पर्याप्त खराब है और चुनाव आयोग ने अगर कुछ तय कर रखा है तो वह अलग और बाद की बात है।
दि एशियन एज में यह खबर लीड नहीं है। तीन कॉलम की यह खबर राहुल गांधी की फोटो के साथ छपी है और इसका शीर्षक है, राहुल का आरोप बिहार चुनाव भी महाराष्ट्र की तरह गड़बड़ होंगे। भाजपा और चुनाव आयोग की बातें उपशीर्षक में हैं। खबर के अनुसार भाजपा ने इसे जबरदस्त साजिश कहा है जबकि चुनाव आयोग ने प्रतिवाद जारी किया है। आप जानते हैं कि यह बिना दस्तखत के है और इसपर राहुल गांधी ने जो चुनौती दी है वह यहां नहीं है। सवाल यह है कि राहुल गांधी अगर चुनाव आयोग, चुनाव प्रक्रिया या चुनाव से संबंधित आंकड़ों पर आरोप लगा रहे हैं तो उसमें भाजपा की क्या भूमिका? चुनाव आयोग को अपनी निष्पक्षता क्यों नहीं साबित करनी चाहिये और राहुल गांधी को क्यों नहीं कहना चाहिये कि वह उन्हें संतुष्ट करे। इसमें भाजपा का इस बात से कोई संबंध नहीं होना चाहिये कि आरोप कैसे हैं और क्या हैं। दूसरी ओर भाजपा को यह पता ही नहीं था कि कांग्रेस ने कल का हमला बड़ी तैयारी से बोला था। हिन्दी में लेख दैनिक जागरण में छपा जो सरकार सर्मथकों और प्रचारकों का ऐसा अखबार है कि अखिलेश यादव उसके बायकाट की सार्वजनिक घोषणा कर चुके हैं। ऐसे में राहुल गांधी का मकसद अपनी बात भाजपा और सरकार समर्थकों को बताना ही हो सकता है। उन्होंने लेख में जो मुद्दे उठाये और टालू प्रतिवाद का जो जवाब दिया उससे अलग, कांग्रेस की तैयारी की चर्चा ही नहीं है।
कांग्रेस के प्रवक्ता गुरदीप सिंह सप्पल ने फेसबुक पर लिखा था, सात फरवरी 2025 को राहुल गांधी, सुप्रिया सुले और संजय राउत ने एक साथ प्रेस कांफ्रेंस की थी। उसमें महाराष्ट्र चुनाव में वोटर लिस्ट की अनियमितता और चुनावी प्रक्रिया पर डेटा प्रस्तुत किया गया था और चुनाव आयोग से कुछ सवाल पूछे थे। प्रेस कांफ्रेंस के कुछ ही मिनट बाद चुनाव आयोग ने वक्तव्य जारी किया कि वो जल्दी ही तथ्यों के साथ राहुल जी की बातों का जवाब देंगे। चुनाव आयोग ने उस दिन हैडलाइन बना दी। लेकिन वो दिन है और आज का दिन है। चुनाव आयोग ने कोई तथ्य नहीं दिए, कोई जवाब नहीं दिया। प्रचारकों का तर्क है कि सब वेबसाइट पर है, चुनाव के समय दिया ही जाता है। पर राहुल गांधी ने मशीन से पढ़े जा सकने वाले डिजिटल डाटा की बात की है और जवाब यह होना चाहिये कि हम डिजिटल आंकड़ा नहीं देगें या इन कारणों से नहीं दे सकते हैं। इसमें पलटवार की गुंजाइश ही नहीं है और संवैधानिक संस्था का काम नहीं है कि वह विपक्ष के नेता के सवालों पर पलटवार करे। वैसे भी चुनाव आयोग ने तीन महीने का समय मांगा था और कांग्रेस ने चार महीने दिये। उनके जवाब का इंतजार किया। बिहार चुनाव से पहले चुनाव की निष्पक्षता सुनिश्चित करने की कोई कोशिश नहीं हुई और उधर ऑपरेशन सिन्दूर के नाम पर युद्ध से लेकर रोड शो और सरेंडर तक हुआ। आप समझ सकते हैं कि चुनाव में सरकार में होने का लाभ लेने की कोशिश तो पूरी है, दिखाई दे रही है पर चुनाव आयोग निष्क्रिय है। इसके लिए हमला बोला गया तो भाजपा का पूरा इको सिस्टम बचाव में कूद पड़ा। फिर भी चाहता है कि आयोग की विश्वसनीयता बनी रहे। प्रधानमंत्री ने लोकसभा चुनाव के नतीजों पर जो कहा उसे तो पूरा प्रचार मिला लेकिन हरियाणा और महाराष्ट्र में अनअपेक्षित जीत पर कुछ कहा हो यह सुनने में नहीं आया। इसीलिये मैंने पूरी व्यवस्था पर एक किताब लिखी है, ईवीएम वाशिंग मशीन में धुली। मुझे उम्मीद थी कि लोग वास्तविकता को जानने के लिए किताब पढ़ना चाहेंगे पर ऐसा कुछ लगता नहीं है और राहुल गांधी के लेख पर जो प्रतिक्रिया है, (चुनाव आयोग का भी) उसे पढ़कर नहीं लगता है कि लेख पढ़कर उनके लिए लिखा गया है जो लेख पढ़ चुके हैं।
कुल मिलाकर, यह व्यवस्था बन गई है और इसकी शुरुआत 2010 में आई किताब, डेमोक्रेसी ऐट रिस्क से हुई थी जो यह बताने के लिए लिखी या लिखवाई गई थी कि ईवीएम खराब है, उसके उपयोग से लोकतंत्र खतरे में पड़ जायेगा और जब सत्ता मिल गई तो ईवीएम ठीक है। वैसे ही जैसे खराब आधार और खराब जीएसटी सत्ता मिलते ही अच्छा और जरूरी हो गया था। स्विस बैंक में रखे काले धन और शेल कंपनियों के जरिये भ्रष्टाचार से कमाये काले धन का निवेश यहां की कंपनियों में करने का आरोप और अदाणी के 20,000 करोड़ रुपये का पता नहीं चलना और सेबी प्रमुख को क्लिन चिट मिलना। यही नहीं, पहले रुपये का भाव गिरता था तो प्रधानमंत्री जिम्मेदार होते थे, सीमा पार से आतंकी आते थे तो केंद्र सरकार जिम्मेदार होती थी अब सब बदल गया है। अब आतंकी हों या घुसपैठिये पश्चिम बंगाल की लगी सीमा से ही आते हैं, पकड़े जायें या नहीं पाकिस्तान को घुसकर मारना है आदि आदि। जब व्यवस्था ऐसी बन गई है तो अखबार भी वैसे ही हैं। इनके लिए चुनाव की चोरी का पूरा खेल समझने-समझाने लायक नहीं है, राहुल गांधी (कांग्रेस) समझाये तब भी। नरेन्द्र मोदी कुछ नहीं करके, सब कुछ अदाणी को बेचकर भी चुनाव जीतते जा रहे हैं तो वह मुद्दा नहीं है राहुल गांधी सवाल उठा रहे हैं क्योंकि वे हार जा रहे हैं। इसमे चुनाव जीतना छिपा लिया जाता है जबकि जीतने और हारने का भी पैटर्न है और वह भी बताता है कि सब ठीक नहीं है।
स्थिति यह है कि नवोदय टाइम्स में पहले पन्ने पर दो ही खबरें और लीड का शीर्षक है, हारने पर आयोग को बदनाम करना बेतुका निर्वाचन आयोग। कहने की जरूरत नहीं है कि यह शीर्षक चुनाव आयोग के जवाब के बाद एक्स पर राहुल गांधी की चुनौती के बाद या बावजूद है। कहने की जरूरत नहीं है कि चुनाव आयोग की बदनामी उसके काम के कारण हो रही है और काम ठीक होता तो किसी के कहने लिखने से बदनामी नहीं होती वैसे ही जैसे भाजपा के दो बड़े नेताओं की किताबों और पूरे तंत्र के प्रयासों से भी नहीं हुई थी और 2019 में पू्र्व चुनाव आयुक्त नवीन चावला ने भी अपनी किताब में लिखा था कि ईवीएम ठीक है पर बहुतों को यकीन नहीं है। मानना, नहीं मानना तो पाठकों का काम है और पाठक किताब खरीद कर पढ़ते होते तो कोई सरकारी बैंक इंडिया ऐट 100 की लाखों प्रतियां खरीद कर क्यों बांटता। द टेलीग्राफ ने राहुल गांधी के लेख की इस खबर को पहले पन्ने पर नहीं रखा है लेकिन उसने बैंगलोर में हुए हादसे से जुड़े मामले को पहले पन्ने पर रखा है और बता रहा है कि वहां क्या सब हो रहा है जो डबल इंजन राज्यों में कई वर्षों से सुना नहीं गया। हिन्दुस्तान टाइम्स और टाइम्स ऑफ इंडिया ने भी इसे पहले पन्ने के लायक नहीं माना है। द हिन्दू आज मैं देख नहीं पाया।


